शुक्रवार, 2 मार्च 2018

एक भूली-बिसरी पुरानी कहानीः कुछ शिक्षाप्रद सामान्य बातें (दर्शन: समापन किस्त)

                                                                                                                                   - शाकिर

विज्ञान में और खासकर जीव विज्ञान में त्रोफिम देनिसोविच लीसेंको एक बहुत बदनाम शख्सियत हैं। पश्चिमी विज्ञान में उनके नाम से परिचित कोई भी व्यक्ति उन्हें इस बात का नमूना मानता है कि एक वैज्ञानिक को कैसा नहीं होना चाहिए। ज्यादातर तो उन्हें वैज्ञानिक मानते ही नहीं। उनकी बातों को वे नकली विज्ञान घोषित करते हैं।
पश्चिमी विज्ञान में यह आम धारणा है कि सोवियत संघ में 1930 के दशक के मध्य से 1960 के दशक के मध्य तक लीसेंको के कारण जीव विज्ञान और खासकर जेनेटिक विज्ञान का बहुत नुकसान हुआ। इस काल में वहां जेनेटिक विज्ञान तो एक तरह से नष्ट ही हो गया। लीसेंको ने मिचुरिन विज्ञान के नाम से एक गलत और छद्म वैज्ञानिक सिद्धान्त प्रचारित किया जो मूलतः पहले ही नकार दिये गये लैमार्कवाद का नया संस्करण था। बात इतने तक सीमित होती तो गनीमत होती। पर लीसेंको को स्टालिन का संरक्षण हासिल था और स्टालिन की तानाशाही के उस दौर में लीसेंको से असहमत वैज्ञानिको को प्रताड़ित किया गया। कुछ को तो निर्वासन और मौत का शिकार होना पड़ा। सोवियत संघ में यह सब इसलिए हुआ कि वहां एक खासकर विचारधारा यानी माक्र्सवाद का चलन था जो मानती थी कि बाहरी वातावरण बदलकर इंसान को बदला जा सकता है जबकि जेनेटिक विज्ञान इससे भिन्न बात करता था। विज्ञान पर विचारधारा हावी हो जाने पर ऐसे ही दुःपरिणाम आ सकते हैं।
लीसेंको और उनके सिद्धान्तों पर बात करने के पहले उस काल के जेनेटिक विज्ञान पर एक नजर डाल लेना फायदेमंद होगा। 
जेनेटिक विज्ञान की शुरूआत 1900 से मानी जा सकती है जब 1860 के दशक के मेन्डल के प्रयोगों से निकले हुए निष्कर्षों को फिर प्रकाशित किया गया। मेन्डल ने मटर के पौधे पर प्रयोग कर निष्कर्ष निकाला था कि आनुवंशिकता के कुछ ‘फैक्टर्स’ होते हैं जो अगली पीढ़ी में निश्चित नियमों के हिसाब से पहुंचते हैं। इन्हें बाद में जीन का नाम दिया गया। बीसवीं सदी के पहले तीन दशकों में जीन और जेनेटिक विज्ञान के कुछ प्रमुख नियमों को सूत्रित किया गया। बाद के तीन दशकों में, लीसेंको के दशकों में, जीन की आणविक संरचना, इससे संबंधित जैव रासायनिक क्रियाएं तथा जीवों में जीन का मेकेनिज्म इत्यादि खोज का विषय बनीं और उसमें सफलता हासिल हुई।
लीसेंको के काल में जो जेनेटिक विज्ञान पश्चिमी दुनिया में हावी था वह कुछ इस प्रकार की बात करता थाः हर जीव में जीन की एक श्रृंखला मौजूद है। यूकेर्याटिक कोशिकाओं वाले जीवों में यह श्रृंखला जीव की प्रत्येक कोशिका में मौजूद नाभिक में अवस्थित क्रोमोसोम पर पायी जाती है। बल्कि क्रोमोसोम और कुछ नहीं, जीन की श्रृंखला ही होती हैं। ये क्रोमोसोम सभी जीवों के प्रमुख अणु प्रोटीन से भिन्न अणु से बने होते हैं जिन्हें न्यूक्लिक एसिड का नाम दिया गया। जीन ही किसी तरह जीव की हर चीज का निर्धारण करते हैं। न्यूक्लिक ऐसिड की आणविक संरचना का पता चलने के बाद यह भी पता चला कि जीन मूलतः प्रोटीन की संरचना को अपने में मौजूद कोड के जरिये निर्धारित करते हैं और चूंकि प्रोटीन अणु जीन की संरचना और कार्यविधि को निर्धारित करता है तो प्रकारान्तर से जीन हर चीज को नियंत्रित कर लेते हैं।
