-राजेन्द्र
देश की आजादी के 68 वर्ष बाद भी एक व्यक्ति की नाक इसलिए काट दी गयी क्योंकि वह एक दलित है और उसने सवर्ण के पास बैठकर खाना खाने की जुर्रत की। सुनपेड़ हरियाणा में एक दलित घर पर तेल डालकर मासूत बच्चों को जिंदा जला दिया गया। मध्यप्रदेश के नेगरुण गांव में दबंग सवर्ण लोगों द्वारा एक बारात पर इसलिए भारी पथराव किया क्योंकि दूल्हा घोड़ी पर चढ़ा था। इस घटना में 4 लोग गंभीर रूप से घायल हो गये और मजबूर होकर दूल्हे को पैदल जाना पड़ा। सवर्ण दबंगी की यह घटनाएं इक्का-दुक्की नहीं बल्कि समय-समय पर ऐसी घटनाएं सुनायी व दिखाई देती रहती हैं। दलित महिलाओं को निशाना बनाना भी दलित उत्पीड़न में आम बात है। पिछले वर्षों में हरियाणा में ऐसी दर्जनों घटनाएं प्रकाश में आयीं। वर्ष 2014 में ही ऐसी घटनाओं की संख्या हजारों में है। (देखें तालिका- 1) कई मामलों में तो तीखे प्रतिरोध भी हुए। भगाड़ा का संघर्ष ऐसे ही संघर्ष के रूप में याद किया जा सकता है।
बीते दलित उत्पीड़न की यह घटनाएं तो उदाहरण मात्र हैं। प्रतिवर्ष सैकड़ों ऐसी घटनाएं देश में घट रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों की बात करें तो स्थिति बेहद बुरी है। खौफजदा है।(देखें तालिका-2) 2010 में दलित उत्पीड़न की घटनाएं 32712 से बढ़कर 47664 हो गयी। प्रतिवर्ष यह घटनाएं लगातार बढ़ती ही गयी हैं।
यूं तो पूरे देश में ही दलित उत्पीड़न की घटनाएं घटी हैं। किंतु 5 राज्य (उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश व आन्ध्रप्रदेश) जहां ये घटनाएं सबसे ज्यादा घटी हैं। कुल अपराधों में दलित उत्पीड़न की दर को देखें तो गोवा सबसे अग्रणी रहा है। अन्य राज्य राजस्थान, आन्ध्रप्रदेश, बिहार कुल अपराधों में दलित उत्पीड़न के अपराधों की दर लगभग 50 प्रतिशत है। (देखें तालिका-3 व 4)
दलितों के प्रति हिंसा के यह आंकडे़ भारत में दलितों की तस्वीर को उजागर कर देते हैं। दलितों के प्रति हिंसा के विरोध में पिछले वर्षों में सामाजिक आंदोलन भी हुए हैं। सवर्ण जातियों के हमलों के जवाब में दलितों का प्रतिकार भी देश में बढ़ा है। यह दलितों की बढ़ी चेतना, सामाजिक मुखरता को दिखाता है। इन संघर्षों का स्पष्ट मतलब है, अब नहीं सहेंगे।
आजादी के इतने वर्षों बाद भी दलित होने की वजह से मारा जाना, प्रताड़ित होना घष्णित पूंजीवाद की देन है। पूंजीवाद ने कभी भी जातीय उत्पीड़न के समूल नाश का लक्ष्य अपने सामने रखा ही नहीं। इसके अंग-उपांग जातीय उत्पीड़न को बनाये रखने के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढंग से सहयोगी ही रहे हैं। जातीय भेदभाव मेहनतकशों को बांट देता है जो कि पूंजीवादी व्यवस्था को फायदा ही पहुंचाता है। दलित उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए अपने संघर्ष को सवर्ण दबंगों के जातीय दंभ के खिलाफ सामाजिक आंदोलन और मुख्य तौर पर पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ लक्षित करने की आवश्यकता है ।




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