बुधवार, 23 नवंबर 2022

 हिन्दू फासीवाद के मूूल स्रोत

                                                                                                    - गुरप्रीत

यह अजीबोगरीब किंतु सत्य है कि स्वदेशी, देशभक्ति और राष्ट्रवाद का दिन-रात राग अलापने वाले संघी हिंदू फासीवादियों की विचारधारा के मूल स्रोत और वह भी ठीक इसी मुद्दे पर, विदेशी हैं। इसके स्रोत यूरोप में, खासकर जर्मनी में हैं। उस जर्मनी में जिसने इसी सोच के आधार पर नाजीवाद को जन्म दिया।

 

सभी फासीवादियों की तरह भारत के फासीवादियों की विचारधारा राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द घूमती है। अपने देश या राष्ट्र को ‘सारे जहां से अच्छा’ घोषित करना इसका सारतत्व है जो स्वभावतः ही अंधराष्ट्रवाद तक चला जाता है। दूसरे देशों या राष्ट्रों को हीन मानना इसमें निहित है। 

अब यह आम सा ऐतिहासिक तथ्य है कि राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य (एक राज्य या सरकार के तहत राष्ट्र) की पैदाइश पंूजीवादी परिघटना है। पंूजीवाद से पहले समाज जैसा था उसमंे राष्ट्र-राज्य की गुजांइश नहीं थी। तब राज्य, साम्राज्य इत्यादि तो थे पर राष्ट्र नहीं। राष्ट्र होने के लिए एक निरंतर भौगोलिक क्षेत्र, एक एकीकृत अर्थव्यवस्था, एक भाषा तथा एक संस्कृति जरूरी है। सामंती काल में इनमें से बाद के तीनों तत्वों का होना संभव नहीं था। केवल पूंजीवाद ही इन्हें संभव बनाता है। इसीलिए सामंतवाद तक कोई राजा या सम्राट एक छोटे या बड़े इलाके पर कब्जा कर राज्य या साम्राज्य तो कायम कर सकता था पर इससे राष्ट्र अस्तित्व मंे नहीं आ सकता था। राष्ट्र एक ऐतिहासिक चीज है जो पूंजीवाद के विकास के साथ ही क्रमशः अस्तित्व में आ सकता है क्योंकि पूंजीवाद माल-मुद्रा के जरिये अंतर्क्रिया को बहुत बढ़ा देता है, सामंती स्थानीय अलगाव व विभेद को तोड़ देता है। 

इस राष्ट्र-राज्य ने पूंजीवादी क्रांतियों में अपनी अभिव्यक्ति पाई। सोलहवीं सदी की डच (हालैण्ड) क्रांति साथ ही स्पेनी प्रभुत्व के खिलाफ क्रांति भी थी। अठारहवीं सदी की अमेरिकी क्रांति तो इंग्लैण्ड के शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम ही थी। सचेत तौर पर इसने फ्रांसीसी क्रांति के दौरान अपने को अभिव्यक्त किया जब यूरोपीय प्रतिक्रियावादियों (सामंती तत्वों) द्वारा क्रांति को कुचलने के प्रयास के खिलाफ क्रांतिकारियों ने ‘राष्ट्र जिन्दाबाद’ का नारा बुलंद किया।

अठारहवीं सदी से ही राष्ट्र की इस परिघटना को वैचारिक तौर पर सूत्रित करने के प्रयास किये गये। अस्पष्ट तरीके से ही सबने इसे महसूस किया कि राष्ट्र नयी परिघटना है और इसका नये जमाने से संबंध है। 

लेकिन वास्तव में सबसे नहीं। कुछ ने राष्ट्र की इस नयी परिघटना में सुदूर अतीत के तत्व देखे। और केवल तत्व ही नहीं, बल्कि मूल स्रोत। इस तरह के लोगों ने, जिसमें जर्मनी के हर्डर प्रमुख थे, कहा कि राष्ट्र मूलतः एक राष्ट्रीय आत्मा का प्रस्फुटन है। यह राष्ट्रीय आत्मा किसी जगह के जन समूह में आदि काल से मौजूद होती है और उस जन समूह के क्रमशः विकास को निर्देशित करती है या ज्यादा सटीक कहें तो उस विकास में स्वयं को प्रकट करती है। यह प्रकटन पराये तत्वों से प्रदूषित या भ्रष्ट हो सकता है। यहां लोग अपनी राष्ट्रीय आत्मा से गाफिल होकर पतित हो सकते हैं। तब राष्ट्र का क्षरण होने लगता है। वह पराजय, दमन और अपमान का शिकार हो जाता है। 

स्पष्ट ही है कि इस धारणा में राष्ट्र के मूल तत्व या स्रोत शाश्वत हैं। वे पूंजीवाद की पैदाइश नहीं हैं। इसका यह भी स्वाभाविक निष्कर्ष निकलता है कि यदि कोई राष्ट्र पराजय, दमन या अपमान का शिकार है (वास्तव में या कल्पना में) तो उसे पुनर्जीवन के लिए राष्ट्र की मूल भावना की ओर लौटना होगा। 

उन्नीसवीं सदी के मध्य से बीसवीं सदी की शुरूआत तक यूरोप में एक पूरी धारा रही है जो इस तरह की सोच को भांति-भांति से विकसित करती रही। गोबिनू, वैग्नर, चैम्बरलिन, स्पेंग्लर इत्यादि इस धारा के प्रमुख लोग रहे। 

यह स्वाभाविक ही था कि राष्ट्र की मूल आत्मा की इस धारणा को तब प्रचलित नस्ल की धारणा से जोड़ा जाता है। तब पूंजीवादी दायरों में नस्ल की धारणा को वैज्ञानिक मान्यता हासिल थी। मूलतः उपनिवेशवादी सोच से पैदा हुई नस्ल की धारणा (जो ईसाई धर्म की सार्विक मानव की धारणा के खिलाफ थी) तब इतनी व्यापक थी कि वैज्ञानिक इसे साबित करने के लिए भांति-भांति के तथ्य और तर्क जुटाते थे। पूरी मानवता को कई नस्लों में बांटा गया और कुछ को श्रेष्ठ तो कुछ को हीन घोषित किया गया। आम तौर पर उत्तर-पश्चिमी यूरोप (नार्डिक या फिर काकेशियाई) के लोग शिखर पर होते थे और अफ्रीका के काले लोग सबसे नीचे।

नस्ल की इन्हीं धारणाओं के बीच आर्य नस्ल की भी धारणा पैदा हुई। इसमें जर्मन विचारकों का ज्यादा योगदान था। यह धारणा भारत, ईरान तथा यूरोप की भाषाओं के परस्पर संबंध से पैदा हुई और अंततः आर्य नस्ल की धारणा तक पहुंच गयी। कहा गया कि पश्चिमी यूरोप, भारत व ईरान के लोग प्राचीन काल के आर्य नस्ल के वंशज हैं और उन्होंने सारी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सभ्यताओं को पैदा किया। आम तौर पर माना गया कि आर्य मूलतः यूरोप के काकेशस के इलाके में पैदा हुए और यहीं से सब जगह फैले। यह देखना आसान है कि एक भाषाई-सांस्कृतिक समूह के ऐतिहासिक तथ्य को खून वाले नस्ल की धारणा में रूपांतरित कर दिया गया। 

एक भाषाई-सांस्कृतिक समूह से नस्ल तक कि ‘आर्य’ की धारणा की यात्रा भारत से शुरू हुई थी। अठारहवीं सदी में यूरोपीय विद्वानों ने संस्कृत साहित्य (धार्मिक और गैर धार्मिक दोनों) के अध्ययन के दौरान पाया था कि संस्कृत भाषा और फारसी तथा यूरोपीय भाषाओं (प्राचीन ग्रीक, लैटिन) में कोई संबंध है। यहीं से यह यात्रा शुरू हुई थी। चूंकि ‘आर्य नस्ल’ की धारणा की यात्रा की शुरूआत भारत से हुई थी इसलिए लोगों ने आर्यों का मूल स्थान भारत माना हालांकि ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम थी। ज्यादातर विद्वान आर्यों का उद्गम स्थल कोकेशस क्षेत्र, मध्य उत्तरी एशिया या यूराल पर्वत के आस-पास मानते रहे। आधुनिक इतिहासकार भी ज्यादातर इसी को मान्यता देते हैं। यह रोचक तथ्य है कि बाल गंगाधर तिलक ने आर्यों का उद्गम स्थल आर्कटिक को माना था। (बाद में सावरकर ने आर्यों को बाहरी माना तो गोलवलकर ने उन्हें भारत का मूल निवासी घोषित कर दिया। आज हिन्दू फासीवादी गोलवलकर की इसी धारणा को मानते और प्रचारित करते हैं। इस मामले में वे सावरकर को भूल जाते है।)

जर्मनी में राष्ट्र और आर्य नस्ल की ये धारणाएं एक खास दिशा में विकसित हुईं जो अंततः नाजीवाद तक पहुंचीं। इसके अनुसार जर्मनी प्राचीन काल से आर्यांे द्वारा उद्भूत एक उच्च राष्ट्र रहा है। बाद के समय में यहूदियों और अन्य विजातीय तत्वों ने इसे भ्रष्ट कर दिया। जर्मनी की वर्तमान दुर्दशा (उन्नीसवीं सदी में तथा बीसवीं सदी की शुरूआत में) का कारण यह भ्रष्टीकरण है। एक श्रेष्ठ (बल्कि सर्वश्रेष्ठ) राष्ट्र के रूप में जर्मनी के पुनरुत्थान के लिए जरूरी है कि इस भ्रष्टीकरण के मूल स्रोत यहूदियों  तथा उनके द्वारा पैदा की गई विचारधारा- उदार पूंजीवादी जनतंत्र, मार्क्सवाद, समाजवाद, सभी- से जर्मनी को मुक्त किया जाये। इससे मुक्त जर्मन राष्ट्र अपने प्राचीन गौरव को हासिल करेगा और सारी दुनिया को इस गौरव के अनुरूप ढालेगा। ‘सबसे ऊपर जर्मनी’ इनका नारा था। 

आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हिन्दू फासीवादियों के विचारों से परिचित कोई भी व्यक्ति यह सहज ही देख लेगा कि यूरोप और खासकर जर्मनी में प्रचलित राष्ट्र और नस्ल के बारे में इन विचारों की इनके विचारों से कितनी समानता है। और चूंकि ये विचार संघी हिन्दू फासीवादियों से पहले से मौजूद थे इसलिए यह भी स्पष्ट है कि इनमें मूल कौन है। यह याद रखना होगा कि तब भारत मंे अंग्रेजी शासन के दौरान ये सारे यूरोपीय विचार पढ़े-लिखे भारतीयों को आसानी से उपलब्ध थे। उन पर यहां चर्चा भी चलती थी। भारतीय लोग भी इन सवालों पर बहस में भागीदारी करते थे। 

यहां एक बात को रेखांकित करना जरूरी है। यह यूरोपीय ही थे जिन्हांेने अंग्रेजी शासन के दौरान भारत की प्राचीन सभ्यता-संस्कृति का अध्ययन किया। उन्होंने ही संस्कृत के ग्रन्थों (धार्मिक और गैर धार्मिक सभी) का मानक संस्करण तैयार किया उनका यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद किया और उनका आलोचनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने ही भारत की प्राचीन लिपियों को पढ़ा। उन्होंने ही पुरातात्विक खुदाई की। यह सब करते हुए उन्होंने ही पहले भारत का एक समग्र इतिहास प्रस्तुत किया। इन सब में अंग्रेजी शासन की आवश्यकताएं, विद्वानों की जिज्ञासाएं और भारत से प्रेम इत्यादि सभी प्रेरक तत्व थे। 

यूरोपीय विद्वानों के इस प्रयास ने कुल मिलाकर भारत की खास धारणा को जन्म दिया जिसे ‘प्राच्यवाद’ कहा जाता है। इसका सारतत्व यह है कि भारत ‘पश्चिम’ से भिन्न था। यह पश्चिमी भौतिकवादी के बदले आध्यात्मिक था। यह तार्किक के बदले भावनात्मक था। यह व्यक्तिवादी के बदले समुदायवादी था। इत्यादि, इत्यादि। यह देखना मुश्किल नहीं है कि ‘प्राच्यवाद’ की इस धारणा की भारत और यूरोप में ‘आर्यों’ की समान उपस्थिति तथा अंग्रेजी राज द्वारा भारत को ‘सभ्य बनाने’ की घोषित परियोजना से खासी असंगति थी। तब भी विद्वानों ही नहीं बल्कि अंग्रेजी शासन में भी यह ‘प्राच्यवाद’ की धारणा खूब प्रचलित रही। 

अंग्रेजी राज की छत्र छाया में पढ़े-लिखे भारतीयों ने भी जब भारत के बारे में सोचना शुरू किया तो उनका भी प्रस्थान बिन्दु यही ‘प्राच्यवाद’ था। जिन्होंने भारत के बारे में नये सिरे से सोचा उन्होंने भी इसी से प्रस्थान किया। हिन्दू फासीवादी भी इन्हीं में थे। प्राचीन गौरव की उनकी धारणा ‘प्राच्यवाद’ का विस्तार मात्र थी। 

आर्य समाज के पैदा होने के आज डेढ़ सौ साल बाद भी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और आर्य समाज अलग-अलग हैं। लेकिन इसके बावजूद यह कहना होगा कि संघ के हिन्दू फासीवादी विचारों की स्वीकार्यता के लिए जमीन तैयार करने में आर्य समाज का भी योगदान रहा। 

आर्य समाज के जनक दयानन्द सरस्वती का मुख्य ध्येय था अन्य धर्मों से हिन्दू धर्म की रक्षा, खासकर इसाई धर्म से जिसे तब भारत में अंग्रेजी राज से परोक्ष समर्थन मिल रहा था। दयानन्द सरस्वती ने महसूस किया कि भांति-भांति के अंधविश्वासों, कुरीतियों तथा छुआ-छूत वाली जाति व्यवस्था से ग्रस्त हिन्दू समाज को अंग्रेजी राज द्वारा प्रसारित आधुनिक ज्ञान-विज्ञान, प्रशासन तथा इसाई मिशनरियों के सामने नहीं बचाया जा सकता। इसके लिए इसमें सुधार करना होगा। पर उन्होंने जो सुधार का रास्ता चुना वह ‘प्राचीन वैदिक धर्म’ की ओर लौटना था। इस ‘प्राचीन वैदिक धर्म’ कि उनकी धारणा वही ‘प्राच्यवादी’ धारणा थी। वे प्राचीन वैदिक काल के गौरव का पुनरुत्थान करना चाहते थे। इसीलिए वे पुनरुत्थानवादी थे। 

इनके मुकाबले खड़े थे सनातनी। ये ‘सनातन धर्म’ वाले परंपरागत कुरीतिग्रस्त हिन्दू समाज को बनाये रखने के पक्षधर थे। मजे की बात यह है कि अपने ‘सनातन धर्म’ की रक्षा में वे उसी ‘प्राच्यवाद’ का सहारा लेते थे। भारतीय इतिहास की कोई नई धारणा न तो आर्य समाजियों के पास थी और न सनातनियों के पास। 

बीसवीं सदी की शुरूआत में उत्तर पश्चिमी भारत में इन दोनों के बीच विवाद काफी तीखा था। इसीलिए सावरकर ने जब हिन्दू समाज को राजनीतिक तौर पर गोलबंद करने के लिए अपनी ‘हिन्दुत्व’ की नई धारणा पेश की तो उन्होंने सचेत तौर पर धार्मिक विश्वासों को ‘हिन्दुत्व’ की अपनी परिभाषा से बाहर कर दिया। 

सावरकर ने कहा कि ‘सिन्धुस्थान’ में हिमालय से लेकर समुद्र तक के क्षेत्र में हिन्दू प्राचीन काल से सांस्कृतिक विरासत के साथ रह रहे हैं। वे भांति-भांति की आस्थाओं के हो सकते हैं पर वे सारे भारत को अपनी मातृभूमि और पुण्यभूमि दोनों मानते हैं। जो भारत में पैदा हुआ है, उसकी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को स्वीकार और आत्मसात करता है तथा भारत को अपनी मातृभूमि और पुण्यभूमि दोनों मानता है वह हिन्दू है भले ही वह किसी पूजा-पाठ की पद्धति को मानता हो या यहां तक कि नास्तिक हो (जैसा कि सावरकर स्वयं थे)। हिन्दू राष्ट्र या हिन्दुस्तान इन्हीं हिन्दुओं का है। बाकी सब पराये हैं और उन्हें हिन्दुस्तान में हिन्दुओं की तरह बराबर का अधिकार नहीं मिल सकता। 

सावरकर की हिन्दू और हिन्दू राष्ट्र की इस धारणा में नस्ल की धारणा अंतर्निहित थी। प्राचीन सांस्कृतिक विरासत के साथ पैदा होने का यही मतलब था। लेकिन इससे एक समस्या और पैदा होती थी। भारत के ज्यादातर मुसलमान अपनी वंश परंपरा में तो यहीं के थे। बाहर से आने वाले बहुत थोड़े थे और सदियों के दौरान यहीं घुल-मिल गये थे (वर्तमान संघ प्रमुख के अनुसार सारे भारतवासियों का डीएनए एक है)। दूसरी ओर हिन्दू की परिभाषा में पूजा-पाठ के विश्वास को बाहर रखा गया था। ऐसे में मुसलमान भी हिन्दू राष्ट्र में बराबर की हैसियत में आ जाते थे। इस निष्कर्ष से बचने के लिए सावरकर ने ‘पुण्यभूमि’ का मापदंड पेश किया। वही हिन्दू राष्ट्र या भारतवर्ष का सच्चा घटक हो सकता है जिसकी पुण्यभूमि भी भारत हो। अब मुसलमानों या इसाईयों की पुण्यभूमि तो भारत है नहीं (वह क्रमशः मक्का-मदीना और यरूशलम में है) इसलिए मुसलमान या इसाई हिन्दू राष्ट्र के हिस्से नहीं हो सकते। ऐसा तभी हो सकता है जब वे भारत को मातृभूमि के साथ अपनी पुण्यभूमि भी मानना शुरू कर दें। और यह हो नहीं सकता क्योंकि इसके लिए उन्हें अपना धर्म ही छोड़ना पडे़गा।

यूरोपीय नस्लवादी राष्ट्र की अपनी हिन्दू राष्ट्र की धारणा से मुसलमानों और इसाईयों को बाहर करने के लिए सावरकर ने जो चाल चली थी (मुसलमानों और इसाईयों को इससे बाहर करने तथा बौद्धों और जैनों को इसमें शामिल करने के लिए ‘पुण्यभूमि’ का मापदंड पेश करना) उसका तार्किक नतीजा यह निकलता था कि दुनिया की ज्यादातर आबादी राष्ट्रद्रोही साबित हो जाती थी। दुनिया के तीन सबसे प्रमुख धर्मों को मानने वाली ज्यादातर आबादी (यानी इसाई, मुसलमान और बौद्ध) ऐसे देशों में रहती है जो उसकी ‘पुण्यभूमि’ नहीं है। लेकिन सावरकर को इस बात की चिंता नहीं थी। उन्हें अपने हिन्दू राष्ट्र की धारणा में भांति-भांति के धार्मिक संप्रदायों मंे बंटे सारे हिन्दुओं को शामिल करना था और मुसलमानों व इसाईयों को इससे बाहर करना था। मातृभूमि और पुण्यभूमि का विभाजन इसमें काम आता था। 

बाद में गोलवलकर ने सावरकर के हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की इसी धारणा को अपना लिया। इसलिए संघी हिन्दू फासीवादियों के वास्तविक वैचारिक गुरू सावरकर हैं और यह अकारण नहीं है कि वे सावरकर की इस तरह इज्जत करते हैं। 

सावरकर की हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र की धारणा में नस्ल अंतर्निहित था। गोलवलकर ने इस अंतर्निहित बात को शब्दों में व्यक्त कर दिया। उन्होंने ‘हिन्दू जाति’ शब्दावली का इस्तेमाल किया। यहां ‘जाति’ शब्द भारत की जाति व्यवस्था के अर्थ में नहीं बल्कि नस्ल के अर्थ में इस्तेमाल है। किसी तरह के भ्रम की गुजांइश न रहे इसके लिए उन्होंने जर्मनी का उदाहरण दिया जहां नस्लवादी धारणा चरम पर थी। नाजीवादी जर्मनी में ‘यहूदी समस्या’ का जो समाधान लागू कर रहे थे (जो अंततः यहूदियों के नरसंहार तक पहंुची) उसे गोलवलकर ने आदर्श बताया। वे ऐसा ही समाधान अपने हिन्दू राष्ट्र में मुसलमानों के संदर्भ में लागू करना चाहते थे। 

राष्ट्र की अपनी इसी धारणा के चलते वे हिन्दुओं और मुसलमानों को दो राष्ट्र मानते थे। वे एक ही राष्ट्र के समान घटक नहीं हो सकते थे। यहां यह याद रखना होगा कि 1940 में मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा ‘द्वि राष्ट्र सिद्धांत’ (हिन्दुस्तान, पाकिस्तान) पेश किये जाने के पहले ही सावरकर-गोलवलकर हिन्दुओं और मुसलमानों के दो अलग-अलग राष्ट्र होने का अपना सिद्धांत पेश कर चुके थे। ‘द्वि राष्ट्र सिद्धांत’ के असली जनक हिन्दू फासीवादी थे, मुस्लिम लीग या जिन्ना नहीं। 

आज भी हिन्दू फासीवादी सीधे-सीधे या घुमा-फिराकर जो बात करते हैं उसका मतलब यही होता है कि मुसलमानों और इसाईयों को यदि राष्ट्रवादी बनना है तो उन्हें हर तरह से हिन्दू बन जाना होगा। ‘पुण्यभूमि’ का मापदंड और किसी नतीजे की गुजांइश नहीं छोड़ता। 

फासीवाद-नाजीवाद ने पूरी दुनिया को दूसरे विश्व युद्ध की जिस विभीषिका में ढकेला था और नाजीवादियों ने यहूदियों का जो नरसंहार किया उससे फासीवाद-नाजीवाद बेहद बदनाम हो गया। उसका राष्ट्र का नस्ली सिद्धांत भी उसी के साथ बदनाम हो गया। स्वयं नस्ल की धारणा भी बदनाम हो गई। आज इंसानों को नस्ली रूपों में देखना बेहद घृणित बात मानी जाती है। इन्हीं सब वजहों से बाद में हिन्दू फासीवादियों ने अपनी सोच को उस तरह खुलकर प्रकट करना बंद कर दिया जैसा वे 1920 व 30 के दशक में करते थे। आज संघी गोलवलकर की किताब ‘हम या हमारा राष्ट्रवाद’ से पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन इस पैंतरेबाजी के बावजूद हिन्दू फासीवादियों के ‘हिन्दुत्व’, ‘राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रवाद’ के विचार वही हैं जो सावरकर और गोलवलकर के थे। मोहन भागवत के परस्पर विरोधी बयानों को इसी की रोशनी में समझा जा सकता है। 

उपरोक्त सब से यह स्पष्ट है कि हिन्दू फासीवादियों की विचारधारा के मूल स्रोत हिन्दुस्तान में नहीं हैं। वे पूर्णतया विदेशी हैं और वह भी ‘पश्चिम’ की सबसे खराब और घृणित देन। ‘पश्चिम’ को लगातार गालियां देने वाले हिन्दू फासीवादी असल में उसकी सबसे घृणित विरासत को अपनाए हुए हैं। वे उसकी प्रगतिशील विरासत- उदार पूंजीवादी जनतंत्र, समाजवाद, साम्यवाद- को नहीं बल्कि उसकी सबसे घृणित प्रतिक्रियावादी विरासत के वाहक हैं। उनकी ‘प्राचीन भारतीय गौरव’ की सारी धारणा इसी घृणित विरासत से आच्छादित है। मानव सभ्यता में जो कुछ भी प्रगतिशील रहा है यदि समाजवाद- साम्यवाद उसका वारिस है तो हिन्दू फासीवाद (और आम तौर पर फासीवाद) उस सबका वारिस है जो सबसे घृणित और प्रतिक्रियावादी रहा है। इसका एक परिणाम हिटलर और मुसोलिनी के निजाम के रूप में सारी मानवता ने भुगता था। दुबारा ऐसा नहीं होने देना है। 

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