जीन न केवल किसी जीव की संपूर्ण संरचना और कार्यविधि को नियंत्रित करते हैं बल्कि अगली पीढ़ी में भी केवल ये जीन ही पहुंचते हैं। आनुवंशिकता का आधार ये जीन ही हैं। जीवन और कुछ नहीं बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीन का स्थानांतरण हैं। जीव का शरीर तो वह उपकरण मात्र है जिसके माध्यम से जीन अगली पीढ़ी में पहुंचता है। अगली पीढ़ी में जीव नहीं पहुंचता बल्कि केवल उसको बनाने वाला जीन पहुंचता है। जीन शाश्वत है। जीव का पूरा जीवन काल जीन से निर्धारित तो होता है, पर वह पलट कर जीन को प्रभावित नहीं करता है। जीन में कोई भी परिवर्तन केवल आकस्मिक ही हो सकता है जो खास बाह्य या आंतरिक कारणों से हो सकता है। बाहर से एक्स-रे, रेडियोऐक्टिव किरणें इत्यादि इसमें परिवर्तन कर सकती हैं। भीतर से अगली पीढ़ी में जीन के स्थानांतरण के समय इसमें कुछ परिवर्तन हो सकता है। इस स्थानांतरण को सम्पन्न करने वाली ‘जर्म कोशिकाएं’ विशेष होती हैं और बाकी कोशिकाओं से ये स्वतंत्र होती हैं। लैंगिक प्रजनन करने वाले जन्तुओं में अण्डाणु और शुक्राणु पैदा करने वाली ये ‘जर्म कोशिकाएं’ जीव के पूरे जीवन काल से अप्रभावित रहती हैं। {इंसानों में ये ‘जर्म कोशिकाएं’ अंडाशय (ओवरी) और वृषण (टेस्टिकल्स) में पायी जाती हैं।}
जब जीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपरिवर्तित रहता है तो जैव विकास कैसे होता है यानी नये-नये जीव कैसे पैदा होते हैें? जेनेटिक विज्ञान यह कहता था कि जीन में ऊपर बताये गये आकस्मिक परिवर्तन नये जीव को जन्म देते थे। यदि यह नया जीव वातावरण के अनुकूल हुआ तो समय के साथ नयी प्रजाति अस्तित्व में आ जाती है। इसे नव-डार्विनवाद कहा गया। इसने जीन के आधार पर लैमार्कवाद को गलत ठहराया। यह तो माना गया जीन की वही श्रृंखला (जीनोम) बाह्य वातावरण के हिसाब से जीव में कुछ परिवर्तन करती है पर यह परिवर्तन इसी जीव तक सीमित रहता है। इस जीव का जीवनकाल समाप्त होने पर यह परिवर्तन भी समाप्त हो जाता है। जीव की अगली पीढ़ी में तो अपरिवर्तित जीन श्रृंखला ही पहुंचती है।
यहां यह रेखांकित करना होगा कि आज भी अपने मूल सिद्धांतों में जेनेटिक विज्ञान यही है। बस इसमें आणविक संरचना और जैव-रासायनिक क्रियाओं की खोज के साथ और बारीकी हासिल हुई है। जीन किसी प्रोटीन के निर्माण को कैसे नियंत्रित करता है यह ठीक-ठीक पता लगा लिया गया है। इसी से यह भी पता चला है कि एक जीन बराबर एक प्रोटीन का नियम हमेशा नहीं चलता और किसी एक जैविक विशेषता (मसलन इंसानों में चमड़ी का रंग) के लिए अक्सर कई जीन मिलकर ही काम करते हैं।
  अपने समय में लीसेंको ने इसी जेनेटिक विज्ञान के खिलाफ प्रतिक्रिया की। सोवियत संघ में बाकी दुनिया की तरह यही जेनेटिक विज्ञान चलन में था। पश्चिम में व्याप्त सारे प्रचार के बावजूद सच्चाई यही है कि लीसेंको के पूरे काल में सोवियत संघ में यह जेनेटिक विज्ञान बना रहा और इस दिशा में शोध होते रहे। 1948 में तो लीसेंको ने यह शिकायत ही  की, कि मिचुरिन जीव विज्ञान को पार्टी का सारा समर्थन हासिल होने के बावजूद सारे वैज्ञानिक संस्थानों में परंपरागत मेण्डेलवादी-मार्गनवादी जेनिसिस्ट ही हावी थे।
