बौद्ध धर्म
-शाकिर
आज हमारे देश में दलितों में एक धारा है जो जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न से अपनी मुक्ति हिन्दू धर्म को त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाने में देखती है। इसके अनुसार बौद्ध धर्म न केवल जातिगत भेदभाव से मुक्त है बल्कि इसका विरोधी भी है। इसलिए इसे अपनाकर जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न से मुक्ति पायी जा सकती है। इसकी शुरुआत 1956 में डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने की थी। जब उन्होंने अपने हजारों अनुयाइयों के साथ नागपुर में बौद्ध धर्म अपना लिया था। बौद्ध धर्म अपनाने वाले इन लोगों को आम तौर पर नव-बौद्ध कहा जाता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे भारत में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान के तौर पर देखा जा रहा है। यानी लगभग एक हजार साल तक विलोपन के बाद अब भारत में बौद्ध धर्म का पुनरुत्थान हो रहा है।
यह अजीब बात है कि आज दुनिया में बौद्ध धर्म के पचास करोड़ से ज्यादा अनुयाई हैं पर स्वयं अपनी जन्मभूमि भारत में ही यह करीब हजार साल तक विलुप्त प्राय रहा। अब नव-बौद्धों की वजह से उसका यहां पुनरुत्थान हो रहा है। ऐसा क्यों हुआ? एक समय बौद्ध धर्म भारत में प्रमुख धर्म था फिर यह यहां से विलुप्त क्यों हो गया? क्या इसमें भारत की वर्ण- जाति व्यवस्था की कोई भूमिका थी? भारत की वर्ण-जाति की सामाजिक संरचना से बौद्ध धर्म का वास्तविक सम्बन्ध क्या था? क्या वास्तव में बौद्ध धर्म वर्ण-जाति व्यवस्था के विरुद्ध था जैसा कि अम्बेडकरवादी दावा करते हैं? क्या बौद्ध धर्म वर्ण-जाति व्यवस्था के भेदभाव से मुक्त है? बौद्ध धर्म ने भारत के इतिहास में वास्तव में क्या भूमिका निभाई? क्यों बौद्ध धर्म पूरे एशिया (खासकर उत्तर व पूर्वी एशिया) में तो फैला और बना रहा पर स्वयं अपनी जन्मभूमि भारत से लुप्त हो गया? क्या आज प्रचलित बौद्ध धर्म वही है जिसे गौतम बुद्ध ने प्रवर्तित किया था?
बौद्ध धर्म दुनिया के उन तीन धर्मों में से एक है जिन्होंने महान सामाजिक आन्दोलनों के रूप में जन्म लिया था। अन्य दो हैं इसाई धर्म और इस्लाम। बौद्ध धर्म इनमें सबसे पुराना है।
बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध (जिनका घर का दिया गया नाम सिद्धार्थ गौतम था) करीब 560 ईसा पूर्व में आधुनिक नेपाल में लुम्बिनी नामक स्थान में पैदा हुए थे। उनकी मृत्यु अस्सी साल की उम्र में 480 ईसा पूर्व के आसपास हुई। हालांकि बौद्ध धर्म के मिथकों में सिद्धार्थ गौतम को एक राजकुमार के रूप में दिखाया जाता है। जो राजा शुद्धोधन के पुत्र थे। पर असल में ऐसा नहीं था। असल में राजा शुद्धोधन शाक्य कबीले के कई सरदारों में से एक थे, जिन्हें तब राजा नाम से सम्बोधित किया जाता था। अपने जमाने में गौतम बुद्ध अक्सर शाक्य मुनि नाम से जाने जाते थे जो उनके कबीले के नाम से सम्बोधन था। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध के जिन्दा रहते ही कौशल के राजा विदुद्मा ने शाक्य वंश का नाश कर दिया था जब उसने उन पर हमला कर स्त्रियों-बच्चों को भी मार डाला। (इसकी वजह यह थी कि शाक्य लोगों ने विदुद्मा के पिता प्रसेनजीत को धोखा दिया था जब उन्होंने विवाह के लिए एक शाक्य कन्या मांगे जाने पर एक सरदार की दासी से उत्पन्न लड़की को भेज दिया था। विदुद्मा स्वयं इस दासी कन्या का पुत्र था। मगध के राजा बिम्बसार की तरह कौशल का प्रसेनजीत भी गौतम बुद्ध का मित्र था।)
बौद्ध मिथकों के अनुसार एक बूढ़े, एक बीमार और एक मृत व्यक्ति को देखकर सिद्धार्थ कातर हो उठे और उन्होंने उन्नीस साल की उमर में अपनी पत्नी और पुत्र को त्यागकर सन्यास ले लिया। इसके बाद सात सालों की तपस्या के बाद उन्हें गया में बोधिवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ और वे सिद्धार्थ गौतम से गौतम बुद्ध हो गये। इसके बाद उन्होंने बनारस के पास सारनाथ से अपने पहले के पांच संगियों (जो कभी उनके साथ तपस्या कर रहे थे और जो कठोर तप-व्रत से सिद्धार्थ को विमुख होते देख उन्हें छोड़कर चले गये थे) को उपदेश देने के साथ अपने नये धर्म की शुरुआत की।
गौतम बुद्ध की शिक्षाओं में प्रमुख थे। चार आर्य सत्य और आठ मार्ग। इसके अलावा प्रतीत्य समुत्पाद का एक दार्शनिक सिद्धान्त भी था। चार आर्य सत्य थे : जीवन दुःखमय है, दुःखों के कारण हैं, दुःखों से मुक्ति पायी जा सकती है और दुःखों से मुक्ति का रास्ता है (अष्टमार्ग)। अष्टमार्ग है : सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्म, सम्यक आजीवन, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।
प्रतीत्य समुत्पाद के अनुसार सभी चीजें कार्य-कारण सम्बन्ध से पैदा होती हैं। नयी चीजें पुराने में मौजूद नहीं होती वरन नये सिरे से पैदा होती हैं। किसी भी शाश्वत चीज का अस्तित्व नहीं है- न तो पदार्थ, न तो ईश्वर और ना ही आत्मा का। केवल परिवर्तन ही सत्य है। ईश्वर और आत्मा जैसी कोई चीज नहीं होती।
जीव इच्छाओं के वशीभूत जन्म-मरण के चक्र में फंसता है। इन इच्छाओं से मुक्ति ही निर्वाण है। यह निर्वाण ही लक्ष्य होना चाहिए। गौतम बुद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे इसी निर्वाण की प्राप्ति हुई थी। जब तक निर्वाण की प्राप्ति नहीं होती जीव इच्छाओं के वशीभूत रहेगा और उसके कर्म जन्म-दर-जन्म उसके जीवन को निर्धारित करते रहेंगे। हालांकि कोई शाश्वत आत्मा नहीं होती पर जीव किसी तरह से अपने कर्मों के हिसाब से नये-नये जन्म लेता रहता है। यह जन्म-मरण का चक्र एक दुःखमय संसार है।
इन शिक्षाओं के तहत गौतम बुद्ध ने व्यवहारिक तौर पर अपने अनुयाईयों के लिए दो तरह के जीवन तय किये। सांसारिक लोगों के लिए सामान्य अष्ट मार्ग था। पर जो स्वयं को पूरी तरह से नयी शिक्षा को समर्पित करना चाहते थे, उनके लिए संघ का मार्ग था। संघ को समर्पित इन बौद्ध भिक्षुओं को अपनी सारी सम्पत्ति का त्याग करना होता था। भीख का कटोरा, दो धोती, सिर मूड़ने को एक उस्तरा और एक लाठी ही उनकी कुल सम्पदा होते थे। हालांकि ये भी संघ की सम्पत्ति होते थे। भीख के कटोरे में पका हुआ भोजन (हर घर से केवल एक मुट्ठी) प्राप्त कर दोपहर तक केवल एक बार भोजन करना होता था। सोना गांव के बाहर किसी पेड़ के नीचे या गुफा में करना होता था। ऐसा करते हुए गांव-गांव घूमना होता था- गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार करते हुए। एक गांव में एक से ज्यादा दिन नहीं ठहर सकते थे। कहा जाता है कि गौतम बुद्ध की मृत्यु के समय संघ में भिक्षुओं की तादाद करीब पांच हजार थी।
गौतम बुद्ध की शिक्षाऐं और उनका संघ चाहे जितना विशिष्ट लगे पर असल में वे अपने जमाने के उत्पाद थे और जमाने के लिए उतने नये भी नहीं थे। जब गौतम बुद्ध ने अपना घर-बार छोड़कर सन्यास लिया तो असल में वे भ्रमणों की एक लम्बी परम्परा में ही जा रहे थे। बाद में भी बौद्ध भिक्षुओं को भ्रमण ही कहा जाता था। स्वयं बौद्ध कथा में आता है कि कैसे पहले गौतम अन्य भ्रमणों के साथ तपस्या कर रहे थे। असल में दुःखों से मुक्ति का रास्ता तलाशने वाले भ्रमणों की तब लम्बी कतार थी।
गौतम बुद्ध के समय उनके अलावा कम से कम अन्य छः सम्प्रदायों का जिक्र आता है। ये हैं; अजित केशकांचली, पूरन कसस्य, संजय, बेलाथिपुत्र, पकुध कच्चायत, निगंठ नाथपुत्र और माक्खलि घोसाल के सम्प्रदाय। निगंठ नाथपुत्र असल में महावीर का नाम है जिनका जैन धर्म था। माक्खलि घोसाल के सम्प्रदाय को नाम था आजीवक संघ। ये सभी उसी कौशल-मगध के इलाके में सक्रिय थे।
ये सभी कौशल-मगध के राज्य पहले बड़े राज्य थे। ये आज की अयोध्या से लेकर पटना तक के इलाके में फैले हुए थे। इसका विस्तार उत्तर में नेपाल की तराई से लेकर दक्षिण में बनारस तक था। ये बड़े राज्य पुराने कबीलाई समाज के विध्वंस पर पैदा हुए थे और बचे हुए कबीलाई समाजों का विध्वंस कर रहे थे। जैसा कि ऊपर बताया गया है, कौशल के राजा प्रसेनजीत के बेटे विदुद्मा ने शाक्य कबीले का विध्वंस किया था। दूसरी ओर मगध के राजा बिम्बसार के बेटे अजातशत्रु ने महावीर के वंश लिच्छवी का (नज्जी संघ का हिस्सा था) विनाश किया था। मजे कि बात यह है कि लिच्छवियों पर हमला करने के पहले अजातशत्रु ने अपने एक मंत्री को गौतम बुद्ध का आशीर्वाद लेने भेजा था।
बचे हुए कबीलों का विध्वंस करने वाले ये राज्य आपस में भी भीषण संघर्षरत थे। बिम्बसार और प्रसेनजीत ने आपस में लड़ने के बाद समझौता कर लिया था (बिम्बसार ने अपनी बहन का विवाह प्रसेनजीत से कर दिया और दहेज में काशी का राज दे दिया जो पहले खुद एक कबीला था)। बिम्बसार के बेटे अजातशत्रु ने पिता को गद्दी से उतारकर कैद कर दिया और भूखों मार डाला। इसी तरह प्रसेनजीत के बेटे विदुद्मा ने उसे गद्दी से उतार दिया और प्रसेनजीत जान बचाने के लिए अजातशत्रु की शरण में गया हालांकि किले के बाहर ही उसकी मृत्यु हो गयी बाद में काशी का राज वापस लेने के लिए अजातशत्रु ने विदुद्मा पर हमला कर दिया। पर उसके सौभाग्य से लड़ाई के पहले ही विदुद्मा अपनी सेना समेत एक पहाड़ी नदी की बाढ़ में बह गया। इस बाहरी-भीतरी लड़ाई का आलम यह था कि अजातशत्रु की पांच पीढ़ियों में पिता की हत्या कर पुत्र गद्दी पर बैठता रहा।
पुराने कबीलाई समाज के जीवन से यह सब बहुत दूर था। तब कबीलाई समाज में आपसी बराबरी और भाईचारा था। कोई कबीले के किसी व्यक्ति की हत्या के बारे में कभी सोच भी नहीं सकता था। अब चारों ओर शोषण, अन्याय, अत्याचार, हत्या और लूट-पाट का बोलबाला था। इस नये वर्गीय समाज में दुःख ही दुःख था। यहां तक कि शासक वर्गीय लोग भी अपने लोभ के कारण इससे मुक्त नहीं थे। कौशल और मगध के राजवंश का इतिहास ही इसे दिखाने के लिए पर्याप्त है।
गौतम बुद्ध ने दुःखों के इसी संसार का सामान्यीकरण किया। जब उन्होंने कहा कि इंसानों के दुःख से निकले आंसू चारों समुद्रों से ज्यादा हैं तो उनके कहने का पर्याप्त आधार था।
पर गौतम बुद्ध पर्याप्त व्यवहारिक थे और यही उनकी अन्य सम्प्रदायों के मुकाबले सफलता का राज भी था। वे जानते थ कि जमाने की गति को पलटा नहीं जा सकता। इसीलिए उसे पलटने के लिए उन्होंने कोई शिक्षा नहीं दी। जो लोग जमाने से तालमेल बैठाने में जरा भी सक्षम नहीं थे उनके लिए बौद्ध भिक्षु और संघ का मार्ग प्रदान किया। बौद्ध संघ को सचेत तौर पर पुराने कबीलाई समाज की तर्ज पर संगठित किया गया था। इसमें सामूहिक संपत्ति और जनवाद था। पर घर-बार और निजी सम्पत्ति को त्याग कर तो बहुत थोड़े ही लोग बौद्ध भिक्षु बन सकते थे। बाकी सामान्य गृहस्थों के लिए अष्ट मार्ग था। यह यूं ही नहीं था कि गौतम बुद्ध ने अपने मार्ग को मध्य मार्ग घोषित किया जो एक ओर कठोर व्रत-तप को नकारता था तो दूसरी ओर विलासितापूर्ण जीवन को।
गौतम बुद्ध की शिक्षाएं जमाने के अनुकूल हैं और भीषण उठा-पटक से गुजर रहे समाज में स्थिरता पैदा करने में सहायक हैं इसे शासक वर्गों ने तुरंत समझ लिया। इसीलिए कौशल और मगध के राजा गौतम बुद्ध के मित्र बन गये और बड़े व्यापारियों में इसे भारी समर्थन हासिल हो गया। गौतम बुद्ध के जिन्दा रहते ही बड़े धनवान व्यापारियों ने बौद्ध भिक्षुओं के आराम के लिए बड़े-बड़े विहार बनवाने शुरु कर दिये और उन्हें सम्पत्ति दान करनी शुरु कर दी जो बाद में बौद्ध धर्म के पतन का प्रमुख कारण बनी।
