रविवार, 1 मई 2016

पूंजीवाद का खात्मा ही जाति व्यवस्था का अंतिम हल

संपादकीय

        आजादी के 67 वर्ष बाद भी जाति व्यवस्था का कलंक देश में मौजूद है। सुनपेड़, खैरलांजी, बथानी टोला, लक्ष्मणपुर बाथे जैसे नृशंस हत्याकांड दिखलाते हैं कि आज भी जाति व्यवस्था, जातीय उत्पीड़न की हकीकत बनी हुई है। इसी के चलते दलित महिलाओं से बलात्कार, अंतरजातीय प्रेम विवाह करने वाले युवक-युवतियों को मार देना जैसी हैवानियत जब-तब सामने आती रहती है। आज भी बड़े पैमाने पर सामाजिक आचार व्यवहार में दलित रोज ही भेदभाव, उत्पीड़न का शिकार पर बन रहे हैं। यह सब पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा बनाये गये कानूनों के बावजूद बदस्तूर जारी है।

        भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था की कभी-भी दिली चाहत नहीं रही कि जाति व्यवस्था खत्म हो। जातिवादी भेदभाव, उत्पीड़न का वह हमेशा ही लाभ उठाता रहा है। इस सामाजिक भेदभाव से वह मजदूरों-मेहनतकशों को बांटकर रखता है। जातिवाद के कारण वह तमाम पिछडे़ इलाकों में अपने शोषण की मात्रा व क्रूरता को बढ़ाकर अधिक मुनाफा कमाता रहा है। हां, पूंजीवादी व्यवस्था अपनी गति में जरूर जाति व्यवस्था के आधार को खत्म करते हुई आगे बढ़ी है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था ने परम्परागत ग्रामीण अर्थव्यवस्था को तोड़ दिया जिसका आधार जातिवाद था। जिसकी मुख्य विशेषता जाति आधारित पेशा था यानि व्यक्ति की पैदाइश के साथ ही उसकी जाति व इसलिए भविष्य में उसका पेशा तय हो जाते हैं। पूंजीवाद ने इस आधार को खिसका दिया है। आज बाटा की जूता फैक्टरी में काम करने के लिए ब्राह्मण तक खुशी-खुशी तैयार हैं।
        पूंजीवादी व्यवस्था ने तो अपनी गति में क्रमशः जाति व्यवस्था के आधार को खिसकाया किन्तु पूंजीवादी राजनीति पार्टियों ने अपने और व्यवस्था के हित में ना सिर्फ इसे बनाकर रखा है बल्कि अपनी वोट बैंक की राजनीति के हिसाब से अलग-अलग पार्टियां जातिवाद का भरपूर इस्तेमाल भी करती हैं। पिछड़ों दलितों की राजनीति करने वाली पार्टियों से लेकर स्वतंत्र दलित संगठन भी जाति व्यवस्था का इस्तेमाल ही अधिक करते है। ये कभी भी अपने एजेण्डे पर जातिवाद के उन्मूलन को नहीं रखते हैं।
        भारत में आजादी के बाद जाति व्यवस्था के सम्पूर्ण विनाश के लिए भूमि सुधार सरीखे वृहत आर्थिक उपाय अपनाने के बजाय शासकों ने महज जातीय आरक्षण की घोषणा कर अपने कत्र्तव्य की इतिश्री कर ली। इससे उस समय जाति व्यवस्था के क्रांतिकारी तरीके से खात्मे की राह अवरूद्ध हो गयी। और बाद में पूंजीवादी दायरे में चलने वाले जाति विरोधी संघर्षों में भी आरक्षण बड़ा मुद्दा बनने लगा। इसी सब का परिणाम यह निकला कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी धीरे-धीरे कमजोर हो रही जाति व्यवस्था आज भी दलितों का खून बहाती नजर आती है।
        पूंजीवादी विकास व जातीय आरक्षण ने धीमी गति से ही सही दलितों के एक हिस्से को ऊपर उठने के अवसर प्रदान किये। भेदभाव, असमानता की खाई को कुछ पाटा है। किन्तु यह अभी भी बहुत चैड़ी है।
        90 के दशक से देश में जारी उदारीकरण-वैश्वीकरण-निजीकरण की बयार में सरकारी नौकरियों में लगातार कटौती जारी है। साथ ही सेना, अर्धसैनिक बल व उच्च वैज्ञानिक व तकनीकी संस्थानों में पहले से ही आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। इस तरह आज जातीय आरक्षण कुल रोजगार के बहुत छोटे हिस्से में ही लागू है।
जातीय आरक्षण के इस बेहद सीमित सुधार को भी सवर्ण मानसिकता के लोग, संगठन पचा नहीं पाते हैं और जब-तब आरक्षण समाप्ति की मांग उठाने लगते हैं। योग्यता व अन्य तर्कों का हवाला देते हुए वे इस वास्तविकता को समझने से इंकार कर देते हैं कि जाति व्यवस्था के चलते समाज में अलग-अलग जाति के लोग अलग-अलग शैक्षिक, सांस्कृतिक स्तर पर खड़े हैं, वे असमान हैं। इन असमान लोगों को एक समान प्रतियोगिता की दौड़ में खड़ा कर देने का सीधा मतलब है कि शिक्षा-नौकरियों में सवर्ण जातियों के वर्चस्व को कायम रखना। असमान लोगों को समान स्तर पर लाने के लिए उनके साथ असमान व्यवहार जरूरी है। पूंजीवादी दायरे में जातीय आरक्षण भी इसी का एक छोटा कदम है इसलिए इसका विरोध कहीं से भी जायज नहीं है।
        सरकारी नौकरियों के निरंतर घटते जाने के साथ बढ़ती बेरोजगारी आज सभी जातियों के युवाओं-छात्रों के लिए चिंता का सबब बन चुकी है। परिणामस्वरूप चंद सरकारी नौकरियों की छीना झपटी काफी बढ़ चुकी है। आज एक ओर तो सम्पन जातियों के कुछ लोग भी खुद को बेरोजगारी की इस भयावह स्थिति में आरक्षण के दायरे में शामिल करने की मांग उठाने लगे हैं तो वहीं दूसरी ओर अन्य सवर्ण जातियां नाम मात्र की नौकरियों में जातीय आरक्षण के खात्मे की मांग करने लगी हैं तो कुछ लोग जातीय के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण का शिगूफा छोड़ जातीय आरक्षण को रद्द करने की मांग करने लगे हैं। आज सभी जाति के छात्रों-युवाओं को यह समझना होगा कि बेरोजगारी की मांग के लिए साझा संघर्ष छेड़ा जाना चाहिए और साथ ही जातिगत भेदभाव के खात्मे के लिए पूंजीवादी दायरे में आरक्षण सरीखे सुधारों का समर्थन किया जाना चाहिए। बेरोजगारी के खिलाफ संघर्ष को जातीय आरक्षण के साथ गड्डमड्ड नहीं किया जाना चाहिए।
        आज हमें यह भी समझने की जरूरत है कि पूंजीवादी व्यवस्था के रहते बेरोजगारी व जातीय व्यवस्था से निर्णायक तरीके से नहीं निपटा जा सकता। क्योंकि यह व्यवस्था अपने हितों में इन दोनों का ही इस्तेमाल कर रही है, उन्हें प्रश्रय दे रही है। ऐसे में सबको गरिमामय रोजगार के साथ-साथ जाति व्यवस्था के पूर्ण खात्मे के लिए देश को समाजवादी क्रांति की आवश्यकता है। समाजवादी क्रांति ही हर प्रकार के भेदभाव, उत्पीड़न को खत्म करने की राह खोलेगी।  

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