सोमवार, 21 मई 2018

‘‘दफन न होते आजादी पर मरने वाले’’


‘‘दफन न होते आजादी पर मरने वाले 
 पैदा करते हैं मुक्ति बीज, फिर और बीज पैदा करने को।
 जिसे ले जाती दूर हवा और फिर बोती है और जिसे 
 पोषित करते हैं वर्षा जल और हिम ।’’

वाल्ट व्हिटमैन जो एक प्रसिद्ध अमेरिकन कवि थे उनकी एक कविता की इन पंक्तियों को शहीद भगत सिंह ने अपनी जेल बुक में उद्धृत किया था। ये पंक्तियां 13 अप्रैल, 1919 को घटे जलियांवाला बाग हत्याकांड के अमर शहीदों पर कितनी सटीक बैठती हैं। ऐसा लगता है मानो व्हिटमैन ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के शहीदों और उसके बाद के भारत के बारे में ही लिखी हों । 



     जलियांवाला बाग हत्याकांड को रचने वाले क्रूर ब्रिटिश उपनिवेशवादी शासक और उसके जनरल नहीं समझते थे कि वे आजादी की लड़ाई में मरने वालों के जरिये ऐसे नये-नये मुक्ति बीजों को जन्म दे रहे हैं जो एक दिन उसके ही औपनिवेशिक शासन के अंत का कारण बनेंगे।


     जलियांवाला बाग हत्याकांड रचकर ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने हजारों-हजार मुक्ति बीजों को जन्म दे दिया था । भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल, उधमसिंह जैसे मुक्तिबीज जलियांवाला बाग की जमीन में शहीदों के खून से पैदा हुए । और भारत का इतिहास गवाह है कि यह सिलसिला बदस्तूर जारी है।


     यह सिलसिला इसलिए जारी है क्योंकि भारत की मजदूर मेहनतकश जनता की मुक्ति का संघर्ष मौजूद है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद का भले ही खात्मा हो गया हो पर भारत की जनता आज भी साम्राज्यवाद और भारतीय पूंजीवाद के जुए के तले पिसी जा रही है। मुक्ति का सवाल बना हुआ है। मुक्ति बीजों और नये-नये मुक्ति बीज पैदा करने की जरूरत मौजूद है। कदाचित इस बात को शहीद भगतसिंह ने अपने वैज्ञानिक समझ और चिंतन के कारण फांसी पर चढ़ने से पहले ही बखूबी समझकर लिख डाला था कि भारत की जनता की मुक्ति तब तक नहीं हो सकती जब तक भारत में समाजवाद कायम नहीं हो जाता है । 


     जलियांवाला बाग की तरह के हत्याकांड ब्रिटिश उपनिवेशवाद मुक्त भारत में कभी नहीं रुके। आज तक जारी हैं। देशी शासक विदेशी शासकों की तरह जालिम, क्रूर और निर्लज्ज हैं। भारत का आज शायद ही कोई कोना हो जो इनकी क्रूरता की गवाही न देता हो। आजाद भारत का कोई भी शासक ऐसा नहीं है जिसके हाथ भारत के मजदूरांे, किसानों, नौजवानों के खून से न सने हों। नेहरू से लेकर मोदी तक सभी के दामन में हमारे शहीदों के खून के छींटे हैं। आजादी के समय तेलंगाना आंदोलन उफान पर था। नेहरू ने सेना के दम पर उसका निर्मम दमन किया। नेहरू के बाद के भारत में यह खूनी खेल जारी रहा। कश्मीर में रोज ही कत्लेआम रचा जाता है। मध्य पूर्वी भारत में सरकारें अपने ही देश के नौजवानों को कत्ल करने वालों को हर साल वीरता पुरस्कार से नवाजती हैं। जनरल डायर के वंशज आज भी जिंदा हैं। 


     रही बात साम्राज्यवाद की तो सौ वर्ष पहले का साम्राज्यवाद बदल चुका है। औपनिवेशिक गुलामी का अंत भले ही हो गया हो पर साम्राज्यवाद की, दुनिया के देशों पर कब्जा करने की मंशा और हरकतें बंद नहीं हुई हैं। अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया, सोमालिया आदि कई-कई देश साम्राज्यवादी चंगुल में फंसे हुए हैं। स्वयं भारत आर्थिक नवउपनिवेश बना हुआ है। भारत के प्राकृतिक संसाधनों से लेकर मजदूरों किसानों को विदेशी साम्राज्यवादी पूंजी देशी शासकों के कंधे पर सवार होकर लूट रही है। देशी-विदेशी पूंजी की लूट के आगे जब जन समुदाय उठ खड़ा होता है तो शासक नये-नये जलियांवाला हत्याकांड रचने में कोई देरी नहीं करते हैं। 


     इसलिए जब हम जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड के सौ वर्ष पूरे होने पर शहीदों को याद कर रहे हैं तो हमें यह भी याद रखना होगा कि यह भारत वह भारत नहीं है जिसकी कल्पना शहीदों ने की थी। यह वह भारत नहीं है जिसका सपना शहीदों ने संजोया था।


     हम युवाओं, नौजवानों को शहीद पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि हमारे सपनों को साकार करो। एक ऐसे भारत का निर्माण करो जहां जुल्म, सितम का निशां न हो। जहां भारत के मजदूर, किसान गुलामी से भरा जीवन न जिएं बल्कि वे ही भारत के असली शासक हों, नियंता हों, निर्माता हों।


     आज के भारत के शासक शायद नहीं समझते कि वे रोज-रोज नए जलियांवाला बाग रच रहे हैं वे नये-नये मुक्तिबीजों को जन्म दे रहे हैं।

     आओ! हम घोषित करें कि हम नये मुक्ति बीज हैं।

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