बुधवार, 3 जून 2015

त्रासद शिक्षा व्यवस्था की त्रासद परीक्षा प्रणाली

-महेन्द्र
        मार्च से मई महीने अधिकांश छात्रों के लिए एक दुःस्वप्न की तरह बीतते हैं और जून का महीना उनमें से कुछ पर कहर बनकर टूटता है। यह समय होता है, परीक्षाओं का और उसके बाद आने वाले परिणामों का। परीक्षाएं अपने साथ तनावग्रस्तता, अवसाद, विश्वासहीनता, नाकामी का भय और न जाने कैसे-कैसे मनोविकारों को अपने साथ लेकर आती हैं। हालात ऐसे हैं कि छात्र-छात्राओं को परीक्षा काल में गुरूजनों से ज्यादा मनोचिकित्सकों की आवश्यकता पड़ रही है। हर साल परीक्षाओं व परिणाम के समय कितने ही छात्र-छात्राओं की आत्महत्याओं की खबरें हम पढ़ते हैं।
        निश्चय ही ऐसी परीक्षा प्रणाली जो छात्र-छात्राओं की जान ले ले, अमानवीय ही कही जायेगी। दरअसल, यह परीक्षा प्रणाली अपनी शिक्षा व्यवस्था के ही अनुरूप है। 
        किसी भी वर्गीय समाज में उत्पादन के साधनों पर शासकों का कब्जा होता है जिसके जरिये वे शासित मेहनतकश जनता का शोषण और उत्पीड़न करते हैं। शासन-सत्ता के सभी रूप इस वर्गीय उत्पीड़न को न सिर्फ जारी रखने का साधन होते हैं बल्कि वर्गीय उत्पीड़न व शोषण-दमन को जायज ठहराने का भी काम करते हैं। मौजूदा पूंजीवादी समाज में भी शासक पूंजीपति वर्ग की राज्य मशीनरी मजदूर-मेहनतकशों के लूट व शोषण को जारी रखने का एक साधन होती है। जिस तरह भौतिक संसाधनों (उत्पादन के साधनों) पर पूंजीपति वर्ग का कब्जा होता है, ठीक उसी तरह बौद्धिक संसाधनों (शिक्षा) पर भी पूंजीपति वर्ग का कब्जा होता है। पूंजीवादी राज्य मशीनरी के अन्य रूपों की ही भांति पूंजीवादी शिक्षा भी पूंजीपति वर्ग के शासन को सुचारू रूप से चलाने के सिवाय और कोई काम नहीं करती। पूंजीवादी शिक्षा; पूंजीपति वर्ग के लिए; अच्छे सेवक पैदा करने का काम करती है। यह शिक्षा पूंजीपति वर्ग और पूंजीवाद के प्रति निष्ठा पैदा करवाने का काम करती है। पूंजीवादी शिक्षा शोषण-उत्पीड़न को न सिर्फ ढंकने का काम करती है बल्कि इस सब को जायज भी ठहराती है। यह पूंजीपति वर्ग द्वारा पूंजीपतियों के हितों के अनुरूप निर्मित की गयी है। पूंजीवादी शिक्षा प्रणाली समाज के चैमुखी और व्यक्ति की क्षमताओं के विकास के लिए नहीं बल्कि पूंजीपति वर्ग की जरूरत के लिए आदमी तैयार करने का काम करती हैै। इस सब के अलावा पूंजीवादी शिक्षा के जरिये पूंजीपति वर्ग अपने स्वार्थपूर्ण, व्यक्तिवादी विचारों व व्यवस्था के हितकारी विचारों को समाज में फैलाने व उनका वर्चस्व कायम करने का काम भी करता है। 
        जब शिक्षा, पूंजीपति वर्ग के हाथ में मेहनतकशों के खिलाफ एक अस्त्र हो तो उसकी परीक्षा प्रणाली का भी घोर उत्पीड़नकारी होना लाजिमी है। दरअसल परीक्षा प्रणाली के जरिये पूंजीपति वर्ग द्वारा मेहनतकशों व उनके बच्चों पर किये जाने वाले उत्पीड़न का व्यवहार घनीभूत होकर सतह पर आ जाता है। पूंजीवादी शिक्षा के उत्पीड़नकारी चरित्र का यह घिनौना रूप परीक्षाओं के समय या परीक्षा परिणामों के आने पर और भी साफ तरीके से जाहिर होता है। जब छात्र-छात्राएं घोर मानसिक यंत्रणा को झेलने को मजबूर होते हैं या फिर असफल होने अथवा आशा के अनुरूप न होने पर जीवन की समाप्ती की ओर उन्मुख होते हैं। 
        पूंजीवादी शिक्षा न सिर्फ उत्पीड़नकारी है बल्कि व्यवहार से ही इसका अलगाव है। वास्तविक ज्ञान-विज्ञान व व्यवहारिक समझदारी से कटी यह शिक्षा मेहनतकश आबादी के लिए बेहद बोझिल और उबाऊ है। किताबों व कक्षाओं में छात्र-छात्राएं जो कुछ भी पढ़ते हैं, उसका सामाजिक जीवन से कोई सामंजस्य नहीं होता है। फलस्वरूप छात्र-छात्राएं शिक्षा के उपयोगमूल्य से अनभिज्ञ रहते हैं और किताबों, पाठ्यक्रमों में जो कुछ होता है उसे रटने में ही अपनी ऊर्जा व समय बर्बाद करते हैं। इस दौरान सामाजिक जीवन अपनी गति में गतिशील रहता है और परीक्षाओं के समय यह बोझ और भी भारी हो जाता है। 
        जब शिक्षा व्यवहार से कटी हुई हो तो परीक्षाएं भी छात्रों का उचित व वास्तविक मूल्यांकन नहीं कर सकतीं। ज्ञान का प्राथमिक स्रोत व्यवहार है। भौतिक वस्तुओं का उत्पादन करने के लिए मानव प्रकृति के साथ व्यवहार करता है। इस व्यवहार को मानव अकेले-अकेले नहीं करता बल्कि आपस में संबंध बनाकर करता है। इस व्यवहार के फलस्वरूप वह प्रकृति व मानव समाज का ज्ञान हासिल करता चला जाता है। और ज्ञान प्राप्ति की यह क्रिया निरंतर व उत्तरोतर बढ़ती रहती है। नया और उत्कृष्ट ज्ञान मानव के व्यवहार को भी नयापन और उत्कृष्टता प्रदान करता है। लेकिन पूंजीवादी शिक्षा व परीक्षा प्रणाली इस व्यवहार से अलग-थलग है। मौजूदा परीक्षा प्रणाली छात्रों के व्यवहार का मूल्यांकन नहीं करती। इसके परिणामस्वरूप होता यह है कि हर वर्ष पाठ्यक्रम या कक्षा के ‘ज्ञान’ का जीवन परीक्षा देने के बाद समाप्त हो जाता है। वह ज्ञान मर जाता है। उसका कोई उपयोग नहीं हो सकता। परीक्षाएं पास की जाती रहती हैं और सारा कुछ भूला भी जाता रहता है। इस प्रकार परीक्षाएं छात्र के ज्ञान व योग्यता का मूल्यांकन करने से ज्यादा उनके रटने की कुशलता का मूल्यांकन ज्यादा करती हैं।
        आम तौर पर समाज में यह मान्यता है कि परीक्षाओं में सफल विद्यार्थी ही योग्य, कुशल व ज्ञानी हैं। जो विद्यार्थी जितने अधिक अंकों से उत्तीर्ण होते हैं, उनको और भी योग्य व ज्ञानी माना जाता है। असफल व कम अंक पाने वाले विद्यार्थियों को अयोग्य व नाकारा घोषित कर दिया जाता है। असफल व कम अंक प्राप्त करने वालों को ऐसी मानसिक यंत्रणा झेलने को मजबूर कर दिया जाता है कि उससे उबरना बेहद कठिन होता है। उनके आत्मविश्वास की भी धज्जियां उड़ा दी जाती हैं। पहले पूंजीवादी शिक्षा/परीक्षा इनको असफल घोषित करती है और बाद में पूंजीवादी व्यवस्था इनके जीवन को भी असफल बना देती है।
        क्या परीक्षा प्रणाली ज्ञान व योग्यता का आंकलन कर सकती है? क्या अच्छे अंकों से पास होने वाले विद्यार्थियों को माना जा सकता है कि उन्होंने अपने विषय या कक्षा का ज्ञान वास्तव में हासिल कर लिया है? या फिर जो छात्र असफल हो गये हैं, उनके बारे में यह कहा जाय कि वे बिल्कुुल नाकारा व अयोग्य हैं? बिल्कुल भी नहीं। किसी छात्र की योग्यता व ज्ञान को आंकने में पूंजीवादी शिक्षा व परीक्षा प्रणाली बिल्कुल भी कारगर नहीं है। तीन घंटों के भीतर किसी की योग्यता की जांच नहीं की जा सकती। क्योंकि परीक्षाएं मूलतः लिखित होती हैं, इसलिए इसकी संभावनाएं और भी कम हो जाती हैं। अगर किसी विषय की परीक्षा में पूछे गये निश्चित प्रश्नों के जवाब छात्र नहीं लिख पाते हैं तो उसे पूरे वर्ष में कुछ भी न सीख पाने का प्रमाण पत्र (फेल करना) बिल्कुल भी तार्किक व न्यायसंगत नहीं है। 
        पूंजीवादी परीक्षा प्रणाली की कारगरता की असफलता हमें जब तब देखने को मिलती है। परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर नकल या पेपर आउट होना इसकी असफलता को ही दर्शाता है। परीक्षा प्रणाली की निर्दयता, निर्ममता व उत्पीड़नकारी होने को लेकर जब-तब आंसू बहाये जाते है; लेकिन कुल जमा परिणाम शून्य ही होता है। कभी ग्रेडिंग सिस्टम का शिगूफा छोड़ा जाता है तो कभी सेमेस्टर प्रणाली द्वारा परीक्षा प्रणाली की कारगरता को सिद्ध करने की असफल कोशिश की जाती है। पढ़ाई का दबाव कम करने के लिए; कभी कोर्स कम करने की बात की जाती है, तो कभी किसी को फेल न करने की; योजना बनायी जाती है। लेकिन ये सारे नुस्ख़े भी दबाव व उत्पीड़न को खत्म तो क्या; कम करने में भी अकारगर हैं। दरअसल, अव्यवहारिक व उत्पीड़क शिक्षा की मूल्यांकन पद्धति भी अव्यवहारिक व उत्पीड़क ही होगी, चाहे वह कोई भी रूप धारण कर ले। 
        क्योंकि पूंजीपति वर्ग और उसकी नुमाइंदगी करनेे वाली सरकारों का यह लक्ष्य नहीं है कि वे सबको शिक्षित करें। उनको मौजूदा व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए भिन्न-भिन्न कौशल व योग्यता के लोग चाहिए होते हैं। उनको; अपनी जरूरत के लिए सीमित संख्या में ही ऐसे लोग चाहिए होते हैं; इसलिए सबको शिक्षित करना, उच्च शिक्षा व तकनीकी  तौर पर शिक्षित करना और वह भी व्यवहारिक व वैज्ञानिक सोच के साथ, यह पूंजीवादी व्यवस्था का लक्ष्य ही नहीं होता। आवश्यकतानुसार लोगों को परीक्षाओं में सफल कर पूंजीवादी व्यवस्था हेतु कलपुर्जों के रूप में इस्तेमाल में लाया जाता है और शेष आबादी को असफल कर उनको उनके नारकीय हालात पर छोड़ दिया जाता है। परीक्षाएं इसी छंटनी को बेहद आसान तरीके से अंजाम देती हैं। आगे की शिक्षा से वंचित होने या रोजगार न पा पाने से जो गुस्सा व क्षोभ व्यवस्था के खिलाफ पैदा होता, परीक्षाएं इससे पूंजीवादी व्यवस्था को बचाती हैं। परीक्षा में जब कोई असफल होता है, तो उसकी जिम्मेदारी आसानी से उस पर डाल दी जाती है। असफल होने वाला इस बात से सहमत हो जाता है कि उसकी अपनी कमी से ही वह असफल हुआ है, कि अगर वह और अधिक मेहनत करता तो जरूर सफल हो जाता, कि वह इसके योग्य ही नहीं है, जैसे कि बाकी सफल व्यक्ति हैं।
        पूंजीवादी शिक्षा व परीक्षा प्रणाली मजदूरों, किसानों-मेेहनतकशों के बच्चों के साथ क्रूरता के साथ पेश आती हैै। परीक्षा प्रणाली का सबसे जहरीला दंश इन्हीं वर्ग के बच्चों को सहना होता है। अपनी वर्गीय स्थिति के कारण परीक्षाओं में सबसे ज्यादा यही बच्चे फेल कर दिये जाते हैं और कम उम्र में ही पूंजीवादी श्रम की लूट में अपने को खटाने पर मजबूर कर दिये जाते हैं। लेकिन पूंजीपति वर्ग और उसके लिए आवश्यक विशेषज्ञों का प्रशिक्षण अलग ढंग से और अलग स्कूल-संस्थानों में होता है जिन्हें हम प्रतिष्ठित स्कूल-संस्थानों के रूप में जानते हैं।
        पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर शिक्षा के उत्पीड़नकारी चरित्र से मुक्ति नहीं मिल सकती। चहुंमुखी विकास करने वाली, वैज्ञानिक सोच और इतिहासबोध से लैस शिक्षा हासिल करने तथा इसी तरह की परीक्षा प्रणाली के लिए यह निहायत जरूरी है कि इस पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा कर शिक्षा को उससे मुक्त कराना जरूरी है। यह काम सामाजिक क्रांति के बिना नहीं हो सकता। इसीलिए छात्रों-नौजवानों को पूंजीवाद के खिलाफ सामाजिक क्रांति और समाजवाद की स्थापना हेतु कमर कस लेनी चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें