नागरिकता (संशोधन) कानून 2019
हिन्दू राष्ट्र में रूपान्तरण की ओर एक कदम
आजादी पूर्व जो काम हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग न कर सके वह काम आजादी के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और उसकी पार्टी भाजपा कर रही है। द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत के आधार पर ब्रिटिश कालीन भारत का विभाजन न हो सका। और इसलिये वीर सावरकर की आत्मा को शांति भी न मिल सकी। सावरकर की आत्मा को शांति प्रदान करने की ओर एक कदम है नागरिकता (संशोधन) कानून 2019।
ब्रिटिशकालीन भारत का विभाजन तो हुआ परंतु ठीक उस तरह नहीं जैसा कि हिन्दू महासभा और संघ परिवार चाहते थे। धर्म के आधार पर पाकिस्तान तो बन गया किंतु आजादी के बाद भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं बना। इसके विपरीत अर्थात् सावरकर जैसों की इच्छाओं के विपरीत आजाद भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य बना। धर्म के आधार पर ब्रिटिश कालीन भारत का विभाजन बहुसंख्यक आवाम की सामाजिक चेतना के विपरीत या जिसे ‘सीमांत गांधी’ ने इन शब्दों में व्यक्त किया था कि ‘‘आपने हमें भेड़ियों के सामने फेंक दिया’’।
अकेले यह पख्तूनी नेता ही ऐसा महसूस नहीं कर रहा था। अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्षशील लाखों लोगों की पीड़ा को इस पख्तूनी नेता ने आवाज दी थी जो देश के बंटवारे के विरुद्ध थे और जिन पर बंटवारे के फैसले को थोपा गया था।
यहां हम बंटवारे, उसके कारणों व उन परिस्थितियों की चर्चा नहीं करेंगे क्योंकि यह इस लेख का विषय नहीं है। किन्तु नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 के ‘उद्देश्यों व कारणों के कथन’ का पहला पैरा (बिन्दु 2) इस धार्मिक आधार पर विभाजन की पृष्ठभूमि में ही लिखा गया है। जिसमें यह मानकर चला गया है कि तीन देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान जिनका राजकीय धर्म मुस्मिल है, में गैरमुस्लिमों ने ही धर्म के आधार पर अत्याचार का सामना किया है। और इसलिये इन तीनों देशों से आये गैरमुस्लिमों को भारत की नागरिकता प्रदान की जाये।
दरअसल नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019, 2015 व 2016 में केन्द्र सरकार के द्वारा बनाये गये नियमों या दिये गये आदेशों की ही निरन्तरता है। इन नियमों व आदेशों के तहत उपरोक्त धर्मों से संबद्ध अवैध प्रवासियों को पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम 1920 और विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 में निहित दंडां से छूट प्रदान की गयी थी। इसके साथ ही उन्हें भारत में ठहरने के लिये दीर्घकालिक वीजा के लिये भी पात्र बनाया गया था। उपरोक्त विधेयक का उद्देश्य उक्त प्रवासियों को भारतीय नागरिकता के लिये पात्र बनाने के संबंध में है।
चूंकि भाजपा सरकार का प्रस्थान बिन्दु ही सिर्फ धार्मिक उत्पीड़न है और वह भी सिर्फ तीन मुस्लिम देशों में, इस कारण भाजपा सरकार व उसके सभी नेताओं के बयान ऊपरी तौर पर वाजिब से लगते हैं। इसी कारण गैरमुस्लिम धर्मावलम्बियों के एक हिस्से में इस अधिनियम को समर्थन भी किया जा रहा है। इसलिये ऊपरी तौर पर मोदी और शाह की बात ठीक है कि यह संशोधन नागरिकता देने के लिये है, छीनने के लिये नहीं।
धूर्ततापूर्वक किये जाने वाले कृत्य व दावे ऊपरी तौर पर चाहे जितने सही जान पड़े परंतु इससे धूर्त व मक्कार लोगों की धूर्तता व मक्कारी छिप नहीं जाती। इस विषय में ठीक यही धूर्तता व मक्कारी की गई है। जानबूझकर पास के गैरमुस्लिम देशों को छोड़ दिया गया है-मसलन नेपाल, भूटान, बर्मा, चीन, श्रीलंका व मालद्वीप। इसमें केवल मालद्वीप ही मुस्लिम बाहुल्य देश है। सरकार ने आखिर गैरमुस्लिम पड़ोसी देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों को नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 से परे क्यों रखा। भाजपा सरकार को केवल तीन देशों के ही धार्मिक अल्पसंख्यकों की पीड़ा समझ में आयी बाकी देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों की पीड़ा समझ में क्यों नहीं आई।
इस प्रश्नों को खड़ा करते ही संघ परिवार व भाजपा सरकार के असली इरादों पर से परदा उठने लगता है। उनके असली इरादे तब भी जाहिर होने लगते हैं जब वे कहते है कि मुसलमानों के तो बहुत सारे देश है वे कहीं भी जा सकते है परंतु हिन्दुओं का तो....। इसमें अंतर्निहित होता है कि वे प्रकारांतर से भारत को हिन्दुओं के देश के रूप में ही देखते हैं।
मोदी संसद के आगे शीश नवाने का प्रहसन करते हैं। वह संविधान के गुणगान का नाटक करते हैं। परन्तु वे सही मायनों में स्वयं पूंजीवादी लोकतांत्रिक संस्थाओं व संविधान की जरा भी परवाह नहीं करते। पूरा संघ परिवार अपने वास्तविक उद्देश्यों को छिपाने के लिये ही लोकतंत्र व संविधान की बातें करता है जैसा कि नाजी पार्टी और उसके नेता किया करते थे।
धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न तो बर्मा में भी होता है जहां से रोहिंग्याओं को खदेड़ दिया गया। श्रीलंका में धार्मिक उत्पीड़न तमिल हिन्दुओं, मुस्लिमों व ईसाइयों का होता है, भूटान में हिन्दुओं का उत्पीड़न होता है और ऐसे ही चीन में भी।
केवल इतना ही नहीं धार्मिक चश्मे की खामी यह भी है कि वह यह नहीं देख पाता कि पाकिस्तान में अहमदिया मुसलमानों से भी उसी तरह बुरा सुलूक किया जाता है जैसा कि अन्य अल्पसंख्यकों से। स्वयं भारत में दलित हिन्दुओं से कई मायनों में मुसलमानों व ईसाइयों जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों से भी बुरा सुलूक किया जाता है।
चूंकि बाकी पड़ोसी देशों की अल्पसंख्यक आबादी हिन्दू फासीवादी दस्तों की परियोजना में फिट नहीं बैठती इसलिये केवल तीन देशों के धार्मिक अल्पसंख्यकों तक ही उनको खुद को सीमित रखना पड़ता है।
आइये! एक अन्य पहलू पर गौर करें। दरअसल नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 तात्कालिक तौर पर असम में चलाये गये एनआरसी की पृष्ठभूमि में लाया गया है। संघ परिवार के चलाये गये झूठे प्रचार व उसके द्वारा बनायी गयी झूठी अवधारणा के विपरीत जब असम में एनआरसी लागू हुआ तो पाया गया कि एनआरसी से छूटे लोगों में लगभग तीन चौथाई आबादी हिन्दुओं की ही है। कथित हिन्दू सरकार के सामने संकट खड़ा हो गया कि वह असम में एनआरसी में छूटे हुये लगभग 13-14 लाख हिन्दुओं का क्या करे। चूंकि एनआरसी सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में चलाया गया था इसलिये असम भाजपा सरकार के भी हाथ बंधे थे।
तात्कालिक तौर पर इस अधिनियम में संशोधन का उद्देश्य इन लगभग 13-14 लाख हिन्दू लोगों को नागरिकता प्रदान करना है। चूंकि अपने धार्मिक चश्मे और फासीवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने के मद्देनजर वे एनआरसी में छूटे मुसलमानों को नागरिकता नहीं देना चाहते इसलिये संघ और उसकी पार्टी भाजपा की सरकार को केवल तीन मुस्लिम देश ही दिखाई दिये।
तात्कालिक तौर पर इस अधिनियम में संशोधन का उद्देश्य और दूरगामी तौर पर अपने हिन्दुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिये उन्हें वही मुफीद लगा। इसके लिये अगर अनुच्छेद 14 में दर्ज समानता के अधिकार की धज्जियां उड़ती हैं तो उड़ें। पूंजीवादी संविधान की धज्जियां उड़ती हैं तो उड़ें। वैसे भी उनकी पवित्र पुस्तक तो ‘बंच ऑफ थाट’ है।
संघ परिवार चूंकि 1947 के अधूरे कार्यभार को पूरा करना चाहता है। चूंकि वह सावरकर के द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को उसके मुकाम तक पहुंचाना चाहता है इसलिये वह इस नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 के माध्यम से असम में नागरिकता रजिस्टर से छूटे लगभग 5 लाख मुस्लिमों को नजरबंदी कैम्पों में ठेलकर या उन्हें देश से खदेड़कर पहला प्रयोग करना चाहता है। ताकि एनपीआर और एन आर सी को देशभर में लागू करके वे मुस्लिमों को देशभर में नजरबंदी कैम्पों में ठेल सके। या उन्हें देश से खदेड़ सके।
ऐसा होने की व्यवहारिक सम्भावना हो या न हो फिर भी फासीवादियों के राजनैतिक उद्देश्य अगर इन कारनामों से पूरे होते हैं तो वे इसकी कोशिश जरूर करेंगे। इसका परिणाम चाहे जितना खतरनाक और पीड़ादायी क्यों न हो वे अपने हिन्दुत्व के एजेण्डे के लिये पूरी कोशिश कर रहे हैं। कश्मीर पर अपने राजनीतिक एजेण्डे के लिये उन्होंने पूरे एक राज्य की आबादी को नजरबंदी कैम्पों में तब्दील कर अपना इरादा जता दिया है। यहां तक कि कश्मीर में नाबालिग बच्चों तक को नहीं बक्शा गया।
इस नागरिकता (संशोधन) कानून को संघियों व भाजपाईओं की जमात ने भी नहीं पढ़ा है नहीं तो वे देश के प्रधानमंत्री व गृहमंत्री की इस बात पर कभी विश्वास नहीं करते कि यह अधिनियम नागरिकता देने के लिये है नागरिकता छीनने के लिये नहीं।
समानता के अधिकार के तहत नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 से मुस्लिमों को परे रखना, उन 5 लाख लोगों की नागरिकता छीननी भी है जो दस्तावेज पेश नहीं कर पाये। क्योंकि ठीक वही कानून 13-14 लाख उन हिन्दुओं को नागरिकता प्रदान कर रहा है जो अपने दस्तावेज पेश नहीं कर पाये। प्रधानमंत्री और उनका ‘‘जोसेफ गोएबल्स’’ चाहे जितना झूठ बोले किन्तु सत्य यही है।
इस नागरिकता (संशोधन) कानून के तहत धारा 2 के संशोधन में लिखा गया है कि ‘‘परंतु अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या इसाई समुदाय के ऐसे व्यक्ति को, जो दिसम्बर 2014 को या उससे पूर्व भारत में प्रविष्ट हुआ और जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 की धारा 3 उपधारा (2) के खंड (ग) द्वारा या उसके अधीन अथवा विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 या उसके अधीन बनाये गये किसी नियम के उपबंधों या उसके अधीन किये गये किसी आदेश के लागू होने से छूट प्रदान की गई है इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिये अवैध प्रवासी के रूप में नहीं माना जायेगा’’। वसुदेव कुटुम्बकम और अतिथि देवो भव की संघी व भाजपाई समझ का यह नायाब उदाहरण है। संकीर्ण सोच धर्म को लेकर, संकीर्ण सोच देशों को लेकर, संकीर्ण सोच वर्ष को लेकर, फासीवादियों से इसके अलावा क्या उम्मीद की जा सकती है?
संकीर्ण सोच उनकी मजबूरी है वरना मोदी और शाह भी तो अप्रवासी ही हैं केवल मोदी और शाह ही नहीं बहुलांश भारत भी अप्रवासी ही है। समय छोटा कर लेने पर मोदी और शाह वैध प्रवासी बन जाते हैं समय बड़ा कर लेने पर ठीक इसके विपरीत। मूलनिवासियों को छोड़कर एक अर्थ में शेष भारतवासी अप्रवासी ही हैं। तो क्या मूलनिवासियों को सभी को देश से नहीं निकाल देना चाहिये?
इसलिये संघी इतिहास के तौर पर निहायत गलत जमीन पर खड़े हैं। ठीक उन सभी मसलों की तरह जिन्हें वे उठाते रहे हैं। ऐसे में सबसे उचित यही है कि जो भी भारत की माटी में रच बस गया, जो यहां रहा है, वह चाहे जिन भी परिस्थ्तियों के वशीभूत होकर आया, एक वैध प्रवासी है। उसे नजरबंदी शिविरों में डालना या उसे देश से निकालने की बात करना सिरे से गलत है।
फासीवादियों द्वारा चलाये जा रहे हिन्दुत्व के एजेण्डे को पहली देशव्यापी चुनौती भी मिल गई। ऐसी चुनौती जिसकी उम्मीद इन फासीवादियों ने भी नहीं की थी। इन देशव्यापी प्रदर्शनों ने एक बार फिर यह मार्ग रेखांकित कर दिया कि संघियों के अपराजेय रथ को कैसे रोका जा सकता है? धर्म की राजनीति का गरूर ठिकाने लगाने का काम साझे संघर्षों की अटूट एकता ने किया। इन संघर्षों ने यह साबित किया कि असली हिन्दुस्तान 1992 व 2002 में नहीं था वरन् 2019 में था। फासीवादी सरकार को यह समझ आ गया होगा कि आगे की राह सपाट नहीं है।
नागरिक अधिकारों व स्वतंत्रता के हनन के विरुद्ध जनता के साझा संघर्षों ने यह साबित कर दिया है कि अब मोर्चाबंदी ज्यादातर सड़कों पर ही होगी। सब कुछ एकतरफा नहीं होने वाला है। फासीवादी दमन कुछ क्षणों के लिये प्रतिरोध को शांत तो कर सकता है परन्तु अगले क्षणों में पहले से ज्यादा तीव्र प्रतिरोध से उसका मुकाबला तय है। जनता ने शरद ऋतु में संघर्षों की जो ज्वाला पैदा की वह भविष्य के फासीवाद विरोधी संघर्षों में दावानल का काम करेगी। (वर्ष- 11 अंक- 2 जनवरी-मार्च, 2020)
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