पर्यावरण
अरावली की नीलामी
कैसे पूंजीवादी लालच ने भारत की ‘प्राकृतिक ढाल’ को मुनाफे की भेंट के लिए पेश किया
आदित्य सिंह
प्रकृति किसी की निजी जागीर नहीं होती। यह एक साझा संसाधन है। हवा, पानी और पहाड़ पर हर उस नागरिक का अधिकार है जो इस देश में सांस लेता है। लेकिन जब सत्ता और पूंजी का गठबंधन हो जाता है, तो सबसे पहले सार्वजनिक संपत्ति की ही बोली लगती है।
उत्तर भारत को थार के रेगिस्तान से बचाने वाली 2 अरब साल पुरानी ‘अरावली पर्वत श्रृंखला’ आज अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रही है। लेकिन यह लड़ाई प्रकृति बनाम विकास की नहीं है। यह लड़ाई ‘मुनाफा बनाम जीवन’ की है। एक तरफ चंद अरबपतियों की तिजोरियां हैं, और दूसरी तरफ करोड़ों आम लोगों का अस्तित्व।
यह लेख बताता है कि कैसे एक कलम की नोक से पहाड़ों की परिभाषा बदलकर, देश के फेफड़ों को माइनिंग माफिया और रियल एस्टेट के दिग्गजों के हवाले करने की साजिश रची गई है।
100 मीटर का ‘खेल’: पहाड़ों को कागजों पर मिटाने की साजिश- पूंजीवाद की सबसे बड़ी चालाकी यह है कि वह लूट को ‘कानून’ का जामा पहना देता है। हाल ही में अदालत द्वारा अरावली की नई परिभाषा तय की गई। इसके अनुसार, केवल उन्हीं पहाड़ियों को ‘पहाड़’ माना जाएगा जो 100 मीटर से ऊँची हैं।
सुनने में यह तकनीकी लगता है, लेकिन असलियत में यह संसाधनों को हड़पने का एक रास्ता है। दुनिया भर में ऊंचाई ‘समुद्र तल’ ;ैमं स्मअमस) से नापी जाती है, लेकिन अरावली के लिए एक नया पैमाना बनाया गया। ऊंचाई को आसपास की जमीन (ठंेम स्मअमस) से नापा जाएगा। चूंकि अरावली का बेस पहले से ही ऊंचा है, इसलिए अगर कोई पहाड़ समुद्र तल से 190 मीटर भी ऊंचा है, तो भी उसे इस नई परिभाषा में ‘पहाड़’ नहीं माना जाएगा।
आंकड़े इस धोखे की गवाही देते हैं। ‘फारेस्ट सर्वे आफ इंडिया’ के डेटा का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से मात्र 1,048 पहाड़ ही 100 मीटर से ऊंचे हैं और 90 प्रतिशत से ज्यादा पहाड़ इस नई परिभाषा के चलते अपना कानूनी संरक्षण खो देंगे। इसका सीधा मतलब है- इन 90 प्रतिशत पहाड़ों पर अब जंगल संदर्भी कानून लागू नहीं होगा, और ये जमीनें माइनिंग कंपनियों और बिल्डरों के लिए ‘ओपन ट्रेजरी’ बन जाएंगी।
प्राकृतिक संसाधनों की लूट और वर्ग संघर्ष- समाजवादी चिंतन हमेशा यह प्रश्न पूछता है- संसाधन किसके और फायदा किसका? अरावली के मामले में यह साफ है कि नुकसान आम जनता, किसान, मजदूरों का है और फायदा धनाढ्य वर्ग का।
अरावली के गर्भ में सिलिका, क्वार्ट्ज और तांबे जैसे बेशकीमती खनिज छिपे हैं। ऊपर की जमीन दिल्ली-छब्त् के सबसे महंगे रियल एस्टेट बाजार का हिस्सा है। जांच में सामने आया है कि कैसे ‘शेल कंपनियों’ (फर्जी कंपनियों) का जाल बिछाकर सार्वजनिक वन भूमि को निजी हाथों में सौंपा जा रहा है।
नियमों के मुताबिक, वन भूमि पंचायतों की होती है, यानी समुदाय की। लेकिन पतंजलि समूह जैसी बड़ी कारपोरेट संस्थाओं और रसूखदार राजनेताओं ने कानूनों को दरकिनार कर हजारों एकड़ जमीन पर कब्जा जमा लिया है। जहाँ कभी आम मवेशी चरते थे और स्थानीय आदिवासी रहते थे, वहाँ आज आलीशान फार्महाउस, रिसार्ट और बैंक्वेट हाल खड़े हैं।
यह अमीर और गरीब के बीच की खाई को और गहरा करता है। एक तरफ वो अमीर हैं जो अरावली के बीचों-बीच फार्महाउस बनाकर ‘शुद्ध हवा’ खरीद रहे हैं, और दूसरी तरफ वो आम जनता है जो इन्हीं पहाड़ों के टूटने से उड़ने वाली धूल और प्रदूषण में दम तोड़ने को मजबूर है।
‘चंदा दो, धंधा लो’ का माडल- लोकतंत्र में सरकार का काम जनता के हितों की रक्षा करना होता है, लेकिन जब नीतियां कारपोरेट चंदे से तय होने लगें, तो वह लोकतंत्र नहीं, धनतंत्र (च्सनजवबतंबल) बन जाता है।
इलेक्टोरल ट्रस्ट के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर एक सीधा पैटर्न दिखाई देता है। जिन्हें बड़े प्रोजेक्ट्स और जमीनें मिल रही हैं, वे ही सत्ताधारी दलों के सबसे बड़े फंडर हैं। यह एक स्ट्रक्चरल करप्शन (ढांचागत भ्रष्टाचार) है। अरावली को बचाने वाले कानूनों को इसलिए कमजोर नहीं किया गया कि उससे देश का विकास होगा, बल्कि इसलिए कमजोर किया गया ताकि खनन माफिया और रियल एस्टेट लाबी को उनके ‘निवेश’ का रिटर्न मिल सके।
पर्यावरण विनाशः गरीब पर सबसे पहली मार- जब पर्यावरण का विनाश होता है, तो उसकी सबसे बड़ी कीमत समाज के सबसे कमजोर वर्ग को चुकानी पड़ती है। अमीर अपने घरों में एयर प्यूरीफायर लगा लेंगे और मिनरल वाटर खरीद लेंगे, लेकिन किसान और मजदूर कहां जाएंगे?
पर्यावरण को चुकानी होगी कीमत- अरावली को नष्ट करने के परिणाम भविष्य की बात नहीं हैं। वे आज दिखाई दे रहे हैं। भारत की यह ‘ग्रेट वाल’ टूट चुकी है। सैटेलाइट इमेज और जमीनी रिपोर्ट बताती हैं कि पर्वत श्रृंखला में 12 बड़े ‘‘गैप’’ (खाली स्थान) बन गए हैं जहां पहाड़ों को कानूनी और गैर-कानूनी खनन द्वारा समतल कर दिया गया है।
इन रास्तों से थार रेगिस्तान पूर्व की ओर बढ़ रहा है। दिल्ली और छब्त् में धूल भरी आंधियां अब आम हो गई हैं। हरियाणा की मिट्टी खराब हो रही है, और राज्य का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा रेगिस्तान बनने की कगार पर है।
पानी का संकट भी उतना ही डरावना है। अरावली की चट्टानें एक प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करती हैं, जो लाखों लोगों के लिए भूजल को रिचार्ज करती हैं। इस जमीन का एक हेक्टेयर सालाना 20 लाख लीटर तक पानी सोख सकता है। जैसे-जैसे पहाड़ों पर रिसार्ट बनाने के लिए कंक्रीट बिछाया जा रहा है, यह स्पंज नष्ट हो रहा है। क्षेत्र में भूजल स्तर हजारों फीट नीचे गिर गया है, और बड़खल और दमदमा जैसी झीलें या तो पूरी तरह सूख चुकी हैं या सिकुड़ कर बहुत छोटी रह गई हैं।
सहमति गढ़ने का खेल (डंदनंिबजनतपदह ब्वदेमदज)- इस पूरे प्रकरण का सबसे घिनौना पहलू जनता को गुमराह करने की कोशिश है। सोशल मीडिया पर बहुत सी वीडियो में सबूत दिखाए गए हैं कि कैसे इन्फ्लुएंसर्स को सरकार के पक्ष में वीडियो बनाने के लिए कथित तौर पर पैसे दिए गए। उन्हें ऐसी स्क्रिप्ट दी गई जिसमें विनाश को ‘विकास’ बताया गया और दावा किया गया कि नई परिभाषा वास्तव में पहाड़ों को ‘बचा’ रही है।
गोदी मीडिया ने भी इसमें भूमिका निभाई है। कुछ एंकरों ने प्रदूषण के लिए अजीबोगरीब तरीके से पहाड़ों को ही दोषी ठहराया, यह कहते हुए कि पहाड़ प्रदूषण को रोक कर रखते हैं, जबकि असल में अरावली प्रदूषण को कम करने में मदद करती है।
निष्कर्षः यह सिर्फ पहाड़ नहीं, हमारी साझा विरासत है- सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में जन-दबाव के चलते इस नई परिभाषा पर रोक लगाई है, जो एक राहत की खबर है। लेकिन यह संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।
अरावली का विनाश केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है। यह एक सामाजिक अन्याय है। यह उस व्यवस्था का परिणाम है जो मुनाफे को पर्यावरण से और निजी संपत्ति को सार्वजनिक कल्याण से ऊपर रखती है।
हमें यह समझना होगा कि हवा, पानी और पहाड़ किसी कंपनी की बैलेंस शीट का हिस्सा नहीं हो सकते। अरावली को बचाना केवल दिल्ली या हरियाणा को बचाने की बात नहीं है, बल्कि यह पूंजीवादी अतिक्रमण के खिलाफ जनता के अधिकार को वापस लेने की लड़ाई है। जब तक समाज का हर नागरिक (किसान, छात्र, और मजदूर) अपने इन साझा संसाधनों के लिए खड़ा नहीं होगा, तब तक यह लूट जारी रहेगी।
आखिरकार, सवाल यही है - हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को क्या सौंपना चाहते हैं - चंद अमीरों के लिए चमकते माल, या सबके लिए सांस लेने योग्य हवा? फैसला सामूहिक होना चाहिए।
डेटा स्रोतः फारेस्ट सर्वे आफ इंडिया, केंद्रीय अधिकारिता प्राप्त समिति (ब्म्ब्) की रिपोर्ट्स और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध इलेक्टोरल ट्रस्ट डेटा और अदालती आदेशों के गहन विश्लेषण पर आधारित। ऽऽऽ
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