रविवार, 26 जनवरी 2020

बढ़ती यौन हिंसा के खिलाफ सही दिशा में एकजुट होना जरूरी

हैदराबाद, उन्नाव, हरदोई, फतेहपुर, रांची, इत्यादि उन बड़े-छोटे शहरों के नाम हैं, जिनमें पिछले वर्ष बर्बर ढंग से पहले महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर उनकी हत्या कर दी गयी।
हैदराबाद की घटना से पूरे देश में क्षोभ आक्रोश की लहर दौड़ गयी थी। उसके तुरन्त बाद जब उन्नाव की घटना सामने आयी तो यह आक्रोश नयी ऊंचाई पर पहुंच गया।


हैदराबाद में जिस बर्बर ढंग से महिला पशु चिकित्सक की हत्या की गयी थी ठीक उसी बर्बर ढंग से दो-तीन दिन बाद पुलिस ने संदिग्ध अपराधियों की हत्या कर दी। बर्बरता का जवाब राज्य द्वारा प्रायोजित बर्बरता से दिया गया।

उन्नाव मामले में आरोपियों ने जमानत पर जेल से बाहर आकर पीड़िता की आग लगाकर जान लेने की कोशिश की। और अंत में इलाज के दौरान दिल्ली में पीड़िता ने प्राण त्याग दिये।

एक के बाद एक ऐसी घटनाएं, सालों-साल से हमारे देश में निरन्तर घट रही हैं। निर्भया काण्ड के बाद मनमोहन सिंह सरकार ने कठोर कानून बनाने, पीड़ित स्त्रियों की सहायता के लिए ‘निर्भया फण्ड’ बनाने जैसे कई कदम उठाये। लेकिन इससे न तो बर्बर घटनाएं रुकी और न केन्द्र व राज्य सरकारों ने ‘निर्भया फण्ड’ का इस्तेमाल किया। ये बातें यह बतलाने को पर्याप्त हैं कि देश का शासक वर्ग महिलाओं के प्रति होने वाले जघन्य अपराधों व हत्याओं के प्रति क्या रुख रखता है। समाज में जब ऐसी वीभत्स घटनाओं के बाद तीव्र आक्रोश फूट पड़ता है तब सरकार उस आक्रोश के दबाव में, उसे ठण्डा करने के लिये कुछ कार्यवाहियां करती हैं। फिर सब कुछ शान्त होने पर वह भी शान्त हो जाती हैं। यह सिलसिला वर्षों से ऐसे ही चल रहा है। पूरे देश में पिछले पांच सालों में हैदराबाद सरीखे जघन्य काण्ड देश में अनगिनत संख्या में घट चुके हैं। 

अनगिनत संख्या से मतलब उन घटनाओं से है जिनके सम्बन्ध में न तो कोई प्रतिक्रिया होती है और न पुलिस की कार्यवाही का कोई नतीजा निकलता है। आये दिन किसी शहर किसी कस्बे, किसी गांव में महिलाओं की जली-अधजली लाशें मिलती रही हैं। कई बार उनकी पहचान छुपाने के लिये उनके मुंह को कुचल दिया जाता है तो कई बार उनकी हत्या कर शव  कहीं और फेंक दिया जाता है। दूरस्थ स्थानों में मिली इन लाशों की न तो शिनाख्त करने वाले होते हैं और न ही ऐसी अचिन्हित लाशें समाज में कोई आक्रोश पैदा कर पाती हैं। मृत स्त्री को ही संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। और जहां से ये स्त्रियां गायब होती हैं वहां आम तौर पर परिवार या समाज यह कह के अपने काम की इतिश्री मान लेता है कि वह फलाने के साथ भाग गयी या कहीं चली गयी होगी।

यह बात एक स्थापित बात हो चली है कि स्त्रियां कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। न घर-परिवार में और न समाज में। न अपने निवास स्थल में और न कार्य स्थल में। न एकान्त में और न सार्वजनिक जगहों में।

ऐसे ही वे दिल्ली, हैदराबाद जैसे विशाल शहरों से लेकर उन्नाव, हरदोई, फतेहपुर जैसे शहरों में भी सुरक्षित नहीं हैं। वे न शहर, न कस्बे और न ही गांवों में सुरक्षित हैं।

और यही बात देश-विदेश के बारे में भी सच है। हमारे देश की राजधानी ही नहीं संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयार्क जैसे शहर भी सुरक्षित नहीं हैं। कभी दिल्ली को तो कभी जोहान्सबर्ग को ‘रेप कैपिटल’ की उपाधि मिलती रहती है। ‘विकसित’ देशों से लेकर ‘विकासशील देशों’ में कहीं भी महिलायें सुरक्षित नहीं हैं। बलात्कार, यौन हिंसा से लेकर छेड़ाखानी, अश्लील फब्तियां पूरी दुनिया में आम बात हैं।

और इसी तरह किसी भी उम्र की महिला यौन हिंसा का शिकार बनती रहती है। यहां तक कि दुधमुंही बच्चियों से लेकर अति वृद्ध महिलायें भी संगठित और असंगठित यौन अपराधियों के निशाने पर आती रहती हैं।

दिल्ली (निर्भया काण्ड), कठुआ (आसिफा काण्ड) और हैदराबाद (पशु चिकित्सका काण्ड) में सामने आया कि कैसे पुरुषों का गिरोह षड्यंत्र रच के महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार और फिर जघन्य ढंग से उनकी हत्या कर देता है। ये खूंखार गिरोह क्रूरता की सारी सीमाओं को पार कर जाते हैं। इनकी क्रूरता के कारनामों को सुनकर किसी के भी शरीर के रोंगटे खड़े हो जायें।

ऐसे वीभत्स काण्ड समाज में भारी हलचल पैदा कर देते हैं और ‘फांसी दो’, ‘तुरन्त फांसी दो’ की बर्बर आवाजों से समाज अपनी प्रतिक्रिया देता है। आम तौर पर चुप रहने वालों की मुखरता बर्बरता की हद छूने लगती है। बर्बर ढंग से सरेआम फांसी देने या गोली मार देने से महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अपराध न पहले रुके हैं और न अब रुकेंगे। तथ्य यही बता रहे हैं। उससे बड़ी बात यह है कि हमारी पूरी सामाजिक संरचना ही स्त्री विरोधी है। इसमें परिवार, स्कूल-कॉलेज से लेकर पूरी समाज व्यवस्था ही आज कटघरे में है। भारत की ही नहीं यूरोप-अमेरिका की भी समाज व्यवस्था कटघरे में है। किसी देश में कम तो किसी देश में ज्यादा परन्तु कोई देश आज ऐसा नहीं है जहां महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा से लेकर दोयम दर्जे का व्यवहार न होता हो।

ये समाज व्यवस्थायें जिन चार स्तम्भों पर खड़ी हैं उन चारों ही स्तम्भों की नींव के नीचे हजारों-हजार स्त्रियों की क्रूर ढंग से हत्या करके दफन की गयी लाशें हैं। ये चार स्तम्भ हैं : धर्म, परिवार, राज्य और निजी सम्पत्ति की व्यवस्था। धर्म, परिवार और राज्य नाम की संस्थायें निजी सम्पत्ति की व्यवस्था को जायज ठहराती हैं और उसकी सुरक्षा और बढ़ोत्तरी के लिये अपनी पूरी ताकत लगा देती हैं। धर्म, परिवार और राज्य; निजी सम्पत्ति से ही खाद-पानी पाते हैं। इस तरह ये चारों स्तम्भ न केवल एक-दूसरे पर निर्भर हैं बल्कि एक-दूसरे को मजबूती भी प्रदान करते हैं। इन चारों स्तम्भों के ऊपर ही हमारी समाज व्यवस्था की पूरी इमारत खड़ी है। 

कोई भी धर्म उठाकर देख लिया जाय उसमें स्त्रियों के ऊपर नाना प्रकार की पाबन्दियां हैं। यहां तक कि धर्मस्थल में जाने या न जाने देने से लेकर धार्मिक अनुष्ठानों के समय स्त्रियों के लिये कई नियम-उपनियम हैं, पाबन्दियां हैं, दुर्व्यवहार हैं। ये धर्म स्त्रियों को दोयम दर्जे का मानते हैं और यहां तक उन्हें ‘नरक का द्वार’ तक कहते हैं। इन धर्मों में स्त्रियों के साथ व्यवहार में अलग-अलग देश-काल के हिसाब से कुछ-कुछ फर्क हो सकता है पर उनकी आत्मा एक है। दोयम दर्जे का व्यवहार। तरह-तरह की पाबन्दियां। मुक्ति या मोक्ष की राह में अवरोध।

