सोमवार, 29 जून 2026

नस्लीय हिंसा का शिकार एंजेल चकमा
सुरभि


        एंजेल चकमा, त्रिपुरा का एक छात्र जो अपनी पढ़ाई करने देहरादून, उत्तराखंड आया था। उसके माता-पिता ने अपने बेटे को सुंदर भविष्य की उम्मीदों के साथ देहरादून भेजा था। ना तो एंजेल चकमा अपनी पढ़ाई पूरी कर पाए और न ही उनके माता-पिता का उनके सुंदर भविष्य का सपना ही पूरा हो पाया। नस्लीय हिंसा ने उत्तराखंड में उनकी जान ले ली। अपने खिलाफ दी गई नस्लीय गालियों का विरोध करने की सजा एंजेल को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। इस हमले में उनके भाई भी घायल हुए थे। एंजेल चकमा की हत्या ने एक बार फिर नस्लीय घृणा और हिंसा के ज़ख्म को ताज़ा कर दिया है।
 
बड़े शर्म की बात है कि उत्तराखंड सरकार और उसकी पुलिस एंजेल चकमा पर हुए हमले को ‘नस्लीय हमला’ मानने से इनकार करती रही। जब उत्तराखंड से लेकर भारत के अन्य हिस्सों में छात्रों के प्रदर्शन होने शुरू हुए तभी सरकार हत्यारों को पकड़ने के लिए हिली। इससे पहले सरकार और हत्यारे दोनों मान कर चल रहे थे कि इस तरह की हत्याएं आम हैं। जैसा कि देश में देखने को मिल रहा है कि मुस्लिमों, दलितों की भीड़ हत्या (माब लिंचिंग) करने वाले अपराधी या तो पकड़े नहीं जा रहे या फिर अदालतों/सरकारों द्वारा छोड़ दिये जा रहे हैं। सत्ता से जुड़े लोगों द्वारा ऐसे अपराधियों को सम्मानित करना न सिर्फ इन और इनके जैसे अन्य अपराधियों के हौसले बढ़ाता है बल्कि समाज में अपराध करने और आतंक की संस्कृति को बढ़ावा देता है। इस आपराधिक संस्कृति में हालिया बढ़ोत्तरी का स्रोत हिन्दू फासीवादी संस्कृति है। जिसमें हिंदी भाषी क्षेत्र का रहन-सहन, खान-पान, रूप-रंग को ‘‘भारतीयता“ मानना। अन्य को भाषा, रंग-रूप, खान-पान के कारण चिढ़ाना, गाली गलौज करना, हिंसा या हत्या तक कर देना शामिल है।

पिछले 10- 12 साल इसी अपराध और आतंक की संस्कृति के और व्यापक होने के साल रहे हैं। मौहम्मद अख़लाक़ की हत्या के आरोपियों के प्रति सहानुभूति जतलाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने अदालत को कहा कि अभियुक्त बुरे आदमी नहीं हैं इसलिए उन पर से मुक़दमा वापस ले लेना चाहिए। केंद्र-राज्य की भाजपा सरकारें इस हिन्दू फासीवादी हिंसा-हत्या को बढ़ावा दे रही हैं।

उत्तराखंड सरकार/पुलिस की नस्लीय हमलों/ हत्याओं के प्रति उदारता के कारण ही मुख्य हत्यारा भागने में सफल रहा, जिसे अभी तक पकड़ा नहीं गया है।

हमले के दौरान एंजेल बार-बार कह रहे थे कि वो ‘भारतीय’ हैं। लेकिन हत्यारों की शिराओं-धमनियों में खून के बजाय घृणा दौड़ रही थी। हत्यारे एंजेल को ‘‘चाइनीज“, ‘‘चिंकी“ कहकर अपमानित करते रहे, हमला करते रहे। कुछ समय पहले ही उत्तराखंड में कश्मीरी छात्रों और फेरी लगाने वालों पर भी हमले हुए थे। पिछले लंबे समय से उत्तराखंड में संघ-भाजपा द्वारा नफरत और विभाजन की राजनीति को ही अपनी रणनीति बनाया गया है। जिसमें मुख्यमंत्री भी शामिल हैं, जिन्होंने मुस्लिमों के खिलाफ लक्षित कई प्रकार के ‘जिहाद’ की एक श्रेणी का ‘‘आविष्कार“ कर डाला है। लगातार होते पेपर लीक, युवाओं का पलायन और बढ़ती बेरोजगारी, आपदाओं से आम जन का जीवन अस्त-व्यस्त होना और भारी भ्रष्टाचार आदि ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिस पर सरकार असफल रही है। लेकिन घृणा और आतंक का प्रसार निरंतर जारी रहा है। रोज फैलाई जा रही यह घृणा ही ऐसी घटनाओं का कारण बनती है और अपराधियों को तैयार करने का काम करती है।

देश में पिछले एक दशक में भीड़ द्वारा हत्या करना आम होता गया है। कभी मुस्लिम तो कभी दलित तो कभी नस्ल के नाम पर लोगों के दिल-दिमाग में भरी गई घृणा; मासूमों की हत्याओं का कारण बनती रही है। एंजेल की हत्या भी इसी घृणा का परिणाम है।

आज नस्लीय घृणा के खिलाफ आवाज बुलंद कर और इस घृणा को फैलाने वाले विचारों, संगठनों और लोगों का पर्दाफाश करने की जरूरत है। यह उजागर करने की जरूरत है कि इस घृणा से वो किसके हितों को साध रहे हैं? एक संघर्ष खड़ा करने की जरूरत है जो किसी जाति, धर्म, नस्ल, राष्ट्र आदि के नाम पर विभाजन के खिलाफ हो। ऐसे संघर्ष और उनकी सफलता ही एंजेल जैसे हिंसा का शिकार हुए लोगों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।                                                                                                                             ऽऽऽ

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