सोमवार, 29 जून 2026

व्यक्तित्व
जनसंघर्षों को साहित्य का सरोकार बनाने वाली महाश्वेता देवी
अमन 

महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को ढाका के जिंदाबहार लेन में हुआ था। महाश्वेता देवी को केवल एक प्रसिद्ध लेखिका कह देना उनके काम को छोटा कर देना होगा। वे उस परंपरा की रचनाकार थीं जिनके लिए लेखन राज्य मशीनरी से संवाद का नहीं, बल्कि उससे संघर्ष का माध्यम होता है। उनका साहित्य उन लोगों की ओर से उठाई गई आवाज है, जिनकी आवाज इस व्यवस्था ने हमेशा से दबाकर रखी थी। आदिवासी, दलित, भूमिहीन मजदूर, स्त्रियाँ और हाशिए पर धकेले गए समुदाय। उन्होंने साहित्य को सजावट या मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि सामाजिक संघर्ष का औजार बनाया। 

महाश्वेता देवी के लेखन में ‘भारत’ का रूप वो नहीं है जो प्रधानमंत्री के भाषणों और सरकारी फाइलों में दिखता है, बल्कि वह भारत है जो कथित ‘‘विकास’’ और ‘‘लोकतंत्र’’ के शोर के नीचे दबा हुआ है। उन्होंने उस देश को देखा जहाँ जंगल केवल संसाधन हैं, जमीन केवल मुनाफा और इंसान उनके ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की राह में एक बाधा। आदिवासी इलाकों में काम करते हुए उन्होंने महसूस किया कि ‘शोषण’ ही इस व्यवस्था का मूल चरित्र है। यही समझ उनके लेखन की राजनीतिक चेतना बनती है। उनके यहाँ साहित्य और सक्रियता अलग-अलग रास्ते नहीं हैं, बल्कि एक ही संघर्ष के दो रूप हैं। 

उनकी रचनाओं में पात्रों के जीवन में किसी न किसी तरह जनसंघर्ष एक मूल जरूरत की तरह मौजूद रहता है। उनके उपन्यास ‘अरण्येर अधिकार’ में बिरसा मुंडा का संघर्ष औपनिवेशिक सत्ता, जमींदारी व्यवस्था और धार्मिक-प्रशासनिक गठजोड़ के खिलाफ आदिवासी समुदाय के प्रतिरोध का प्रतीक बन जाता है। इस उपन्यास में महाश्वेता स्थापित करती हैं कि आदिवासी आंदोलन ‘‘पिछड़ेपन’’ की अभिव्यक्ति नहीं थे, जिस तरह राज्य मशीनरी और मीडिया उन्हें पेश करता है बल्कि न्याय और आत्मनिर्णय की चेतना से जन्मे राजनीतिक आंदोलन थे। 

महाश्वेता देवी के साहित्य की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वे उत्पीड़ितों को दया का पात्र नहीं बनातीं, बल्कि उन्हें संघर्षशील विषय के रूप में सामने रखती हैं। उनकी चर्चित कहानी ‘द्रौपदी’ इसी का उदाहरण है। द्रौपदी, जो एक संथाल आदिवासी महिला थी, राज्य की दमनकारी मशीनरी का शिकार होती है। उसे नक्सली होने के आरोप में गिरफ्तार कर बलात्कार किया जाता है। बलात्कार के बाद जब सिपाही उसे कपड़े देने आता है तो वो कहती है; ‘‘मैं कपड़े क्यों पहनूं, यहाँ कोई इंसान नहीं जिससे मैं शर्माऊं’’। यहाँ प्रतिरोध किसी आदर्श नैतिकता से नहीं, बल्कि अपमान के विरुद्ध उठे आत्मसम्मान से पैदा होता है। कोई ताज्जुब नहीं कि सत्ता में आने के बाद देश के हिंदू फासीवादियों को ये कहानी इतनी खटकती रही कि उन्होंने इसे विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों से निकालना शुरू कर दिया। 

इसी तरह ‘हजार चैरासी की माँ’ उपन्यास में महाश्वेता देवी ने नक्सलबाड़ी आंदोलन को एक माँ की नजर से देखने की कोशिश की है। यह उपन्यास नक्सल आंदोलन को रोमांटिक या खारिज करने के बजाय, उस सामाजिक परिस्थिति को समझने की कोशिश करता है जहाँ से प्रतिरोध जन्म लेता है। एक माँ के अनुभव के जरिए महाश्वेता देवी यह दिखाती हैं कि व्यवस्था केवल विद्रोहियों को नहीं मारती, बल्कि उनके परिवारों को भी सामाजिक रूप से रोज मारती है। ‘हजार चैरासी की माँ’ उस माँ की मर्मस्पर्शी कहानी है जिसने जान लिया है कि उसके पुत्र का शव पुलिस हिरासत में कैसे और क्यों है? 

महाश्वेता देवी का साहित्य सत्ता की भाषा को स्वीकार नहीं करता। वे विकास, कानून और व्यवस्था जैसे शब्दों के पीछे छिपी हिंसा को बेनकाब करती हैं। बंधुआ मजदूरी, वनाधिकार, विस्थापन, पुलिस दमन और काॅरपोरेट लूट जैसे मुद्दे उनके लेखन में बार-बार लौटते हैं। 

उनका साहित्य इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कई जनांदोलनों में महाश्वेता सीधे तौर पर जुड़ी थीं। उन जनसंघर्षों ने उनके जीवन को भी परिवर्तित किया और लेखन को भी। वे आदिवासियों की ओर से बोलने का दावा नहीं करतीं, बल्कि उनके साथ खड़े होकर बोलती हैं। वर्षों तक वे जमीनी आंदोलनों से जुड़ी रहीं, जनसंगठनों के साथ काम किया और कानूनी लड़ाइयों में भी हिस्सा लिया। भाषा के स्तर पर महाश्वेता किसी साहित्यिक शुद्धता की परवाह नहीं करतीं। उनके बारे में कहा गया है कि उनके साहित्य की भाषा सत्ता के सुसंस्कृत व्याकरण को तोड़ती है, उनकी भाषा खुरदरी है, कई बार असुविधाजनक भी, लेकिन ईमानदार है। उसमें लोकबोलियाँ हैं, गालियाँ हैं, क्रोध है, करुणा है। 

नारी प्रश्न उनके लेखन में किसी अलग ‘विषय’ की तरह नहीं आता, बल्कि वर्ग, जाति और सत्ता के साथ गुँथा हुआ दिखाई देता है। उनकी स्त्रियाँ न तो आदर्श नारी हैं, न ही सिर्फ पीड़िता। वे श्रम करती हैं, प्रतिरोध करती हैं और व्यवस्था के नैतिक ढोंग को उजागर करती हैं। कहा जा सकता है कि महाश्वेता देवी का स्त्रीवाद जमीन से निकला हुआ, वर्ग-सचेत और राजनीतिक है। 

आज जब असहमति को ‘अपराध’, संघर्ष को ‘राष्ट्रविरोध’ और सवाल पूछने को ‘अर्बन नक्सल’ कहा जा रहा है, तब महाश्वेता देवी का लेखन और भी जरूरी हो जाता है। आज इस बात को और भी ज्यादा जोर देकर कहने की जरूरत बन जाती है कि साहित्य का काम व्यवस्था को सजाना नहीं, बल्कि उसे सवालों के कटघरे में खड़ा करना है। आज जनसंघर्ष कोई रोमांटिक आइडिया नहीं बल्कि समाज बदलाव की अनिवार्य शर्त बन जाता है।          ऽऽऽ

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