शुक्रवार, 2 मार्च 2018

हिंसक बनते भारतीय किशोर

                                                                                                                                          -चंदन

पिछले दिनों एक के बाद एक ऐसी घटनाएं घटीं जिसने समाज को चितिंत कर दिया। इनमें से पहली घटना गुडगांव के रेयान इन्टरनेशनल स्कूल की है। जहां 11वीं के एक छात्र ने 7 वर्षीय मासूम प्रद्युमन की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी कि वह परीक्षाएं व पैरेन्टस टीचर्स मीटिंग को टालना चाहता था। हत्या स्कूल में ही बड़ी बेरहमी से गला रेंतकर की गयी थी जिसने सभी को स्तब्ध कर दिया।
दूसरी घटना लखनऊ के ब्राइटलैंड स्कूल की है। कक्षा 6 की छात्रा ने कक्षा 1 के एक छात्र को इसलिए मार-मारकर अधमरा कर दिया कि वह स्कूल की छुट्टी चाहती थी। बच्चे पर जानलेवा हमला करते समय वह कह रही थी ‘‘तू मरेगा तभी तो स्कूल की छुट्टी होगी’’।
तीसरी घटना हरियाणा के यमुनानगर की है। यहां कक्षा 12 के एक छात्र ने प्रिसिंपल की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी। छात्र गैरहाजिरी के कारण स्कूल से निकाले जाने से नाराज था।
इनसे पूर्व भी नोएडा में भी एक किशोर ने अपनी मां व बहन की फ्लैट में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।
उपरोक्त घटनाएं इस बात का इशारा कर रही हैं कि अपराध व हिंसा की आंच भारतीय किशोरों को भी झुलसाने लगी हैं। ये घटनाएं इस बात की पोल खोल देती हैं कि महंगे और आलीशान ‘शिक्षा के मंदिर’ मासूमों के लिए कितने सुरक्षित हैं? अभिभावकों से मोटा पैसा उसूलने वाले इन ‘मंदिरों’ में बच्चों के लिए सुरक्षा इंतजाम नाकाफी हैं। और वहां कैसी शिक्षा, संस्कृति, संस्कार मिल रहे हैं? 
पहले यूरोप व अमेरिका में किशोरों द्वारा की जाने वाली हिंसा के लिए उनकी आलोचना की जाती थी। वहां के स्कूलों में या बाहर किशोरों द्वारा बड़ी संख्या में हिंसा को अंजाम दिया जाता रहता है। अमेरिका में तो ‘गन कल्चर’ इतना आम है कि वहां से आये दिन ऐसी घटनाओं की खबरें आती रहती हैं। यूरोप व अमेरिका के साम्राज्यवादी देशों में किशोरों द्वारा हिंसा को अंजाम देने की घटनाओं के पीछे ‘‘पाश्चात्य संस्कृति’’ व उपभोक्तावाद को कारण बताया जाता था। लेकिन जो यूरोप अमेरिका के लिए सच है वही आज भारतीय किशोरों के लिए भी सच हो रहा है।
जाहिर है जिस पूंजीवादी समाज में हम रह रहेे हैं वहां हिंसा, अपमान, गैरबराबरी को बोलबाला है। शासक पूंजीपति वर्ग मजूदर-मेहनतकश जनता को बल के दम पर दबा कर रखता है और उनका शोषण करता है। इस शोषण को अमली जामा पहनाने के लिए शासक वर्ग अपनी पुलिस-फौज-सरकारी मशीनरी के जरिये हिंसा करता है। शासक पूंजीपति वर्ग ही पूंजीवादी समाज में भांति-भांति के अपराधों को अंजाम देता है। और इन अपराधों में हिंसा एक प्रधान पहलू है। जब चहुंओर समाज में हिंसा-अपराध व्याप्त होता है तो उस समाज के बाल मन-किशोर भी इससे बच नहीं सकते। जो समाज की आम गति है उससे किशोर व बच्चे भी नहीं बच सकते।
भारतीय पूंजीवादी समाज के निरंतर संकट और पतन में धसते जाने की यह मुखर अभिव्यक्ति है। चैतरफा संकटों व पतन से ग्रसित भारतीय पूंजीवादी समाज बच्चों व किशोरों को इससे भिन्न कुछ दे भी नहीं सकता है।
