-शाकिर
धार्मिक लोगों का मानना होता है कि जो लोग धर्म और ईश्वर में विश्वास नहीं करते (यानि आम भाषा में नास्तिक) वे नैतिक नहीं हो सकते। वे हमेशा अनैतिक होंगे और अनैतिक कार्यों में लिप्त होंगे। वे ‘खाओ-पीओ, मौज करो’ के हिसाब से जीवन जियेंगे और किसी भी ऊंचे आदर्शों में विश्वास के अयोग्य होगें। वे अधम होंगे। नास्तिकों की अनैतिकता के बारे में यह धारणा इतनी पक्की है कि यूनान और भारत दोनों के नास्तिक दर्शन (क्रमशः एपीक्यूरस और चार्वाक दर्शन) के बारे में आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि वे ‘खाओ-पीओ, मौज करो’ की वकालत करते हैं। चार्वाक दर्शन के बारे में घृणापूर्वक यह कहा जाता रहा है कि वह ‘ऋणं कृत्वा, घृतं पीबेत’ यानि कर्ज लेकर घी पीने की शिक्षा देता है।
धार्मिक लोगों की नजर में नास्तिक इसलिए नैतिक जीवन नहीं जी सकता कि धर्म और ईश्वर ही नैतिकता का आधार है। यह आधार खत्म होते ही व्यक्ति अनैतिक आचरण करने के लिए स्वच्छंद हो जाता है। न तो उसे किसी का भय होेता है और न कोई बाधा उसे रोकती है। आज के भारतीय धार्मिक की राय में पश्चिम के लोग इसीलिए पतित और अनैतिक जीवन जी रहे हैं कि वहां धर्म और ईश्वर में आस्था बहुत कम हो गयी है।
लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या पश्चिम के लोग भारतीयों के मुकाबले ज्यादा अनैतिक जीवन जी रहे हैं? क्या भारतीय ज्यादा नैतिक हैं? क्या आस्तिक लोग नास्तिकों से ज्यादा नैतिक होते हैं? क्या वास्तव में नैतिकता का आधार धर्म और ईश्वर होता है? क्या मानव इतिहास में धर्म और ईश्वर की ईजाद के पहले लोग नैतिक जीवन नहीं जीते थे? आखिर नैतिकता का आधार क्या है? क्या कोई शाश्वत नैतिकता होती है? मनुष्य क्यों किसी नैतिकता पर चलेगा? यदि कोई शाश्वत नैतिकता है भी तो इंसान उस पर क्यों चलेगा?
धार्मिक लोगों की नजर में नास्तिक इसलिए नैतिक जीवन नहीं जी सकता कि धर्म और ईश्वर ही नैतिकता का आधार है। यह आधार खत्म होते ही व्यक्ति अनैतिक आचरण करने के लिए स्वच्छंद हो जाता है। न तो उसे किसी का भय होेता है और न कोई बाधा उसे रोकती है। आज के भारतीय धार्मिक की राय में पश्चिम के लोग इसीलिए पतित और अनैतिक जीवन जी रहे हैं कि वहां धर्म और ईश्वर में आस्था बहुत कम हो गयी है।
लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या पश्चिम के लोग भारतीयों के मुकाबले ज्यादा अनैतिक जीवन जी रहे हैं? क्या भारतीय ज्यादा नैतिक हैं? क्या आस्तिक लोग नास्तिकों से ज्यादा नैतिक होते हैं? क्या वास्तव में नैतिकता का आधार धर्म और ईश्वर होता है? क्या मानव इतिहास में धर्म और ईश्वर की ईजाद के पहले लोग नैतिक जीवन नहीं जीते थे? आखिर नैतिकता का आधार क्या है? क्या कोई शाश्वत नैतिकता होती है? मनुष्य क्यों किसी नैतिकता पर चलेगा? यदि कोई शाश्वत नैतिकता है भी तो इंसान उस पर क्यों चलेगा?
नैतिकता का सवाल दर्शन का एक प्रमुख सवाल रहा है। दर्शन की हर प्रमुख शाखा ने नैतिकता का अपना सिद्धान्त पेश किया है। अक्सर तो देखने में ऐसा लगता है मानो प्रकृति, ज्ञान, ईश्वर इत्यादि के बारे में दर्शन की सारी बातें नैतिकता का कोई खास सिद्धान्त पेश करने के लिए की गयी होती हैं। इतना तो तय है कि हर दार्शनिक शाखा का नैतिकता का सिद्धान्त उसके आम दार्शनिक सिद्धान्तों का प्रतिफलन होता है।
यह स्वाभाविक ही है कि अमूर्त से अमूर्त दार्शनिक सिद्धान्त के दार्शनिक के लिए भी ठोस सवाल यही होता है इंसान और इंसानी समाज सबसे अच्छा जीवन कैसे जिये? यदि वर्तमान जीवन अच्छा नहीं है तो उसे अच्छा कैसे बनाया जाये? यह देखते हुए कि दुनिया भर में दर्शन वर्गीय समाज की उच्चतर अवस्था में अस्तित्व में आया, ये सवाल और भी स्वाभाविक थे क्योंकि वर्गीय समाज हर तरह के दुःख और कष्ट से भरा होता है, उसमें भांति-भांति के अन्याय-अत्याचार होते हैं। इस तरह नैतिकता का सवाल (समाज की राजनीतिक व्यवस्था के साथ-साथ) प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर दर्शन के मूल में है। यूनानी दर्शन में तो यह एकदम ही स्पष्ट था क्योंकि तब तक वहां ईश्वर की कोई धारणा नहीं थी और वहां का धर्म देवी-देवताओं वाला कबीलाई धर्म का जारी रूप ही था।
नैतिकता के सवाल को जब दार्शनिक तौर पर उठाया जाता है तो यह प्रमुखतः तीन सवालों में विभक्त हो जाता है। पहला, क्या इंसानी नैतिकता का कोई अपना वस्तुगत आधार है या वह इंसान पर ही आधारित है? यदि वह इंसान पर आधारित है तो भी उसका आधार क्या है? क्या तर्क और भावनाएं? या कुछ और? दूसरा, क्या कुछ शाश्वत नैतिक सिद्धान्त होते हैं या नैतिकता हमेशा सापेक्षिक होती है? तीसरा, यदि कुछ नैतिक सिद्धान्त होते भी हैं तो इंसान उस पर क्यों चलेगा? वह क्यों अनैतिकता के रास्ते पर नहीं चलेगा?
पहले पश्चिमी दर्शन की बात करें।
यूनान में नैतिकता के बारे में जोरदार ढंग से बातें सबसे पहले ज्ञानवादियों या सोफिस्टों ने कीं। ये ज्ञानवादी यूनानी अभिजातों के युवाओं को शिक्षा देते थे जिससे वे बाद में शासन करने लायक बन सकें। ज्ञानवादियों ने कहा कि हर किसी की अपनी नैतिकता होती है यानि नैतिकता व्यक्ति सापेक्ष होती है। जिसे जो ठीक लगता है वह करे। नैतिकता का उनका यह सिद्धान्त ज्ञान की उनकी इस सामान्य धारणा से निकला था कि ज्ञान व्यक्ति सापेक्ष होता है। यह किसी भी तरह सत्ता हथियाने के अभिजातों की कोशिशों के भी अनुकूल था।
सुकरात ने ज्ञानवादियों की इन बातों पर सवाल उठाया। उसने पूछा कि किसी व्यक्ति के लिए कोई चीज ठीक क्यों है? तर्क-वितर्क करते हुए उसने जवाब दिया कि कोई आचरण किसी व्यक्ति के लिए तभी ठीक होगा यदि वह ज्ञान पर आधारित हो। अपने बारे में ज्ञान व्यक्ति को सद्गुणों तक पहुंचाता है और व्यक्ति उन सद्गुणों के हिसाब से जीवन जीता है। यदि कोई सद्गुणों के हिसाब से जीवन नहीं जी रहा है तो इसीलिए कि उसे ज्ञान नहीं है। स्वयं अपने बारे में सुकरात ने कहा कि सद्गुण क्या हैं उसे पता नहीं क्योंकि वह ज्ञानी नहीं है। वह ज्ञान की तलाश में है और इसीलिए हर किसी से सवाल-जवाब करता रहता है। असल में सुकरात का उद्देश्य सवाल-जवाब के जरिये पुरानी आस्थाओं पर सवाल खड़ा करना था।
सुकरात के शिष्य प्लेटो ने नैतिकता का अपना सिद्धान्त पेश किया। इंसानी जीवन का उद्देश्य खुशी या भला जीवन है। और यह भला जीवन तभी जिया जा सकता है जब उस नैतिकता पर चला जाये जो अच्छाई के फार्म (फार्म आव गुड) पर आधारित हो। उसके अनुसार सुन्दरता और न्याय (या अन्य चीजों) की तरह अच्छाई का भी अमूर्त-आदर्श रूप कहीं मौजूद है। इंसानी जीवन की सारी अच्छाईयां उसकी अनुकृति हैं। इस अच्छाई को जानने और उसे अपनाने से ही इंसान का जीवन भला हो सकता है। इस तरह प्लेटो नैतिकता के किसी वस्तुगत आधार को स्वीकार करता था जो इंसान से स्वतंत्र था। ध्यान रखने की बात है कि यह आधार ईश्वर नहीं है। ठोस तौर पर प्लेटो ने बौद्धिक जीवन जीने वाले समाज के संचालकों के जीवन को सबसे श्रेष्ठ जीवन माना जो शारीरिक जरूरतों और भावनाओं को निश्चित सीमा में रखते हुए तर्कपूर्ण जीवन जीते हैं। प्लेटो का नैतिकता का सिद्धान्त भी उसके आम दर्शन के अनुरूप था जिसमें हर चीज का ‘फार्म’ प्रमुख चीज है। या यूं भी कह सकते हैं कि नैतिकता के इस सिद्धान्त को प्रस्तुत करने के लिए ही वह उन दार्शनिक सिद्धान्तों तक पहुंचा था।
अरस्तू ने भी भला जीवन को लक्ष्य माना। उसने भी बौद्धिक-तर्कपूर्ण जीवन को सर्वश्रेष्ठ माना। पर वह नैतिकता का आधार इंसान से परे न मानकर इंसान में ही देखता था। उसके अनुसार हर चीज के होने का कोई अंतिम कारण या लक्ष्य होता है। इंसानी जीवन का लक्ष्य है तर्कपूर्ण जीवन। तर्क ही इंसान की खासियत है। इसीलिए इसके हिसाब से जीवन जीना उसकी प्रकृति के हिसाब से जीवन जीना होगा। अरस्तू के लिए भी इंसानी नैतिकता का एक वस्तुगत आधार है पर यह इंसान से बाहर न होकर इंसान मंे ही है। यह है इंसान की मूलभूत प्रकृति यानी तर्कबुद्धि। ठोस तौर पर अरस्तू का कहना था कि अति पर चलने के बदले बीच में चलना ही तर्कसंगत और सही है। न तो डरपोक होना चाहिए, न ही दुस्साहसी। न तो सन्यासी होना चाहिए, न ही भोग-विलासी। अरस्तू का नैतिकता का सिद्धान्त भी उसके आम दार्शनिक सिद्धान्त से निकला था जिसमें हर चीज के होने के चार कारण होते हैं। चीज का उद्देश्य चैथा कारण है। यह गौर करने की बात है कि अरस्तू और प्लेटो दोनों ने शासक वर्गीय दार्शनिकों के जीवन को सर्वश्रेष्ठ कहा।
यूनानी दर्शन के एपीक्यूरस से पहले की चर्चा हो चुकी है। यह असल में भोगियों और विलासियों का दर्शन नहीं था। एपीक्यूरस का कहना था कि जीवन का उद्देश्य आनन्द होना चाहिए। इसीलिए आनन्द को बढ़ाना चाहिए और कष्ट को कम करना चाहिए। पर यहां एपीक्यूरस का आशय ‘खाने-पीने और मौज करने’ के आनन्द से नहीं था बल्कि ऊंचे स्तर के आनन्द से था। एपीक्यूरस का कहना था कि छिछले आनन्द से तो अंत में कष्ट ही होता है। एपीक्यूरस खास तौर पर दोस्ती और भाई-चारे के सामूहिक जीवन पर जोर देता था। एपीक्यूरस असल में वर्गीय समाज के समुद्र में सामूहिकता का द्वीप बना रहा था जिससे वर्गीय समाज के कष्टों से बचा जा सके।
लगभग इसी समय का स्टोइक दर्शन ‘सम्पत्तौ या विपत्तौ, महताम एकरूपता’ (दुःख-सुख में एक समान) के सिद्धान्त पर चलता था। इसका कहना था कि सुख और दुःख को एक रूप में ही लेना चाहिए। न सुख से खुश होना चाहिए और न दुःख से परेशान। यदि इंसान तर्कपूर्ण ढंग से विचार करेगा तो वह सुख और दुःख दोनों की सीमाओं को समझ जायेगा। वह उनसे ऊपर उठ जायेेगा। स्टोइकों के लिए सुख-दुःख से ऊपर तर्कपूर्ण जीवन ही सर्वश्रेष्ठ था। स्टोइक यह मानते थे कि तर्कबुद्धि हर इंसान की खासियत है। इस तरह वे हर इंसान को बराबर मानकर चलते थे चाहे वह गुलाम हो या गुलामों का मालिक। इस स्टोइक दर्शन ने बाद में ईसाई दर्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ईसाई दार्शनिकों में सन्त अगस्टीन भी प्लेटो या अरस्तू की तरह खुशी का जीवन या भला जीवन नैतिकता का लक्ष्य मानता था। पर यहां तक तर्क के आधार पर नहीं बल्कि ईश्वर के प्रति प्यार से पहुंचा जा सकता था। अगस्टीन के अनुसार आदम ने शुरुआती पाप किया था। तब से सारे इंसान उसी पाप को ढो रहे हैं। वे नया पाप नहीं कर सकते। इससे मुक्ति ईश्वर से प्यार में है और बाइबिल इसका रास्ता दिखाती है। स्पष्ट है कि यहां नैतिकता- अनैतिकता का आधार ईश्वर है जिसकी आज्ञा का उल्लंघन कर आदम ने आदिम पाप किया था जिसकी सजा आज भी सारी मानवता ढो रही है। अगस्टीन का पूरा दर्शन नव-प्लेटोवादी दार्शनिक सिद्धान्तों के हिसाब से ईसाई धर्म की बातों की व्याख्या करता था। नैतिकता के बारे में भी उसने यही किया।
सन्त अगस्तीन से अलग सन्त टामस आक्र्वनास ने बाइबिल को स्वीकार करते हुए भी अपनी नैतिकता का आधार अरस्तू के सिद्धान्त को बनाया था। उसके अनुसार बाइबिल में प्रस्तुत सत्य तक तर्क के जरिये भी पहुंचा जा सकता है क्योंकि ईश्वर ने ही इंसान को तर्कबुद्धि देकर ऐसी व्यवस्था की है। तर्कबुद्धि से देखें तो नैतिकता का आधार मानव की प्रकृति होनी चाहिए, उस मानव को जिसे ईश्वर ने बनाया है। स्पष्ट ही आक्र्वनास का यह नैतिकता का सिद्धान्त उत्तरमध्यकाल के ईसाई धर्म को अरस्तू के दर्शन से सम्पूरित करने की कोशिश थी।
आधुनिक काल में पूंजीवाद की उत्पत्ति के साथ नैतिकता के नये सिद्धान्त पैदा हुए। इनके मूल में था पूंजीवादी नैतिकता को दार्शनिक आधार प्रदान करना। टामस हाब्स ने कहा कि इंसान अपनी प्राकृतिक अवस्था में एक-दूसरे के साथ मारकाट का जीवन जीता है। केवल संप्रभुता संपन्न ताकत के मातहत चलने वाला समाज ही इससे मुक्त हो सकता है। इस समाज के इंसान का दायित्व है संप्रभुता संपन्न ताकत के बनाये नियमों के हिसाब से चलना। इसी में उसकी भलाई है। हाब्स से अलग स्पिनोजा का कहना था कि संपूर्ण प्रकृति (समाज और इंसान सहित) एक निश्चित नियम से संचालित है। यदि इंसान इसे समझ लेता है और इसके हिसाब से जीवन जीता है तो वही सबसे अच्छा जीवन होगा। पश्चिमी दर्शन में प्लेटो से लेकर स्पिनोजा तक सभी तर्कबुद्धि को प्रमुख स्थान देते रहे थे। पर डेविड ह्यूम ने कहा कि नैतिकता तर्क से नहीं भावनाओं से तय होती है। क्या सही है, क्या गलत और क्या न्यायपूर्ण है, क्या अन्यायपूर्ण इस नतीजे तक इंसान भावनाओं से पहुंचता है। तर्क-वितर्क तो बाद में केवल इसका स्पष्टीकरण देते हैं। यानि ह्यूम ने इंसानी भावनाओं को नैतिकता का आधार माना। इसके विपरीत इमैनुएल कान्ट का कहना था समाज में नैतिकता का एक वस्तुगत आधार मौजूद है और इसे तर्क से खोजा जा सकता है। कान्ट ने इसे इस सूत्र में पेश किया: तुम वही करने को ठीक मानो जिसे तुम पूरे समाज का नियम बना सकते हो। ‘सच बोलो’ इसके हिसाब से ठीक है पर ‘झूठ बोलो’ नहीं क्योंकि यदि सभी झूठ बोलेंगे तो कोई किसी पर विश्वास नहीं करेगा और तब इस नियम पर समाज नहीं चल सकता। सभी मामलों की तरह हेगेल ने नैतिकता के मामले में भी एकदम भिन्न रुख अपनाया और कहा कि नैतिकता का सवाल भी असल में ऐतिहासिक विकास से जुड़ा हुआ है। इस सवाल की प्रस्तुति और इसका समाधान दोनों इतिहास के विकास से जुड़ा हुआ है। इन सभी आधुनिक दार्शनिकों के मामले में भी यही हुआ कि नैतिकता के उनके सिद्धान्त उनके आम दार्शनिक सिद्धान्तों से निकलते थे। या यूं भी कह सकते हैं कि नैतिकता के अपने सिद्धान्तों को दार्शनिक आधार प्रदान करने के लिए ही उन्होंने अपना सामान्य दर्शन पेश किया था। कान्ट ने तो खुलेआम कहा ही था कि उन्होंने तर्कबुद्धि की सीमा इसीलिए रेखांकित की है कि ईश्वर में आस्था का मार्ग प्रशस्त किया जा सके। तर्क से ईश्वर साबित नहीं होता इसलिए तर्क पर ही सवाल उठाओ।
