-दीपक
अभी कुछ दिन पहले ही एक दोस्त से मिलना हुआ। जैसे ही मैं उसके कमरे में पहुंचा, मुझे वह बीमार, परेशान हाल में अपने कमरे में बैठा हुआ मिला। मुझे समझते देर नहीं लगी कि भाई साहब ने जैम (ज्वाइंट एडमिशन फार मास्टर) की परीक्षा दी है और अभी कुछ दिन पहले ही उसका रिजल्ट आया है। कहीं न कहीं दोस्त की हालत के लिए यह ही जिम्मेदार है। पूछने पर शक पक्का हो गया कि जैम में इनकी कम रैंक आयी है। हजारों रुपये कोचिंग में फूंक, 1 साल तक लगातार तैयारी करने के बावजूद जैम की परीक्षा पास न कर पाने से वह इतना परेशान था कि बीमार हो गया था। सच्चाई तो यह है कि देश में करोड़ों छात्रों की हालत ऐसी ही है, जो 10-10 प्रतियोगी परीक्षाएं देकर भी उन्हें पास नहीं कर पाते और अंत में खुद को कसूरवार मानकर मानसिक बीमारियों का शिकार हो जाते हैं।
आज यू.पी.एस.सी.,कैट, ए.आई.ई.ई.ई., एस.एस.सी., जैम, नैट से लेकर हजारों तरह की प्रतियोगी परीक्षाएं आयोजित करवायी जाती हैं। इसके पीछे यह अवधारणा काम करती है कि सबसे योग्य को ही मौका मिलना चाहिए और अयोग्य छात्रों को योग्य बनने के प्रयास करते रहने चाहिए। क्या इस बात में सच्चाई है? आइये कुछ उदाहरणों से इसे समझा जाय।
देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल परीक्षा में पिछले वर्ष 2014 में 9,44,926 छात्रों ने इसकी प्री परीक्षा के लिए फार्म खरीदा। लगभग 6,80,455 छात्रों ने अपना प्रवेश पत्र डाउनलोड किया और कुल 4,51,602 छात्रों ने परीक्षा दी। जबकि इस साल मात्र 1100 छात्रों ने मेन्स परीक्षा पास की। अगर मोटा हिसाब भी लगायें तो 9 लाख छात्रों में से 1100 छात्र ही योग्य निकले बाकि के छात्र व्यवस्था द्वारा अयोग्य करार दे दिये गये। ये ‘अयोग्य’ छात्र खुद को कोसते हुए अगलेे साल फिर योग्यता की आजमाइश करेंगे।
एक और उदाहरण लें, स्नातक की पढ़ाई के लिए होने वाले जैम परीक्षा में इस बार लगभग 300 सीटों के लिए 1.5 लाख छात्र बैठे। अपनी सारी योग्यता और जोर आजमाइश के बावजूद यह तय है कि 300 छात्र ही चुने जाने हैं। इसका साफ मतलब है कि 300 छात्रों के बाद से अयोग्य छात्रों की गिनती शुरू हो जायेगी। जबकि ये वही छात्र हैं, जिन्होंने स्नातक की परीक्षाएं अच्छे अंकों से पास की हैं। इसी शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें ‘योग्य’ छात्र की डिग्री भी दी है।
कुछ समय पहले तक शिक्षक के लिए बी.एड. की डिग्री आवश्यक थी। लेकिन जैसे-जैसे बी.एड. किये हुए नौजवानों की संख्या बढ़ने लगी, वैसे ही सरकार ने सी-टैट के रूप में नयी बाधा खड़ी कर दी। यानि पहले बी.एड. किया हुआ छात्र योग्य था लेकिन अब यह काफी नहीं। मतलब साफ है कि योग्यता का पैमाना बदलता रहता है, कि नई-नई प्रतियोगी परीक्षाएं ‘योग्यता’ के चुनाव के लिए नहीं बल्कि रोजगार की तुलना में अतिरिक्त आबादी को छांटने का एक तरीका है। ‘योग्यता का चयन’ वाली अवधारणा से व्यवस्था का एक और फायदा होता है। वह सबको अपनी योग्यता अनुसार रोजगार उपलब्ध करवाने में अपने कर्तव्य को छुपा ले जाती है और प्रतियोगी खुद को ही अयोग्य मानते हुए मानसिक दबाव का शिकार हो जाता है। नौजवानों में तेजी से बढ़ रहे अवसाद, नशे की प्रवृति, आत्महत्या के पीछे ये कारण भी हैं।
समाज में मौजूद रोजगार के सीमित अवसरों ने गलाकाटू प्रतियोगिता को जन्म दिया है। प्रतियोगी परीक्षाएं भी इसी प्रतियोगिता का एक रूप हैं जिसमें हर एक नौजवान एक-दूसरे से आगे निकलना चाहता है। इस प्रवृति ने प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग सेन्टरों के बाजार को तेजी से बढ़ाया है।
देश के अंदर यू.पी.एस.सी., कैट, ए.आई.ई.ई.ई., एस.एस.सी., नैट, आदि की कोचिंग के लिए कोचिंग हब विकसित हो गए हैं। राजस्थान में कोटा, कानपुर में काकादेव, बिहार में पटना, दिल्ली में मुखर्जी नगर, म.प्र. में इंदौर ऐसे ही हब बनते हैं। जहां हर साल करोड़ों छात्र प्रतियोगिता में सबसे आगे निकलने की आस लिए पहुंचते हैं। हर साल लगभग 6 लाख छात्र इंजीनियरिंग आदि की तैयारी के लिए कोटा पहुंचते हैं। जहां कि हर कोचिंग में लगभग 40,000-1,00000 रु0 तक में इंजीनियरिंग की तैयारी करवायी जाती है। फीस के अलावा वहां रुकने, खाने, आदि में लगभग 60,000 रु0 सालाना का खर्चा आता है। कोचिंग सेन्टरों के इतने बड़े बाजार को देखते हुए दक्षिण कोरिया के संस्थान ‘इटूस’ ने भी अपना कोचिंग सेन्टर कोटा में खोला है। ‘इटूस’ प्रमुख के अनुसार कोचिंग संस्थानों का बाजार भारत में उभरता हुआ बाजार है और ‘इटूस’ जल्द ही अन्य राज्यों में भी अपनी शाखाएं खोलेगा। कोचिंग सेन्टरों का बाजार कितना बड़ा है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अकेले पटना में ही ये 1000 करोड़ रु. का आंकड़ा पार कर चुका है। छात्रों से और अधिक पैसा ऐंठने के लिए कई कोचिंग सेन्टरों ने अपने स्कूल भी खोल दिये हैं जहां वे कक्षा 6 से ही बच्चों को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करवाने लगते हैं। यानि मासूम बचपन को भी प्रतियोगी परीक्षाओं की अंधी दौड़ में रगड़कर अपना मुनाफा बटोरा जाय।
भारत सरकार के एक आंकड़े के अनुसार भारत में हर 3 में से 1 शिक्षित बेरोजगार है। 1991 के बाद से भारत में हुआ विकास रोजगार विहीन विकास रहा है जिसने पूंजीपतियोें की पूंजी को तो बढ़ाया है परंतु बेरोजगारों के मुकाबले नये रोजगारों को पैदा नहीं किया। बड़ी मात्रा में रोजगार पैदा करने वाले कृषि और उद्योग ठहराव का शिकार हैं जिससे बेरोजगारों के मुकाबले, रोजगार कम हैं। इस प्रवृति ने नौजवानों के बीच रोजगार के लिए छीना-झपटी को बढ़ाया है। और इसने प्रतियोगी परीक्षाओं और उनकी तैयारी के लिए कोचिंग सेन्टरों की परिघटना को तेजी से बढ़ाया है। पूंजीवादी व्यवस्था निरंतर मंदी का शिकार है। यह सबको रोजगार उपलब्ध कराने में अक्षम है। यह अगर कुछ दे सकती है तो प्रतियोगी परीक्षाओं के रूप में नौजवानों को मानसिक अवसाद दे सकती है। अवसाद का इस्तेमाल करते हुए अपनी तिजोरियां भर सकती है। जरूरत है कि प्रतियोगी परीक्षाओं के इस भ्रामक जाल से निकलते हुए, सबको रोजगार की मांग के लिए सड़कों पर उतरा जाय। बेरोजगारों की फौज से मुनाफा बढ़ाने वाली पूंजीवादी व्यवस्था को बदल, समाजवाद के लिए संघर्ष को आगे बढ़ाया जाय।
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