गुरुवार, 10 नवंबर 2022

 कैसा ‘अमृत महोत्सव’, किसका ‘अमृत महोत्सव’

                                                                                                             -मोहित


भारत अपनी आजादी का ‘अमृत महोत्सव’ मना रहा है। ‘अमृत महोत्सव’ नाम मोदी सरकार ने दिया हुआ है। इस रूप में ‘अमृत महोत्सव’ मोदी सरकार और अधिक से अधिक कह सकते हैं कि भारत का शासक वर्ग मना रहा है। इस ‘अमृत महोत्सव’ को जिस ढंग से मनाया जा रहा है उसमें आम लोगों की कोई भागीदारी नहीं है। सरकारी कार्यक्रम जैसे आयोजित कराये जाते हैं वैसे ही ‘अमृत महोत्सव’ का आयोजन हो रहा है। देश के छात्रों-नौजवानों, मजदूर-मेहनतकशों का इस आयोजन से शायद ही कोई मतलब हो।

सरकारी कार्यक्रमों के लिये सरकार की तरफ से आदेश आते हैं। सरकार ही इन कार्यक्रमों का बंदोबस्त करती है। सरकार द्वारा धन मुहैय्या कराया जाता है। सरकार के सुर में सुर मिलाने वाला मीडिया इन कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए अपनी ओर से जोर लगाता है। और इसी तरह पूंजीपति भी कुछ पैसा खर्च करके अपने उत्पादों की बिक्री के लिये इन कार्यक्रमों को अपने प्रचार का साधन बना देते हैं। देश की आजादी के 75 वर्ष पर ‘अमृत महोत्सव’ मोदी सरकार का आयोजन है। आयोजन के साथ-साथ यह एक तरह का अनुष्ठान है। और अनुष्ठान से ज्यादा जिस दल से, जिस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से उनका संबंध है उसको इस बहाने आजादी के सिपाही के रूप में मान्यता दिलाना है। भाजपा-संघ को उसका विरासतदार घोषित करना है। आजादी के नायकों पर अपना हक जताना भी है। 

भाजपा-संघ आजादी के नये ठेकेदार हैं। हालांकि इसके पहले और लम्बे समय तक ठेकेदार कांग्रेस पार्टी थी। कांग्रेस पार्टी ने दशकों तक भारत में शासन किया। और अपने शासन करने के अधिकार के तौर पर वह अपनी आजादी की लड़ाई में निभायी गयी भूमिका को अतिरंजित ढंग से बताती थी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसके राजनैतिक फ्रंट पहले जनसंघ और बाद में भाजपा (1980 से) को हमेशा इस बात के लिये राजनैतिक गाली खानी पड़ती थी कि इनकी आजादी की लड़ाई में कोई भूमिका नहीं थी। आजादी की लड़ाई के समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेता अंग्रेजों की वफादारी की कसमें खा रहे थे। उन्होंने न केवल आजादी की लड़ाई से अपने को अलग रखा बल्कि आजादी की लड़ाई को भटकाने के लिये हिन्दू और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने में अंग्रेजों व मुस्लिम लीग का साथ दिया। गौर से देखा जाय तो सावरकर-हेडगेवार-गोलवलकर और जिन्ना-लियाकत खान में कोई फर्क नहीं था। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू थे। और सिक्का हमेशा अंग्रेजों के हाथ में रहता था।

भारत और पाकिस्तान (बाद में बांग्लादेश पाकिस्तान से अलग हो गया) के बंटवारे के लिए अंग्रेज, मुस्लिम लीग व राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, हिन्दू महासभा जिम्मेदार थे। कांग्रेस पार्टी के भीतर भी ऐसे लोग थे जो मानते थे कि हिन्दू और मुस्लिम साथ-साथ नहीं रह सकते हैं। ऐसे लोग भी ‘द्वि-राष्ट्र’ के साम्प्रदायिक सिद्धान्त पर हिन्दू महासभा, मुस्लिम लीग और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की तरह ही विश्वास करते थे। इन लोगों ने भारत के विभाजन के समय दंगा-फसाद कराने से लेकर कत्लेआम में खुली-छिपी भूमिका निभायी थी।

उस समय भारत के पूंजीपति वर्ग की पार्टी कांग्रेस भी इस विभाजन के लिए जिम्मेदार थी जिसने ढीले-ढाले केन्द्र के साथ संघीय ढांचे को स्वीकारने से इन्कार कर दिया। वह केन्द्रीयकृत ढांचे के लिए विभाजन को भी स्वीकार करने को तैयार हो गयी।

इस तरह से देखें तो भारत की आजादी का ‘अमृत महोत्सव’ भारत के विभाजन का ‘कलंक महोत्सव’ भी है। विभाजन के वक्त भारत और पाकिस्तान (और बाद में फिर पाकिस्तान के विभाजन) में लाखों की संख्या में लोग मारे गये। और लाखों-लाख लोग बेघर हो गये। हजारों महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। और हजारों मासूम बच्चे हमेशा-हमेशा के लिए अपने मां-बाप से बिछुड़ गये। इसलिए जो कोई भारत की आजादी के ‘अमृत महोत्सव’ का जश्न मनाना चाहता है उसे हर वक्त आजादी के साथ जुड़े कलंक की याद भी दिलायी जानी चाहिये।

भारत और पाकिस्तान के विभाजन का दंश 75 साल बीतने के बाद भी दक्षिण एशियाई उप-महाद्वीप से नहीं मिट सका है। तीन-चार युद्धों के साथ अनगिनत सैन्य झड़पों में हजारों-हजार लोग दोनों ओर से मारे जा चुके हैं। और इस उप-महाद्वीप के लगभग हर देश में साम्प्रदायिक दंगों में मारे गये लोगों की संख्या भी कई हजार तक जा पहुंची है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष युद्ध, दंगा-फसाद, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, हजारों-हजार के कत्लेआम, औरतों से बलात्कार, बच्चों के अनाथ होने और लाखों लोगों के बेघर होने के भी 75 वर्ष हैं। ये उत्तरी भारत के कई शहरों में बसे ‘रिफ्यूजी कैम्प’ के भी 75 वर्ष हैं। कई शहरों में बने ‘सिन्धी चौराहा’, ‘सिन्धी मार्केट’, ‘पंजाबी मोहल्ला’ इस बात की याद दिलाते हैं कि यहां बसे लोग 1947 में पाकिस्तान से भारत आये थे। इसी तरह पाकिस्तान के शहरों खासकर लाहौर, कराची, रावलपिण्डी आदि  में भारत से जाकर बसे मुसलमानों को शरणार्थी (मुहाजिर) ही कहा जाता है। और कुछ इसी तरह के हाल प.बंगाल, असम और बांग्लादेश के भी शहरों-कस्बों के हैं।

भारत की आजादी के 75 वर्ष भले ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से मुक्त होने के 75 वर्ष हों परन्तु एक बात यह सच है कि ये 75 वर्ष भारत के मजदूर, किसान, दलित, आदिवासी, आदि शोषित-उत्पीड़ितों के लिए नई तरह की गुलामी के भी 75 वर्ष हैं। जिस वक्त भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी जा रही थी तो उस वक्त अपनी जान की परवाह किये बगैर फांसी पर लटकने वाले एक ऐसे भारत का सपना देखते थे जहां गरीबी न हो, भूख न हो, बेरोजगारी न हो। वे एक ऐसे भारत का सपना देखते थे जहां बराबरी हो। पूरे भारत के लोग आपस में मिल-जुलकर रहें। मेहनत करें और सबका जीवन खुशहाल हो। कुछ लोगों ने इसे ‘समाजवाद’ का नाम दिया हुआ था। वे जानते थे कि पूंजीवाद के रहते भारत में गरीबी, असमानता, बेरोजगारी कभी खत्म नहीं हो सकते थे। वे अच्छे ढंग से जानते थे कि गांधी-नेहरू-पटेल-जिन्ना आदि जिस दिशा में भारत को अंग्रेजों की सरपरस्ती में धकेल रहे हैं वहां भारत की मजदूर-मेहनतकश जनता का जीवन और भविष्य अंधकार में है। एक गढ्ढे से निकलकर दूसरे गढ्ढे में फंसने जैसा होगा।

‘समाजवाद’ की बात करने वालों में शहीद भगत सिंह से लेकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी तक थी। भारत के शोषित-उत्पीड़ितों के साथ खड़े ये लोग भारत में क्रांति चाहते थे। ऐसी क्रांति जैसे 1917 में रूस में हुयी थी या फिर 1949 में चीन में हुयी थी। क्रांति के विचार उस जमाने में इतने आम थे कि अपने को वामपंथी कहलाने वाले नेहरू या सुभाष चन्द्र बोस भी ‘क्रांति’ के बारे में लेख लिखते थे। नेहरू ने तो महान मजदूर नेता स्तालिन की 1953 में हुयी मृत्यु के बाद भारत की संसद में उनकी याद में एक जोरदार भाषण ही दे डाला था। और बताया था कि स्तालिन ने पूरी दुनिया के लिए क्या किया था। मानवता को फासीवाद से बचाया था और तीसरी दुनिया के देशों की आजादी की लड़ाई में सहयोग किया था।

भारत में क्रांति तो नहीं हो सकी परन्तु क्रांति की मशाल को थामकर अपनी जान कुर्बान करने वालों की संख्या हजारों-हजार में है। इन 75 वर्षों में कोई ऐसा वर्ष शायद ही कभी बीता हो जब भारत में क्रांति की मशाल को जलाये रखने, आगे बढ़ाने के लिये भारत के मेहनतकशों और उनके बेटी-बेटों ने अपनी जान की कुर्बानी न दी हो। तेलंगाना, तेभागा, नक्सलबाड़ी किसान विद्रोह भारत के क्रांतिकारियों के नेतृत्व में लड़े गये। और आज भी ऐसे हजारों लोग हैं जो भारत में क्रांति के लिए अपना सर्वस्व त्यागने को तत्पर रहते हैं। इस तरह ये 75 साल भारत में क्रांति के न होने परन्तु क्रांति के लिए पूरा प्रयत्न लगाने के भी 75 साल हैं।

इन 75 सालों ने साबित किया है कि भारत की आजादी की लड़ाई में शामिल भगत सिंह सरीखे क्रांतिकारी एकदम सही थे। वे एकदम सही थे जब वे कह रहे थे कि गोरे अंग्रेजों के जाने के बाद काले अंग्रेजों की सत्ता कायम हो जाने से भारत के मजदूरों-किसानों, नौजवानों-औरतों, शोषित-उत्पीड़ितों की जिन्दगी में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आयेगा। उनकी मुक्ति नहीं होगी। उनकी मुक्ति सिर्फ क्रांति से होगी। समाजवाद की स्थापना से होगी। और आज भी क्रांति का यह काम शेष बचा हुआ है। भगत सिंह का आह्वान भारत के छात्रों-नौजवानों, मजदूर-किसानों को क्रांति की राह में बढ़ने को कह रहा है। 

ये आजादी के 75 साल भारत के मजदूरों, किसानों, नौजवानों, औरतों, दलितों, आदिवासियों, उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं (कश्मीरी, नागा आदि) के नहीं हैं। ये 75 साल भारत के पूंजीपतियों, बड़े-बड़े भू-स्वामियों, बड़े सैन्य-असैन्य नौकरशाहों, बड़े-बड़े व्यापारियों, धूर्त राजनेताओं के 75 साल हैं, इन्होंने खूब दौलत कमायी है। भारत के मजदूर- मेहनतकशों को खूब लूटा है। भारत के प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम दोहन किया है। इन्होंने भारत की न तो जमीन, न नदियों, न खानों, न समुद्र को छोड़ा है। टाटा, बिड़ला, अम्बानी, अडानी, महेन्द्रा आदि ने देश को खूब लूटा है। और एक मजे की बात है ये लुटेरे पूंजीपति वहीं जाकर बसते हैं जहां से गोरे अंग्रेज भारत आये थे। भारत के कई बड़े पूंजीपतियों के आशियाने ठीक ब्रिटेन की महारानी के अगल-बगल में हैं।

हिंदुजा भाई (अशोक लिलैंड के मालिक), अनिल अग्रवाल (वेदांता का मालिक), लक्ष्मी निवास मित्तल (इस्पात का बड़ा कारोबारी) आदि लंदन में बस कर भारत को लूटते हैं। और अभी कुछ माह पहले मुकेश अम्बानी ने लंदन में एक शानदार और बहुत ही महंगा होटल अपनी रिहायश के लिये खरीदा है। अरबों रुपये की सम्पत्ति मुकेश अम्बानी भारत को लूट कर ही वहां खरीदता है। ये 75 साल इन काले अंग्रेजों के 75 साल हैं। इनकी दौलत, शोहरत बढ़ने के 75 साल हैं। ये काले अंग्रेज, ये धनपशु आराम से भारत को लूटते रहे हैं और हम इन्हें देखते रहे हैं। अपनी दौलत, अपनी ऐय्याशी में रोज-रोज होने वाली बढ़ोत्तरी को इन धूर्तों ने ‘विकास’ का नाम दिया हुआ है। और अपनी दौलत, ऐय्याशी में होने वाले विकास को, ये भारत का विकास कहते हैं।

पिछले 75 सालों में भारत का विकास हर ओर से एकतरफा है। असमान है और कह सकते हैं, विकृत है। भारत के मजदूरों-मेहनतकशों के हिस्से पहले अंग्रेजों की गुलामी थी और आज इन काले अंग्रेजों की गुलामी है। 

भारत की आजादी की लड़ाई की तुलना यदि पौराणिक कथा ‘सागर मंथन’ से की जाय तो सारा अमृत भारत के दौलतमंदों के हाथ लगा और सारा विष भारत के मजदूर-मेहनतकशों के हिस्से में आया है। और भारत के दौलतमंद अपने को सुसंस्कृत देव ही समझते हैं जबकि आम जन उन्हें राक्षस ही नजर आते हैं। भारत के इस सागर मंथन में भगवान विष्णु की भूमिका महात्मा गांधी ने निभायी थी। उन्होंने एक संत का, एक फटेहाल किसान का ऐसा मोहिनी रूप धरा की कि सारा अमृत भारत के टाटा-बिड़ला, पूंजीपति-भूस्वामियों के हाथ लगा। और इस मंथन में कोई ऐसा ‘शिव’ नहीं था जो विष को अपने कण्ठ में धारण कर सके। यह सारा विष मजदूरों -किसानों को अपने ही कण्ठ में धारण करना पड़ा। और इतिहास की सच्चाई यह है कि मजदूर-किसानों की मुक्ति का काम उन्हें स्वयं ही करना पड़ेगा। भारत के नौजवानों को करना पड़ेगा। उस अधूरे स्वप्न को पूरा करना पड़ेगा जिसको लेकर भारत के शहीद फांसी के तख्ते चूम गये। शहीद भगत सिंह के दिखाये रास्ते पर चलकर ही वह दिन आ सकता है जब भारत के मजदूर-किसान, शोषित-उत्पीड़ित जन अपनी मुक्ति का उत्सव मना रहे होंगे।

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