गुरुवार, 1 मार्च 2018

तेलंगाना और आंध्रप्रदेश में आत्महत्या करते छात्र

संयुक्ता ने इस साल 12 वीं की परीक्षा में 95 फीसदी अंक हासिल किए थे। उसका सपना डाॅक्टर बनने का था। इसीलिए उसने हैदराबाद के एक नामी कोचिंग सेन्टर में दाखिला ले लिया। मेडिकल की परीक्षा के लिए भी वो खूब मेहनत कर रही थी। लेकिन 16 अक्टूबर को अचानक उसने आत्महत्या कर ली। उसने एक सुसाइड नोट भी लिखा, जिसमें उसने मेडिकल की पढ़ाई में खुद को नाकाबिल मानते हुए ऐसा कदम उठाने की बात लिखी।
संयुक्ता अकेली नहीं है। पिछले 60 दिनों में आंध्रा और तेलंगाना की कोचिंगों में तैयारी करने वाले 50 से अधिक छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। आत्महत्याओं के बाद से सरकार, कोचिंगों और मां-बाप द्वारा छात्रों पर डाले जा रहे दबाव को आत्महत्या का कारण मानते हुए कोचिंग संस्थानों के लिए नए कानून बना रही है तो मां-बाप को सलाह देने का काम कर रही है। पिछले साल कोटा (राजस्थान) में भी छात्रों की आत्महत्याओं की कई घटनाएं हुयी। उसके बाद भी इसी तरह के नीम-हकीमी नुस्खे आजमाए गए। इनमें से कोई भी भारत में तेजी से बढ़ती छात्रों की आत्महत्याओं को नहीं रोक पाया।
दरअसल इन आत्महत्याओं की जड़ में गलाकाटू पूंजीवादी प्रतियोगिता और रोजगार का संकट काम कर रहा है। तेजी से घटते रोजगार के अवसर और चुनिन्दा नौकरियों के लिए जबर्दस्त मार-काट  भय का माहौल पैदा करती है, जिसमें आज के छात्र जी रहे हैं। जब तक यह माहौल नहीं बदला जाता तब तक सारे ही उपाय दर्द को तो कम कर सकते हैं परंतु रोग को नहीं खत्म कर सकते।

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