पश्चिमी दर्शन के इस संक्षिप्त अवलोकन से स्पष्ट है कि नैतिकता के सवाल पर समय के साथ दार्शनिकों ने भिन्न-भिन्न रुख अपनाया। कुछ ने नैतिकता को व्यक्ति-समाज सापेक्ष माना तो कुछ ने इसका वस्तुगत आधार खोजा-इंसान के भीतर और इंसान के बाहर भी। पर इस सवाल पर लगभग सभी मौन रहे कि इंसान किसी इच्छित नैतिकता पर क्यों चलेगा? यह देखते हुए कि ज्यादातर इंसान सही के बदले गलत पर, अच्छे के बदले बुरे पर ही चलते हैं, यह सवाल और भी मौजूं हो जाता है। हालांकि सुकरात ने कहा था कि इंसान यदि जान ले कि भलाई किस चीज में है तो उस पर वह चलेगा पर क्यों चलेगा यह नहीं बताया। यूनानी दर्शन में इस समस्या को ‘अक्रासिया’ नाम दिया गया यानी यह जानते हुए भी कि भलाई किसमें है, इंसान किसी और रास्ते पर चलता है। सुकरात की तरह बाकि दार्शनिकों ने भी मान लिया कि यदि इंसान सही नैतिकता और उसके स्रोत को जान ले तो उस पर चल पड़ेगा। पर क्यों, यह उन्होंने नहीं बताया। कान्ट ने अपने सिद्धान्त के जरिये इसे हल करने की कोशिश पर यह नाकाफी रहा। कान्ट के सिद्धान्त को बिना जाने हुए उस पर चलने वाला पूंजीपति वर्ग (‘अपने मुनाफे के बारे में सोचो’) सारे पूंजीवादी समाज को भयानक संकट में धकेल देता है।
जहां तक भारतीय दर्शन की बात है, नैतिकता के आधारों पर उतनी बात नहीं हुई जितना इस पर कि क्या नैतिक है, क्या अनैतिक और उस पर कैसे चला जाये। वैदिक संहिताओं में ऋत और धर्म की चर्चा है जो प्रकृति और समाज में मौजूद अंतर्निहित व्यवस्था की ओर इंगित करते हैं। आर्यों के कबीलाई समाज में इसका एक मतलब सामूहिकता भी था। सभी से उम्मीद की जाती थी कि वह ऋत व धर्म के हिसाब से चलेगा। कबीलाई समाज के अनुष्ठानों का पालन भी इसमें शामिल था। तब यही नैतिकता थी। इसका उल्लंघन अनैतिकता।
कबीलाई समाज टूट कर वर्गीय समाज बनने के साथ यह स्थिति बदल गयी। ऋत इंसान से दूर चला गया। इसी स्थिति में भारत में बौद्ध और जैन धर्म पैदा हुये जिन्होंने एकदम भिन्न नैतिकताएं दीं। बौद्ध धर्म ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति यानी निर्वाण को अपना लक्ष्य घोषित किया और इसके लिए अष्ठ मार्ग सुझाया (सही दृष्टि, सही उद्देश्य, सही बोल, सही व्यवहार, सही जीविका, सही प्रयास, सही भाव, सही ध्यान)। इसने अतियों से अलग मध्यमार्ग की शिक्षा दी। बौद्ध धर्म की इस नैतिकता में ईश्वर व स्वर्ग-नर्क का कोई स्थान नहीं था। बौद्ध धर्म से अलग जैन धर्म ने अहिंसा को जीव मात्र तक विस्तारित किया और अपेक्षानुसार कठोर सात्विक जीवन की वकालत की।
लगभग इसी समय से मोक्ष का सवाल भारतीय दर्शन का प्रमुख सवाल बन गया। बौद्ध धर्म का निर्वाण इसी का एक रूप था। मानव जीवन का लक्ष्य और सही-सार्थक जीवन इससे परिभाषित होने लगा। सभी दर्शनों ने इसका अलग-अलग रास्ता सुझाया और इसी के हिसाब से जीवन की नैतिकता भी तय हुयी। जहां मीमांसा ने वैदिक जीवन पद्धति को इसका रास्ता बनाया वहीं वेदान्त ने कभी ज्ञान को तो कभी भक्ति को इसका रास्ता बताया।
भारत में ईसा के बाद के काल में धर्म और दर्शन में काफी घाल-मेेल रहा। हिन्दू धर्म को जहां धर्म सूत्रों में (स्मृतियां इत्यादि) संहिताबद्ध किया गया वहीं बौद्ध व जैन धर्म को कथाओं में। हिन्दू दार्शनिकों ने जहां नैतिकता के सवाल पर अमूर्त रूप से विचार किया वहीं धर्मसूत्रों में इसे ठोस रूप प्रदान किया गया। यही नहीं, चाणक्य नीति, पंचतंत्र, हितोपदेश इत्यादि अन्य तरीकों से भी इन्हें प्रस्तुत किया गया।
भारत में मध्य काल तक स्थिति यह हो गई कि नैतिकता के सवाल वर्णाश्रम व्यवस्था व धर्मसूत्रों से तय होने लगे। दर्शन का काम इनको जायज ठहराना रह गया। स्थिति मध्यकालीन ईसाई धर्म की तरह हो गई जब दर्शन का काम धर्म के नियमों-कानूनों का स्पष्टीकरण करना रह गया।
भारत में नैतिकता के आधार को मीमांसा ने वेदों में, सांख्य ने प्रकृति में और बौद्ध दर्शन ने मानव जीवन में देखा। बाकियों ने इसका आधार ब्रह्म या ईश्वर में देखा। जहां तक निरीश्वरवादी चार्वाक दर्शन का सवाल था, उन्होंने नैतिकता का आधार चीजों के स्वभाव यानि प्रकृति के नियमों में देखा। चार्वाक दर्शन ने ब्राह्मण धर्म के अनुष्ठानों और नैतिकता की खूब खिल्ली उड़ाई।
दर्शन में नैतिकता के सवाल के उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि इस सवाल का सूत्रीकरण और उसका जवाब दार्शनिकों के अपने देश-काल के हिसाब से और उनकी सामाजिक स्थिति के हिसाब से तय होता रहा है। सवाल एक ही था और जवाब अलग-अलग। जहां ईश्वर की धारणा से दूर यूनानी दार्शनिकों ने इसका ईश्वर विहीन उत्तर ढूढ़ा वहीं ईश्वर में आस्था रखने वाले दार्शनिकों ने इसके मूल को ईश्वर में देखा और धर्म द्वारा बताये गये रास्ते की दार्शनिक व्याख्या करने की कोशिश की। स्वर्ग-नर्क इत्यादि धार्मिक धारणाओं की दार्शनिक व्याख्या में काफी कठिनाई हुई पर इन आस्थावान दार्शनिकों ने कोई न कोई रास्ता निकाला। (ब्रह्मसूत्र के लेखक बादनारायण जब बह्म और कर्म को लेकर कठिनाई में फंस गये तो घोषित कर दिया कि इस संबंध में धर्मशास्त्रों में जो कहा गया है, वही सत्य है। उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।) ईश्वर को सीधे नकारने वाले दार्शनिकों ने अपनी नैतिकता के लिए इंसान को ही आधार बनाया।
इस तरह देखें तो न केवल नैतिकता (क्या सही है, क्या गलत; क्या अच्छा है, क्या बुरा; क्या न्यायपूर्ण है, क्या अन्यायपूर्ण; क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए इत्यादि) हर समाज में बदलती रही है बल्कि नैतिकता के सवाल पर दार्शनिक चिंतन-मनन भी समाज के हिसाब से बदलता रहा है। यानि नैतिकता का सवाल और जवाब दोनों समाज सापेक्ष रहे हैं।
नैतिकता के बारे में आज कुछ बातें स्पष्ट हैं। नैतिकता का एक जैविक-सामाजिक आधार मौजूद है पर स्वयं नैतिकता समाज के हिसाब से बदलती रहती है। नैतिकता का भाव (सही-गलत, अच्छा-बुरा इत्यादि) हर इंसान में मौजूद रहता है पर यह भाव किस रूप में प्रकट होगा यह सामाजिक स्थिति पर निर्भर करता है। यानि कोई भी इंसानी समाज ऐसा नहीं हो सकता जिसकी अपनी कोई नैतिकता की धारणा- सही-गलत, अच्छे-बुरे की धारणा- न हो। पर क्या सही है-क्या गलत, क्या अच्छा है-क्या बुरा, कौन सा जीवन अच्छा है- कौन सा बुरा यह समय के साथ बदलता रहता है। समाज के विकास के साथ नैतिकताएं पैदा होती रहती हैं और खत्म होती रहती हैं। कोई शाश्वत नैतिकता नहीं होती पर नैतिकता का सैन्स या भाव मानव प्रकृति का हिस्सा होने के चलते मानव जीवन तक स्थाई है।
जीव वैज्ञानिकों ने यह पाया है कि जो जीव समूह में रहते हैं उनके जैविक विकास में ही यह सुनिश्चित हुआ कि समूह का सदस्य समूह के हिसाब से चले। समूह के हिसाब से चलने पर पुरुस्कार और न चलने पर दंड मिलता है। समूह या समूह के सदस्यगण किसी खास सदस्य के साथ यह करते हैं। यह अचेत तौर पर होता है। ह्यूम के हिसाब से कहें तो यह भावनाओं से होता है क्योंकि इंसानों के अलावा अन्य कोई जीव तर्क नहीं करता।
इंसान अपनी प्रकृति में ही सामूहिक या सामाजिक प्राणी है। इसका जैविक विकास इसी रूप में हुआ है। सामाजिक जीवन से अलग इंसान का इंसान के रूप में जैविक विकास आज भी असंभव है (इंसानी समाज से दूर इंसान का बच्चा जैविक तौर पर अपनी सारी इंसानी जैविक क्षमताओं का विकास नहीं कर सकता)। इंसान के जैविक उद्विकास (evolution) में सामूहिक जीवन जीने वाले जीवों की ऊपर कही गई विशेषता और विकसित हुई तथा उसने सचेतन रूप ग्रहण किया। समूह के लिए क्या सही है और क्या गलत तथा समूह के हर सदस्य के लिए क्या सही है और क्या गलत इसकी सचेतन प्रक्रिया विकसित हुयी। यानी बाकी सामूहिक जीवों की तरह अचेतन प्रतिक्रिया करने के बदले इंसान सचेत प्रतिक्रिया करने लगा। यहीं से नैतिकता का भाव या सेन्स पैदा हुआ। ध्यान देने की बात है कि नैतिकता का भाव पैदा होने के पीछे सामूहिक जीवन था, किसी सदस्य का जीवन नहीं। अलग-थलग जीवन जीने वाले जीवों में न तो इसकी जरुरत थी और न इसका कोई अचेत रूप विकसित हुआ। आज भी समाज से अलग किसी अकेले व्यक्ति की नैतिकता का कोई मतलब नहीं।
मानव मस्तिस्क का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने पाया है कि मस्तिस्क में नैतिकता से संबंधित हिस्से वहीं हैं जो खास इंसानी हिस्से हैं। हालांकि वे उन हिस्सों से भी सम्बद्ध हैं जहां भावनाएं पैदा होती हैं। ह्यूम इस रूप में आंशिक तौर पर सही थे कि नैतिकता न केवल तर्कबुद्धि बल्कि भावनाओं से भी जुड़ी हुयी है। इस संबंध में वैज्ञानिकों में इंसानों के बीच भावनाओं का तादात्म्य पैदा करने वाले ‘मिरर न्यूट्रान’ की काफी चर्चा है। ये वे न्यूट्रान हैं जो सामने वाले के दुःख-सुख को देखकर सक्रिय हो जाते हैं और व्यक्ति को वैसा ही एहसास कराने लगते हैं।
इस तरह स्पष्ट है कि इंसान में नैतिकता के भाव का एक जैविक-सामाजिक आधार मौजूद है। यानी मानवीय नैतिकता का एक वस्तुगत आधार मौजूद है पर यह स्वयं इंसान की प्रकृति में ही है। यह प्रकृति पहले की दार्शनिकों की सोच से बिल्कुल भिन्न है। इस प्रकृति का खुलासा केवल आधुनिक विज्ञान ही कर पाया। दर्शन के पुराने सवाल को अंततः विज्ञान ने हल किया और बताया कि नैतिकता का आधार इंसान से बाहर किसी ईश्वर या किसी ‘फार्म’ में नहीं है।
हम जानते हैं कि इंसान वही नहीं है जो वह जैविक तौर पर विकसित हुआ। उसके बाद उसका सामाजिक विकास भी हुआ। और यह भी इंसानी प्रकृति में निहित है कि वह मूलतः अपने समाज का उत्पाद होता है। समाज से अलग उसके अस्तित्व का मतलब नहीं। जैसा समाज, वैसा इंसान।
नैतिकता के मामले में भी यही हुआ। इंसान में नैतिकता का भाव तो स्थाई था पर स्वयं ठोस नैतिकता समय के साथ बदलती रही। समाज बदलता रहा और उसके साथ नैतिकता बदलती रही। कबीलाई समाज की एक नैतिकता थी तो वर्गीय समाज की दूसरी। स्वयं वर्गीय समाजों में नैतिकताएं अलग-अलग रहीं। यूनानी-रोमन गुलामी समाज की कई नैतिकताएं आज घृणित लगती हैं। इसी तरह सामंती समाज की नैतिकताएं पूंजीवादी समाज में घटिया मानी जाती हैं। मध्ययुगीन हिन्दू समाज में वर्ण-जाति के हिसाब से जीवन जीना सर्वोच्च नैतिकता थी जो इंसान के पूर्व जन्म के कर्मों से निर्धारित होती थी। आज यह निहायत घृणित-पिछड़ी सोच मानी जाती है और कानून की नजर में अपराध है।
जब कभी देश-काल से परे किसी शाश्वत नैतिकता की बात की जाती है तो या तो अज्ञानता या कुटिल चाल को अभिव्यक्त करती है या फिर इस तथ्य को कि सभी वर्गीय समाज में कुछ चीजें आम हैं। मसलन ‘चोरी करना पाप है’ सारे वर्गीय समाजों की नैतिकता है जो निजी सम्पत्ति की रक्षा के लिए बनाई गयी है। निजी संपत्ति से रहित कबीलाई समाज में किसी व्यक्ति को इस वाक्य का मतलब ही नहीं समझ आयेगा। ‘सदा सच बोलो’ वाली नैतिकता में यह अंतर्निहित है कि समाज में झूठ बोलने की कोई जरूरत या मजबूरी है। यह जरूरत या मजबूरी खत्म हो जाने पर इस उपदेश की जरूरत नहीं रह जायेगी। इसी तरह नैतिक होने के लिए ईश्वर या स्वर्ग-नर्क का लालच या भय तभी तक कारगर है जब तक इंसान इन पर विश्वास करता है। विज्ञान और समाज के विकास के फलस्वरूप यह विश्वास खत्म हो जायेगा तब नैतिकता का यह अवलम्ब भी खत्म हो जायेगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्ति ज्यादा अनैतिक हो जायेगा। बल्कि वह ज्यादा ऊंचे स्तर का नैतिक हो जायेगा।
सारे ही वर्गीय समाज शोषण-उत्पीड़न, अन्याय-अत्याचार पर आधारित रहे हैं। इसीलिए वह ज्यादातर लोगों के लिए भयानक दुःख और कष्ट से भरे रहे हैं। इस दुःख और कष्ट की छाया शोषक-शासक वर्गाें पर भी पड़ती रही है। ठीक इन्हीं वजहों से इन समाजों में नैतिकता की जोर-शोर से बातें होती रही हैं, इसके लिए कठोर नियम भी बनाये जाते रहे हैं। पर साथ ही नैतिकताओं का जमकर उल्लंघन भी होता रहा है। सच तो यह है कि वर्गीय समाजों में ज्यादातर लोग ज्यादातर समय अपने समाज की नैतिकताओं का उल्लंघन ही करते रहे हैं। वर्गीय समाजों में इसके अलावा कुछ नहीं हो सकता था। ‘अक्रासिया’ का कारण व्यक्ति की कमजोरी नहीं थी जैसा कि अरस्तू सोचते थे, न ही अज्ञानता थी जैसे कि सुकरात सोचते थे। ‘अक्रासिया’ का कारण सामाजिक संरचना थी। नैतिकता पर न चलने के लिए व्यक्ति नहीं बल्कि समाज जिम्मेदार था। न पढ़कर फेल होने के लिए छात्र नहीं बल्कि शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार है।
कबीलाई समाजों में ‘अक्रासिया’ की समस्या नहीं थी। कबीलाई समाज के व्यक्ति के लिए अधिकार और कर्तव्य में कोई फर्क नहीं था। कबीलाई समाज की नैतिकता उसके व्यक्तिगत व्यवहार का सहज हिस्सा थी। वह उसकी आदत थी। वह सहज ही ऋत पर चलता था क्योंकि ऋत उसके व्यक्तित्व का हिस्सा था। ‘अक्रासिया’ वर्गीय समाज में पैदा हुई जब अधिकार और कर्तव्य जुदा-जुदा हो गये- शासकों-शोषकों के हिस्से में सारे अधिकार आ गये और शासितों-शोषितों के हिस्से में सारे कर्तव्य। भविष्य में जब वर्गीय समाज का खात्माहो जायेगा और मानव की मूलभूत प्रकृति के अनुरूप एक बार फिर सामूहिक समाज कायम हो जायेगा तब फिर ‘अक्रासिया’ की समस्या समाप्त हो जायेगी। तब फिर अधिकार और कर्तव्य के बीच फर्क समाप्त हो जायेगा। तब नैतिकता फिर उपदेश देने की बात नहीं रह जायेगी बल्कि लोगों की आदत का हिस्सा हो जायेगी। तब कोई नैतिकता की बातें नहीं करेगा लेकिन सभी तब के सामूहिक जीवन के अनुरूप नैतिक आचरण करेंगे। तब नैतिक आचरण करने के लिए न तो शासन के भय की जरूरत होगी, न समाज के और न ही ईश्वर या नर्क के। ठीक इसी कारण इसके लिए किसी लालच की भी जरूरत नहीं होगी। मनुष्य सहज ही नैतिक होगा। विचलनों पर बहुत आसानी से काबू पा लिया जायेगा।
मानवता के इस भविष्य के लिए समर्पित होना सबसे बड़े गौरव की बात होगी। आज की सर्वोच्च नैतिकता यही होगी।
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