लीसेंको ने जिस मिचुरिन जीव विज्ञान को प्रचारित किया वह रूसी जीव वैज्ञानिकों तिमर्याजेव और मिचुरिन के सिद्धान्तों को आगे बढ़ाना था। ये दोनों रूसी जीव वैज्ञानिक क्रांति के कुछ समय बाद तक जिन्दा रहे- पहला आधा दशक तो दूसरा डेढ़ दशक। दोनों ने ही क्रांति का समर्थन किया।
लीसेंको मूलतः कृषि वैज्ञानिक थे। जहां मिचुरिन ने अपने प्रयोगों के द्वारा फलों की करीब तीन सौ नयी प्रजातियां विकसित की थीं। वहीं लीसेंको ने फसलों की नयी प्रजातियां विकसित कीं। गेंहू, राई और आलू पर प्रयोग करके उन्होंने बिल्कुल भिन्न मौसम में पैदा होने वाली प्रजातियां विकसित कीं। यही नहीं, उन्होंने पौधों में कलम के द्वारा नयी संकर प्रजातियां पैदा करने के सफल प्रयोग किये। हालांकि बाद में पश्चिम में यह प्रचारित किया गया कि ये प्रयोग झूठे थे पर उस समय खाद्यान्न बढ़ाने के हर प्रयास में लगे हुए सोवियत संघ में इस तरह के झूठ की कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि प्रयोगशाला का कोई भी सफल प्रयोग तुरंत ही खेत में आजमाया जाता था।
तब प्रचलित जेनेटिक विज्ञान व्यावहारिक मामलों के लिए जरा भी कारगर नहीं था। जन्तुओं व वनस्पतियों पर इसके प्रयोग केवल सैद्धान्तिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण थे। जेनेटिक विज्ञान को व्यावहारिक मामलों में सफलताएं कुछ दशक बाद ही मिलनी शुरू हुई (इंसुलिन का निर्माण इसमें प्रथम था)। इसके विपरित लीसेंको के प्रयोग सीधे व्यवहार से संबंध रखते थे- फसलों व फलों की नयी प्रजातियां विकसित करने से संबंधित ।  
लीसेंको ने अपने ये प्रयोग प्रचलित जेेनेटिक विज्ञान से भिन्न सैद्धान्तिक आधार पर किये और दावा किया कि प्रयोगों ने इन सिद्धान्तों की पुष्टि की है। कहीं-कहीं इस सिद्धान्त को चरणबद्ध विकास का सिद्धान्त कहा गया। लीसेंको ने कहा कि कोई भी जीव अपने पूरे जीवनकाल में न तो एक जैसा होता है और न ही उसका विकास एक जैसा होता है। ऐसा नहीं होता कि शुरू में एक कोशिका थी और बाद में जीव में वैसी ही एक अरब कोशिकाएं हो र्गइं। इसके विपरीत जीवों का विकास चरणों में होता है। इतना ही नहीं। इन चरणों को बाहर से प्रभावित किया जा सकता है और वह प्रभाव ऐसा हो सकता है कि अगली पीढ़ी में चला जाये यानी आनुवंशिक हो जाये। मसलन, ऊपर से लगता है कि किसी पौधे का बीज एक जैसा रहता है। पर असल में बीज अपने जीवन काल में कई चरणों से गुजरता है जिसमें से एक ‘आराम काल’ भी होता है। अपने मूल वातावरण में कोई बीज पौधे से अलग होने के बाद तुरंत अंकुरित नहीं हो सकता।
लीसेंको ने कहा कि वे जीव के विकास में और आनुवंशिकता में क्रोमोसोम के महत्व के स्वीकार करते हैं पर वे क्रोमोसोम को केवल जीन तक अपचयित करने के खिलाफ हैं। साथ ही वे यह भी मानते हैं कि जीव के विकास को अन्य कारक भी प्रभावित करते हैं (जिसमें बाहरी वातावरण का प्रभाव भी शामिल है) तथा ये प्रभाव इतने स्थाई हो सकते हैं कि वे अगली पीढ़ी में चले जायें यानी आनुवंशिक हो जायें। इस तरह जेनेटिक विज्ञान जहां आनुवंशिकता का मतलब पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीन का स्थानांतरण घोषित करना था वहीं लोसेंको ने इसकी बिल्कुल भिन्न परिभाषा दी और उसे जीव के विकास तथा उसके वातावरण से संबंद्ध घोषित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि आनुवंशिकता को जीव से अलग का केवल उसके जीन तक सीमित नहीं किया जा सकता। स्पष्टतः ही इससे जैव विकास की एकदम अलग धारणा पैदा हुई जिसमें जीन में आकस्मिक परिवर्तन के जरिये प्राकृतिक वरण प्रमुख नहीं था बल्कि अपने वातावरण में जीव का संपूर्ण विकास ही प्रमुख था।
लीसेंको ने प्रचलित जेनेटिक विज्ञान को भाववादी बताया और कहा कि इस तरह के सिद्धांत के चलन का कारण वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था में विद्यमान थे। अपने पतित संकटग्रस्त समाज को बचाने के लिए हर संभव प्रयासरत पूंजीपति वर्ग भाववाद का प्रचार करता था और वैज्ञानिक भी इसकी चपेट में आते थे। वैज्ञानिक होने के चलते व तथ्यों और प्रयोग पर भरोसा करते थे और इसी में जेनेटिक विज्ञान का उद्धार निहित था। वक्त के साथ जेनेटिक विज्ञान अपनी भाववादी जमीन छोड़कर सही जमीन पर लौटेगा पर इसमें काफी समय लगेगा।
यह याद रखना होगा कि पश्चिम में जेनेटिक विज्ञान के उदय के साथ उसके आधार पर पूंजीवादी शोषण, अन्याय-अत्याचार को जायज ठहराने की कोशिश होने लगीं। कहा जाने लगा कि इन सबके कारण जीन में हैं। जीन से ही कोई अच्छा-बुरा, मेहनती-कामचोर, बुद्धिमान-मूर्ख होता है। पूंजीवाद में सफल लोग अपने जीन के कारण ही सफल हैं। पूंजीवाद बिल्कुल प्राकृतिक व्यवस्था है। इसे समाप्त कर साम्यवाद कायम करने की कोशिश मानव प्रकृति के प्रतिकूल व्यवस्था बनाने की कोशिश होगी जो कभी सफल नहीं होगी। वर्तमान व्यवस्था को ही स्वीकार करना चाहिए। यदि इसे बेहतर बनाना है तो केवल एक तरीके से यह किया जा सकता है-लोगों के जीन में परिवर्तन करके। जरूरी है कि खराब जीन वाले लोगों को बच्चा पैदा करने से रोका जाये और जीन को बेहतर बनाने के प्रयास किये जायें। इस दिशा में विभिन्न देशों में कानून बनाये गये और प्रयोग किये गये जिनमें नाजियों का यहूदी कैदियों पर प्रयोग सबसे बदनाम हैं। सैद्धान्तिक तौर पर कई जेनेटिक वैज्ञानिकों ने डार्विन के विकासवाद को खुलेआम नकारा और  इरविन श्रोडिन्जर सरीखे भौतिक वैज्ञानिक ने इसकी खुली भाववादी-ईश्वरवादी व्याख्या की- जीन के रूप में अमरता और ईश्वर दोनों प्रमाणित हो गये हैं।
इस वातावरण में लीसेंको की बातों को समझा जा सकता है।
सोवियत संघ में स्टालिन के बाद खुश्च्रोव काल में लीसेंको को कुछ तवज्जो मिलती रही पर ब्रझनेव-कोसिगिन काल में लीसेंको का अवसान हो गया। पश्चिमी विज्ञान के हिसाब से सोवियत जेनेटिक विज्ञान मुक्त हो गया।
आज इस मुक्ति के आधी सदी बाद जेनेटिक विज्ञान की क्या स्थिति है? लीसेंको के बारे में उसकी क्या राय है? इस राय को इस बात से समझा जा सकता है कि पिछले दिनों लियोन ग्राह्म की एक किताब आई-‘लीसेंको का भूत’। यह रूसी जीन वैज्ञानिकों में इस समय लीसेंको के बारे में बढ़ती रूचि पर केन्द्रित है। स्वयं पश्चिमी दुनिया में इस तरह के लेख छपने लगे हैं : ‘क्या लीसेंको अंततः सही थे?’
हुआ यह है कि सारी दुनिया में पिछले दो दशकों में जीव विज्ञान की एक नयी शाखा तेजी से उभरी है और अब तो यह एक तरीके से फैशन में आ चुकी है। यह शाखा है ‘एपिजेनेटिक्स’ (जीन से ऊपर)। जीन के बारे में ‘द जीन’ नाम की परंपरागत दृष्टि से पांच सौ पृष्ठ की मोटी किताब लिखने वाले सिद्धार्थ मुखर्जी का भी कहना है कि एपिजेनेटिक्स अंततः प्रकृति बनाम पालन-पोषण की आदिम बहस का समाधान पेश करती है यानी इस बहस का कि इंसान अपने जीन की पैदाइश है कि वातावरण की, उसके लिए प्रकृति निर्णायक है कि पालन-पोषण।
मजे की बात यह है कि एपिजेनेटिक्स की शुरुआत लीसेंको के काल में ही हुई थी। इसे शुरू करने वाले थे ब्रिटिश जीव वैज्ञानिक कोनार्ड वैडिंगटन। उन्होंने ही एपिजेनेटिक्स शब्द की रचना की। वैडिंगटन मार्क्सवादी थे और शायद इसीलिए उनके विचारों को पश्चिमी विज्ञान में ज्यादा तबज्जों नहीं मिली और अगले तीन दशकों तक इस दिशा में कोई विशेष काम नहीं हुआ। पर 1990 के दशक से इस दिशा में प्रगति हुई और 1990 के दशक से इसने जोर पकड़ लिया।
जीव विज्ञान के भीतर से इस दिशा में प्रेरणा भ्रूण विज्ञान और विकास विज्ञान से मिली। भ्रूण के विकास के अध्ययन और उसके बाद शिशु से लेकर वृद्धावस्था तक जीव के विकास के अध्ययन से यह अधिकाधिक स्पष्ट होने लगा कि सब कुछ जीन से निर्धारित नहीं होता। इसी तरह जीन और जीनोम तथा स्वयं क्रोमोसोम के बारीक अध्ययन से बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए। पता चला कि क्रोमोसोम या डी एन ए अणु का ज्यादातर हिस्सा (इंसानों में 96प्रतिशत) जीन का हिस्सा नहीं होता। फिर वह क्या करता है? जीन के ‘आन’-‘आफ’ का अपना एक मेकेनिज्म है। जीन कभी-कभी ही किसी जैविक विशेषता का सीधे-सीधे निर्धारण करते हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यह था कि जीन में इतनी कम विविधता प्रजातियों में इतनी ज्यादा विविधता कैसे पैदा कर देती है? सारे स्तनधारियों में 95 प्रतिशत जीन समान हैं। फिर वे इतने भांति-भांति के क्यों है? यहां तक कि जीन के स्तर पर पूर्णतया समान इंसान-सियामिक जुड़वा इतना अलग-अलग कैसे हो जाते हैं?
ऐपिजेनेटिक्स इन सारे सवालों का जबाव देने का प्रयास करता है। संक्षेप में कहें तो वह यह बताता है कि किसी जीव का अपने वातावरण में विकास केवल जीन पर निर्भर नहीं करता। आणविक और जैव रासायनिक स्तर पर बहुत सारी अन्य चीजें इसे निर्धारित करती हैं। किसी जीव की सारी कोशिकाओं में वही जीन रहने के बावजूद जीनोम (यानी जीन का आणविक समुच्चय तथा सारे क्रोमोसोम) वास्तव में वही नहीं रह जाता। अलग-अलग तरह के अंगों में वह अलग-अलग हो जाता है। कोशिकाओं में मौजूद कुछ अन्य संरचनाएं भी जीव के विकास को निर्धारित करती हैं और वे भी अगली पीढ़ी में पहुंचती हैं। ये सब कुछ मिलाकर किसी खास वातावरण में किसी खास जीव को विकसित करती हैं  बल्कि इनमें से कुछ आनुवंशिकता को भी प्रभावित करती हैं। यानी न केवल जीन व जीनोम बल्कि जीव का विकास भी आनुवंशिकता को निर्धारित करता है।
ठीक यही बातें लीसेंको अपने समय अन्य शब्दों में कह रहे थे। एपिजेनेटिक्स दूसरे तरीके से लीसेंको की बातों को ही प्रमाणित कर रहा है और आगे बढ़ा रहा है। लीसेंको की यह बात भी सही साबित हो रही है कि लम्बे वक्त के बाद जेनेटिक विज्ञान सही जगह पर पहुंच जायेगा। दुर्भाग्य बस इतना है कि आज भी पूर्वाग्रह के कारण वैज्ञानिक लीसेंको के योगदान को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। आज भी या तो उनके नाम पर चुप्पी साध ली जाती है या फिर उनका जिक्र आने पर पुराना कुत्सा-प्रचार दोहरा दिया जाता है। ऐसा करने वाले को तो अक्सर पता भी नहीं होता कि लीसेंको के सिद्धांत वास्तव में थे क्या? (लीसेंको ने इन्हें सबसे स्पष्ट रूप में 1948 में आयोजित सोवियत जेनेटिक कांग्रेस में व्यक्त किया था)
विज्ञान की इस पुरानी भूली-बिसरी कहानी से दर्शन के मामले में क्या सबक निकलता है?
पहले तो ठीक दार्शनिक निष्कर्ष पर बात करें।
ध्यान से देखें जेनेटिक विज्ञान की इस बहस में द्वन्द्ववाद के कुछ मूलभूत बिन्दु केन्द्र में थे। इन पर परम्परागत जेनेटिक विज्ञान तो पूर्णतया गलत था ही लीसेंको भी पूर्णतया सही नहीं थे। द्वन्द्ववाद के ये मूलभूत बिन्दु थेः अंर्तक्रिया का सवाल और उसमें प्रधान व गौण पहलू, विकास की प्रक्रिया का सवाल-परिमाणात्मक व गुणात्मक परिवर्तन, एकरूपता व विभेद का सवाल आकस्मिक व निश्चितता का सवाल इत्यादि।
पहला और मूलभूत सवाल तो यही था कि क्या जीन और जीव में क्या कोई अंतक्रिया थी और थी तो दोनों में प्रधान व गौण पहलू कौन थे? परंपरागत जेनेटिक विज्ञान इस अंतक्रिया से ही इंकार करता था। जीन व जीव का रिश्ता एकतरफा था- जीन जीव को निर्धारित करता था। जीव अपनी बारी में पलट कर जीन को प्रभावित नहीं करता था। जीन में परिवर्तन हो सकता था पर वह आकस्मिक परिवर्तन था और वातावरण में जीव के विकास से उसका कोई संबंध नहीं था। यह एकदम ही गैर द्वन्द्ववादी बात थी और सिरे से गलत थी।
इसके मुकाबले लीसेंको ने जीन और जीव की अंतक्रिया को देखा और साथ ही जीव और वातावरण की अंतक्रिया को भी। पर इसमें वे प्रधान व गौण को रेखांकित नहीं कर पाये। अक्सर ही उनकी बातें वातावरण को प्रधान बताती प्रतीत होती थीं। क्रोमोसोम की भूमिका को स्वीकार करते हुए भी (वे जीन की धारणा को अस्वीकार करते थे) वे जो बातें कहते थे उनसे यह भूमिका बहुत धूमिल हो जाती थी। जबकि असल में जीन व जीव (उसके वातावरण में) की अंतक्रिया में जीन (या ज्यादा बेहतर कहें तो अपने सभी रूपों में डी एन ए अणु) प्रधान होता है और जीव गौण। पर द्वन्द्ववाद के सब जगह विद्यमान नियमों की तरह यहां भी किन्हीं विशेष स्थिति में जीव प्रधान हो जाता है। ध्यान रहे कि यहां जीन व जीव की अंतक्रिया की एक विशेष संदर्भ में ही चर्चा हो रही है। संदर्भ बदलते ही दोनों का रिश्ता बदल सकता है। यदि सवाल यह उठाया जाये कि क्या जीव शाश्वत जीन का वाहन मात्र है (जैसा कि रिचर्ड डाकिन्स कहते हैं) तो उत्तर बदल जायेगा।
जीन व जीव में प्रधान व गौण का सवाल एकरूपता और विभेद से, निरंतरता व परिवर्तन से जुड़ा हुआ था। इनसे ही संबंधित था आकस्मिक व निश्चितता का सवाल। धरती पर जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है। यहां बस भौतिक स्थितियों की मौजूदगी में प्रकृति में विद्यमान भौतिक व रासायनिक नियमों के तहत धरती पर जीवन पैदा हुआ और विकसित हुआ। विकसित होते हुए वह इंसान तक पहुंचा। जैव विकास के नियमों को उनके एकदम सामान्य रूप में डार्विन ने सूत्रित किया। इसमें विविधता और प्राकृतिक वरण प्रमुख थे।
यह स्पष्ट है कि जीवों की उत्पत्ति के साथ यहां भी विविधता और एकरूपता का द्वन्द्व आ उपस्थित हुआ। यदि जीव में एकरूपता नहीं होती हो तो नयी पीढ़ी वैसी नहीं रहेगी और इसीलिए कोई प्रजाति संभव नहीं होगी। एक पीढ़ी के सारे जीव भिन्न-भिन्न हो जायेंगे और अगली पीढ़ी में भी। दूसरी और यदि एक प्रजाति के सारे जीव एक पीढ़ी और पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक जैसे रहेंगे तो कोई विविधता न होने के चलते नयी प्रजातियां पैदा नहीं होंगी। कोई जैव विकास इस अर्थ में नहीं होगा। जीवन बिल्कुल शुरुआत में जैसा पैदा हो गया वैसा ही हमेशा बना रहेगा। दोनों ही कारणों से जीवों में विविधता और एकरूपता की कोई ऐसी व्यवस्था विकसित होनी जरूरी थी जो इस रूप में काम करे कि प्रजातियां बनी भी रहें और नयी प्रजातियां विकसित भी हों। जीव वही हो लेकिन साथ ही भिन्न भी हो। आज की भाषा में बात करें तो जीवन ने इस समस्या को, एकरूपता व विविधता की समस्या को जेनेटिक्स व एपिजेनेटिक्स के रूप में हल किया। जहां जीन, जीनोम, क्रोमोसोम एकरूपता बनाये रखने की कोशिश करते हैं वहीं जीव का वातावरण में विकास इसमें विविधता को जन्म देता है। जहां पहला निरंतरता बनाए रखने की कोशिश करता है वहीं दूसरा परिवर्तन लाता है। यह याद रखना होगा कि यहां मामले का अपेक्षाकृत सरलीकरण किया जा रहा है।
जीन व जीनोम एकरूपता बनाये रखने की कोशिश करता है पर वह स्वयं जीन के विकास के फलस्वरूप परिवर्तन का शिकार होता है जो अपनी बारी मे वातावरण से प्रभावित होता है। जीन में परिवर्तन इस विकास से स्वतंत्र बिल्कुल आकस्मिक रूप में भी हो सकता है- वातावरण में मौजूद ऐडियोएक्टिव किरणों की मौजूदगी आदि से था फिर ‘जर्म सेल’ में डीएनए अणु की प्रतिलिपि बनने के दौरान ‘गलती’ से। इत्यादि। पर क्या ये सारे परिवर्तन आकस्मिक ही हैं जिनकी कोई निश्चितता नहीं है। मामले को ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि जीन या जीनोम में आकस्मिक परिवर्तन हो सकता है पर इसका अगली पीढ़ी के लिए चयन निश्चितता के मातहत होता है। इसीलिए एकदम ही भिन्न जीव -‘राक्षस’-अचानक नहीं पैदा हो जाते।
यहां यह स्पष्ट है कि द्वन्द्ववाद के बुनियादी नियम (विपरीतों की एकता और संघर्ष) जीव विज्ञान में उसी तरह विद्यमान हैं जैसी पूरी प्रकृति में। यदि इन नियमों की स्पष्ट समस्त वैज्ञानिकों में होती तो न केवल निरर्थक बहसों से बचा जाता बल्कि विज्ञान की प्रगति भी बहुत तेज होती।
पर ऐसा है नहीं। वैज्ञानिक भी अपने समाज की ही पैदाइश होते है और वे उसमें हावी विचारधारा के मातहत होते हैं। पूंजीवाद में जीने वाले वैज्ञानिक पूंजीवाद की आम विचारधारा के मातहत होते हैं, यह अलग बात है कि इसमें से ज्यादातर इसके प्रति सचेत नहीं होते। वे तो स्वयं को किसी भी विचारधारा से मुक्त वैज्ञानिक मात्र मानते हैं जिसकी रूचि केवल प्रकृति (व समाज) के नियमों के उद्घाटन में है। पर जैसे दिल से स्वयं को गैर-राजनीतिक मानने वाला व्यक्ति सबसे खराब किस्म का राजनीतिक व्यक्ति होता है वैसे ही स्वयं को दिल से विचारधारा मुक्त मानने वाला व्यक्ति सबसे खराब किस्म का विचारधारात्मक व्यक्ति होता है। दुर्भाग्य से आजकल के ज्यादातर वैज्ञानिक इसी श्रेणी में आते हैं।
पिछली शताब्दी भर से ज्यादा के समय में, जब से पूंजीवाद साम्राज्यवाद में तब्दील हो गया और चौतरफा पतन का शिकार हो गया तब से इसने विचारधारात्मक तौर पर हर प्रतिक्रियावादी चीज को बढ़ावा दिया है। यह आमतौर पर परिवर्तन और प्रगति का विरोधी हो गया है। अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत पूंजीपति वर्ग का विचारधारात्मक हमला उग्र से उग्र होना चला गया। ऐसी अवस्था में इस विचारधारा के प्रभाव से बचे रहना वैज्ञानिकों के लिए कठिन से कठिनतर होता गया है।
ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि वैज्ञानिक अपने वैज्ञानिक कार्य में इस विचारधारा के प्रभाव से संचालित हों। उनका शोध इससे संचालित हो या फिर वैज्ञानिक खोजों की व्याख्याएं इससे प्रभावित हों जो अपनी बारी में खोजों की दिशा-दशा को तय करें। प्रकृति के नियमों की खोज को समर्पित होने के चलते वैज्ञानिक घूम-फिर सही वैज्ञानिक नतीजों तक पहुंचेंगे पर इसमें बहुत ज्यादा समय और ऊर्जा अपव्यय हो चुकी होगी। आज यही हो रहा है। जेनेटिक विज्ञान का शताब्दी भर का इतिहास इसे ही प्रभाणित करता है।
इस सबका संबंध उस चीज से है जो दर्शन पर लेखों की इस श्रृंखला के पहले लेख में इंगित की गई थी। वह यह कि दर्शन और विज्ञान के विकास के साथ अब स्थिति वहां पहुंच गई है जब विज्ञानों के विज्ञान के रूप में दर्शन की जरूरत नहीं रह गई और वह केवल द्वन्द्ववाद और तर्कशास्त्र तक सीमित हो गया है। परंपरागत दर्शन के तमाम सवाल अब विज्ञान के सवाल है और उसे ही इन्हें हल करना है।
लेकिन इस कथन में निहित है कि अपने वैज्ञानिक शोध में वैज्ञानिक द्वन्द्ववादी दृष्टि से लैस हों। यदि ऐसा नहीं होता और वे पूंजीवादी विचारधारा के प्रभाव में गैर-द्वन्द्ववादी दृष्टिकोण के शिकार होते हैं तो उनका वैज्ञानिक शोध इससे नकारात्मक तौर पर प्रभावित होगा। गलत वैज्ञानिक सिद्धान्त प्रस्तुत किये जायेंगे और सही वैज्ञानिक सिद्धान्तों की गलत दार्शनिक व्याख्याएं की जायेंगी। पतित पूंजीपति वर्ग अपने विचारधारात्मक संघर्ष में इनका इस्तेमाल करेगा और असावधान वैज्ञानिकों को अपना एजेन्ट बना लेगा। यहां उन वैज्ञानिकों की बात नहीं की जा रही है जो निहित स्वार्थो के तहत खुशी-खुशी पूंजीपति वर्ग का एजेन्ट बन जाते हैं।
ऐसे में विज्ञान के विकास के लिए भी विचारधारात्मक संघर्ष महत्वपूर्ण बन जाता है। और दार्शनिक संघर्ष इस विचारधारात्मक संघर्ष का एक अहं हिस्सा है क्योंकि पूंजीपति वर्ग और उसका विरोधी मजदूर वर्ग विचारधारात्मक संघर्ष में अंततः दार्शनिक सवालों तक पहुंचते हैं। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और अधिभूतवादी भाववाद बहस का मुद्दा भी बन जाते हैं और बहस की मूल गति को दिशा भी देते हैं।
इसलिए परम्परागत दर्शन के सवालों के विज्ञान का सवाल बन जाने से दार्शनिक संघर्ष समाप्त नहीं हो जाता। आज भी भांति-भांति के स्तरों पर यह संघर्ष चल रहा है। पूरी बीसवीं सदी में पूंजीपति वर्ग ने अपनी रक्षा में अधिभूतवादी भाववाद की नाना प्रकार की धाराएं पैदा कीं और इस नयी सदी में भी यह क्रम जारी है। अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत पूंजीपति वर्ग यह करता ही जायेगा।
यहीं से यह आवश्यकता भी पैदा हो जाती है कि इस वर्ग का खात्मा करने को उद्यत क्रांतिकारी द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद को आत्मसात कर इसकी जमीन से पूंजीपति वर्ग का मुकाबला करें। वे न केवल प्रकृति व समाज की सही व्याख्या करें बल्कि दार्शनिक स्तर पर अधिभूतवादी भाववाद की रोज पैदा हो रही नयी-नयी किस्मों का पर्दाफाश करें। क्रांतिकारियों का उद्देश्य केवल दुनिया की सही व्याख्या करना नहीं है, बल्कि इसे बदलना है। पर इसे बदलने के लिए इसकी सही व्याख्या करना जरूरी हैः इसके विशिष्ट और आम दोनों रूपों में।

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