समाज में बौद्ध धर्म की स्वीकार्यता के लिए इससे जुड़े हुए और कारण भी थे। तब का समाज ब्राह्मणीय वैदिक कर्मकाण्डों और पशु-बलि से काफी त्रस्त था। ये नये कृषि समाज के प्रतिकूल भी थे। पुराने पशुपालक समाज के ये चाहे जितने अनुकूल रहे हों पर नये कृषि समाज पर ये भारी पड़ रहे थे। कोई आश्चर्य नहीं कि बौद्ध धर्म ने अहिंसा पर इतना जोर दिया। इसी के साथ नये वर्गीय समाज की वर्ण व्यवस्था लोगों के लिए बेहद कष्टकारी साबित हो रही थी।
पर जैसा कि पहले कहा गया है, गौतम बुद्ध ने वर्णों में विभेदित नये वर्गीय समाज के खिलाफ कोई झंडा नहीं बुलंद किया। बल्कि इसके साथ कैसे तालमेल बैठाया जाये इसका रास्ता सुझाया। उन्होंने गुलामों या कर्जदारों के भागकर भिक्षु बन जाने को निषिद्ध किया। हालांकि उन्होंने संघ के दरवाजे सभी वर्ण के लोगों के लिए खुले रखे पर स्त्रियों को उसमें प्रवेश काफी हिचक के बाद ही दी। इस तरह बौद्ध भिक्षुओं का संघ तो वर्ग-वर्ण विभाजन से मुक्त था पर सामान्य बौद्ध अनुयाई वर्ग-वर्ण विभाजन के तहत ही जीते रहे। बौद्ध धर्म ने बस इतना किया कि वर्ग-वर्ण विभाजित समाज के कष्टमय जीवन को जीना कुछ आसान बना दिया। यही इसकी सफलता का राज भी था। इसके मुकाबले अतिवादी होने के चलते जहां जैन धर्म एक संकीर्ण सम्प्रदाय बन कर रह गया वहीं अन्य सम्प्रदाय जमाने की निराशा से न उबर पाने के कारण विलुप्त हो गये।
जमाने के लिए बौद्ध धर्म की उपयोगिता को देख शासक वर्गों ने इसे भारी समर्थन दिया। खासकर राजाओं और व्यापारियों का इसे भारी समर्थन प्राप्त हुआ। व्यापारियों का समर्थन प्राप्त होने के चलते व्यापारिक मार्गों पर बौद्ध विहार कायम हुए और इनके जरिये बौद्ध धर्म देश-विदेश में फैला। लगातार घूम-घूम कर प्रचार करने वाले बौद्ध भिक्षु इसके लिए बहुत उपयोगी साबित हुए। सम्राट अशोक का समय आते-आते बौद्ध धर्म देश में इतने व्यापक तौर पर फैल गया था कि स्वयं उसने बौद्ध धर्म अपना लिया। इसके बाद उसके प्रयासों से बौद्ध धर्म श्रीलंका सहित अन्य अनेक नये क्षेत्रों में विस्तारित हुआ।
शासक वर्गों द्वारा बौद्ध धर्म को अपनाये जाने पर इस पर प्रभाव पड़ना ही था। बौद्ध संघ में सम्पत्ति इकट्ठी होने लगी और फिर इस सम्पत्ति का भ्रष्टकारी प्रभाव दिखाई पड़ने लगा। स्थिति वहां पहुंच गयी कि गौतम बुद्ध की मृत्यु के करीब सौ साल बाद इस पर विचार करने के लिए भिक्षुओं की एक बैठक बुलाई गयी जिसे दूसरी महासंगीति कहा जाता है (पहली महासंगीति गौतम बुद्ध की मृत्यु के तुरंत बाद बुलाई गयी थी)। इसमें कुछ वरिष्ठ भिक्षुओं ने सम्पत्ति के दुष्प्रभाव को रोकने के लिए नियमों को कठोर बनाने का प्रस्ताव किया। उनकी बात नहीं मानी गयी और वे अलग हो गये। ये बाद में थेरवादी (थेर-वरिष्ठ) कहलाये। स्थिति बिगड़ती रही और सम्राट अशोक के समय तीसरी महासंगीति तक मामला एक तरह से हाथ से निकल चुका था। बाद में इन लोगों ने स्वयं को महायान कहना शुरु कर दिया (वे थेरवादियों को हिकारत से हीनयान कहते थे) और यह कथा गढ़ ली कि गौतम बुद्ध ने कुछ और भी ऊंचे सिद्धान्त दिये थे जो विशिष्ट लोगों को ही पता थे। महायानी उन्हीं सिद्धान्तों पर चल रहे हैं। महायान असल में गौतम बुद्ध की मध्यमार्गी शिक्षा को शासक वर्गों के अनुरूप खालिस भाववादी दर्शन की दिशा में ढालना था। निरीश्वरवादी होने के बावजूद महायानी भारत में सबसे अतिवादी भाववादी थे (शून्यवाद इन्हीं का सिद्धान्त था और शंकर के माया के सिद्धान्त के इससे मिलता-जुलता होने के कारण शंकर को छिपा हुआ बौद्ध भी कहा जाता था)। ये महायानी ही थे जिन्होंने बाद में बौद्ध धर्म की प्राकृत (पाली) भाषा को छोड़कर संस्कृत में अपने दार्शनिक ग्रन्थों की रचना की। हालांकि यह कहना होगा कि अब थेरवादी भी इनसे बहुत भिन्न नहीं रह गये थे।
बौद्ध धर्म में एक और विकास (या पतन) तब हुआ जब पहली सहस्त्राब्दी के उत्तरार्द्ध में इसमें तंत्रवाद का प्रवेश हुआ। तंत्रवाद पुराने कबीलाई अनुष्ठानों और तंत्र-मंत्र का सामंती वर्गीय समाज के हिसाब से नया संस्करण था। यह हिन्दुओं और बौद्धों दोनों में विकसित हुआ। मत्स्य (मछली), मांस, मदिरा (शराब), मैथुन और मुद्रा (योग) इसके पांच मकार या अनिवार्य तत्व थे। महायान बौद्धों में यह तंत्रवाद वज्रयान और सहजयान दो रूपों में विकसित हुआ। वज्रयानी पांच मकार को ज्यादा समर्पित थे। वज्रयान ही ज्यादा प्रचलित हुआ।
आज बौद्धों में थेरवाद, महायान और वज्रयान ही प्रभावी हैं। थेरवाद दक्षिण एशिया में ज्यादा प्रचलित है जबकि महायान भारत, चीन और पूर्वी एशिया में। वज्रयान तिब्बत और मंगोलिया में ज्यादा प्रचलित है।
बौद्ध धर्म में विकास (या पतन) केवल दार्शनिक सिद्धान्तों तक सीमित नहीं रहा। धीमे-धीमे इसमें मूर्तिपूजा और देवी-देवताओं की भी प्रवृष्टि हो गई। भारत में पहले-पहल मूर्तिपूजा बौद्धों और जैनियों ने ही शुरु की। हिन्दुओं ने बाद में उनकी नकल की। पुराण कथाओं की तर्ज पर जातक कथाएं प्रचलित हो गईं। भांति-भांति के अंध विश्वासों का बोलबाला हो गया। गुप्तकाल और वर्धनकाल तक हिन्दुओं और बौद्धों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं रह गया। यहां तक कि हिन्दू पुराण कथाओं में गौतम बुद्ध को भी विष्णु का एक अवतार घोषित कर दिया गया।
ब्राह्मणीय हिन्दू धर्म ने बौद्ध धर्म की चुनौती के सामने अपने में कुछ परिवर्तन किये थे। ईसा के बाद की शताब्दियों में नये उभरते सामंती समाज के हिसाब से वैसे भी इसमें परिवर्तन होने थे। मांस-मदिरा का त्याग और अहिंसा की बातें इनमें से कुछ थीं। इस काल में हिन्दू और बौद्ध धर्म दोनों ही नये उभरते सामंती समाज के हिसाब से ढले पर अब ईश्वर, स्वर्ग-नरक तथा पुराण कथाओं वाला हिन्दू धर्म वर्ण-जाति व्यवस्था वाले समाज के ज्यादा अनुकूल साबित हुआ।
हालांकि गुप्त वंश के प्रमुख राजाओं ने बौद्ध धर्म को संरक्षण प्रदान किया था पर शशांक गुप्त जैसे बाद के उत्तराधिकारियों ने इसका दमन किया। वर्धन काल में बौद्ध धर्म को फिर फलने-फूलने का मौका मिला पर इसके बाद यह विलोपन की ओर बढ़ चला। बीच में केवल पाल वंश के राजाओं ने ही उसे संरक्षण प्रदान किया। ईसा की बाद की शताब्दियों में हिन्दू धर्म और बौद्ध व जैन के बीच संघर्ष लगातार चलता रहा था। बौद्धों और जैनियों को अक्सर ही हिन्दू राजाओं के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा। आज भी हिन्दुओं के कई मन्दिरों के नीचे बौद्ध और जैन मंदिरों के भग्नावशेष दबे पड़े हुए हैं। कई इतिहासकारों का मत है कि मुसलमान शासकों के काल में इस्लाम ठीक उन्हीं स्थानों में व्यापक पैमाने पर फैला जो पहले बौद्ध इलाके थे। बौद्धों ने हिन्दुओं के दमन से निजात पाने के लिए नये मुस्लिम शासकों के इस्लाम धर्म को स्वीकार कर लिया था।
भारत से बाहर बौद्ध धर्म का फैलाव ज्यादातर ईसा के बाद की शताब्दियों में हुआ। इसके फैलाव की मूलतः तीन दिशायें थीं। एक दिशा श्रीलंका से होते हुए बर्मा, थाईलैण्ड, लाओस, कम्बोडिया, मलेशिया, इंडोनेशिया और वियतनाम की ओर थी। यह थेरवादी दिशा थी। दूसरी दिशा चीन, कोरिया और जापान की ओर थी। यह महायानी दिशा थी। तीसरी दिशा तिब्बत और मंगोलिया की ओर थी। यह वज्रयानी दिशा थी। पश्चिम में काबुल-कांधार तक तो बौद्ध धर्म सम्राट अशोक के जमाने में ही फैल चुका था।
बौद्ध धर्म का विभिन्न दिशाओं में प्रसार उन समाजों के हिसाब से हुआ और बौद्ध धर्म उनके अनुरूप ढला। उदाहरण के लिए चीन में बौद्ध धर्म का वहां पहले से विद्यमान ताओ मत से तालमेल बैठाया गया। तिब्बत में जब वज्रयान का प्रवेश हुआ तो उसने वहां सामंती समाज के अनुसार रूप ग्रहण किया और स्वयं उस सामंती समाज को खास सांचे में ढाला भी। लामाओं की व्यवस्था तिब्बत में ही शुरु हुई। लामा इहलौकिक और पारलौकिक दोनों दुनिया के नियंता थे।
इसमें कुछ भी अजीब नहीं है कि आज दुनिया में बौद्ध धर्म के जितने भी सम्प्रदाय मौजूद हैं उनका गौतम बुद्ध और उनकी शिक्षाओं से बहुत दूर का ही नाता है। गौतम बुद्ध आज अपने धर्म को ही नहीं पहचान पाते। ऐसा सभी धर्मों के साथ हुआ है।
गौतम बुद्ध से बहुत दूर के नाते वाले इस बौद्ध धर्म में आज के समाज की समस्याओं का हल ढूढ़ना कुआं और खाई में से एक चुनने जैसा है। गौतम बुद्ध ने कबीलाई समाज टूट कर नये बनते वर्गीय समाज की समस्याओं से निजात के लिए एक शानदार भ्रम का निर्माण किया था और वे सफल हुये थे। पर आज के पूंजीवादी समाज की समस्याओं से निजात किसी भ्रम की शरण लेने में नहीं है बल्कि हर तरह के भ्रम को तार-तार कर आगे बढ़ने में है। बौद्ध धर्म पैदा हुआ था सामूहिक सम्पत्ति वाले आदिम साम्यवादी समाज के विघटन से। आज की समस्याओं का समाधान है एक नये अत्यन्त ऊंचे साम्यवादी समाज की स्थापना में।
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