शनिवार, 25 जनवरी 2020

गहराता आर्थिक संकट

उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हर नौजवान की नजर पढ़ाई के साथ-साथ अपने भविष्य पर यानी भविष्य के रोजगार पर भी होती है। अधिकतर नौजवान चूंकि पढ़ाई के साथ रोजगार पाने की जंग को अकेले ही अपने बूते पर हल करना चाहते हैं इसीलिए देश-दुनिया की खबरों को वे सामान्य ज्ञान के एक प्रश्न के बतौर रट तो लेते हैं पर उन खबरों से अपने जीवन का सरोकार नहीं जोड़ पाते। जब उनके सामने उनसे पहले पढ़ाई पूरी कर चुका बेरोजगार युवक आता है तो भी वे इसी गलत निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं कि उस युवक ने ठीक से तैयारी नहीं की होगी। कुछ ऐसे ही विचार छात्रों के दिमाग में तब पनपते हैं जब वे किसी ऐसे मजदूर से टकराते हैं जिसे किसी फैक्ट्री में छंटनी की वजह से काम से निकाल दिया गया होता है। इस मामले में मजदूर का ही दोष निकालने की कोशिश होने लगती है। कुछ ऐसा ही ख्याल किसी बेहद उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवान को किसी प्राईवेट फैक्ट्री में 4-6 हजार पर खटते देखते हुए आम छात्रों के दिमाग में पैदा होता है। पढ़े-लिखे बेरोजगार, छंटनीशुदा मजदूर या ठेके पर काम करते पढे़-लिखे नौजवान के बारे में गलत खयालात पैदा होने के पीछे ये आम छात्र कहीं से भी दोषी नहीं हैं। वे तो दरअसल उसी सोच को अपना रहे होते हैं जो हमारे आस-पास में चलन में है। दरअसल यह सोच उन्हें अपने भविष्य के बारे में एक झूठी आशा में जीने में भी मदद करती है। टी.वी.चैनल, अखबार और आस-पड़ोस यही सोच परोस रहे होते हैं।

पर वे छात्र जो देश-दुनिया से एकदम कटे नहीं होते यह खबर सुनकर परेशान हो जाते हैं कि इस वक्त बेरोजगारी की दर पिछले 45 वर्षों में सबसे अधिक है। वे ये खबरें भी सुनकर परेशान होते रहते हैं कि ऑटो सेक्टर की मौजूदा वक्त में चल रही मंदी से करीब 10 लाख लोगों के रोजगार पर खतरा पैदा हो गया है। अपने आस-पास अच्छे खासे पढ़े लोगों को ठेकेदारी के तहत मजदूरी करते देख उन्हें अपना भविष्य खतरे में दिखायी पड़ने लगता है। वे हालात को बदलना चाहते हैं बेहतर भविष्य चाहते हैं पर सही राह के अभाव में हालात पर गुस्से का इजहार करने के अलावा और कुछ नहीं कर पाते हैं।

आज जिस वक्त में हम जी रहे हैं हालात कुछ ऐसे ही हैं कि नयी नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं। जो लोग काम पर लगे हैं उन्हें भी काम से निकाला जा रहा है। स्वरोजगार या बिजनेस की भी फलने-फूलने की संभावना बेहद कम है। आखिर इस वक्त हालात ऐसे क्यों हो गये हैं? इस प्रश्न का जवाब यह है कि हमारी सरकार लगातार ऐसी नीतियों को लागू कर रही है जिससे स्थायी सुरक्षित रोजगार घटते जा रहे हैं और ठेके की नौकरियां ही ज्यादातर नौजवानों को मिल पा रही हैं। बड़े-बड़े पूंजीपतियों के फायदे के लिए सरकार सारे नियम-कानून बदलकर ऐसा माहौल पैदा कर रही है कि कम्पनियों को मजदूरों को जब चाहे रखने जब चाहे निकालने की छूट मिल जाये। निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण के नाम से मशहूर इन नीतियों के जरिये छात्रों-नौजवानों के भविष्य को अंधकार की ओर धकेला जा रहा है। इन्हीं नीतियों के चलते छात्र एक ओर लाखों रुपया खर्च कर कोई प्रोफेशनल कोर्स कर पा रहे हैं और कोर्स करने के बाद पा रहे हैं कि उनका कोर्स उन्हें काई सुरक्षित रोजगार देने लायक तक नहीं है।

जहां सुरक्षित स्थायी रोजगार का सवाल सरकारी नीतियों से जुड़ता है वहीं कुल उपलब्ध रोजगारों का सवाल देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ता है। और हकीकत यही है कि आज न केवल भारत बल्कि समूची दुनिया की अर्थव्यवस्था नाजुक दौर से गुजर रही है। वह संकट का शिकार है। इसीलिए बेरोजगारी भारत में 45 वर्षों के सबसे ऊंचे स्तर पर जा पहुंची है। 

पर अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त है इस बात का क्या मतलब है? क्या देश में नया उत्पादन करने, नये कारखाने लगाने के लिए जरूरी कच्चा माल, संसाधनों की कमी पड़ गयी है? नहीं, ऐसा होता तो अर्थव्यवस्था का संकट और उसके चलते बड़ी संख्या में लोगों में पैदा होने वाली गरीबी समझ में आने वाली बात होती। जैसे आज से 100-200 वर्ष पूर्व जब अकाल पड़ने से हजारों-लाखों लोग मर जाते थे तो यह बात सबको हजम हो जाती थी कि जब अनाज पैदा ही नहीं हो रहा तो क्या कर सकते हैं।

पर आज अर्थव्यवस्था के संकट की वजह इसकी एकदम उलटी है। आज संकट इस वजह से पैदा हो रहा है कि मालां और सेवाओं का इतना उत्पादन हो गया है कि वो बाजार में इसलिए नहीं बिक पा रही हैं क्योंकि बड़ी आबादी के पास उन्हें खरीदने के लिए पैसा नहीं है। लोगों के पास चीजें खरीदने के लिए पैसा इसलिए नहीं है क्योंकि उनका सुरक्षित रोजगार छिन चुका है कि पूंजीपति उन्हें बेहद कम दामों में काम करने को मजबूर कर रहा है। अब चूंकि पहले से ही पैदा हुये माल की बिक्री नहीं हो पा रही है तो और माल क्यों पैदा किया जाये। तमाम कल कारखाने बन्द हो जा रहे हैं। लोगों की छंटनी की जा रही है। बेरोजगारी चरम पर पहुंच रही है। अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो जा रही है।

आज भारत ही नहीं दुनिया के पैमाने पर यह संकट देखा जा रहा है। इस संकट की शुरूआत 2007-08 से अमेरिका से हुई थी। तब वहां बड़े पैमाने पर गरीब मेहनतकश लोगों को बीमा कंपनियां-बैंकों ने ऐसे कर्ज घर बनाने के लिए दे दिये थे जिन्हें वापस चुकाना लोगों की क्षमता में नहीं था। ऐसे कर्जों को सब प्राइम ऋण कहा गया था। सब प्राइम ऋण बांटकर आवास क्षेत्र की मांग को ऊपर उठाया गया था। पर यह सब लम्बे समय तक नहीं चल सकता था और 2007-08 आते-आते संकट फूट पड़ा। पहले आवास क्षेत्र की कंपनियां व फिर बैंक-बीमा कम्पनियां संकट की जद में आते गये। शीघ्र ही संकट अमेरिका से निकल कर पूरी दुनिया में महसूस किया जाने लगा। एक के बाद एक बड़ी-बड़ी कम्पनियां डूबने लगीं। उनमें काम पर लगी आबादी बेकार होने लगी।

तब डूबती कम्पनियां, डूबते पूंजीपतियों को बचाने के लिए दुनिया भर की सरकारें आगे आयीं और उन्होंने पूंजीपतियों के गिरते मुनाफे की भरपायी के लिए अपने खजाने खोल दिये। पर संकट की मार झेल रहे मजदूरों-मेहनतकशों के लिए सरकारों ने कुछ नहीं किया। सरकारों ने पूंजीपतियों की मदद (बेल आउट) के लिए भारी कर्ज अपने ऊपर चढ़ा लिया। बाद में इस रकम को तरह-तरह से जनता से वसूला जाने लगा। इसका एक आसान तरीका यह था कि विभिन्न जनकल्याणकारी कामों में खर्च कम करना, सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में कटौती, शिक्षा-स्वास्थ्य मद में कटौती और सरकारी  संस्थानों का निजीकरण। सरल भाषा में इन कदमों को कटौती कार्यक्रम कहा गया।

आर्थिक संकट के चलते पहले से ही छंटनी-बेकारी की मार झेल रहे मजदूर-मेहनतकश वर्ग की इन कटौती कार्यक्रमों ने मानो कमर ही तोड़ दी। दुनिया भर में एक के बाद एक देश में मजदूर-मेहनतकशों के साथ छात्र-नौजवान इन कटौती कार्यक्रमों के खिलाफ सड़कों पर उतरने लगे। अरब देशों में जन विद्रोह से लेकर फ्रांस का येलो वेस्ट संघर्ष, अमेरिका का आक्यूपाई वाल स्ट्रीट संघर्ष सब इसी बात को दिखलाते थे कि जनता अब और हमला सहने की स्थिति में नहीं थी।

अर्थव्यवस्था के संकट के इन वर्षों ने दुनिया के पैमाने पर मेहनतकशों-नौजवानों के आगे स्पष्ट कर दिया कि जिन सरकारों को वो अपना वोट देकर चुनते हैं वो सरकारें खुलेआम पूंजीपतियों के लिए और जनता के खिलाफ काम कर रही हैं। कि पूंजीपतियों के गिरते मुनाफे की भरपाई सरकारें अपने खजाने से कर रही हैं और जब सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ जा रहा है तो उसे मजदूर-मेहनतकशों से वसूला जा रहा है।

परिणाम यह निकला कि अर्थव्यवस्था के इस संकट ने कई देशों में राजनैतिक संकट का रूप ले लिया। और एक के बाद दूसरी पार्टी की सरकारें जीत कर सत्ता में पहुंचने लगीं। पर लोगों ने पाया कि हर पार्टी की सरकार पूंजीपतियों के पक्ष में ही खड़ी थी। 

यह पूंजीवादी व्यवस्था के कारण ही है कि आज दुनिया एक ऐसे संकट को झेल रही है जहां लोगों को गरीबी-भुखमरी का इसलिए सामना करना पड़ रहा है कि अति उत्पादन हो गया है। वस्तुओं-चीजों का इफरात मात्रा में पैदा होना, बाजार का मालों से पटा होना और भारी आबादी का इन मालों से वंचित होना हमारे समय का एक ऐसा विरोधाभास है जो किसी को भी गुस्से और आक्रोश से भर देगा। 

पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन का स्वरूप लगातार सामाजिक होता जाता है पर मालिकाना निजी बना रहता है। ऐसे ही एक कारखाने के स्तर पर तो उत्पादन योजनाबद्ध ढंग से होता है पर पूरे समाज के पैमाने पर उत्पादन में अराजकता हावी होती है। आपसी प्रतियोगिता में पूंजीपति मालों का अति उत्पादन कर लेते हैं। अपने मुनाफे के लिए वे मजदूरों की मजदूरी को कम से कम करना चाहते हैं। पूंजीपतियों की यह चाहत कि वे मजदूरों को कम से कम मजदूरी दें और उनके द्वारा समस्त उत्पादित माल बाजार में पूरा बिक जाय। समाज को लगातार संकट की ओर धकेलती जाती है। पूंजीवाद के इतिहास में आर्थिक संकट लगातार आते रहे हैं। दरअसल पूंजीवाद संकट दर संकट ही आगे बढ़ता है। पूंजीवाद का नाश किये बगैर संकट से मुक्ति नहीं पायी जा सकती।

खैर! सरकारों ने भारी बेल आउट पूंजीपतियों को देने के साथ संकट दूर करने के नाम पर यह भी किया कि दुनिया भर के बैंकों ने बेहद कम ब्याज दर पर पूंजीपतियों को ऋण देना शुरू किया। सरकारों का तर्क यह था कि अगर पूंजीपतियों को सस्ते ऋण दिये जायेंगे तो वे इस ऋण से उत्पादक गतिविधियां शुरू करेंगे जिससे अर्थव्यवस्था में गति पैदा होगी और संकट दूर हो जायेगा। बीते 10 वर्षों से दुनिया भर की सरकारों ने इसी तर्क पर बेहद कम या शून्य ब्याज दर पर पूंजीपतियों को ऋण बांटना जारी रखा है। इस ऋण का क्या परिणाम निकला?

जब बाजार में पहले से ही उत्पादित मालों का अंबार लगा हो तो भला नया माल उत्पादित करने का जोखिम पूंजीपति आखिर क्यों लेते। नतीजा यह हुआ कि इन ऋणां का दुनिया में उत्पादक गतिविधियों में नाम मात्र का उपयोग भी नहीं हुआ। बल्कि इन ऋणों का इस्तेमाल पूंजीपतियों ने बड़े पैमाने की सट्टेबाजी, शेयर बाजार को उठाने-गिराने, वायदा कारोबार सरीखे जुएबाजी में करना शुरू कर दिया। आज दुनिया के पैमाने पर उपलब्ध कुल पूंजी का 70 प्रतिशत हिस्सा इसी तरह की सट्टेबाजी में लगा है।

परिणाम यह निकला कि अमेरिका सरीखे देशों में बेहद कम ब्याज पर उपलब्ध पूंजी भारत सरीखे देशों के शेयर बाजार में उछाल पैदा करने लगी। आज भारतीय शेयर बाजार का सूचकांक इस सट्टा पूंजी के कारण अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति से स्वतंत्र हो चुका है। अपनी बारी में यह सट्टेबाजी में लगी पूंजी वास्तविक उत्पादन-वितरण को कभी भी भारी संकट में ढकेल सकती है।

2007-08 में जब अमेरिका से संकट की शुरूआत हुई तो संकट के हल के तौर पर इस सट्टेबाजी में लगी वित्तीय पूंजी पर लगाम लगाने की खूब बातें हुइंर् पर संकट थोड़ा हल्का पड़ते ही पाया गया कि कहीं भी वित्तीय पूंजी पर लगाम नहीं लगी थी। उसके कारनामे लगातार बदस्तूर जारी थे। ऐसे में केवल पूंजीपतियों के चाकर अर्थशास्त्री ही यह झूठी आशा पाल सकते थे कि संकट टल गया है। वे बार-बार घोषणा करते रहे कि संकट से निपट लिया गया है। पर तभी नयी खबर संकट के न टलने के उदाहरण के बतौर सामने आ जाती। 

अब फिर 2019 में दुनियाभर की संस्थायें संकट के गहराने की बातें कर रही हैं। विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा जारी रिपोर्टों में अर्थव्यवस्थाओं के खतरे की ओर बढ़ने की संभावना अधिकाधिक व्यक्त होती जा रही हैं। जहां विकसित देशों की विकास दर 2 प्रतिशत के आस-पास बनी हुई है तो समूची दुनिया की विकास दर 3 प्रतिशत के इर्द-गिर्द है। ऐसे में रिपोर्टों में बार-बार यह बतलाया जा रहा है कि 2007-08 में चीन की तेज विकास दर ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाया था पर आज खुद चीन की अर्थव्यवस्था बड़े खतरे के मुहाने पर है। तमाम रिपोर्टें यह आशंका दर्ज करा रही हैं कि अगर चीनी अर्थव्यवस्था 2 प्रतिशत सिकुड़ती है तो कैसे समूची दुनिया की विकास दर थम जायेगी। 

यह वास्तविकता है कि 2007-08 के वक्त भारत-चीन सरीखे देशों की विकास दर ऊंची बनी रही थी पर आज खुद इन देशों की अर्थव्यवस्था भी संकटग्रस्त हो चुकी है। आज सरकारों ने पूंजीपतियों को बचाने में अपने ऊपर इतना कर्ज चढ़ा लिया है कि संकट के गहराने की स्थिति में पूंजीपतियों को बचाने के लिए सरकारों के पास करने के विकल्प बेहद कम होंगे।

कहा जाता है कि हर संकट के वक्त लुटेरों के बीच के झगड़े अधिक खुलकर सामने आ जाते हैं। इस संकट के वक्त भी ऐसा ही हो रहा है।

2007-08 में जब से संकट शुरू हुआ तभी से विश्व व्यापार संगठन के तहत देशों के बीच बनी तट कर, सब्सिडी, सरकार के घाटे से संदर्भी सहमति ध्वस्त होती चली गयी। हालांकि शुरूआती वर्षों में पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों ने उदारीकरण-वैश्वीकरण-निजीकरण की नीतियों को तेजी से लागू करना ही संकट के हल का रास्ता बताया पर सरकारें अपने-अपने पूंजीपतियों को बचाने के लिए किसी हद तक संरक्षणवाद की ओर बढ़ने को मजबूर हुईं। 

आज हालत यह है कि अमेरिका और चीन अपने पूंजीपतियों की रक्षा में एक के बाद एक संरक्षणवादी कदम उठा रहे हैं। वे एक-दूसरे के तैयार मालों को अपने-अपने देशों में आने से रोकने के लिए उन पर तट कर बढ़ा रहे हैं। यह सब एक किस्म के व्यापार युद्ध को पैदा कर रहा है जो पहले से ही गिरती के शिकार वैश्विक व्यापार को और गिरती की ओर ले जा रहा है।

संकट के चलते ही दुनिया भर के साम्राज्यवादियों के बीच संघर्ष तेज होता जा रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने आर्थिक वर्चस्व के पराभव को सामरिक वर्चस्व से हल करना चाह रहे हैं। वे आक्रामक भेड़िये की तरह एक के बाद एक देशों को अपने हमलों का शिकार बना रहे हैं वे अपना वैश्विक प्रभुत्व बचाना चाह रहे हैं पर आर्थिक गिरती के चलते वे ईरान, सीरिया कहीं भी अपने मन की नहीं कर पा रहे हैं। रूसी साम्राज्यवादी उन्हें कड़ी चुनौती दे रहे हैं। 

आज दुनिया भर के देशों की विकास दर में गिरती, घटता वैश्विक व्यापार, सरकारों का बढ़ता कर्ज, पूंजीपतियों पर बढ़ता कर्ज, बढ़ती बेरोजगारी सभी इसी ओर संकेत कर रहे हैं कि 2007-08 का संकट टला नहीं है और 2019-20 में वह फिर से गहराने की ओर जायेगा।

भारतीय अर्थव्यवस्था भी इन खतरों से अछूती नहीं है। मोदी सरकार झूठे आंकड़ों से भले ही खुशनुमा तस्वीर पेश कर जनता को भुलावे में रखने में एक हद तक सफल हुई है पर बेरोजगारी की भयावह स्थिति के साथ मजदूर-मेहनतकश अपनी बदहाल होती जिन्दगी से यह महसूस कर रहे हैं कि मामला गड़बड़ है कि प्रचार माध्यमों से विकास की झूठी तस्वीर शीघ्र ही आम जनता की थाली में कम होते राशन के आगे दम तोड़ देगी।

भारत के छात्र-नौजवान-युवा अब इस संकट के असर को अपने जीवन में महसूस करने की ओर बढ़ रहे हैं। अब ठेके में काम करता पढ़ा-लिखा इन्सान, नौकरी खोता मजदूर या बेरोजगार युवा यह समझने की ओर बढ़ रहा है कि अपनी बदहाली के लिए वह दोषी नहीं है बल्कि पूंजीपतियों की मुनाफे की हवस से पनपा संकट उसकी बदहाली का जिम्मेदार है। छात्र अधिकाधिक इस समझ पर खड़े होंगे की मौजूदा संकट ने उनके भविष्य को अंधकारमय बनाया हुआ है।

जितना शीघ्र भारत के छात्र-युवा इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि मौजूदा संकट आम तौर पर पूंजीवादी व्यवस्था और खास तौर पर पिछले 3-4 दशकों की उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों का परिणाम है, उतना शीघ्र ही वे संकट के वास्तविक हल के लिए दुनिया भर में सड़कों पर उतर रहे छात्र-युवाओं के कन्धे से कन्धा मिला भारत में भी सड़कों पर उतरने की ओर बढ़ेंगे।

आज जरूरत है कि बेहतर भविष्य की आस संजोने वाला हर छात्र-युवा संगठित होकर अपने ऊपर बोले जाते हुए हर हमले के खिलाफ संघर्ष करे। जरूरत है कि देश के हर शहर और गांव तक में शिक्षा-स्वास्थ्य के मद में खर्च कम करती और इस तरह शिक्षा-स्वास्थ्य महंगा करती सरकार के खिलाफ लड़ा जाय। आज जरूरत है कि स्थायी रोजगार छीनती, सरकारी सेक्टर का नीजिकरण करती सरकार के खिलाफ लड़ा जाय। आज जरूरत है कि छंटनी के शिकार मजदूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर छात्र-युवा लड़े।

इन संघर्षों को लड़ते हुए निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों को चुनौती दी जाय और समूची पूंजीवादी व्यवस्था को बदलने का संघर्ष तेज किया जाय। आज जरूरत है कि भगत सिंह की बातों को फिर से याद किया जाय कि जो सरकार अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधायें दे पाने में अक्षम हो ऐसी सरकार को बदल देना या तबाह कर देना वहां के छात्रों-नौजवानों का अधिकार ही नहीं कर्तव्य बन जाता है।

अतीत में अर्थव्यवस्था के संकटों ने जहां मेहनतकशों-नौजवानों के जीवन में भारी तबाही-कंगाली पैदा की थी वहीं इन संकटों ने रूस, चीन सरीखे देशों में संकटों से मुक्त समाजवादी व्यवस्था लाने वाली क्रांतियां भी पैदा की थी। आज वक्त भारत के छात्रों-नौजवानों से भी मांग कर रहा है कि भारत में भी ऐसी समाजवादी क्रांति पैदा करने के लिए वो आगे आयें। भारत की समाजवादी क्रांति ही संकटों से मुक्त बेहतर समाज का रास्ता खोल सकती है।                        (वर्ष- 10 अंक-4 जुलाई-सितम्बर, 2019)

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