गुरुवार, 1 मार्च 2018

कालेज-कैंपसों में बढ़ते फासीवादी हमले और हमारी चुनौतियां

28 सितम्बर शहीद भगत सिंह के जन्म दिवस के अवसर पर आयोजित सेमिनार


28 सितम्बर का दिन महान क्रांतिकारी भगत सिंह का जन्म दिवस है। भगत सिंह का पूरा जीवन भारत की आजादी के लिए साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक रहा है। भगत सिंह द्वारा साम्राज्यवादी लूट, शोषण के साथ-साथ उनके राजनीतिक षड़यंत्रों का भी पर्दाफाश किया गया। साम्राज्यवादियों ने अपनी घृणित राजनीति द्वारा भारत में हिन्दू-मुस्लिम के बीच वैमन्स्य व साम्प्रदायिक दंगों को पैदा किया। साम्प्रदायिकता की विष वेल को अंग्रेजों द्वारा भरपूर खाद-पानी दिया गया। साम्प्रदायिकता के कारण अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने वाले मेहनतकशों की एकता को तोड़ा जाता रहा। साम्प्रदायिक राजनीति व दंगे अंगे्रजों की लूट को कायम रखने का एक अस्त्र था। इसे और अधिक विस्तृत व व्यापक बनाने के लिए हिन्दू महासभा, आरएसएस, मुस्लिम लीग जैसे संगठनों को अंग्रेजों द्वारा पाला पोसा गया।
भगत सिंह ब्रिटिश साम्राज्यवादियों की इस षडयंत्र भरी राजनीति को भली-भांति समझते थे और बार-बार साम्प्रदायिकता के खिलाफ वर्गीय एकता को कायम करने की बात कहते थे। भगत सिंह द्वारा अपने लेख में लिखा गया - 
‘‘लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग चेतना की जरूरत है। गरीब मेहनतकशों व किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूंजीपति हैं इसलिए तुम्हें इनके हथकंड़ों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़ कुछ ना करना चाहिए। संसार के सभी गरीबों के, चाहे वह किसी भी जाति, रंग, धर्म या राष्ट्र के हों अधिकार एक ही हैं तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम धर्म, रंग, नस्ल और राष्ट्रीयता व देश के भेद भाव मिटाकर एक जुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथों में लेने का प्रयत्न करो....’’    (‘‘साम्प्रदायिक दंगे और उनका इलाज’’ जून 1928 में लिखे गये लेख का अंश)
आज भगत सिंह के जन्म के एक सदी से अधिक समय बाद यदि हम साम्प्रदायिकता की समस्या को देखंे तो यह बढ़ते-बढ़ते एक बेहद गंभीर स्तर पर पहुंच चुकी है। आजादी के बाद से ही भारतीय शासकों ने अंग्रेजों के समान ही ‘फूट डालो राज करो’ के तहत साम्प्रदायिकता का भरपूर इस्तेमाल किया। जबलपुर, अलीगढ़, मेरठ, ‘गुजरात नरसंहार’ आदि सैकड़ों साम्प्रदायिक दंगे आजाद भारत में रचे गये जिसमें अब तक हजारों बेगुनाह लोग मारे गये व घायल हुए। इन दंगों के गुनाहगारों को आज तक कोई सजा नहीं हुई।
आज स्थिति पहले किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा गंभीर बन गयी है। देश के भीतर हिन्दू फासीवादी आंदोलन बड़ी तेजी से पैर पसार रहा है। इस आंदोलन की तेजी और बढ़त का एक प्रतीक 2014 में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बन जाना भी है। अम्बानी, अडानी, टाटा जैेसे एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग द्वारा आरएसएस-भाजपा जैसे फासीवादी संगठनों को दशकों से पाल-पोस कर रखा गया। परंतु लम्बे समय तक इन्होंने इस पर पूरा भरोसा नहीं किया था। वह कांग्रेस पार्टी द्वारा ही अपनी सत्ता को चला रहा था और कांग्रेस ने भी इस वर्ग की खूब सेवा की। किन्तु वर्ष 2014 आते आते वक्त बदला, हालात बदले और एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने लगभग एक मत से भाजपा पर भरोसा जताते हुए उसे शासन की बागडोर सौंप दी। यह एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग और आरएसएस का नापाक गठजोड़ का परिणाम था। सत्ता प्राप्त करने के बाद से भाजपा खुले दिल से पूंजीपति वर्ग की सेवा में जुट गयी। एक के बाद दूसरा कानून, योजनाएं बनाकर पूंजीपति वर्ग को लाभ पहुंचाने में जुट गयी। जिसके लिए उसने सारी हदें पार कर दी है। किन्तु इस दौड़-धूप के बावजूद यह वह नहीं कर पा रही है जिसकी चाहत पूंजीपति वर्ग को है। यानी आर्थिक संकट से मुक्ति।
वर्ष 2007-08 से दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं विश्व आर्थिक संकट से जूझ रही हैं। इस आर्थिक संकट के दौर में मेहनतकशों को और अधिक क्रूरता से लूटने के लिए दुनिया भर में ही दक्षिणपंथी ताकतों का उभार बढ़ा है। अमेरिका में ट्रम्प और भारत में मोदी इसके प्रतिनिधिक उदाहरण हैं। आर्थिक संकट से समाज में फैली निराशा और आक्रोश से दुनिया का पूंजीपति वर्ग भयभीत है। वर्ष 2011 में अरब विद्रोह, फ्रांस में मजदूरों की लम्बी-लम्बी हड़तालें, अफ्रीका में खान मजदूरों की कुर्बानियों से भरी हड़तालें आदि तीखे संघर्ष पिछले वर्षों में दुनिया के पटल पर छाये रहे। भारत में भी मारुति मजदूरों, बैंग्लौर में महिला मजदूरों, चाय बगानों, जूट मिलों आदि मजदूरों के ऐसे ही संघर्ष पिछले दिनों में हुए। तमाम औद्योगिक इलाकों में मजदूरों के बीच अपनी गिरती स्थिति के कारण भारी आक्रोश पनप रहा है। रोजगार ना मिलने से बेरोजगारों के भीतर भी भारी असंतोष पल रहा है। पूरी दुनिया में ही मजदूरों-मेहनतकशों के बीच छायी शांति की बर्फ धारे-धीरे टूटने के संकेत दिखाई दिये। इन संकेतों से भी दुनिया का शासक भयाक्रांत है। साथ ही वह आर्थिक संकट से निकलने के तौर पर मजदूरों-मेहनतकशों का और अधिक शोषण को ही अपना रास्ता मानता है। इसके अतिरिक्त वह कुछ और सोच व कर भी नहीं सकता है।
मजदूर-मेहनतकशों के भीषण दमन और क्रूर शोषण के लिए आज पूंजीवादी शासक अपने जनतंत्र के सारे ढकोसलों को छोड़ फासीवादी तानाशाही को एक विकल्प के तौर पर अपनाने की ओर बढ़ सकते हैं। यह एक बार फिर से साबित करता है कि जनवाद, स्वतंत्रता पूंजीवाद की सिर्फ श्रंगार की चीजें ही हैं असल में इनकी प्राण वायु मुनाफा और सिर्फ मुनाफा है और इसके लिए यह किसी भी हद तक जा सकते हैं। दुनिया के शासकों का दक्षिणपंथ की ओर ढुलकना इसी बात को सिद्ध करता है।
दुनिया की यह तस्वीर भारत की भी हकीकत है। मजदूर-मेहनतकश विरोधी क्रूर नीतियों को आगे बढ़ाने व मेहनतकशों के दमन के लिए भारतीय एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग द्वारा समाज की सबसे पिछडी़, प्रतिगामी ताकतों के साथ गठजोड़ कर लिया है। यह गठजोड़ एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग और संघ का गठजोड़ है। 2014 में आम चुनाव में भाजपा पर लुटाये गये धन और खुले तौर पर भाजपा का समर्थन, से अब कुछ छिपा नहीं है।
चुनाव जीतने के बाद एक तरफ तो भाजपा एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की सेवा में लगी है तो दूसरी तरफ वह देश को फासीवाद की ओर धकेल रही है। फासीवाद का आम तरीका है कि वह संस्कृति व शिक्षा को अपना निशाना बनाते हैं, इसमें मौजूद हर प्रगतिशील मूल्य को खत्म कर वह इसे अपने फासीवादी रंग में रंग देता है। इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। यह सचेत तौर पर असत्य, अर्धसत्य फैलाता है। ‘करिश्माई व्यक्तित्व’(महामानव) जैसे किरदारों को रचता है। जैसे हिटलर को रचा गया जैसे मोदी को रचा जा रहा है। ‘मोदी में कोई कमी नहीं है’, ‘पूरे देश में एक ही व्यक्ति ईमानदार है जो सब ठीक कर देगा’, ‘यह व्यक्ति पूरे तंत्र से, हर चीज से ऊपर है’, आदि-आदि बातों को रचकर एक फासीवादी नेता तैयार किया जा रहा हैै। 
संघ के फासीवादी आंदोलन का विरोध करने वाली आवाज को यह निर्लल्जता से कुचल डाल रहा है। दावोलकर, पानसरे, कलबुर्गी और अब गौरी लंकेश की हत्याएं इस बात के प्रमाण हैं। ये हत्याएं संघी अभियान का एक अटूट हिस्सा हैं। संघी फासीवादी राजनीति हर समय समाज में नये-नये उन्माद पैदा कर रही है, कभी लव जिहाद, कभी गौहत्या तो कभी अंधराष्ट्रवाद। और हर बार इन उन्मादों का शिकार आम जनता बन रही है। कभी अखलाक, कभी जुनैद तो कभी ऊना के दलित नौजवान।
समाज में मौजूद खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा इत्यादि विभितता को भी लगातार निशाना बनाया जा रहा है। वैज्ञानिक मूल्यों के स्थान पर धार्मिक कूपमंडूकता, अंधविश्वास को बढ़ावा दिया जा रहा है। स्त्रियों की स्वतंत्रता को बाधित करने के घृणित कृत्य किये जा रहे हैं। ब्राह्मणवादी मूल्यों को महिमामंडित कर दलित, आदिवासियों की धार्मिक मान्यताओं को कुचला जा रहा है। उनका उत्पीड़न किया जा रहा है। कुल मिलाकर जीवन के हर पहलू पर संघी मध्ययुगीन, ब्राह्मणवादी सोच थोपी जा रही है। साथ ही देश प्रेम के घृणित मापदंड रचकर लोगोें से देशभक्ति की प्रमाणिकता देने के लिए उनका उत्पीड़न किया जा रहा है। समाज में मौजूद सीमित जनवाद, निजी किस्म की स्वतंत्रता पर भी मध्ययुगीन मूल्य थोपे जा रहे हैं। सीमित जनवाद का भी गला घोटा जा रहा है। यह सब कुछ करने के लिए विषवेल जैेसा फैला आरएसएस का संगठन, मीडिया, सरकार ऐड़ी-चोटी का जोर लगाये हुए हैं। 
संघी फासीवाद का शिक्षा व संस्कृति पर हमला हम प्रत्यक्ष तौर पर कालेज-कैंपसों में देख सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों से देश के तमाम कालेज इन्हीं वजहों से सुर्खियों में रहे हैं। कालेज-कैंपसों, शिक्षा को संघ अपने अभियान का एक प्रमुख केन्द्र बनाये हुए हैं। शिक्षा में अवैज्ञानिक, अतार्किक बातों की भरमार तो पहले से ही थी अब तेजी से इसे भगवा रंग में रंगा जा रहा है। पाठ्यक्रमों से चुन-चुन कर प्रगतिशील, वैज्ञानिक सोच के विचारों को हटाकर सामंती, अवैज्ञानिक मूल्यों को भरा जा रहा है। जो सांप्रदायिकता से भरी शिक्षा अब तक आरएसएस द्वारा संचालित स्कूलों में दी जाती थी वह अब सरकार के जोर से सरकारी स्कूलों में दी जा रही है। 
दीनानाथ बत्रा जो कि आरएसएस के ‘विद्या भारती’ स्कूल के नेटवर्क में महासचिव रहे हैं; की कूपमंडूकता से भरी किताबें गुजरात, हरियाणा, मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूलों में अनिवार्य कर दी गयी हैं। इनकी किताबें हिन्दू पौराणिक पात्रों को वास्तविक पात्रों मेें बदल देती हैं। तमाम आधुनिक चिकित्सीय पद्धतियों (सर्जरी, स्टैम सैल आदि) को भारतीय दंत कथाओं से जोड़ दिया है। जैसे बत्रा द्वारा बेहद अवैज्ञानिक ढंग से कहा गया कि महाभारत काल में गांधारी द्वारा सौ पुत्रों को जन्म स्टैम सैल द्वारा ही दिया गया। 
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा रामायण, महाभारत को पाठ्यक्रमों में शामिल कर दिया गया और सूर्य नमस्कार को अनिवार्य कर दिया गया। इसी तरह के बदलाव राजस्थान व अन्य स्थानों पर भी जोर-शोर से किये जा रहे हैं। एक होड़ सी लगी है कि कौन सबसे ज्यादा अतार्किक, कूपमंडूक बातों को कर सकता है। उसे दूसरों पर थोप सकता है। हमारे प्रधानमंत्री जी भी इसी होड़ में लगे हैं। मुबंई में रिलाइंस अस्पताल के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा गणेश के सर पर हाथी का सर लगाने की सर्जरी को प्लास्टिक सर्जरी कहा गया। 
शिक्षा, शोध से जुड़े तमाम महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति की योग्यता आरएसएस से जुड़ा होना बन गयी है। चुन-चुन कर आरएसएस से या उसकी विचारधारा से जुड़े लोगों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जा रहा है। ताकि शिक्षा के भगवाकरण का अभियान जोरशोर से चलाया जा सके। वाई.एस. राव-चेयरमैन इंडियन काउंसिल फार हिस्टोरिकल रिसर्च, गजेन्द्र चैहान-चेयरमैन एफटीआईआई, लोकेश चंद्रा-अध्यक्ष इंडियन काउसिल फाॅर कल्चर रिलेशन, विश्राम जमदार-चैयरमैन एनआईटी नागपुर, आदि, आदि। इन सभी लोगों की प्रमुख योग्यता आरएसएस से सीधे जुड़ा होना या उसकी विचारधारा के गहरे प्रभाव में होना है।
शिक्षा व शोध संस्थानों में अपनी सोच के लोगों को बैठाने, पाठ्यक्रमों का भगवाकरण करने और कालेजों से जनवादी माहौल को बेहद सीमित कर देने का अभियान तेजी से चल रहा है। इस अभियान के खिलाफ तमाम जगहों पर छात्र-शिक्षकों के तीखे विरोध भी पिछले दिनों हुए हैं। 2014 के बाद यदि कुछ महत्वपूर्ण कैम्पसों को देखंे तो वह दक्षिणपंथी ताकतों का हमला और उसके प्रतिकार के गवाह बने हैं।
जेएनयू अपनी आजाद सोच के कारण हमेशा से ही संघी दुष्प्रचार के हमलों का निशाना रहा है। जेएनयू के बारे में भाजपा-संघ के बड़े-बडे़ नेता गली-मुहल्ले के छिछोरों की तरह भड़ास निकालते रहे हैं। 2014 के बाद यह और भी घटिया स्तर पर पहुंच गया। छद्म राष्ट्रवादियों द्वारा राष्ट्रवाद की बहस को खड़ा कर जेएनयू छात्रों को देशद्रोही करार दे दिया गया। जेएनयू में संघी हमलों का अभियान बदस्तूर जारी है। संघी छद्म राष्ट्रवादियों का राष्ट्रवाद ना तो साम्राज्यवाद विरोधी है ना ही सामंतवाद विरोधी। इनका राष्ट्रवाद साम्राज्यवाद की गोद में बैठकर मध्ययुगीन सामंती विचारों से भरा पड़ा है। निश्चित है इस किस्म का राष्ट्रवाद बेहद प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद ही हो सकता है। इस राष्ट्रवाद की आड़ में विभिन्न राष्ट्रीयताओं, दलितों, आदिवासियों, मजदूर-मेहनतकशों, अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न ही किया जा रहा है।
दिल्ली वि.वि. में अंग्रेजी विभाग द्वारा आयोजित सेमिनार में तोड़-फोड़ और हरियाणा में महाश्वेता देवी के नाटक के मंचन रोकने के दौरान संघी लम्पटों द्वारा तोड़-फोड़ की गयी। यही नहीं कालेज में साम्प्रदायिकता पर बनी डाक्यूमैन्ट्री ‘मुजफ्फरनगर अभी बाकी है’ के प्रदर्शन को जबरन रोक दिया गया। संघ के अनुषांगिक संगठनों द्वारा कालेज कैम्पसों में तमाम मौकों पर प्रगतिशील नाटकों, सभा, आंदोलनों में तोड़-फोड़ की जा रही है। कालेज कैम्पसों में छात्रों व छात्र संगठनों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बार-बार ये लम्पट कुचल रहे हैं। गुलमेहर कौर जैसी छात्रा जिसने अपने विचार पोस्टरों से जाहिर किये, यह सब भी इन संघी ताकतों को बर्दाश्त नहीं हुआ और उस छात्रा को बदनाम करने के लिए यह बेहद ओछी हरकतों पर उतर आये।
इससे पूर्व एफटीआईआई के निदेशक पद पर गजेन्द्र चैहान की नियुक्ति को लेकर लम्बा आंदोलन छात्रों द्वारा चलाया गया। हैदराबाद वि.वि. में ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्षरत छात्रों का क्रूर उत्पीड़न संघी लम्पट संगठनों, कालेज प्रशासन व भाजपा नेताओं द्वारा किया गया। इनके उत्पीड़न से तंग आकर एक छात्र रोहित वेमुला आत्महत्या को मजबूर हुआ। रोहित वेमुला की आत्महत्या पर छात्रों द्वारा बेहद रोष व्यक्त किया गया। छात्रों व इंसाफ पसंद लोगों द्वारा इस दुःखद घटना पर तमाम जगहों पर विरोध प्रदर्शन किये गये।
कालेज कैम्पसों पर संघी हमलों के ये चंद उदाहरण हैं। इन्हीं से मिलते जुलते हमले अन्य वि.वि. पर भी किये गये। जादवपुर वि.वि., इलाहाबाद वि.वि., बनारस वि.वि., जामिया मिलिया वि.वि. आदि जगहों पर भी संघ का फासीवादी अभियान के दौरान छात्र-शिक्षकों का उत्पीड़न किया गया। बरेली में तो शहीद उधम सिंह की शहादत को याद करते हुए पछास व प्रगतिशील सांस्कृतिक मंच द्वारा लगायी गयी पोस्टर प्रदर्शनी को संघी लम्पटों द्वारा फाड़ दिया गया। कुल मिलाकर हर जगह अभिव्यक्ति की आजादी को बेहद निर्मम ढंग से कुचला जा रहा है।
संघ की फासीवादी विचारधारा हर प्रगतिशील जनवादी मूल्यों के खिलाफ है। यह मजदूरों-मेहनतकशों के खिलाफ है। यह अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, महिलाओं के खिलाफ है। यह ज्ञान-विज्ञान, जीवन के खिलाफ है। संघ की फासीवादी विचारधारा अपने मूल में एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की नंगी तानाशाही है। जिसके तहत पूंजीपति वर्ग अपने शासन को जबरन समाज में थोपता है। इसीलिए तमाम पूंजीवादी पार्टियां संघ के फासीवाद के खिलाफ कोई चुनौती पेश नहीं कर सकती हैं। इन्हें तो बस इस बात का मलाल रहता है कि यदि पूंजीपति वर्ग उन पर भरोसा करता तो वह इससे ज्यादा क्रूर, भयानक तरीके से नंगी तानाशाही को कायम करते। कांग्रेस पार्टी आपातकाल के दौरान यह सिद्ध भी कर चुकी है।
तमाम क्षेत्रीय पार्टियां जो संघी फासीवादी आंदोलन से एक हद तक प्रभावित हैं। क्योंकि इनका आधार क्षेत्रीय पूंजीपति वर्ग है और यह वर्ग भी अपना जनवाद सीमित होता महसूस करता है। किन्तु यह पार्टियां भी पूंजीवाद से बाहर नहीं सोच सकतीं। इनका स्वर्ग भी इसी पूंजीवाद में है। इसीलिए यह अपने को मरियल विरोध तक ही सीमित रखती हैं। यह अपने लिए कुछ छूट या रहम चाहती हैं। जितनी छूट व रहम इन्हें मिलती है उतना यह भी इनके साथ गठजोड़ कायम कर लेती हैं। मजदूर क्रांति की राह त्याग चुकी पार्टियों का फासीवादी आंदोलन का विरोध भी रस्मी ही है। क्रांति की राह त्याग देने के कारण यह फासीवाद का मुकम्मल विरोध और खात्मा करने में सर्वथा अक्षम हैं।
फासीवादी आंदोलन का यदि कोई सच्चे अर्थों में मुकाबला कर सकता है, इसे अजायबघर की वस्तु बना सकता है तो वह है देश का मजदूर-मेहनतकश वर्ग। यही वर्ग फासीवाद की नंगी तानाशाही जो कि अपने आप में पूंजीपति वर्ग की ही नंगी तानाशाही है, से सबसे ज्यादा शोषित उत्पीड़ित है। छात्र-नौजवान जो कि अधिकांशतः मजदूर-मेहनतकश परिवारों के ही हिस्से हैं और भविष्य के मजदूर-मेहनतकश हैं। इनका फासीवादी आंदोलन के खिलाफ संघर्ष मजदूर-मेहनतकशों के संघर्षों से अटूट रूप से जुड़ा है।
छात्र नौजवान पूंजीवादी व्यवस्था में पढ़-लिखकर बेरोजगार घूमने को मजबूर हैं। पूंजीवादी व्यवस्था का संकट बेरोजगारी की समस्या  को और विकराल बना रहा है। छात्र कालेज मंे पढ़ते हुए अब तक मिले सीमित जनवाद को भी अपनी आंखों के सामने खोता देख रहा है। बेरोजगारी से पैदा हुई अनिश्चतता और बोलने की आजादी पर प्रतिबंध छात्रों को देर सबेर संघी फासीवादी आंदोलन के खिलाफ एक जुझारू योद्धा बनायेगी। इसके भू्रण आज भी हम अपने कालेज कैम्पसों में साफ-साफ देख रहे हैं।
देश के अल्पसंख्यक, दलित, महिलाएं और इंसाफ पंसद लोग संघ की साम्प्रदायिक व सामंती सोच के कारण बेहद असुरक्षा में जीने को मजबूर हो रहे हैं। तमाम तरह से इन पर संघी मंडली हमलावर है। फिलहाल रक्षात्मक मुद्रा में किन्तु देर सबेर इससे बाहर निकल कर समाज के हिस्से फासीवादी आंदोलन के खिलाफ एक मजबूत सहयोगी बनेंगे।
एक बेहद जरूरी किन्तु अदृश्य ताकत है जो संघी फासीवादी आंदोलन के खिलाफ खड़ी है। वह है भारत की क्रांतिकारी विरासत। संघी फासीवादियों के पास ऐसी कोई विरासत नहीं है। संघ इस विरासत से पूरी तरह महरूम है। पौराणिक पात्रों या सामंती हिन्दू शासकों से यह अपने को समाज में स्थापित व आदर्शीकृत करने की नाहक कोशिश करता रहता है। इनके आदर्श हैं हिटलर, मुसोलिनी जैसे लोग किन्तु मजबूरी यह है कि इन बदनाम शख्शों को वह खुले तौर पर नहीं स्वीकार सकते हैं।
संघ के बरक्स हमारी क्रांतिकारी विरासत हमारे साथ खड़ी है। जिससे हम हर पल प्रेरणा पाते हैं। संघी फासीवादी ताकतों जैसी तमाम ताकतों को हमारी क्रांतिकारी विरासत ने बार-बार परास्त किया और मानवीय मूल्यों को जिन्दा रखा, उन्हें आगे बढ़ाया है। आज वक्त ने एक बार फिर हमारे सामने एक शत्रु लाकर खड़ा कर दिया है। ऐसे वक्त में हमें शहीद भगत सिंह व पूरी क्रांतिकारी विरासत को याद करते हुए उनके द्वारा जलाई गयी मशाल को थामने की जरूरत है। यह मशाल अंधेरी रात में हमारी राह रौशन करेगी। संघर्षों के नये कीर्तिमान रचकर ही हम भगत सिंह व क्रांतिकारी विरासत के सच्चे हकदार होंगे।
दिनांकः- 28 सितम्बर 2017
परिवर्तनकामी छात्र संगठन (पछास)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें