गुरुवार, 26 जुलाई 2018

अमेरिका में शिक्षकों की हड़तालें

अमेरिका के पश्चिमी वर्जीनिया में 33,000 से अधिक शिक्षकों ने हड़ताल की। यह हड़ताल नौ दिन तक चली। यह हड़ताल जल्द ही ओक्लाहोमा, ऐरिजोना, कोलोरेडो, उŸारी कैरोलिना, दक्षिणी कैरोलिना, प्यूर्टो रिको, अरकान्सस, नेवाडा, ज्यार्जिया, मिशिगन, आदि तक फैली। यहां भी हजारों की संख्या में लोग हड़ताल के समर्थन में सड़कों पर आये। शिक्षकों की तीन मुख्य मांगे थी; तनख्वाहों में वृद्धि, बेहतर स्वास्थ्य सुरक्षा तथा पेन्शन सुरक्षा। इन हड़तालों को छात्रों, अभिभावकों एवं समाज के अन्य हिस्सों का समर्थन प्राप्त हुआ। लाल कपड़े विरोध का प्रतीक बन गये। नारा दिया गया ‘रेड फार एड’ (त्मकवितम्क- म्क से आशय शिक्षा)। फरवरी से जून मध्य तक चले हड़तालों का यह क्रम फिलहाल रुक गया है। 
 
अक्सर ही; अमेरिकी साम्राज्यवादी अपनी चमक-धमक, अय्याशी, हमलों या अंतर्राष्ट्रीय धौंसपट्टी के लिए ही चर्चा में रहते हैं। यह चमक-धमक या धौंसपट्टी की ताकत अमेरिकी शासक वर्ग न सिर्फ दुनियाभर की मेहनतकश जनता को लूटकर बल्कि अपने देश के मेहनतकशों को लूटकर भी हासिल करता है। जनता की लूट पर टिकी इस खोखली ताकत को शिक्षकों की हड़ताल से समझा जा सकता है। 

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय ने 1990 के मुकाबले 2017 में प्रति छात्र पर खर्च को दो-तिहाई तक कम कर दिया। मुद्रास्फिति के हिसाब से 1990 के 19,100 डॉलर के मुकाबले 2017 में केवल 7,160 डॉलर ही प्रति छात्र खर्च किया जा रहा है। इस खर्च में भी अधिकांश विश्वविद्यालय द्वारा चलाये जाने वाले मेडिकल केन्द्रों से दिया जा रहा है। एरिजोना में 40 करोड़ डॉलर स्कूलों को फण्ड दिया गया, जो पिछले 10 साल का (1.1 अरब डॉलर) आधा ही है। स्वास्थ्य सेवाओं में ओबामाकेयर (।िवितकंइसम बंतम ।बज) ने बीमा कम्पनियों को रिकॉर्ड मुनाफा दिया है। साथ ही; स्वास्थ्य केन्द्र और अस्पताल; स्टाफ की भारी कमी और काम के बोझ की स्थिति में हैं। ऐसे में सरकार का यह कहना कि पैसा नहीं है तो स्वाभाविक तौर पर ही शिक्षकों का सवाल होता है। डेमोक्रेटिक पार्टी ने 700 अरब डॉलर का रिकार्ड सेना बजट, डोनाल्ड ट्रम्प की मैक्सिको सीमा पर दीवार, बैंको को बेलआउट पैकेज के लिए पैसा है पर शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवानिवृत्ति (पेन्शन) के लिए पैसा नहीं है। 

शिक्षकों की प्रान्तवार तनख्वाहों में भी अन्तर है। कुल 15 प्रान्त ऐसे हैं जहां सरकार ने तनख्वाहें कम रखी हैं। 2008 में आये आर्थिक संकट के बाद से यह असमानता और अधिक बढ़ी है। जिन प्रान्तों में हड़तालें हो रही हैं वहां आर्थिक संकट के पिछले 10 सालों में प्रति छात्र खर्च में 21.6 प्रतिशत की कमी हुई है। ऐरिजोना ऐसा प्रान्त है जहां यह कटौती सबसे ज्यादा प्रति छात्र 36.6 प्रतिशत तक पहुंच गई। 

अमेरिकी शासकों ने आर्थिक संकट से निपटते हुए वित्तपतियों को कर्ज माफी, करों में छूट आदि देते हुए इसका बोझ जनता पर ही डाल दिया। जिससे हाल-फिलहाल अर्थव्यवस्था मंदी के खतरे को टाले हुए है। सामाजिक मदों में खर्च कटौती ने असमानता की खाई को और अधिक चौड़ा कर दिया है। ऐरीजोना में अमीरों पर टैक्स को 1990 के 7 प्रतिशत के मुकाबले 2008 से ही 4.54 प्रतिशत कर दिया है। ओक्लाहोमा में 2004 के मुकाबले में टैक्स कटौती से विभिन्न जनकल्याणकारी मदों में खर्च में कमी है। इसी तरह पश्चिमी वर्जीनिया में 1990 के 13 प्रतिशत टैक्स को अमीर वर्ग के लिए 6.5 प्रतिशत कर दिया गया। यहां सबसे गरीब 20 प्रतिशत लोगों पर टैक्स 8.7 प्रतिशत है तो 1 प्रतिशत सबसे अमीरों पर टैक्स केवल 6.5 प्रतिशत है। आंकड़े बताते हैं कि कैसे सरकारी मदद से अमीरों की सम्पत्ति में इजाफा किया जा रहा है। यह सब जनता की मूलभूत सुविधाओं से भी कटौती की कीमत पर हो रहा है। 
टैक्स छूट के जरिये ही एप्पल कम्पनी ने 25.5 के बजाय केवल 14.5 प्रतिशत ही चुकाया। इस टैक्स छूट से ही कम्पनी के मुनाफे में वृद्धि हुई। कम्पनी के ऊपर 280 अरब डॉलर से अधिक का टैक्स बकाया है। 

इन टैक्सों का यदि शिक्षा पर खर्च करें तो उसमें काफी सुधार आ सकता है। एक अनुमान के हिसाब से अमेरिका के 32 लाख स्थायी शिक्षकों के साथ बाकि शिक्षकों को कोरपोरेट के शेयर पुनर्खरीद में जनवरी-मार्च 2018 में खर्च किए पैसों से प्रति शिक्षक 49,000 डॉलर को बोनस अदा किया जा सकता है। या इतने पैसे से देश के 98,200 सरकारी स्कूलों को अतिरिक्त 16 लाख डॉलर दिए जा सकते हैं। या 5.07 करोड़ सरकारी स्कूलों के छात्रों पर प्रति छात्र 3000 डॉलर अधिक खर्च किया जा सकता है। एक अनुमान यह भी है कि देश की सरकारी शिक्षा पर सालभर के खर्च का दोगुना शेयरों की पुनर्खरीद में बर्बाद कर दिया जाएगा। साफ है कि शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के बदले पूंजीपतियों की शेयर सट्टेबाजी में सरकारें ज्यादा छूटें दे रही हैं।

शिक्षकों ने स्कूलों में संसाधनों की कमी में अपना निजी पैसा भी खर्च किया। मार्केट ब्रीफ एजुकेशन वीक के आंकड़ों के अनुसार 90 प्रतिशत तक शिक्षकों ने स्कूल के लिए या कक्षा के अन्य साजो-सामान के लिए अपना पैसा खर्च किया। यह स्थिति तब ही पैदा हुई जब सरकार द्वारा बजट कटौती इस स्तर पर है कि स्कूल के संसाधनों एवं अन्य जरूरी सामान ही नहीं खरीदे जा सक रहे हैं। 

इस सब वस्तुस्थिति से आगे बढ़कर शिक्षकों की हड़ताल की मुख्य प्रवृत्तियों पर नजर डाली जाये। हड़तालें सभी प्रान्तों में क्रमानुसार चली, एक साथ नहीं। हड़तालें 1-2 दिन से लेकर 9 दिनों तक चली। हड़तालें गर्वनर या अन्य अधिकारियों के आश्वासन से समाप्त हो गयीं। हड़तालों का नेतृत्व इन्टरनेशनल सोशलिस्ट ऑर्गनाइजेशन तथा डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ऑफ अमेरिका (जैकोबिन) जैसे शासक वर्गीय ट्रेड यूनियन संघ कर रहे थे।

शिक्षा के प्रति सरकारी उदासीनता के खिलाफ हजारों शिक्षक-छात्र सड़कों पर उतरे जिसमें समाज के अन्य हिस्सों का भी समर्थन प्राप्त हो रहा था। ऐसे में निश्चित ही शिक्षक अधिक जुझारुपन से लड़ना चाहते थे। ट्रेड यूनियन संघों और उनसे सम्बद्ध प्रान्तीय यूनियनों के नेतृत्व के खिलाफ भी आन्दोलनरत शिक्षकों का गुस्सा फूटा। उन्होंने शिक्षा की बुरी होती स्थिति के लिए यूनियनों को भी जिम्मेदार माना। यूनियन नेतृत्व के हड़ताल तोड़ने के रुख के खिलाफ भी लड़े। पर अभी यह विरोध इतना तीखा नहीं था कि शासकों की चाटुकार यूनियनों से पल्ला छुड़ा लिया जाता या उन्हें हड़ताल जारी रखने पर मजबूर कर दिया जाता।

मौजूदा समय में पूंजीवादी व्यवस्था का संकट अपने चरम पर है और शासकों को इससे निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। नई आर्थिक नीतियों (उदारीकरण, वैश्वीकरण, निजीकरण) का दिवाला पिट चुका है। ऐसे में ट्रेड यूनियन संघ या तो शासकों के पालतू हो चुके हैं या फिर संघर्षों को नेतृत्व देने में अक्षम साबित हो रहे हैं। यह बात अमेरिका के शिक्षकों के आन्दोलन के लिए भी सच है। ऐसे में ट्रेड यूनियनों को केवल आर्थिक लड़ाई के मंच से आगे बढ़कर राजनीतिक संघर्ष का मंच बनाने की जरूरत है। राजनीतिक संघर्ष का निशाना पूंजीवादी व्यवस्था को बनाना होगा। एक बेहतर समाजवादी समाज के निर्माण के लिए।     

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