आज समाज के क्या हाल हैं? यहां मेहनत करने के बाद भी नौकरी जैसी सफलता चंद लोगों को ही हासिल होती है। बहुसंख्यक तो असफल होने के लिए अभिशप्त हैं। सफलता के लिए गलाकाटू प्रतियोगिता ही इस पूंजीवादी समाज का नियम है। इस प्रतियोगिता में टिके रहने के लिए, सफल होने के लिए व्यक्ति खुदगर्जी की सारी हदें पार करने के लिए तैयार है। यह प्रतियोगिता व असफलता का भय कक्षा में, पढ़ाई के दौरान, परीक्षा में पास होने से लेकर नौकरी हासिल करने तक हर जगह व्याप्त है। यह प्रतियोगिता या असफलता का भय पूरे जीवन में कहीं भी समाप्त नहीं होता। पूंजीवादी समाज के इस आम चरित्र से किशोर भी नहीं बचते। असफलता का भय या गला काटू प्रतियोगिात उनके भीतर भी हिंसा को जन्म देती है।
सड़ते-गलते इस पूंजीवादी समाज में बच्चों को स्नेह, अपनत्व, दोस्ती के मूल्य व संस्कार मुश्किल से ही हासिल होते हैं। जैसे-जैसे पूंजीवादी समाज सड़ रहा है वैसे-वैसे परिवारों की भी स्थिति बद से बदत्तर हो रही है। परिवार के भीतर स्वस्थ माहौल उनको हासिल नहीं होता। परिवार के भीतर भी मां-बाप निरंतर पूंजीवाद जनित आर्थिक-सामाजिक-सांस्कृतिक दबाओं में जी रहे होते हैं। उनका तनावपूर्ण जीवन बच्चों के मन-मस्तिस्क पर विपरीत असर डालता है। परिवार में रहते हुए भी बच्चे परिवार को हासिल नहीं कर पाते। व्यक्तिवाद व अलगाव पूंजीवादी समाज में बढ़ता जा रहा है। हर कोई कहता है, ‘कोई भी किसी का अपना नहीं है’। हर कोई संदेह के दायरे में है। साथी, दोस्त कोई नहीं है, हर कोई प्रातियोगी हैं। अलगाव के शिकार ये बच्चे या तो घर की चारदीवारी में कैद हैं या ‘आाधुनिक तकनीकि से सुसज्जित’ खिलौने से खेल रहे हैं। कुछ बच्चे और हैं जो वीडियो गेम में किसी को मारने का आनंद उठाते हैं। ये घृणित पूंजीवादी बाजार द्वारा पैदा किये गये काल्पनिक चरित्रों को मार-मार कर बड़े हो रहे हैं। कई बार वे असल जीवन में भी ऐसा  कर देते हैं। हिंसा उनके मनोविज्ञान का अभिन्न हिस्सा बन जाती है। 
जैसा किशोर या बच्चों के लिए परिवार का माहौल है वैसा ही आस-पड़ोस, स्कूल या उससे जुड़ी संस्थाएं हैं। हर जगह नफा-नुकसान है। वास्तविक दोस्ती कहीं भी नहीं। उनका जीवन अभावों का अंबार है। इच्छाएं अनंत पर हासिल कुछ भी नहीं। दमित इच्छाएं ही उसे पूंजीवादी घृणित संस्कृति का आसान शिकार बनाती हैं। ‘खाओ-पिओ और मौज करो’, ‘बस अपना भला देखो’ आदि के घृणित नारे उसके जीवन-मूल्य बन जाते हैं। यह पूंजीवादी उपभोक्तावादी संस्कृति टीवी सीरियलों, विज्ञापनों, फिल्मों आदि के जरिये समाज में फैलायी जाती है। इस पूंजीवादी उपभोक्तावादी संस्कृति के जरिए एक तरफ पूंजीपति वर्ग  अपना माल बेचता है वहीं दूसरी तरफ आम जनता और खासकर किशोरों की मति को भ्रष्ट और पतित करता है। पूंजीपति वर्ग एक तीर से दो शिकार इस उपभोक्तावादी संस्कृति के जरिये करता है। इसी के साथ वह हिंसा, अश्लीलता व यौन कुंठाओं को किशोरों के मन मस्तिस्क में बैठा देता है। हिंसा के मामले में हालीवुड फिल्में व उनके द्वारा प्रसारित वीडियो गेम्स अन्य साधनों पर भारी पड़ते हैं। पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों का हिंसा का आम चरित्र इन फिल्मों-वीडियो गेम्स में अभिव्यक्त होता है। नायकों व आदर्श चरित्रों से विहीन पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया में इन फिल्मों व वीडियो गेम्स के हिंसक चरित्र ही किशोरों-बच्चों के नायक बन जाते हैं। वे इन्हीं चरित्रों में जीते हैं तथा ऐसे ही जीवन की कल्पना करते हैं। ऐसा करके पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासक अपनी व्यवस्था को दीर्घजीवी बनाते हैं। एक स्वस्थ व विवेकी मस्तिस्क के बजाए वे आम जन को एक दूसरे का दुश्मन बना देते हैं। संवेदन शून्य बना देते हैं। राजस्थान में जब चाचा एक मुस्लिम मजदूर का कुल्हाड़ी से गला काट रहा था तो 12 साल के वीडियों बनाने वाले उसके भतीजे के हाथ जरा भी नहीं कांपते।
