सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

गोरखालैण्ड की मांग, संघर्ष और दमन

-कैलाश

        पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 3 जून, 2017 को बांग्ला भाषा की अनिवार्यता का फैसला लिया। इसके बाद से बंगाल के उत्तरी हिस्से (पहाड़ी) में इस फैसले का विरोध शुरू हो गया। इसके साथ ही अलग गोरखालैण्ड की मांग एक बार फिर से होनी शुरू हो गयी। देश में 50 के दशक से ही अलग राज्य की मांग रही है। जो आज फिर से आंदोलनों, प्रदर्शनों, बंद आदि के रूप में प्रकट है।
 
        अलग गोरखालैण्ड की मांग करने वाले लोगों की अपनी भाषा बांग्ला नहीं है। अपने खान-पान, रहन-सहन, संस्कृति के मामले में भी इनमें बंगाली लोगों से भिन्नता है। यानी राष्ट्रीयता के अपने विशिष्ट गुणों से संपन्न है गोरखालैण्ड का यह क्षेत्र। ऐसे में बांग्ला भाषा की अनिवार्यता गोरखाओं की अस्मिता एवं पहचान पर हमला था। भारत में भाषायी उत्पीड़न की एक बड़ी समस्या रही है। कभी यह हिन्दी-अंग्रेजी की अनिवार्यता के रूप में अभिव्यक्त होता है तो कभी क्षेत्रीय भाषाओं को दबाने के रूप में। यह सब तब है जब देश में भाषा की अनिवार्यता के खिलाफ तीखा संघर्ष रहा है। इसके अलावा गोरखा लोगों को एक तखलीफ यह भी है कि उन्हें बाहर जाने पर विदेशी (नेपाली) समझा जाता है।

        गोरखा लोग मूलतः नेपाल से आये लोग हैं। अठारवीं-उन्नीसवीं सदी में गोरखा शासकों का शासन क्षेत्र उच्च हिमालयी क्षेत्रों की नेपाल-भारत सीमाओं तक फैला था। हिमांचल, उत्तराखण्ड से लेकर सिक्किम तक इनका शासन था। 1780 में सिक्किम से दार्जिलिंग को जीतने के बाद यहां भी गोरखा निवासित हो गये। अंग्रेजों के यहां पहुंचने पर 1816 में गोरखाओं का शासन खत्म हुआ। 1947 में भारत की आजादी के बाद यह पश्चिम बंगाल का हिस्सा बना दिया गया। 1955 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से अखिल भारतीय गोरखा लीग ने बंगाल से अलग होने की मांग उठायी। 1955 में ही जिला मजदूर संघ ने राज्य पुनर्गठन समिति को दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी, कूचविहार को मिलाकर एक अलग राज्य की मांग की। परंतु, तब इस पर सरकार ने कोई निर्णय नहीं लिया और इस मामले को टाल दिया। 

        1980 के दशक में गोरखालैण्ड की यह मांग उग्र तेवरों के साथ ही उठी। गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में यह संघर्ष चला। इन संघर्षों में 1985 से 1988 के बीच कई लोग मारे गये। तब तत्कालीन वाममोर्चा सरकार के साथ एक समझौते के तहत दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन किया गया। इस समझौते ने अलग राज्य के इस संघर्ष को ठण्डा कर दिया और गोरखाओं को कुछ विशिष्ट अधिकार प्राप्त हुए। गोरखा प्रतिनिधियों की प्रशासन-सरकार में कुछ सीटें निश्चित कर दी गयीं। 2008 से विमल गुरंग गोरखा आंदोलन का नेतृत्व संभाले हुए हैं। मौजूदा आंदोलन के कारणों के बारे में बात रखते हुए विमल गुरंग ने कहा, ‘‘गोरखालैण्ड टैरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन को समझौते के तहत विभाग नहीं सौंपे गये। पांच साल बीतने के बावजूद न तो पूरा अधिकार मिला और न ही पैसा। राज्य सरकार ने हमें खुल कर काम ही नहीं करने दिया । ऊपर से जबरन बांग्ला भाषा थोप दी।’’ 

        मौजूदा आंदोलन से निपटने के लिए सरकार दमन का सहारा ले रही है। जहां ममता बनर्जी साफ तौर पर अलग राज्य के निर्माण के खिलाफ खड़ी हैं। वहीं जब-जब ममता बनर्जी ने केन्द्र सरकार से अर्द्धसैनिक बलों की मांग की, वह पूरी की गयी। इसके अलावा केन्द्र सरकार ने इस मुद्दे पर चुप्पी साधी हुयी है। ममजा बनर्जी व भाजपा एवं अन्य राजनीतिक दलों के लिए मुख्य मुद्दा बंगाल में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव हैं। भाजपा बहुसंख्यक बंगाली जनों की इच्छा का ख्याल रखते हुए गोरखालैण्ड का मुखर समर्थन नहीं कर रही है। हालांकि पिछले कई बार से वहां से भाजपा इसी आधार पर जीतती रही है कि वह छोटे राज्यों की पक्षधर है। दार्जिलिंग जून माह से ही प्रदर्शनों, पुलिस-अर्द्धसैनिक बलों से झड़प का केन्द्र बना हुआ है। अभी भी संघर्ष जारी है।

        गोरखालैण्ड की मांग का मुख्य नेतृत्वकारी वर्ग वहां का पूंजीपति व मध्यम वर्ग है। जनता के संघर्ष में उतरने की मुख्य वजह उनका गिरता जीवन-स्तर, बेरोजगारी आदि भी है। परंतु वहां का पूंजीपति वर्ग इसे केवल गोरखा अस्मिता का प्रश्न बना देना चाहता है। सन 2000 में बने छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड व झारखण्ड राज्य भी अपनी अस्मिता और विकास के नारे के साथ अस्तित्व में आये। परंतु आज भी वहां की मेहनतकश जनता के जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया है। हां, आज उनका संघर्ष फिर किसी नए राज्य के निर्माण का नहीं वरन पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष है। गोरखालैण्ड की मांग के लिए संघर्षरत जनता का संघर्ष न्यायसंगत व जनवादी होने के बावजूद उनको साफ यह समझ लेना होगा कि अलग राज्य उनके जीवन और हालात नहीं बदलने वाला। उन्हें आगे भी संघर्ष करना होगा। पूंजीवाद की आम गति ही असमान विकास की होती है। इसे जहां आज वे बंगाल का हिस्सा होते हुए महसूस करते हैं वही अलग गोरखालैण्ड में भी वह मौजूद रहेगी। पूंजीवादी असमान विकास के खिलाफ उनका संघर्ष जारी रहेगा। 

        पूंजीवाद के असमान विकास की समस्या से केवल समाजवादी क्रांति और समाजवादी राजसत्ता के निर्माण से ही मुक्ति हासिल की जा सकती है। यह पूरे देश के स्तर पर ही संभव है। गोरखालैण्ड के निर्माण से वहां भी मेहनतकश जनता के लिए पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष प्रमुखता हासिल कर लेगा। लेकिन हाल-फिलहाल केन्द्र व राज्य सरकारों का रुख गोरखालैण्ड की मांग को पूरा करने का नहीं है। गोरखालैण्ड की मांग का यह संघर्ष जारी रहने की ही संभावना है।

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