-सुखवीर
पिछले दिनों हरियाणा के सबसे बड़े औद्योगिक शहर फरीदाबाद के पास एक गांव सुनपेड़ में एक दलित परिवार के घर को आग की भेंट चढ़ा कर दो मासूम बच्चों की हत्या कर दी गयी। घटना देश की राजधानी के निकट थी इसलिए तुरंत सुर्खियों में आ गयी और राजनीतिक दलों के बीच विवाद का विषय बन गयी।
सुनपेड़ की घटना आजाद भारत में कोई अपवाद स्वरूप हुयी घटना नहीं है और न ही ऐसी घटना है जिसे कोई कहे कि मामला कुछ और था बना कुछ और दिया गया। हरियाणा में हाल के वर्षों में दर्जनों गांवों-कस्बों में ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं। ऐसे ही घटनाएं उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में सामने आती रहती हैं।
आजाद भारत में दलितों, आदिवासियों और कई स्थानों पर पिछड़ों पर जाति हिंसा की घटनाएं क्यों नहीं रुक रही हैं। सख्त कानून और हजारों किस्म के राजनीतिक-सामाजिक संगठनों की मौजूदगी और सक्रियता के बावजूद दलितों-आदिवासियों को रोज-रोज अपमान, गैरबराबरी, उत्पीड़न और हिंसा को क्यों झेेलना पड़ता है। क्यों सवर्ण इक्कीसवीं सदी में भी मध्ययुगीन जातीय श्रेष्ठताबोध और अहंकार में डूबे हुए हैं।
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था की व्यापकता इतनी अधिक है कि जिन धर्मों में जाति व्यवस्था का कोई प्रावधान व हवाला नहीं है वे भी जाति व्यवस्था के जाल में फंसे हुए हैं। मुस्लिम, सिख, ईसाई, आदि धर्मोें में जातिगत बंटवारा मौजूद है। यह जातिगत बंटवारा उनके अंदर वैसी ही जकड़ बनाये हुए है जैसी जकड़ हिन्दू धर्म के अंदर मौजूद है। शादी, रहन-सहन, खान-पान सहित सामाजिक व्यवहार में जाति बोध और कुंठायें काम करती रहती हैं।
यहां सवाल उठता है कि क्या इक्कीसवीं सदी में जाति व्यवस्था वैसी ही है जैसी बीसवीं सदी से पूर्व थी। कोई भी जो भारतीय समाज के इतिहास, सामाजिक जीवन का नजदीकी से अध्ययन करेगा वह यही कहेगा कि नहीं, ऐसा नहीं है। जाति व्यवस्था पहले से काफी कमजोर हुई है परंतु इतनी भी कमजोर नहीं हुयी है कि कोई यह कह सके कि जाति व्यवस्था का नाश बस अब कुछ दिनों की बात है, कि जाति व्यवस्था के उन्मूलन का वक्त आ गया है।
जाति व्यवस्था में आये बदलाव में सबसे महत्वपूर्ण व केन्द्रीय भूमिका भारत में पूंजीवादी विकास की रही है। पूंजीवाद ने क्रमशः भारतीय समाज में परंपरागत ग्रामीण अर्थव्यवस्था जो जातिगत पेशों पर आधारित थी, की नींव खोदी और सामाजिक अलगाव को तोड़ डाला। पूंजीवादी व्यवस्था की स्थापना भारत में एक बेहद लंबे कालखंड में हुयी। शुरुआत ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के भारतीय समाज में अपने लूट और शोषण के तंत्र को स्थापित करने से हुयी। उन्होंने भारतीय सामंती व्यवस्था को तोड़कर उसके स्थान पर अर्द्धसामंती-औपनिवेशिक व्यवस्था कायम की। इस व्यवस्था में उन्होंने अपने शोषण व लूट को व्यवस्थित और सुचारू ढंग से चलाने के लिए विशाल तंत्र खड़ा किया। इस तंत्र में नयी लगान व्यवस्था, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन व अपने माल को पहुंचाने के लिए कल-कारखाने, रेल व यातायात व्यवस्था, संचार साधनों का विकास और अपने क्रूर शासन को बनाये रखने के लिए विशाल प्रशासनिक ढांचा आदि को शामिल किया जा सकता है।
भारतीय समाज में पूंजीवाद के अध्यारोपण से पुरानी जड़ चीजों की नींव हिलनी शुरू हो गयी। ब्रिटिश औपनिवेशिक ढांचे को चलाने के लिए ऐसे शिक्षित लोगोें की भी आवश्यकता थी जो शासकों के लिए दुभाषिये, क्लर्क आदि का काम कर सकें। इस शिक्षा व्यवस्था के दो परिणाम निकले। पहला ब्रिटिश औपनिवेशिक तंत्र की जरूरतें पूरी हुयीं और दूसरा उनके लूट और शोषण के तंत्र को समझ कर उसकी मुखालफल करने वाले लोग सामने आये। पहले अंग्रेजों के चाटुकार थे तो दूसरे भारत को आजाद देखने वाले लोग थे।
आजादी की लड़ाई के विस्तार व पेचोखम में न भी जाया जाये तो भी हम जानते हैं कि एक लंबे और भीषण संघर्ष के बाद भारत 1947 में आजाद हुआ। और आजाद भारत में एक पूंजीवादी व्यवस्था कायम की गयी। जैसे-जैसे पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली का वर्चस्व कायम होता गया वैसे-वैसे भारत का जातिगत ढांचा चरमराने लगा। जजमानी व्यवस्था अपने अंत की ओर बढ़ने लगी। जातिगत पेशे टूटने लगे। भू-मालिकाने के स्वरूप में परिवर्तन होने लगे। पूंजी के वर्चस्व ने सदियों से ठहरे समाज में पिछली एक सदी में जबरदस्त उथल-पुथल कायम की है। इस उथल-पुथल को आज हर कहीं समाज में देखा जा सकता है।
आजादी की लड़ाई के दिनों में ही भारतीय जाति व्यवस्था के दार्शनिक, वैचारिक, सामाजिक आधार की आलोचना शुरू हो चुकी थी। ऐसे अनेकों-अनेक समाज सुधारक हुये जिन्होंने जाति व्यवस्था को अपने निशाने पर लिया। इस क्रूर व्यवस्था के मानवद्रोही चरित्र को उजागर किया। ऐसे व्यक्तियों में महाराष्ट्र के महात्मा ज्योतिबा फुले (1837-1890), केरल के श्रीनारायण गुरू (1856-1926), अय्यानकाली (1863-1941), तमिलनाडु के पंडित अयोतीदास (1845-1944), ई0वी0 रामास्वामी पेरियार (1879-1973) के नाम प्रमुखता से लिये जा सकते हैं।
उपरोक्त सभी व्यक्तियों के अलावा एक ऐसी शख्सियत रही है जिन्हें आम तौर पर भारतीय संविधान के निर्माता के तौर पर जाना जाता है, डा0 भीमराव राम जी अंबेडकर (1891-1956)। जिन्होंने भारतीय जाति व वर्ण व्यवस्था की निर्मम आलोचना की। उनका एक प्रसिद्ध भाषण ‘जाति व्यवस्था का उन्मूलन’(Annihilation Of Caste) आजकल पुनः एक बार चर्चा में है।
1947 में बने भारतीय संविधान में जाति व्यवस्था को सामाजिक रूप से इतनी ही चुनौती मिली कि एक तरफ इससे अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के लिए संसद, विधानसभाओं व अन्य संस्थानों में सीटें सुरक्षित की गयी तथा शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गयी। इसके साथ कई कानून बनाये गये। इन कानूनों में अस्पृश्यता (अपराध) कानून 1955 (जिसे नागरिक अधिकार सुरक्षा कानून भी कहा जाता है), अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 व 1995 आदि हैं।
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था के पूर्ण उन्मूलन के लिए यह जरूरी था कि भारत में मजदूर और किसानों के नेतृत्व में कोई जनवादी क्रांति हुई होती। आजादी की लड़ाई के दिनों में भारत में क्रांति की वास्तविक संभावना मौजूद थी परंतु क्रांति के खिलाफ भारत को गुलाम बनाने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवादी ही नहीं थे बल्कि भारत के भावी शासक पूंजीपति वर्ग और भूस्वामी भी थे।
भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को बनाये रखने में भारत के शासक वर्ग के घृणित हित मुख्यतः काम कर रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि ब्राह्मणवादी, मध्ययुगीन मूल्य मान्यताओं का नाश हो। जाति व्यवस्था का सामाजिक स्वरूप बनाये रखने के लिए वे इन घृणित मूल्यों-मान्यताओं का इस्तेमाल करते रहे। यह सब आज भी जारी है। हिन्दू फासीवादी जो कि आज सत्ता में काबिज हैं, वे भारतीय समाज में इन मूल्यों को ही स्थापित करना चाहते हैं। वे इन्हें भारतीय संस्कृति का नाम देते हैं। दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों को उत्पीड़ित रखने वाली जाति व्यवस्था को किसी भी तरह से कायम रखना चाहते हैं।
भारतीय समाज में आज एक तरफ पूंजीवादी विकास के कारण जाति आधारित पेशे और अलग-थलग डालने वाला सामाजिक परिवेश टूट रहा है तथा दूसरी तरफ जाति व्यवस्था के घृणित तंत्र को बनाये रखने के लिए शासक वर्ग के विभिन्न हिस्से लगातार प्रयासरत हैं। वे यथास्थिति को बनाये रखना चाहते हैं। इस तरह से ये दो परस्पर विरोधी गतियां जाति व्यवस्था के जीवन को संचालित करती हैं।
जाति व्यवस्था को चुनौती देने वाले सामाजिक सुधारों के प्रयासों के साथ पूंजीवादी समाज के निर्माण ने जाति व्यवस्था के दार्शनिक, वैचारिक या धार्मिक आधार को काफी कमजोर कर दिया है। सदियों से ब्राह्मणों द्वारा जातियों की उत्पत्ति को ब्रह्मा के शरीर के विभिन्न अंगों से पैदा होने की झूठी कहानी कौन दलित मानेगा। कौन मानेगा कि ब्राह्मण सिर और शूद्र पांव से पैदा हुए थे। ऐसे ही दलितों, पिछड़ों का अपमान करने वाली झूठी पौराणिक कहानियों को कौन विवेकवान मनुष्य सुनना पसंद करेगा। धूर्त ही इन झूठी कहानियों पर विश्वास कर सकते हैं।
क्रांति न होने देने का यह परिणाम निकला कि भारतीय समाज में जाति व्यवस्था बनी रही, अब जो कुछ था वह पूंजीवाद की आम गति और कानूनी-संवैधानिक जरिये से होने वाले सुधार। ये सुधार आजादी के बाद बने पूंजीवादी संविधान के हिस्से बन गये। ये सुधार जाति व्यवस्था की नींव खोदते थे सिर्फ उसे कमजोर करने में ही कुछ भूमिका निभाते थे। चुनाव में सुरक्षित सीटें व आरक्षण की व्यवस्था ऐसे ही सुधार हैं।
सुरक्षित सीटें व आरक्षण आदि के चलते समाज में खासकर राजनैतिक व प्रशासनिक ढांचें मेें दलित, आदिवासी, पिछड़े उन स्थानों पर पहुंचने में सफल रहे जहां वे इस बंदोबस्त के बगैर नहीं पहुंच पाते। सवर्णाें के हाथ में इसके बगैर बहुत अधिक शक्तियां केन्द्रित रहतीं। वे एक ऐसा तंत्र कायम कर लेते जो करोड़ों लोेगों को गुलामी के अंधेरे में धकेल देता।
सुरक्षित निर्वाचन व आरक्षण ने जाति व्यवस्था की जकड़न को ऐसे समाज में काफी ढीला किया जिसमें सामंतशाही के खिलाफ कोई जनवादी क्रांति नहीं हुयी थी।
आरक्षण के खिलाफ भारतीय समाज में सबसे उग्र प्रतिक्रिया नब्बे के दशक में तब दिखाई दी थी जब वी.पी.सिंह की सरकार ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करते हुए 27 फीसदी आरक्षण पिछड़ों के हक मेें लागू कर दिया। सवर्णों और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के द्वारा इसका घोर विरोध किया गया था।
भारतीय समाज में आरक्षण का विरोध करने वाले कभी भी जाति व्यवस्था के उन्मूलन की बात नहीं करते। वे आरक्षण को खत्म कर देना चाहते हैं परंतु घृणित जाति व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं। वे योग्यता का तो बहुत तर्क देते हैं परंतु वे इतने अधिक अयोग्य हैं कि देख ही नहीं पाते कि जाति व्यवस्था ने भारत के दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों के जीवन में कितना जहर घोला है। सच तो यह है कि भारत में मिर्चपुर, लक्ष्मणपुर बाथे, खैरलांजी, सुनपेड़ की वीभत्स घटनाएं घटती रहती हैं। सच तो यह है कि जिस दिन जाति व्यवस्था का पूर्ण उन्मूलन हो जायेगा उस दिन आरक्षण की मांग उठने की जमीन पूर्णतया खत्म हो चुकी होगी। इसलिए यदि कोई सवर्ण आरक्षण की व्यवस्था का खात्मा चाहता है तो उसे जाति व्यवस्था उन्मूलन के नारे को बुलंद करना चाहिए।
जाति व्यवस्था का उन्मूलन वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था के रहनुमाओं का कभी कोई मकसद नहीं रहा है। भारतीय लोकतंत्र में जाति मत प्राप्त करने का ऐसा जरिया बनी हुयी है कि हर कोई इसको बना कर रखना चाहता है। कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा, आदि सभी पार्टियां चुनावों के समय जाति के समीकरण के गणित को बिठाती रहती हैं। हालिया बिहार विधानसभा चुनाव के समय इसका दिलचस्प नजारा देखने को मिला। भूलकर भी किसी ने नहीं कहा कि जाति व्यवस्था के कलंक से भारतीय समाज को मुक्ति चाहिये। हर कोई जाति को बनाकर रखना चाहता है। जिन जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता उसको इसका लाभ उठाने का मौका दिलाने की राजनीति तो पिछले कई दशकों से परवान चढ़ रही है। जाट, गुर्जर, पटेल आदि-आदि जातियां आरक्षण के लाभ के लिए उग्र आंदोलन करती रही हैं।
आरक्षण की ये मांगें इक्कीसवी सदी के उस भारत की तस्वीर को खुलेआम सामने ले आती हैं जिस तस्वीर को भारत के नई आर्थिक नीतियों के पैरोकार दुनिया में किसी को नहीं दिखाना चाहेंगे। सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की मांग उस समय सबसे ज्यादा जोर पकड़ने लगी जब निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां जोरदार ढंग से लागू की जाती रही हैं। केन्द्र व राज्य सरकारें सामाजिक मदों में भारी कटौतियां कर रही हैं। नये सरकारी स्कूल, काॅलेज नाममात्र के ही खुल रहे हैं। सरकारी नौकरियों की संख्या घटती चली गयी है।
नई आर्थिक नीतियों का भले ही समाज में शासन वर्ग और उसके चाटुकारों ने कितना ही गुणगान किया हो परंतु आज भी समाज में बेरोजगारों के बीच सरकारी नौकरियों का जबरदस्त आकर्षण मौजूद है। हर कोई जानता है कि निजी क्षेत्र में तीव्र शोषण के साथ असुरक्षित भविष्य है। उसके मुकाबले उन्हें सरकारी नौकरियां सुरक्षित और फायदेमंद लगती हैं। इसलिए एक-एक सरकारी पद के लिए लाखों आवेदन करते हैं और इसीलिए या तो आरक्षण की सूची में नयी जातियों को शामिल करने की मांग होती है या फिर तथाकथित योग्य लोगों के द्वारा आरक्षण को खत्म करने की मांग होती है।
आर्थिक आरक्षण का शिगूफा उछालने वाले वैसे बड़े न्याय और बराबरी के पक्षधर बनते हैं परंतु ये भी भूलकर कभी जाति व्यवस्था के खात्मे की बात नहीं उठाते हैं। वे जातिगत आरक्षण को तो खत्म करना चाहते हैं परंतु जाति व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं। यह अजब-गजब पाखण्ड है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख जब बिहार चुनाव के समय आरक्षण की व्यवस्था की समीक्षा की मांग कर रहे थे तब उनके विरोधियों ने ठीक ही प्रश्न उठाया था कि वे जातिगत आरक्षण को खत्म करने का षडयंत्र रच रहे हैं। बुरी तरह से आलोचना का शिकार होने पर देश के प्रधानमंत्री यह कहने को मजबूर हुए कि वे आरक्षण की व्यवस्था को बनाये रखने के लिए जान की बाजी लगा देंगे।
आरक्षण व सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था का लक्ष्य कभी भी जाति व्यवस्था का नाश नहीं था। यह पूंजीवादी शासकों की एक ऐसी नीति थी जिसके चलते वे दलित, आदिवासी, पिछड़ों के बीच पूंजीवादी सत्ता का विस्तार चाहते थे। उन्हें शासक मध्यम वर्ग में प्रवेश देकर उन्हें आत्मसात करना चाहते थे। इस रूप में वे सफल रहे हैं। आज भारत की वर्गीय संरचना के ऊपर के संस्तरों में इन जातियों की एक ठीक उपस्थिति है। यह बातें इस सच के साथ हैं कि इन जातियों की एक बेहद क्षुद्र संख्या ही शासकवर्ग की पांतों में है जबकि करोड़ों लोग शोषित और शासित हैं। वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में भारत के करोड़ों दलित, आदिवासी, पिछड़े उन संस्तरों में सैकड़ों वर्षाें तक आरक्षण की व्यवस्था के चलते रहने पर भी नहीं पहंुच सकते। वे एक ही शर्त में शासक बन सकते हैं, जब वे वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था का नाश कर दें समाजवाद कायम कर दें। ऐसा जब वे करेंगे तब वे अपनी जाति पहचानों का भी नाश कर देंगे। जाति व्यवस्था का उन्मूलन कर देंगे। यह प्रक्रिया क्रांति के विकास के साथ बढ़ती जायेगी और तब सम्पंन हो जायेगी जब मुल्क में समाजवादी सत्ता कायम होगी। समाजवादी समाज में न जातियां होंगी और न जातिगत आरक्षण जैसी व्यवस्था। न जातिगत श्रेष्ठता न हीनताबोध होगा। ऐसे नये मनुष्य भारत की धरती पर विचरण करेंगे जिनका जीवन जाति व्यवस्था के कलंक से पूर्णतया मुक्त होगा।

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