सोमवार, 7 नवंबर 2022

 एक समय एक सोवियत संघ था......

सोवियत संघ के विघटन को लगभग तीन दशक हो चुके हैं। इन तीन दशकों में उस सोवियत संघ का नामलेवा कोई नहीं बचा जिसकी 20 वीं सदी में तूती बोलती थी। बीसवीं सदी का इतिहास सोवियत संघ के इर्द-गिर्द घूमता सा दिखायी देता है। इसकी सकारात्मक और नकारात्मक कितनी ही वजहें कोई गिना सकता है परन्तु सोवियत संघ को कोई भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है।

आज सोवियत संघ की चर्चा महज इतिहास से परिचित होने का एक मामला हो सकता है परन्तु इतिहास का निर्माण करने की चाहत रखने वालों को इतिहास से परिचित तो होना ही चाहिये। इसीलिए सोवियत संघ को जानना हम सबके लिये जरूरी है। 

सोवियत संघ का जन्म एक युगान्तरकारी घटना के फलस्वरूप हुआ था। सोवियत संघ का जन्म हुआ ही नहीं होता यदि यह युगान्तरकारी घटना न घटी होती। वह युगान्तरकारी घटना थी जिसे इतिहास आज ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ के नाम से जानता है। ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ ने रूस ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास को बदल के रख दिया था। 7 नवम्बर, 1917 को हुयी ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ ने ही सोवियत संघ की नींव डाली थी। सोवियत संघ का जन्म इस क्रांति के पांच वर्ष बाद 30 दिसम्बर 1922 को हुआ था। उस वक्त सोवियत संघ में चार गणतंत्र रूस, उक्रेेन, बेलारूस और ट्रांसकाकेशिया शामिल हुये थे। ये चारों गणतंत्र वे थे जहां समाजवाद की स्थापना हो चुकी थी। बाद में कई अन्य गणतंत्र सोवियत संघ का हिस्सा बनते गये। अपने जन्म के दो दशक के भीतर सोवियत संघ में 15 राष्ट्र या गणतंत्र शामिल हो चुके थे।

सोवियत संघ के सदस्य राष्ट्र एशिया से यूरोप तक फैले हुये थे। ये राष्ट्र थे: रूस, उक्रेन, बेलारूस, जार्जिया, अजरबैजान, लातविया, लिथुआनिया, एस्टोनिया, मोल्दोवा, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, अर्मेनिया, किरगिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान। सोवियत संघ का पूरा नाम सोवियत समाजवादी गणतांत्रिक संघ (यू.एस.एस.आर.) था। संक्षेप में सोवियत संघ ही प्रचलित रहा है।

विज्ञान की दुनिया में हम जानते हैं कि जन्म और मृत्यु एक प्रक्रिया है। न तो जन्म एकाएक होता है और न मृत्यु। ठीक कुछ-कुछ ऐसा ही समाज में होता है। सोवियत संघ का जन्म और विघटन भी प्रक्रियाओं के तहत हुआ था। जहां सोवियत संघ के जन्म की प्रक्रिया रूस में 1917 की ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ से शुरू हुयी थी वहां उसके विघटन की पीठिका सोवियत संघ में समाजवाद के खात्मे और पूंजीवाद की 1956 में हुयी पुर्नस्थापना के साथ रखी गयी थी। कहने को सोवियत संघ का विघटन अस्सी के दशक के अंतिम वर्षों में शुरू हुआ। परन्तु इसकी नींव 1956 में रखी जा चुकी थी। औपचारिक तौर पर सोवियत संघ का विघटन 26 दिसम्बर, 1991 को हुआ था। 

25 दिसम्बर, 1991 को सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाचौफ ने इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने इस्तीफा देने के लिए जानबूझ कर ईसाइयों के ‘‘बड़े दिन’’ ‘‘क्रिसमस डे’’ को चुना था। वे शायद ईसा मसीह की तरह अपने को ‘‘मुक्तिदाता’’ समझ रहे थे। यह दीगर बात है सोवियत संघ का पतन असमाधेय संकटों का परिणाम था। और हुआ यह भी कि सोवियत संघ के विघटन के बाद भी जिन संकटों के कारण उसका विघटन या पतन हुआ था उनका कोई खास समाधान नहीं निकला। सोवियत संघ के पतन के बाद सोवियत संघ में शामिल देशों में हिंसा, अराजकता, बर्बादी और परस्पर युद्ध का सिलसिला शुरू हो गया। स्वयं रूस लगभग एक दशक तक भयानक अराजकता की अवस्था में पड़ा रहा।

सोवियत संघ का जन्म उथल-पुथल के दौर में हुआ था और उसके विघटन ने भी उथल-पुथल के हालात पैदा कर दिये थे। और जैसे उसके जन्म के समय की दुनिया युद्ध, बर्बरता, तबाही, आतंक आदि से भरी हुयी थी ठीक वैसी ही दुनिया उसके विघटन और उसके बाद रही। लेकिन सोवियत संघ के जन्म और उसकी एक अच्छी अवस्था तक वह न केवल उन देशों में शांति, खुशहाली, मुक्ति की बयार लेकर आया था जो उसमें शामिल थे बल्कि वह पूरी दुनिया के शोषित-उत्पीड़ित जनों के लिए आशा, विश्वास, मुक्ति और आजादी का प्रेरणास्रोत बन गया था। बीसवीं सदी के तीसरे दशक से लेकर पांचवे दशक तक सोवियत संघ मानवजाति के आशा, विश्वास, मुक्ति ही नहीं बल्कि उसकी रक्षा का आधार बना। सोवियत संघ के नेता स्तालिन, लाल सेना और उससे बढ़के वहां के जनगण थे जिन्होंने हिटलर के मंसूबों पर पानी फेर दिया था। फासीवाद की विभीषिका का अंत सोवियत संघ में कायम समाजवाद ने ही किया था। 

सोवियत संघ को हजारों कारणों से याद किया जा सकता है लेकिन पूरी दुनिया को हिटलर के फासीवादी आतंक से मुक्ति दिलाने में उसके योगदान ने इतिहास में हमेशा के लिये उसे अमर कर दिया है। कहना बहुत मुश्किल है कि यदि समाजवादी सोवियत संघ न होता तो फासीवादी विभीषिका का अंत कैसे होता। हिटलर ने तो महज 11 दिनों में उस वक्त की दुनिया की एक बड़ी आर्थिक व सैन्य ताकत फ्रांस में कब्जा कर लिया था। और साम्राज्यवादी ब्रिटेन हिटलर के आक्रमण से दहल रहा था। हिटलर के सहयोगी जापान और इटली एशिया और अफ्रीका में आगे बढ़ते जा रहे थे। वह सोवियत संघ की महान जनता और उसके नेता स्तालिन थे जिनके नेतृत्व में फासीवाद को निर्णायक शिकस्त दी गयी। सोवियत संघ ने द्वितीय विश्वयुद्ध की भारी कीमत चुकायी थी। उसके दो करोड़ लोग इस युद्ध में मारे गये थे। हिटलर के फासीवादी मंसूबों की कीमत जर्मनी को भी अच्छी-खासी चुकानी पड़ी थी। हिटलर द्वारा छेड़े गये द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी के करीब 90 लाख लोग मारे गये थे। इस युद्ध में कुल मिलाकर पांच करोड़ लोग मारे गये थे। समाजवादी सोवियत संघ न होता तो न जाने और कितने करोड़ लोग इस युद्ध में मारे जाते।

समाजवादी सोवियत संघ जिन जनगणराज्यों से मिलकर बना था वह कभी जारशाही के मातहत थे। जारशाही का साम्राज्य एशिया और यूरोप के बड़े हिस्से में फैला हुआ था। जारशाही बेरहमी से अपने साम्राज्य की जनता का शोषण-उत्पीड़न करती थी। क्रूरता और आतंक उसके हथियार थे। ‘फूट डालो और राज करो’ उसकी नीति थी। प्रतिरोध की किसी भी आवाज को निर्ममतापूर्वक कुचल देना जारशाही को कायम रखने का तरीका था। रूस की जनता सहित सम्पूर्ण जारशाही में जनवाद का नामोनिशान न था। मजदूर, किसान, बुद्धिजीवी न अपने अखबार निकाल सकते थे, न सभा-जुलूस कर सकते थे और न अपने संगठन बना सकते थे। जार की पुलिस राजनैतिक हत्यायें करने में माहिर थी।

जारशाही को पहले विश्वयुद्ध ने जर्जर कर दिया था। रूस की जनता खासकर किसान युद्ध के शुरूवाती सालों में जार के साथ खड़े रहे। रूस के क्रांतिकारी बोल्शेविक युद्ध के शुरू होने के भी कई साल पहले से आम जनता को समझा रहे थे कि यह युद्ध लुटेरे का युद्ध है। मातृभूमि की रक्षा या न्याय से इसका कोई लेना नहीं है। बोल्शेविकों के निरन्तर प्रचार और संगठन करने और अंततः युद्ध के विनाशकारी परिणामों से आम जनता को इस युद्ध का चरित्र ठीक से समझ में आ गया और वह जारशाही के पूर्ण खिलाफ हो गयी। बोल्शेविकों के नेतृत्व में हुयी ‘फरवरी क्रांति’ और फिर ‘अक्टूबर क्रांति’ ने जारशाही का इतिहास से नामोनिशान मिटा दिया। महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति ने सबसे पहले युद्ध से अपने को अलग किया और फिनलैण्ड को जारशाही के कब्जे से मुक्त कर दिया।

रूस में हुयी ‘महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति’ ने फिनलैण्ड को आजाद करने के साथ विभिन्न राष्ट्रों, जनगणों, अल्पसंख्यक समुदायों आदि के बीच के सम्बन्धों की एक नयी कसौटी, परिभाषा और भविष्य दिखला दिया था। रूस के महान क्रांतिकारी नेता लेनिन ने ‘राष्ट्रीयताओं’ के आत्मनिर्णय के अधिकार’ को मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से पेश करते हुए इसकी सैद्धान्तिक नींव पहले ही डाल दी थी। क्रांति के बाद उसे व्यवहारिक रूप देना था। विभिन्न राष्ट्रों, जनगणों के बीच के जटिल सम्बन्धों को व्यवहारिक रूप से हल करने के प्रयासों के फलस्वरूप सोवियत संघ अस्तित्व में आया। 

समाजवादी सोवियत संघ सच्चे अर्थों मंे संघ था। उसमें शामिल हर राष्ट्रीयता को ‘अलग हो जाने के अधिकार’ के साथ आत्मनिर्णय का अधिकार था। संघ के साथ सबसे अधिक जनवादी (डेमोक्रेटिक) संघ था। समाजवादी सोवियत संघ की तुलना हम भारत के संघ से करें तो हम पायेंगे कि भारत में किसी भी राष्ट्रीयता को आत्मनिर्णय का अधिकार नहीं है। और भारत की संघीय सरकार (कानूनी भाषा में) वास्तव में एक ऐसी केन्द्रीय सरकार जिसके सामने भारत के राज्य (दूसरे शब्दों में राष्ट्रीयतायें) कुछ भी नहीं है। केन्द्र सर्व शक्तिमान है। उसके पास आर्थिक, सैनिक, संवैधानिक सभी तरह की ताकत है। समाजवादी सोवियत संघ में शामिल राष्ट्रीयतायें संघ का हिस्सा होने के साथ कई-कई तरह के अधिकार रखती थी। यहां तक कि हर राष्ट्रीयता का अपना राष्ट्रपति, अपना झण्डा, अपना संविधान तक था। 

सोवियत संघ में जब तक समाजवाद रहा तब तक उसका चरित्र अधिकाधिक जनवादी व संघीय था। बाद के समय में रूसी वर्चस्ववाद फिर से हावी होने लगा। रूसी वर्चस्ववाद की प्रतिक्रिया राष्ट्रीयताओं के बीच तनाव में होने लगी। जिस तरह से सोवियत संघ साठ के दशक में अधिकाधिक साम्राज्यवादी रुख अख्तियार करता गया ठीक उसी तरह से आंतरिक मामलों में सोवियत संघ राष्ट्रीयताओं के उत्पीड़न की ओर भी बढ़ता गया। अस्सी के दशक का अंत आते-आते सोवियत संघ के दरकने की शुरूवात हो गयी और 1991 में वह पूरी तरह से विघटित हो गया।

समाजवादी सोवियत संघ ने दिखलाया था कि किस तरह से विभिन्न राष्ट्रीयताओं, भाषा-भाषी, विभिन्न धर्मों व नस्लों के लोग एक साथ रह सकते हैं और सामाजिक प्रगति कर सकते हैं वहां सोवियत संघ में पहले पूंजीवाद की स्थापना और फिर उसके सामाजिक साम्राज्यवादी बनने और अंततः उसके विघटन के बाद सोवियत संघ के राष्ट्र न केवल पश्चिमी और रूसी साम्राज्यवादियों के बीच अपने प्रभाव व अपने गुट में शामिल करने के लिये संघर्ष व षड्यंत्र के क्षेत्र बन गये बल्कि वे आपस में युद्ध और संघर्ष में उलझ गये। हाल के दशकों में रूस-यूक्रेन, रूस-बेलारूस, आर्मेनिया-अजरबैजान आदि के बीच सीमा पर तनाव, झड़पों यहां तक कि कुछेक देशों के बीच युद्ध तक हो चुके हैं। कहां समाजवादी सोवियत संघ ने विभिन्न राष्ट्रों के बीच शांति, भाईचारा, एकजुटता को सुनिश्चित किया और कहां अब हालात यह हैं कि सोवियत संघ के पूर्व के देशों में सीमा पर झड़पों और युद्ध में सैकड़ों लोग अपनी जान दे चुके हैं। ऐसी कुछ मिलती-जुलती कहानी यूगोस्लाविया की भी रही है। सोवियत संघ की तरह यूगोस्लाविया के विघटन ने भी भयानक मानवीय त्रासदी को जन्म दिया था। चेकोस्लोवाकिया का ही विघटन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा। यूगोस्लाविया और चेकोस्लोवाकिया दोनों का ही गठन समाजवादी सोवियत संघ की प्रेरणा से हुआ था। इन दोनों का ही पतन सोवियत संघ के पतन के साथ-सात हो गया।

सोवियत संघ के विपरीत पूंजी और बाजार की जरूरतों को केन्द्र में रखकर यूरोपीय संघ का गठन हुआ। यूरोपीय संघ के गठन की प्रक्रिया उस समय (1957 में) शुरू हुयी जिस समय सोवियत संघ में पूंजीवाद की पुर्नस्थापना हो रही थी। नब्बे के दशक में सोवियत संघ विघटित हो चुका था परन्तु इसी समय यूरोपीय संघ आकार ग्रहण करता गया। यूरोपीय संघ समाजवादी सोवियत संघ से चरित्र में एकदम उल्टा था। जर्मनी और फ्रांस जैसी प्रमुुख साम्राज्यवादी ताकतों का इसमें वर्चस्व था। बाद में यूनाईटेड किंगडम इससे अलग हो गया। यूरोपीय संघ में पूंजी और बाजार केन्द्र में थे और यही उसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा बने हुये हैं। अलग-अलग देशों के पूंजीपति वर्ग के हितों की टकराहट यूरोपीय संघ में उजागर होती रहती है। 

सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्व राजनीति में संयुक्त राज्य अमेरिका अपना वर्चस्व बनाने में कुछेक समय तक कामयाब रहा। परन्तु इक्कीसवीं सदी में उसे रूस, चीन से चुनौती मिलनी शुरू हो गयी। आज सोवियत संघ का नामोनिशान नहीं बचा परन्तु दुनिया के मजदूर, मेहनतकशों, शोषितों-उत्पीड़ितों की मुक्ति और भलाई के लिये, राष्ट्रों के बीच शांति, भाईचारा, एकता स्थापित करने के लिये फिर से समाजवादी संघों की आवश्यकता है।

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