मंगलवार, 1 सितंबर 2020

 ऑन लाइन बुक इग्जाम उत्पीड़न का एक तरीका


24 मार्च को देशभर में लॉकडाउन की घोषणा के बाद सरकार का आदेश हुआ कि आज से सब कुछ बंद। बस-रेल, स्कूल, फैक्टरी आदि सब कुछ बंद कर दिये गये। लोगां को घरों में बंद रहने का आदेश दे दिया गया। क्योंकि दुनियाभर में लाइलाज कोरोना बीमारी अब महामारी का रूप धारण कर चुकी है इससे बचना है तो जहाँ पर भी हो जिस भी हालत में हो अगले आदेश तक वैसे ही रहो.. !

उससे पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में 9 मार्च से मिड सेमेस्टर ब्रेक हो चुका था जो कि 16 मार्च तक था। लेकिन दिल्ली सरकार ने एहतियातन पहले ही 31 मार्च तक सभी शिक्षण संस्थानों जैसे स्कूल कॉलेजों और कोचिंग सेंटरों को बंद करने का आदेश दे दिया था। छुट्टी की वजह से अधिकांश छात्र सुदूर अपने गाँवों में चले गए थे जो सामान्यतः अपनी पाठ्यपुस्तक या अन्य कोई पाठ्य सामग्री लेकर नहीं गए हैं।

इसी बीच विश्वविद्यालय प्रशासन के द्वारा सूचना आती है कि जब तक कॉलेज नहीं खुलेगा सभी कक्षाएं ऑनलाइन दी जाएंगी, ऑनलाइन मोबाइल एप्लीकेशन के द्वारा। इसको लेकर छात्रों के साथ समस्याएं तभी से शुरू हो गईं क्योंकि बहुसंख्या में छात्रों के पास या तो स्मार्ट एंड्रायड मोबाइल फोन नहीं था या इंटरनेट कनेक्टिविटी की भारी दिक्कत थी या फिर पढ़ने की सामग्री साथ नहीं थी। कक्षाएं होनी शुरू हुईं तो उसमें एक चौथाई के आसपास ही छात्र भाग ले पाए। न शिक्षकों को इस तरीके से पढ़ाने और ना ही छात्रों को ऐसे पढ़ने का तरीका मालूम था। बहुत बार कक्षा आधे में ही खत्म कर दी जाती और ऐसे महज़ औपचारिकता के साथ वि.वि. प्रशासन के अनुसार सारा सिलेबस भी पूरा करा दिया गया। जोकि की हकीकत से बिल्कुल परे है।

बिना सिलेबस पूरा किए हुए ही प्रशासन की ओर से आदेश आया कि सभी पाठ्यक्रमों और सभी वर्षो के छात्रों की ऑनलाइन तरीके से परीक्षाएं कराई जाएँगी। क्न्ज्। (दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ) और छात्र संगठनों के द्वारा इसकी तमाम खामियों को उजागर करते हुए इस अनैतिक आदेश का विरोध किया गया। प्रशासन ने क्न्ज्। से कोई परामर्श नहीं किया बल्कि अपने अधिकारियों के साथ ही बैठकों में इसको निर्धारित किया गया था। उन्होंने ‘‘ऑनलाइन’’ कई बार मीटिंग रखी जिसमें इंटरनेट डिस्कनेक्टिविटी की वजह से उनको खुद की मीटिंगें स्थगित करनी पड़ीं। बहुत माथापच्ची करने के बाद नया आदेश आया कि पहले-दूसरे वर्ष के छात्रों को छोड़कर बाकी छात्रों का ओपन बुक एग्जाम (व्ठम्) लिया जाएगा। लेकिन यह आदेश भी उतना ही गलत था जितना कि इससे पहले वाला। क्योंकि पहले या तीसरे/अंतिम वर्ष के छात्रों के साथ दिक्कतों में कोई भी अलगपन नहीं था।  

प्रशासन ने पुलिस से मिलीभगत करके इसके खिलाफ उठने वाली आवाज़ों को दबाने के लिए पूरे विश्वविद्यालय परिसर में धारा 144 लागू कर दी। फिर भी 18 जून को दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रगतिशील छात्र संगठनों ने आर्ट्स फैकल्टी पर प्रदर्शन किया। पुलिस ने प्रदर्शन करने से रोक दिया। जो यह दिखाने के लिए काफी था कि सरकार अपना विरोध सह पाने में बिलकुल भी सक्षम नहीं है।

फिर जब 22 जून को दोबारा छात्र संगठन और क्न्ज्। संयुक्त रूप से प्रदर्शन करने गए तो 13-14 लोगों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया और उनको ज़िंदगी बर्बाद कर देने से लेकर और भी कई तरह से डराने-धमकाने की भी कोशिश की। जिस धारा 144 की दुहाई देकर उन्होंने वहाँ से प्रदर्शन को रुकवाया और लोगों को हिरासत में रखा, उसी धारा 144 के लागू रहने के बावजूद भाजपा-आरएसएस की छात्र इकाई ।ठटच् के कार्यकर्ताओं ने 20 जून को आर्ट्स फैकल्टी पर ही चीन के विरोध में प्रदर्शन किया था।

इसी प्रकार से ऑनलाइन प्रदर्शन भी जारी रहे। ट्विटर स्टार्म से लेकर ईमेल, फेसबुक, यूट्यूब सब जगह छात्रों की बातों को सरल से सरल बातों से बताने की कोशिश की गई। मीडिया ने इसको बाद में कवर भी किया। दूसरे विश्वविद्यालय तथा राज्य सरकारों ने अपने यहाँ परीक्षाएँ नहीं कराने की घोषणा की। लेकिन क्न् प्रशासन अभी भी अपने अड़ियल रवैये से हिलने को राजी नहीं था। फिर मानव संसाधन विकास मंत्री का बयान आया कि छात्रों को इस व्ठम् से होने वाली दिक्कतों से हम पूरी तरह अवगत हैं और न्ळब् की एक कमेटी ने सरकार को यह परामर्श दिया कि अंतिम वर्ष के छात्रों का भी एग्जाम ना कराए जाए लेकिन वो सिफारिश केवल मीडिया के माध्यम से पहुँची। क्योंकि न्ळब् ने अपनी आधिकारिक अधिसूचना जारी करके यह बात नहीं कही थी। इसीलिए छात्र संगठनों ने इसी बात को लेकर 2 जुलाई को न्ळब् को साझा ज्ञापन सौंपा। जिसमें सभी बातों का उल्लेख किया गया था। वहाँ पर जो अधिकारी मिले उन्होंने तब भी यही कहा कि हम समस्याओं से पूर्ण रूप से अवगत हैं और इसको लेकर जल्दी ही एक दो दिन में अधिसूचना भी जारी कर दी जाएगी ।

फिर 4 तारीख को मॉक परीक्षा ली गयी जिसमें 22 प्रतिशत छात्र ही अपने उत्तर की कॉपी जमा कर सके। इसमें पहले से अवगत कई समस्याओं का सामना करना पड़ा जैसे :- पेपर डॉउनलोड होने में बहुत ज़्यादा समय लग जाना, ओपन बुक एग्जाम तो था लेकिन छात्रों के पास बुक ही नहीं थी, इंटरनेट-मोबाइल की सुविधा से दूर जैसी बहुतायत में समस्याएं थीं। यह मॉक परीक्षा बिल्कुल असफल रही और साथ ही प्रशासन की डींगें हांकने वाली तैयारियों की पोल खुल गई जिसकी वजह से काफी किरकिरी भी हुई।

छात्रों ने व्ठम् के खिलाफ अदालत में गुहार लगाई वहाँ कई बार डीयू प्रशासन को गलत जानकारी देने को लेकर अदालत ने फटकार भी लगाई। लेकिन हर बार डीयू प्रशासन अपनी फरेबों से बच निकलने में कामयाब रहा। इसी दौरान कई बार मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सामने भी प्रदर्शन करके अपनी समस्याओं को उठाने का काम किया गया। लेकिन सरकार ने हर बार ही ओछी हरकत दिखाई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी अब क्न् प्रशासन को ऑनलाइन परीक्षा करने की अनुमति दी है। लेकिन समस्याएं जस की तस हैं, उनके हल और समाधान के लिए कोई रास्ता नहीं निकाला जा रहा है। जबकि उनके पास परीक्षा नहीं कराके वैकल्पिक व्यवस्था भी है कि वो पूर्व प्रदर्शन के आधार पर सभी छात्रों को पास कर दें और यह भी सुनिश्चित करें कि जो अपने अंकों को लेकर सन्तुष्ट होंगे वे स्थिति सामान्य होने पर दोबारा परीक्षा दे सकेंगे। 

ऑनलाइन परीक्षा हर हाल में गलत है। इसको किसी भी तरीके से सही नहीं कहा जा सकता जोकि छात्रों के जीवन के साथ बिल्कुल खिलवाड़ करने जैसा है। गरीब छात्रों व गरीब इलाकों से आने वाले छात्रों को शिक्षा से रोकना इसका आवश्यक परिणाम है। महामारी के दौर में छात्रों व उनके परिवारों की दुर्दशा के प्रति यह एक असंवेदनशील कदम है। बिना किताबों, बिना कोर्स पूरा किये एग्जाम लेना सरासर गलत है। वि.वि. का यह कदम तमाम कारणों से छात्रों को प्रताड़ित करने, उन्हें तनाव दने का काम कर रहा है।

                                                                                                      -सलमान हुसैन

                                                                                                    छात्र, दिल्ली विश्वविद्यालय

                                                                                                    वर्ष- 11 अंक- 3 व 4 (अप्रैल-सितंबर, 2020)


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