यही बातें परिवार नाम की संस्था पर लागू होती हैं जहां पुरुषों का वर्चस्व होता है। वह स्त्री की नहीं पुरुष की ‘फैमिली’ (परिवार) होती है। और भाषा के जानकार बताते हैं कि फैमिली शब्द का यूनानी भाषा में अर्थ होता था ‘दासों का समूह’। यानी किसी परिवार में स्त्रियां, बच्चे उस परिवार के मालिक पुरुष के दास हैं। और दासों का काम किसी भी तरह से मालिक की सेवा करना है। क्योंकि वह घर का मालिक है इसलिये उसकी हर बात जायज है। वह ‘हां’ कहे तो ‘हां’ कहो, वह ‘ना’ कहे तो ‘ना’ कहो। वह घर का मालिक इसलिए है कि सम्पत्ति का मालिक है। कमाई करता है या कमाई के स्रोतों पर उसका कब्जा है। उसे खेत, खलिहान, दुकान, कारखाना, मकान, आदि-आदि जो भी सम्पत्ति है वह उसे उसके बाप से मिली है या उसने कमाई है। क्योंकि परिवार को चलाने वाले आर्थिक स्रोतों पर उसका कब्जा है इसलिए स्वाभाविक तौर पर उस पर निर्भर सभी को उसके हुक्म को मानना होगा। उसकी आज्ञा का पालन करना होगा और उसकी सेवा करनी ही करनी होगी।

धर्म, परिवार में पुरुष की वर्चस्वकारी स्थिति को जायज ठहराता है और इसकी भांति-भांति से व्याख्या करता है। और उसूल, अनुष्ठान, आदि से इसको स्थापित करता है। और इसीलिये धर्म का पोषण परिवार नाम की संस्था से और परिवार नाम की संस्था का धर्म से पोषण होता है।

यही बातें राज्य पर भी लागू होती हैं। मानव समाज में राज्य नाम की संस्था पैदा ही निजी सम्पत्ति की व्यवस्था की रक्षा के लिये हुई थी। कोई भी राज्य सम्पत्तिवानों की रक्षा के लिए जन्म लेता है। कानून चाहे वह आदिकालीन हो या समकालीन सम्पत्ति सम्बन्धों की ही अभिव्यक्तियां होते हैं। आधुनिक पूंजीवादी राज्यों में जहां लोकतंत्र है वहां औपचारिक तौर पर कानून की दृष्टि में स्त्री-पुरुष बराबर होते हैं परन्तु निजी सम्पत्ति की व्यवस्था के कारण ये कानून धरे के धरे रह जाते हैं। सम्पत्ति न केवल विवाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है बल्कि तलाक में भी भूमिका निभाती है। दुष्ट, जाहिल पुरुषों के साथ स्त्रियां सिर्फ और सिर्फ इसलिये जीवन भर सम्बन्ध निभाती रहती हैं कि वे तलाक के बाद कहां जायेंगी। कैसे अपने जीवन का निर्वाह कर पायेंगी। और हम ऐसी कई स्त्रियों को देख सकते हैं जिन्होंने किसी तरह से तलाक तो ले लिया पर वे अब गुजारा भत्ते के लिये यहां-वहां अदालतों के चक्कर लगाती फिरती हैं।

