बुधवार, 3 जून 2015

परीक्षा का दबाव और कारण

-चंदन
        परीक्षाओं से कुछ माह पहले तक छात्रों से माता-पिता की बातचीत कुछ इस प्रकार होती है, ‘‘कितनी तैयारी हो चुकी है?’’, ‘‘थोड़ा पढ़ाई पर ध्यान दो, आजकल तो खेलना(या जो कोई भी उसका शौक हो) छोड़ दे, एक-दो महीने की बात है’’, ‘‘अभी थोड़ा मेहनत कर लेगा/लेगी तो आगे जीवन सुधर जायेगा’’ आदि-आदि। इसके अतिरिक्त बोर्ड परीक्षाओं वाले छात्रों को कुछ अन्य बातें भी सुननी होती है, ‘‘इस साल बोर्ड है’’, ‘‘पिछली बार शर्मा जी के बच्चे के बोर्ड में 90 प्रतिशत थे’’, ‘‘ये पहली सीढ़ी है, यहां अंक प्रतिशत अच्छा रहा तो आगे भी अच्छे मौके मिलेंगे’’ और ऐसी ही तमाम बातें।

        ऐसा नहीं है कि यह स्थिति घर की ही होती है। विद्यालयों के भी यही हाल होते हैं। शिक्षकों का कुल जोर परीक्षा परिणाम होता है। इसी को ध्यान में रखकर वे निर्देश देते हैं। जैसे-‘‘पिछले सालों मेें ये-ये प्रश्न आए थे, इन्हें सही से तैयार कर लेना’’, ‘‘इनको कोचिंग-ट्यूशन में कर लेना’’, ‘‘आजकल पढ़ाई की दिनचर्या बनाओ’’, ‘‘इतने-इतने घंटे पढ़ा करो।’’
        यहां तक कि दोस्तों के बीच भी बातें इसी तरह की होती हैं। ‘‘तूने कितनी तैयारी कर ली’’, ‘‘तेरे भय्या/दीदी हैं, पढ़ाने वाले अपनी तो कुछ तैयारी ही नहीं हुई’’, ‘‘ यार नोट्स दे दे, फोटो काॅपी करके दे दूंगा।’’, ‘‘परीक्षा तक रुक जा उसके बाद खेलने (अपने पसंदीदा कामों में) चलेंगे’’ या ऐसी ही कुछ चिंता बातों में होती है।
        उपरोक्त सारी चर्चाएं कम-ज्यादा या भिन्न रूपों में परीक्षा के समय तक रहती हैं। यह पूरा समय छात्रों व उनके शैक्षिक कार्यों से जुड़े लोगों के भी रिश्तों को सामान्य नहीं रहने देता। अक्सर ही इसमें परीक्षा के तनाव को कम करने या बढ़ाने वाली चर्चाएं होती हैं। ये चर्चाएं निर्विवाद रूप से गरीबोें के सरकारी विद्यालयों और मध्यम वर्गीयों के कान्वेंट स्कूलों के छात्रों के बीच होती हैं। हां! ये तनाव शासक वर्गीय स्कूलोें के छात्रों में नहीं होता। यह इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि कभी किसी पूंजीपति वर्ग के व्यक्ति के बच्चे को शिक्षा के कारण तनाव या आत्महत्या की घटना नहीं हुई। वह सामाजिक चुनौतियों से आजाद होता है, उसे पढ़कर कोई नौकरी नहीं ढूंढनी होती है, बल्कि अक्सर ही उसका भविष्य तय होता है। 
        छात्र मूल्यांकन की इस पूंजीवादी पद्धति में दोहरा पिसता है। जहां एक तरफ वह व्यवहार से कटे हुए विज्ञान को जबर्दस्ती रटने को मजबूर होता है, वहीं दूसरी तरफ प्रतियोगिता के इस दौर में दूसरे से आगे भी निकलना होता है। व्यवहार से कटे इस ज्ञान को किसी हद तक प्र्रयोगशालाओं के अंदर तक ले जाया जाता है। जहां छात्र को वर्षों पुराने रासायनिक, भौतिक या जैव विज्ञानी प्रयोगों को रटना होता है कि इन-इन रसायनों की क्रिया से ये मिलेगा; और उससे वो। जहां तक आधुनिक वैज्ञानिक खोजों और उसके अनुसार पाठ्यक्रम की बात है तो वह केवल सूचनार्थ पाठ्यक्रम में शामिल हो जाता है। जिसे; उसे वास्तविक अर्थों में समझना मुश्किल सा हो जाता है। 
        शिक्षा की इस पद्धति में मूल्यांकन का आधार क्या है? मूल्यांकन का आधार है; कुछ घंटों में साल भर याद/रटे हुए से; पन्ने भर देना। हमें दी जाने वाली शिक्षा का पाठ्यक्रम और मूल्यांकन का निर्धारण कौन करता है? स्पष्ट ही है कि सरकार के दिशा-निर्देशों पर बोर्ड करते हैं। अब सोचने वाली बात यह है कि व्यवहार यानि श्रम से जुड़े बिना तैयार होने वाले छात्र की स्थिति क्या होगी और उसकी जरूरत किसे है? श्रम ने शिक्षा की आवश्यकता को पैदा किया। यदि किसी भी विज्ञान को उसके ऐतिहासिक क्रम में बताया जाय तो उसकी द्वन्द्वात्मक गति से भी छात्र को परिचित करवाया जायेगा। जैसे मोटे तौर पर अणु से आगे परमाणु और उससे आगे इलैक्ट्राॅन, प्रोटाॅन और उससे आगे क्वाॅर्क की खोज हर पिछले ज्ञान को और गहराई तक ले जाता है और नई सीमाएं खोलता है, ऐसी शिक्षा प्राप्त छात्र समाज की सीमाओं को आगे बढ़ाकर नये समाज निर्माण के सिद्धांत तक भी जा सकता है। इसीलिए उन्हें आज ही काठ का पुतला बनने की शिक्षा दी जाती है। ये काठ के पुतले न सिर्फ सरकार के काम के हैं बल्कि पूंजीपतियों के लिए भी हितकारी हैं। बल्कि पूंजीपति वर्ग के शोषण को झेलने का इन्हें प्रशिक्षण दिया जाता है। असल में पूंजीपतियों की सेवा करते हुए वह सरकार के सामने भी मुंह बाए खड़े रहते हैं। 
        इस अव्यवहारिक शिक्षा की मूल्यांकन पद्धति भी शासकों के हितों का ख्याल रखती है। कक्षा में पढ़ने वालों का व्यक्तिगत मूल्यांकन होता है। शिक्षा सामूहिक परंतु परीक्षा व्यक्तिगत। इससे छात्रों का ज्ञान एक निजी क्षमता-योग्यता की वस्तु बन जाती है।  इस तरह एक कक्षा को नहीं बल्कि हर छात्र में एक कक्षा को शिक्षा दी जाती है और उससे मूल्यांकन होता है। जिसमें इस तरह चर्चा होती है कि फलां छात्र अच्छा है या बुरा है। इससे छात्रों केे साझा प्रयासों व क्षमताओं का विकास नहीं हो सकता। वे निरंतर दूसरे से संघर्षरत प्रतियोगी होते हैं, जिसे किसी भी तरह आगे निकलना है।
        भला ऐसे एकांगी सोच के व्यक्ति से समाज का क्या लाभ? ऐसे व्यक्तिवादी छात्र की पूंजीवादी शासकों को जरूरत है। जिससे वे स्वयंभू श्रेष्ठमन छात्र से लेकर हीन भाव छात्र तक की पूरी पीढ़ी तैयार करता है। जहां की पूरी की पूरी भीड़ व्यक्तिगत है। समाज को ऐसी भीड़ नहीं चाहिए। उसकी जरूरत तो एक संगठित जुलूस की है, एक संगठित सेना की है; न कि एक स्वयंभू नायक की। समाज को सामाजिक जीव चाहिए न कि एकांगी। समाज को एक छात्र चाहिए जो खुद को समाज का हिस्सा माने न कि समाज को अपना। सामूहिक शिक्षा और मूल्यांकन निजी; की ये पद्धति पूंजीपतियों की सेवक है, आम मेहनतकश छात्रों की नहीं। 
        इसीलिए स्वभाविक ही एक परायी चीज के प्रति छात्र असहज होेंगे ही, जैसे- एक पराये वायरस से शरीर बीमार हो जाता है या एक पराये से परिजन असहज हो जाते हैं। एक परायी (पूंजीपति वर्ग की सेवा करने वाली) मूल्यांकन पद्धति से मेहनतकशों के छात्र असहज हो जाते हैं। तनाव महसूस करते हैं; बीमार हो जाते हैं और कुछ तो हार कर मर भी जाते हैं। उन्हें एक ऐसी मूल्यांकन पद्धति चाहिए जो उन्हें बता सके कि तुम सब समाज के लिए किसी न किसी रूप में उपयोगी हो। इसलिए तुम सबको एक जैसी परीक्षा की जरूरत नहीं। 
        इसके अलावा शिक्षा की मूल्यांकन पद्धति में एक और द्वंद है; शिक्षा तो वार्षिक, मूल्यांकन (साल या 2-3 माह में) 3 घंटे में। यह पहले वाले द्वंद की आवश्यकता है जिसमें एकांगी व्यक्ति चाहिए। इसके अलावा ऐसे में वैज्ञानिक बोध वाले छात्रों का जन्म भी न हो सकेगा। इससे एक छात्र के लिए एक सिद्धांत के विकास को समझने की तुलना में चुने हुए सूत्रों को याद करना आवश्यक हो जाता है। उस पर भी उसने कुछ कम किया और अंक कम आए तो मूर्ख अन्यथा होशियार। यह तरीका इस लिहाज से भी गलत है कि कुछ प्रश्नों के उत्तर देने से छात्र का समग्र मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। इससे छात्र की मानसिक क्षमता(याद/रटने) का तो फिर भी अंदाजा लग सकता है कि उन चुनिंदा प्रश्नों में से याद प्रश्न का उत्तर कितना सही देता है। इस तरह आधा-अधूरा मूल्यांकन करने की प्रक्रिया पूरी होती है। 
         शासकों को मूल्यांकन में कुछ घंटों की लिखित परीक्षा रखने का मकसद मानसिक श्रम को उच्च व शारीरिक श्रम को निम्न बताना होता है। यह मानसिक श्रम भी व्यवहार से कटा हुआ व एकांगी है। एक एकांगी व श्रम के प्रति हीन भाव रखने वाला व्यक्ति शासकों का सबसे प्रिय होगा। एक पूंजीपति भी एकांगी व श्रम के प्रति हीन भाव रखता है। उसे अपनी जैसी सोच वाले लोग ही चाहिए। 
        यह दीगर बात है कि मेहनतकशों व मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों में से अधिकांश इससे बाहर हो जाते हैं। अपनी इस नियति से वे डरते हैं, जिसमें उन्हें दीक्षित तो परोपजीवी के रूप में किया जाता है, जबकि बनना उन्हें श्रमजीवी पड़ता है। इससे वह खुद अपने प्रति हेय हो जाते हैं।
        इस तरह की शिक्षा से तैयार व्यक्तिवादी एकांगी व्यक्ति क्या हासिल कर पा रहा है? अवसाद, अलगाव और आत्महत्या जैसे कदम। मुंबई में 2013 में 75 प्रतिशत अवसादग्रस्त लोग थे, जिसमें 6 वर्ष से 25 वर्ष तक के लोग थे। ये स्थिति देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की है।(स्रोतः टाइम्स आफ इंडिया, 20 जनवरी 2013, इंटरनेट वर्जन) 
         रोजगार की बात की जाये तो अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन(आई.एल.ओ.) की 2015 की रिपोर्ट बताती है कि इस वर्ष भारत की बेरोजगारी दर 3.8 प्रतिशत रहेगी। शेष रोजगार प्राप्त लोगों की स्थिति यह है कि 2004 से 2010 तक केवल 11 लाख लोगों का रोजगार बढ़ा जबकि 2009 से 2012तक 139 लाख लोगों तक रोजगार फैला। 2009 से 2012 के बीच बढ़े रोजगार अनियमित आय वाले रोजगार अधिक हैं। इसका अंदाजा इस बात से भी लग सकता है कि 2011-12 में कुल रोजगार कर रहे लागों में से केवल 21.2 प्रतिशत लोगों को ही नियमित वेतन मिलता था। (स्रोतः टाइम्स आफ इंडिया, 24 मार्च, 2015, इंटरनेट वर्जन)
        एक अवसादग्रस्त अकेला नौजवान शासकों के इस शिक्षा-रोजगार के मकड़जाल में उलझा रहता है। उपरोक्त आंकड़ों से साफ ही है कि मेहनतकशों के लिए यह खतरनाक स्थिति है। जहां कि वह प्राप्त शिक्षा से अलगाव में चला जाता है और सामूहिकता के बोध से काफी दूर होता है। यह स्थिति जहां परीक्षा छोड़ने (उत्तराखंड बोर्ड परीक्षा 2015 में 3148 छात्रों ने हिंदी की परीक्षा छोड़ी) से लेकर आत्महत्या तक जाती है। देश में 2012 में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों में 34 प्रतिशत की उम्र 15-29 वर्ष है। आत्महत्या करने वालों में 80 प्रतिशत शिक्षित हैं जो कि देश की साक्षरता दर 74 प्रतिशत से अधिक है। यानि आत्महत्या करने वालों में शिक्षित अधिक हैं।
        पूंजीपति वर्ग की सेवा करने वाली इस शिक्षा के बजाय मेहनतकशों को सामूहिकता पर केन्द्रित शिक्षा की आवश्यकता है। जो छात्रों मेें योग्यता पैदा करे और कहे कि हमें हर काम करने लायक व्यक्ति की जरूरत है। आपके लिए कुछ काम तो हमारे पास है ही। जो निरंतर आपका मूल्यांकन करे और योग्यता विकास में मदद करे। ऐसी शिक्षा समाजवाद ही दे सकता है जो कि मानव मूल्यों को और उच्च धरातल पर ले जाये न कि पूंजीवादी व्यवस्था जो कि मुनाफे के मूल्य को ही ऊंचा करना चाहता है।

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