गुरुवार, 26 जुलाई 2018

जिन्ना के बहाने ए.एम.यू पर फासीवादी हमला 

हमारे देश में फासीवादी आंदोलन का उभार एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। जैसा कि फासीवादी आंदोलन की फितरत है कि वह झूठे सपने, झूठे नायक, फर्जी राष्ट्रवाद, सांप्रदायिकता, फर्जी दुश्मन, देश को खतरा जैसे मामलों में आम जनता की भावनाओं को भड़का कर अपने आंदोलन को आगे बढ़ाता है। इस मामले में वित्तीय पूंजी के मालिक इस फासीवादी आंदोलन के अगुवाओं को मद्द करते हैं।

हमारे देश में 2014 में कुछ इसी तरह की जुमलेबाजी और पुरानी सरकार का जनता के सामने मोहभंग होने तथा पुरानी सरकार द्वारा वित्तीय पूंजी की आकांक्षाओं की पूर्ति न किए जाने के कारण संघ और भाजपा की सरकार कायम हुई परंतु यह सरकार इतनी जनविरोधी साबित हुई कि इसने पूंजीपति वर्ग की सेवा में मजदूरों, किसानों, छात्रों, नौजवानों, बेरोजगारों, व्यापारियों सहित अन्य कामकाजी लोगों पर निर्मम हमले बोलना शुरू कर दिए। जीएसटी, नोटबंदी, श्रम कानूनों में संशोधन आदि ने आम जनमानस में इसकी लोकप्रियता को कमजोर कर दिया। कुल मिलाकर पिछले 4 वर्ष में अर्थव्यवस्था व समाज व्यवस्था से जुड़े हर क्षेत्र में निराशा का दौर जारी रहा। इन कारणों से देश के कोने-कोने में विरोध के स्वर भी उठने लगे। तब जाकर सरकार व संघ के अगुवाओं ने देश की जनता को फिर से अपनी घृणित राजनीति में फंसाने के प्रयास तेज कर दिए। 

अभी हाल में ही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना फोटो विवाद के जरिए भारत-पाक विभाजन के लिए जिन्ना को जिम्मेदार ठहराना तथा परोक्ष रूप से यह जिम्मेदारी मुस्लिम समुदाय पर डालना और उस समय की अराजकता व मारकाट के लिए मुस्लिमों को जिम्मेदार बताकर ‘हिंदू-मुस्लिम’ ध्रुवीकरण पैदा करने की ही साजिश है। संघी ताकतें शिक्षण संस्थानों को संघी पाठशाला में तब्दील कर देना चाहती हैं। इसके लिए जरूरी है कि विरोधी विचारों को कुचला जाए। इसलिए ये ताकतें अपने व सरकार के खिलाफ उठ रही आवाजों को बेरहमी से कुचल रही हैं। वह आवाज उठाने वालों को या तो मार दे रही हैं या फिर उन्हें देशद्रोही साबित करने में जुट जाती हैं। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय से लेकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय तक की घटनाएं इस बात की गवाह हैं कि संघी फासीवादी हमारे देश को बर्बर समाज में तब्दील कर देना चाहते हैं।

ए.एम.यू में हुई 2 मई की घटना से पूर्व एक गैर सरकारी संगठन द्वारा सूचना मांगी जाती है (सूचना के अधिकार के तहत) कि ए.एम.यू छात्रसंघ कार्यालय में जिन्ना की फोटो क्यों लगी हुई है। इसका जवाब भी दिया जाता है। इसके बाद भाजपाई मंत्री सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा दिए गए बयान में ए.एम.यू को देशद्रोहियों का अड्डा बताया जाता है और उसे सबक सिखाने की बात कही जाती है। इसके बाद स्थानीय भाजपा सांसद सतीश गौतम द्वारा इस मुद्दे को भुनाकर हिंदू-मुस्लिम धुव्रीकरण का अभियान शुरू होता है और देश में एक बार फिर मुस्लिम समुदाय व ए.एम.यू को खलनायक बनाने की मुहिम शुरू हो जाती है। 

सांसद एक चिट्ठी ए.एम.यू प्रशासन को जिन्ना की फोटो को मुद्दा बनाकर लिखता है। लेकिन इन महाशय से चिट्ठी के जवाब का इंतजार भी नहीं किया जाता और यह हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं को एक प्लानिंग के तहत ए.एम.यू के सैय्यद बाबा गेट पर भेज देते हैं। जहां पर यह लोग ए.एम.यू के खिलाफ नारेबाजी करते हैं और गेट की सिक्योरिटी के साथ मारपीट करते हैं। इनमें से 6 लोगों को छात्रों द्वारा पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया जाता है परंतु पुलिस सबको थाने ले जाकर छोड़ देती है। 

इसी घटना स्थल से कुछ ही दूरी पर पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी जी एक गेस्ट हाउस में रुके हुए थे। जिला प्रशासन को उनकी सुरक्षा की विशेष जिम्मेदारी लेनी चाहिए थी। लेकिन जिला प्रशासन संघ के नेताओं के सामने इतना पंगु था कि पूर्व की घटना के कुछ घंटों बाद वही गुंडे अपने 20-25 साथियों के साथ दो-तीन बजे आ धमकते हैं। गेट पर ए.एम.यू का पुतला फूंका जाता है व भड़काऊ नारेबाजी की जाती है जबकि 5 बजे हामिद अंसारी जी को यूनियन की आजीवन सदस्यता दी जानी थी। उनकी सुरक्षा के बजाय पुलिस संघी गुंडों को प्रोटेक्ट कर रही थी और पूरी अराजकता फैलाने के बाद पुलिस ही अपने साथ गुंडों को ले गई। इन गुंडों को स्थानीय सांसद द्वारा 1000 से 500 रू0 तक के भाड़े पर बुलाया गया था तथा इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी थाना सिविल लाइन के एस.एच.ओ जावेद को दी गई थी।

इसके बाद ए.एम.यू स्टूडेंट यूनियन के नेता व छात्र इसी गेट पर प्रदर्शन करते हैं। जिनकी संख्या लगभग ढाई हजार होती है। इन छात्रों की मांग होती है कि ए.एम.यू में हुयी घटना के दोषियों(संघी गुंडों) को गिरफ्तार किया जाय। वैसे छात्र इस पूरे घटनाक्रम को पूर्व उपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी पर सुनियोजित हमला बता रहे थे। क्योंकि पुलिस अंसारी जी की सुरक्षा के बजाय गुंडों को प्रोटेक्ट कर रही थी। छात्र गेट पर प्रदर्शन कर ही रहे थे कि भारी संख्या में पुलिस बल वहां पहुंच गया और छात्रों की घेराबंदी कर ली गयी। प्रशासन ने छात्रों की मांगों पर ध्यान देने के बजाय छात्रों पर बर्बर लाठीचार्ज किया जिसमें दर्जनों छात्र घायल हुए और पुलिस द्वारा छात्रों पर किया गया यह हमला ऐसा था कि कई छात्र गंभीर रूप से घायल हुए और उनके सिरों में चोटें आयीं। 

ए.एम.यू के छात्र नेता इसके बाद ए.एम.यू पर हुए हमले का विरोध, आरोपियों की गिरफ्तारी व मामले की न्यायिक जांच की मांग करते हुए रोजाना धरना-प्रदर्शन करने लगे। उधर मीडिया व सोशल मीडिया में ए.एम.यू व छात्र नेताओं को खलनायक बनाने की कवायद शुरू कर दी गयी। जिला प्रशासन द्वारा छात्रों से बात करने के बजाय विश्वविद्यालय को छावनी में तब्दील कर दिया गया। जब छात्रों को लगा कि उनकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, तो छात्रों ने अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी। 12 लोग भूख हड़ताल पर बैठे थे। जिसमें छात्र संघ अध्यक्ष मशकूर अहमद, उपाध्यक्ष सज्जाक, सचिव मोहम्मद फहर केन्द्रीय कार्यकारिणी सदस्य नदीम व अन्य थे। इस दौरान छात्रों पर तमाम तरह से दबाव डाला जा रहा था कि वह आंदोलन खत्म कर दें परंतु छात्र मैदान में डटे रहे। इनमें आरिफा, सुरैय्या, बेबी परवीन, इमरान, उमर फारूक, सज्जाद आदि को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इस दौरान पुलिस प्रशासन फासीवादियों की चापलूसी में डटा रहा। अंत में दबाव में आकर प्रशासन को कुछ मांगें माननी पड़ीं। इसके अलावा रमजान के महीने को देखते हुए छात्रों ने लगभग 15 दिन चले आंदोलन को समाप्त कर दिया। 

       इस पूरे घटनाक्रम ने दिखा दिया कि आज देश में फल-फूल रही फासीवादी ताकतों के निशाने पर जो शिक्षण संस्थान हैं, उन्हें तभी बचाया जा सकता है जब छात्रों नौजवानों का एक जुझारू प्रतिरोध खड़ा किया जाए और इस प्रतिरोध को फासीवाद को परास्त करने वाली मुख्य लड़ाकू शक्ति मजदूरों के संघर्षों के साथ नाभिनालबद्ध किया जाए। 

ए.एम.यू में इस घटना की शुरूआत ए.एम.यू छात्र संघ कार्यालय में लगी जिन्ना की फोटो से हुई। फासीवादी गुंडों ने जिन्ना को भारतीय इतिहास के खलनायक के तौर पर पेश कर भारत-पाक विभाजन के दौरान हुई सांप्रदायिक हिंसा में मौतों का जिम्मेदार ठहराते हुए सवाल उठाया शुरू किया और अपने आप को देशभक्त बताना शुरू किया। जबकि इस बात को कौन नहीं जानता कि भारत में द्विराष्ट्र सिद्धांत के जनक सावरकर रहे हैं। सावरकर के विचार से ही प्रभावित होकर जिन्ना भी द्विराष्ट्रवाद का समर्थन बन गया हालांकि इसके ऐतिहासिक पहलू कई और भी हैं। 

ए.एम.यू में 1938 से जिन्ना की फोटो यूनियन की आजीवन सदस्यता होने के कारण लगी हुई है। कार्यालय में जिन्ना के अलावा अन्य कई लोगों की फोटो भी लगी है। यह भारत का एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। ए.एम.यू घटना के कुछ दिनों बाद पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने कहा कि कोलकत्ता में विक्टोरिया हाउस हो सकता है तो ए.एम.यू में जिन्ना की तस्वीर क्यों नहीं। हामिद अंसारी की बात का तार्किक जवाब संघी लम्पटों के पास नहीं है। क्योंकि उनकी राजनीति पाकिस्तान विरोध, मुसलमान विरोध की है। उन्होंने कभी भी साम्राज्यवाद विरोध की राजनीति की ही नहीं। ये ऐतिहासिक दस्तावेजों और इतिहास वर्तमान की हर चीज को अपनी पसंदगी-नापसंदगी से ही देखते हैं। जो चीज इन्हें पंसद नहीं ये उसे तोड़ कर नष्ट कर देना चाहते हैं। पर इन्हें क्या पता अच्छा-बुरा जो भी हो इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता। उससे तो सिर्फ सबक लिए जा सकते हैं। लेकिन संघी कहां मानने वाले थे, उन्हें तो जिन्ना के बहाने ए.एम.यू व मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाना था व देश का दुश्मन घोषित करना था और उन्होंने इस काम के लिए इस घटना के मुख्य आरोपी अमित गोस्वामी का इस्तेमाल किया। वह एक शातिर किस्म का आदमी है तथा मीडिया व समाज में छाए रहने के लिए इस तरह के कृत्य करता रहता है। वह कई राजनीतिक दलों में रह चुका है तथा अलीगढ़ में छात्र राजनीति में भी रह चुका है। ऐसा महत्वाकांक्षी नौजवान अक्सर ही फासीवादियों के शिकार हो जाते हैं। अब जब फासीवादी आंदोलन  मजबूत हो रहा है तो कालेज कैंपसों में ऐसे तत्वों पर ध्यान रखने की जरूरत है। तमाम छात्र समुदाय को फासीवादियों के चुंगल से कैसे बचाया जाए इसके लिए फासीवादियों के बरक्स क्रांतिकारी छात्र राजनीति का प्रचार प्रसार तेजी से करने की जरूरत है और एक व्यापक आंदोलन खड़ा करने की जरूरत है।

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