धर्म, परिवार, राज्य और निजी सम्पत्ति की व्यवस्था से जिस संस्कृति का निर्माण होता है वह अपने चरित्र में न केवल स्त्री विरोधी बल्कि मजदूर-मेहनतकश विरोधी है। ये चारों संस्थाएं सिर्फ और सिर्फ दौलतमंदों के लिये हैं। ये दौलत बढ़ाने को जायज ठहराती हैं। इसका उल्टा नतीजा निकलता है कि पूरे समाज में ऐसे आदमी-औरतों की संख्या बढ़ती जाती है जिनके पास कोई निजी सम्पत्ति नहीं होती है। वे सिर्फ और सिर्फ अपनी मेहनत पर या फिर भीख या अपराध से जिन्दा रह सकते हैं। जो अपनी मेहनत से जिन्दा रहते हैं वे नये समाज बनाने के अग्रदूत हो सकते हैं पर जो भीख या अपराध पर जीते हैं वे खतरनाक ढंग का जीवन जीते हैं और अपनी बारी में समाज के लिये भी खतरा बन जाते हैं। ये लम्पट तत्व कहीं तक भी जा सकते हैं। अपराध, हत्या ये सब इनके लिये बांये हाथ का खेल बन जाते हैं। समाज ने इन्हें जिन अमानवीय-नारकीय परिस्थितियों में धकेल दिया होता है वहां से वे समाज के खिलाफ ऐसी ही प्रतिक्रिया दे सकते हैं। ऐसे लम्पटों की कोई नैतिकता नहीं होती। करुणा, मानवता से इनका कोई वास्ता नहीं होता है। वे गिरोह बनाकर किसी स्त्री के साथ सामूहिक बलात्कार कर नृशंस हत्या भी कर सकते हैं तो किसी भी शहर में दंगा-फसाद कर सकते हैं। वे राजनेताओं की सभाओं में भीड़ बन सकते हैं तो फासिस्टों की अग्रणी पैदल सेना भी बन सकते हैं। लुई नेपोलियन बोनापार्ट (मशहूर नेपोलियन का भतीजा) से लेकर नरेन्द्र मोदी तक इन लम्पटों की पीठ पर सवार होकर बादशाह बनते रहे हैं।

जहां एक ओर समाज की तलछट से ऐसे अपराधी-बलात्कारी बनते हैं वहीं समाज के पहुंच वाले नेता-पूंजीपति-अफसर अपनी ताकत का इस्तेमाल कर महिलाओं के साथ यौन हिंसा करते हैं। कुलदीप सेंगर-चिन्मयानंद से लेकर ढेरों बलात्कार के आरोपी आज संसद-विधानसभाओं में बैठे हैं। पुलिस थानों में बलात्कारों की संख्या भी भारत जैसे देशों में काफी ज्यादा है। पूंजीवादी मीडिया की वर्गीय पक्षधरता ऐसे मामलों को ढकने-छिपाने में होती है तभी किसी नेता-पूंजीपति-अफसर के कुकृत्य पर ‘फांसी दो’ की मांग नहीं पैदा होती। तलछट के लोगों के बर्बर कुकृत्यों पर ही मीडिया 24 घण्टे कवरेज करती दिखलाई देती है।

समाज की तलछट से लेकर शीर्ष पर बैठे खाते-पीते लोगों से हर जगह से महिलाओं के साथ यौन हिंसा के अपराधी आज पैदा हो रहे हैं। ये सभी महिला शरीर को यौन वस्तु के रूप में देखने वाली संस्कृति के प्रभाव में होते हैं।

‘फांसी दो-फांसी दो’ की मांग करने वाले कभी इस बात की गहराई में जाने की कोशिश नहीं करते हैं कि क्यों ऐसे लोग निरन्तर हमारी व्यवस्था में पैदा हो रहे हैं जो इतने नृशंस ढंग से हत्यायें करते हैं। दंगे-फसाद में जो आगे बढ़-बढ़ कर लोगों को मारते या सम्पत्ति को नष्ट करते हैं, वे कहां से पैदा होते हैं? ये सब लोग उसी समाज व्यवस्था की पैदाइश हैं जो रात-दिन निजी सम्पत्ति की पूजा करती है। अगर मुकेश अम्बानी पैदा होगा तो मुकेश सिंह (निर्भया काण्ड में फांसी की सजा पाया हुआ) भी पैदा होगा। और दोनों ही अलग-अलग तरह से मानव जाति के दुश्मन हैं। और दोनों ही स्त्रियों, शोषितों-उत्पीड़ितों के दुश्मन हैं। एक को इस व्यवस्था में पूरा संरक्षण हासिल है तो दूसरा समाज की तलछट है। एक की सुरक्षा में पूरी राज्य मशीनरी लगी होती है तो दूसरे को राज्य व्यवस्था का अदना सा सिपाही भी किसी वक्त भी सरेआम गोली से उड़ा सकता है।

मुकेश अम्बानी और मुकेश सिंह को पैदा करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था अपना यह उत्पादन तब तक जारी रख सकती है जब तक समाज के मजदूर-मेहनतकश, किसान-नौजवान, स्त्री-पुरुष, शोषित-उत्पीड़ित इसके खिलाफ खड़े नहीं हो जाते हैं। उनके लिये मुकेश अम्बानी और मुकेश सिंह जब एक ही सिक्के के दो पहलू बन जायेंगे तब वे समझ जायेंगे कि मुकेश सिंह जैसे तब ही समाज में नहीं पैदा होंगे जब मुकेश अम्बानी जैसे नहीं पैदा होंगे। दोनों ही बर्बर पशु हैं। एक सारी मानवता से विहीन होकर जंगली बर्बर पशु की तरह अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकता है तो दूसरा एक ऐसा धनपशु है जो सभ्यता, मानवता, संस्कृति का चोला पहनकर अपने धन को बढ़ाने के लिये किसी भी हद तक जा सकता है। अपने धन के दम पर सरकार बना-बिगाड़ सकता है तो फासिस्ट हिटलर को भी पाल-पोस सकता है। हिटलर के पीछे जर्मनी के सबसे बड़े धन्ना सेठ ही थे। एक के लिये निर्भया की हत्या करना हंसी-खेल है तो दूसरे के लिये यहूदियों को गैस चैम्बर में धकेलना महान राष्ट्रवादी परियोजना है।

इस व्यवस्था के लिये स्त्रियां क्या हैं? मन बहलाव का साधन या रात-दिन काम करने वाली दासियां या ऐसे ही कुछ। या तो उन्हें ‘नारायणी-नारायणी’ कहा जायेगा या फिर महज एक दासी। या फिर पुरातन ढंग से ‘नरक का द्वार’ या फिर अति आधुनिक समाज में महज ‘‘यौन वस्तु’’ (सेक्स ऑब्जेक्ट)। वह कोई इंसान नहीं है वह या तो देवी है या फिर दासी या फिर यौन वस्तु। 

‘यौन वस्तु’ की धारणा को रोज बनने वाली फिल्मों, साहित्य, इण्टरनेट-टेलीविजन में प्रचार मिलता है और सबसे वीभत्स रूप में पोर्न फिल्में इसे पुष्ट करती हैं, जहां सब कुछ अतिरंजित है।

किसी भी स्त्री या पुरुष को उसके सम्पूर्ण मानवीय गरिमा से च्युत कर जब महज यौनिकता (सेक्सुयलिटी) या यौन अंगों के रूप में चित्रित कर धनपशु कमायेंगे तो समाज में ऐसे लोग निरन्तर तैयार होंगे वे चाहे भद्रलोक का चोला ओढ़ें या समाज की तलछट हों वे किसी भी तरह अपनी कुत्सित इच्छाओं की पूर्ति चाहेंगे। चाहे उसके लिये उन्हें कुछ भी करना पड़े। घर के भीतर यौन आक्रमण करने पड़ें या समाज में गिरोह बनाकर सामूहिक बलात्कार या हत्यायें करनी पड़े।

हैदराबाद, उन्नाव, हरदोई, फतेहपुर, आदि-आदि घटनाओं पर गहराई से विचार करेंगे तो हम यही पायेंगे कि यहां इस व्यवस्था में इन समस्याओं का कोई समाधान नहीं है। न तो कठोर कानून और न ही तुरन्त फांसी जैसी सजाएं। यह व्यवस्था मुकेश अम्बानी और मुकेश कुमार को ही पैदा करेंगी। साथ ही कुलदीप सेंगर जैसे नेता ही पैदा करेगी। यहां जरूरी और बेहद जरूरी हो गया है कि इस व्यवस्था को बदला जाय। यह व्यवस्था जिन स्तम्भों में खड़ी है उन स्तम्भों की नींव खोदी जाय। एक नया समाज बनाया जाय जहां शोषण-उत्पीड़न न हो। स्त्रियों को आजादी, बराबरी न केवल औपचारिक तौर पर बल्कि वास्तविक तौर पर हासिल हो। आज ऐसी समाज व्यवस्था समाजवाद के अलावा कुछ अन्य नहीं हो सकती है।

 बढती यौन हिंसा आकड़ों की नजर में

भारतीय समाज महिलाओं के लिए लगातार असुरक्षित होता जा रहा है। खुद सरकारी संस्था राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2018 में महिला अपराधों से जुडे़ 378277 मामले दर्ज किये गये। जबकि 2017 में यह संख्या 3,59,849, 2016 में  3.38 लाख व 2015 में 3.29 लाख थी। इन्हीं आंकड़ों के अनुसार लगभग हर 15 मिनट में एक महिला के साथ बलात्कार का मामला सामने आता रहा है। यह वो आंकड़े हैं जो थानों में दर्ज हो जा रहे हैं। लाखों मामले लोक-लाज, दबाव, पुलिस की कार्यप्रणाली इत्यादि के चलते दर्ज ही नहीं हो पाते। जाहिर है वास्तविक स्थिति कहीं अधिक भयावह है।

यौन हिंसा और सख्त कानून

हैदराबाद निशंस रेप-हत्या काण्ड के बाद उपजे जनाक्रोश के बीच पुलिस ने इस घटना के आरोप में दो दिन बाद चार नवयुवकों को गिरफ्तार किया। कुछ दिन पश्चात 6 दिसम्बर की सुबह पुलिस ने अपराध की ही जगह पर कथित आरोपियों को ‘कथित मुठभेड़’ में मार गिराया। इस मुठभेड़ (एनकाउण्टर) के पश्चात कुछ पूंजीवादी नेता, अधिकारी, अभिनेता लोग पुलिस की तारीफ करने लगे। ‘त्वरित न्याय’, ‘निर्भया के बलात्कारियों को फांसी’, ‘ऐसी सजा से बलात्कारियों के मन में डर बैठने’ जैसी बातें चर्चा में आने लगी। कुछ लोगों ने पुलिसकर्मियों पर फूल बरसाये तथा उन्हें मिठाइयां खिलायी। लोग भूल गये कि यह वही पुलिस है जिसने महिला डॉक्टर की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने गये परिजनों से कहा कि ‘कहीं भाग गयी होगी’। लोग यह भूल गये कि यह वही पुलिस है जो कई महिलाओं को रिपोर्ट दर्ज करने से पहले ही थाने से भगा देती है। 

सख्त कानून की मांग दरअसल ऐसे मामलों में न्याय न मिलने या लंबित रहने से भी उपजती है। मामले सालों अदालत में लटके रहते हैं और दोष सिद्धि की दर भी बहुत कम है। निर्भया काण्ड के बाद गठित जस्टिस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार ‘सख्त सजा की जरूरत नहीं है। क्योंकि मौजूदा कानून लागू ही नहीं होते इसलिए लोग सख्त सजा की मांग करते हैं। इससे बलात्कार नहीं रुकेंगे’। यह सच्चाई भी है।

महिला हिंसा की वजह, इस सम्बन्ध में कानून का मौजूद न होना नहीं है। समाज में मौजूद पुरुष प्रधान मानसिकता, महिलाओं को ‘उपभोग की वस्तु’ के बतौर प्रस्तुत करने वाली ‘खाओ-पियो मौज करो’ की उपभोक्तावादी संस्कृति तथा फिल्मों-गानों-विज्ञापनों-पोर्न साइटों द्वारा परोसी जा रही यौन कुण्ठा मिलकर वह वातावरण तैयार करती हैं जिसमें लगातार ऐसे लम्पट लोग पैदा हो रहे हैं जो महिला हिंसा को अंजाम दे रहे हैं। इसको बदलने के लिए सख्त कानून की नहीं व्यापक सामाजिक बदलाव की जरूरत है।

सख्त कानून बनने का यह परिणाम अवश्य निकलेगा कि बच्चियों-महिलाओं पर हो रही यौन हिंसा के मामलों में रिपोर्ट दर्ज होना ही कम हो जायेंगी। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 95 फीसदी बलात्कार के मामलों में आरोपी परिचित ही होते हैं। ऐसे में रिपोर्ट दर्ज कराने से लेकर मुकदमे तक में रिश्तेदार-परिचित लोग मामले को दबाने का ही प्रयास करेंगे। इससे मुकदमों की संख्या और दोषसिद्धि दर में और कमी आयेगी। जो मुकदमे दर्ज होंगे उनमें अपराधी आशाराम-चिन्मयानन्द-सेंगर जैसे रसूखदार लोग या पैसे वाले लोग हुये तो सख्त से सख्त कानून भी उनके सामने घुटने टेक देगा। व्यापक सामाजिक आंदोलनों के दबाव में ही इन रसूखदार लोगों पर शासन-प्रशासन कार्यवाही के लिए मजबूर होता है। आशाराम मामले में गवाहों को मार देना, सेंगर-चिन्मयानन्द मामलों में पीड़ित पक्ष को ही प्रताड़ित करने की घटनायें इस बात को पुष्ट कर देती हैं। साथ ही यह भी कि अगर बलात्कार की सजा कठोर बना कर हत्या की सजा (जो आजीवन कारावास या फांसी है) के करीब पहुंच जायेगी तब अक्सर बलात्कारी हर बलात्कार के साथ ही हत्या का भी प्रयास करेंगे और ऐसे मामलों में आरोपी पर दोष सिद्ध करना और मुश्किल हो जायेगा।

कुछ लोग एनकाउण्टर या अपराधियों को जनता के हाथों सौंपकर उनकी लिंचिंग की मांग कर रहे हैं। ये कौन लोग हैं? नेता व अफसर तो यह कहकर अपराध के सामाजिक कारणों को छिपाकर उसे व्यक्तियों तक समेट देना चाहते हैं। यह कहकर उनका लक्ष्य साफ है कि वे कोई भी आंच पूंजीवादी व्यवस्था तक नहीं पहुंचने देना चाहते। फासीवादी विचारों के प्रस्तोता एनकाउण्टर को महिमामंडित कर एक तानाशाही पूर्ण बर्बर समाज की पैरोकारी कर रहे हैं। तानाशाहीपूर्ण बर्बर समाज के लिए जनमत तैयार कर रहे हैं। एक बर्बर कृत्य के लिए फांसी की मांग भी अपने आप में बर्बरता ही है।

जहां तक आम जनता के एक हिस्से का सवाल है जो ऐसे एनकाउण्टर के समर्थन में खड़ा हो रहा है, वह एक तरफ तो महिला हिंसा से आक्रोशित है किन्तु मौन है। यौन हिंसा के मामले में कानून के पक्षपात व देरी से परेशान है किन्तु इसके सामाजिक वर्गीय कारण को नहीं समझता। ऐसे लोग ही आम तौर पर एनकाउण्टर को जायज ठहरा रहे हैं। हमें समझना होगा कि हमारा कानून एक पूंजीवादी व्यवस्था का कानून है, जहां आम जनता को न्याय नहीं मिलता ना ही उसके न्याय के लिये यह कानून बने हैं। वह न्याय तभी पाता है जब वह अपने सामाजिक आंदोलनों से सरकार व प्रशासन को मजबूर करे। वरना तो उसकी थाने में रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो पाती। एनकाउण्टर की मांग अंततः उसके ही नाम मात्र के जनवाद का गला घोंट देगी। 


इसलिए हम मेहनतकशों को आज के फासीवादी माहौल में जो नाम मात्र का जनवाद है उसकी रक्षा भी करनी है। और सिर्फ जनवाद तक ही नहीं ठहरना है। हमें ऐसे समाज की तरफ बढ़ना है जहां मजदूर-मेहनतकशों का राज हो। जहां यौन हिंसा समेत हर किस्म के अपराध को जड़ से खत्म किया जायेगा। जहां मुनाफे की खातिर महिलाओं को उपभोग वस्तु की तरह नहीं स्थापित किया जायेगा बल्कि उन्हें पुरुषों की पूर्ण बराबरी का दर्जा हासिल होगा। उन्हें इंसान समझा जायेगा। यह मजदूर-मेहनतकशों के लिए पूर्ण स्वतंत्रता, बराबरी का समाज होगा। 
                                                     (वर्ष- 11 अंक- 2 जनवरी-मार्च, 2020)

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