इन सब में सोशल मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई है। आज पूरी दुनिया पहले की तुलना में ज्यादा तेजी से एक-दूसरे से जुड़ चुकी है। हिंसा व हिंसा के विचारों का प्रसार बहुत तेजी व व्यापकता से सोशल मीडिया के जरिये होता है।
समाजशास्त्री व मनोवैज्ञानिक किशोरों द्वारा की जाने वाली हिंसा के लिए परिवारों, अभिभावकों या स्कूलों को दोषी ठहराते हैं। वे कहते हैं कि पैसा कमाने की होड़ में वे अपने बच्चों को भौतिक संसाधन मुहैया कराकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। वे उन्हें अच्छा नागरिक बनने की शिक्षा नहीं देते। स्कूल भी बच्चों की काउंसलिंग नहीं करते या उनको मानवीय मूल्यों, संवेदना से लैस नहीं करते।
जहां तक स्कूलों का सवाल है तो वे आज विशुद्ध दुकानें बन चुके हैं। स्कूलों के मालिक-प्रबंधक स्वयं पूंजीपति वर्ग का हिस्सा हैं। उनका ध्येय शिक्षा या मानवीय मूल्य देना नहीं बल्कि मुनाफा कमाना है। और जहां तक परिवारों या अभिवावकों का सवाल है तो वे खुद इस पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा पीड़ित हैं। पूंजीवाद की पतनशीलता की जो मार बच्चों पर पड़ रही है वही किसी अन्य रूप में उनके अभिभावकों पर भी पड़ रही है। जो बच्चों के साथ हो रहा है वही बदले रूप में उनके अभिभावकों के साथ हो रहा है। क्षुब्ध होकर कोई कह सकता है कि जो खुद पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा बीमार किया हुआ है वह किसी और का क्या इलाज करेगा?
किशोरों द्वारा की जाने वाली हिंसा पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा की जाने वाली हिंसा का ही प्रतिरूप है। पतित होते पूंजीवादी समाज में हिंसा? घृणा व अपमान उत्तरोत्तर बढ़ता जायेगा। यह समाज के सभी अंगों को अपनी चपेट में लेता जायेगा। बाल मन भी इससे बच नहीं सकता है। किशोरों-बच्चों द्वारा की जाने वाली हिंसा की जननी स्वयं पूंजीवाद है जो अपने सभी अंगों से शोषित-उत्पीड़ित जनता पर रोज ही हिंसा को अंजाम देता है। किशोर तो मात्र इसके अन्य शिकार हैं। सड़ती-गलती इस पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त किये गये बगैर किशोरों को हिंसा करने या हिंसा का शिकार होने से नहीं बचाया जा सकता। बाल सुलभ भावनाएं, विवेक व जीवन मूल्य अब नये समाज के संघर्ष निर्माण के जरिये ही संभव हैं। नया समाज समाजवादी भारत ही हो सकता है। जहां वास्तविकता दोस्ती होगी। अलगाव नहीं होगा तथा जीवन इंसानी व वैज्ञानिक मूल्यों व विवेक से लैस होगा। हमें समाजवाद के लिए संघर्ष करने हेतु उठ खड़ा होना होगा तभी किशोरों तथा समाज को बचाया जा सकता है। यह संघर्ष भी एक नयी संस्कृति को जन्म देगा। पूंजीवादी शासक और उनकी व्यवस्था के चरित्र का खुलासा, नये समाज का संघर्ष देश के मेहनतकशों और उनके बच्चों को ऐसा इंसान बनायेगा जो नये समाजवादी भारत के निर्माण के सूत्रधार होगें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें