प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) की 160 वीं सालगिराह पर
-सुरभि
1857 का विद्रोह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के सबसे शानदार व गौरवशाली अध्यायों में शामिल है। वास्तव में 1857 का महाविद्रोह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था।
ब्रिटिश औपनिवेशिक गुलामी के खिलाफ भारत के गर्वीले सामंत, सैनिक, किसान व कामगार पूरी ताकत व जद्दोजहद के साथ लड़े। अंतिम सांस तक लड़े। निश्चित तौर पर यह विद्रोह असफल हुआ लेकिन इसने भारतीय जनमानस के भीतर संघर्ष व कुर्बानी का जो जज्बा पैदा किया और जो साम्राज्यवाद विरोध की चेतना पैदा की वह आने वाली पीढ़ियों को अनुप्राणित करती रही, एक प्रकाश स्तंभ की तरह उनका मार्ग प्रदर्शित करती रही।
1857 का विद्रोह भारत में औपनिवेशिक राज के खिलाफ हुआ सबसे हिंसक व व्यापक संघर्ष था जो करीब दो साल चला। इस विद्रोह की जद में उत्तरी, मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्सों समेत पंजाब, हरियाणा और उत्तर पूर्वी भारत भी शामिल था।
विद्रोह की शुरुआत सिपाहियों के विद्रोह से हुई। गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूस असंतोष के तात्कालिक कारण बने। 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में तैनात ईस्ट इंण्डिया कंपनी की बंगाल आर्मी के हिन्दुस्तानी सिपाहियों ने बगावत कर दी। उन्होंने अपने अफसरों को मार गिराया तथा अपने 85 साथियों को जेल से आजाद करा लिया, जिन्हें चर्बी लगे कारतूस इस्तेमाल करने का हुक्म न मानने के अपराध में बंदी बना लिया गया था। इसके बाद बंगाल आर्मी के ये जवान दिल्ली कूच कर गये। 11 मई को बागी दिल्ली पहुंच गये और उन्होंने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को अपना प्रधान सेनापति एवं बख्त खान को अपना प्रतिनिधि व प्रवक्ता घोषित किया।
मेरठ छावनी के विद्रोह ने पूरी बंगाल आर्मी को विद्रोह के लिए उठ खड़े होने की का जज्बा पैदा कर दिया। विद्रोही सैनिकों को आम जनता का सहयोग व समर्थन मिला। साथ ही अंग्रेजों से असंतुष्ट व सत्ताच्युत कई राजा-सामंत व ताल्लुकेदार इस संग्राम में कूद पड़े।
1857 का विद्रोह कोई यकायक होने वाली घटना नहीं थी। अंग्रेजों के खिलाफ आक्रोश सर्वत्र व्याप्त था। राजे-नवाब अंग्रेजों द्वारा छल-बल द्वारा अपनी सल्तनतें व रियासतें हड़पने के चलते नाखुश थे तो किसान अत्यधिक कर बोझ व कामगार अपना रोजगार छिन जाने से तबाह हाल थे। सैनिक औपनिवेशिक अंग्रेज अफसरों द्वारा जानवरों जैसा बर्ताव झेल रहे थे। जिनके लिए उनके धर्म, संस्कृति व सभ्यता के लिए कोई सम्मान नहीं था। इस तरह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ, एक साझे दुश्मन के खिलाफ ये सब एक हो गये।
इस विद्रोह के दौरान औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रकट हुआ आक्रोश अंग्रेजों के भारत में 100 सालों की लूट, छल-बल, अन्याय-उत्पीड़न व बेहद अपमानजनक व्यवहार के खिलाफ एक सामूहिक विस्फोट था।
अंग्रेज भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिये व्यापार के बहाने आये थे। 1757 में प्लासी तथा 1764 में बक्सर की लड़ाई जीतने के साथ ही भारत पर राज करने का ईस्ट इंडिया कंपनी का मंसूबा प्रकट होता गया। ‘फूट डालो राज करो’ की नीति अपनाकर वह अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाती गयी। एक-एक करके रजवाडे़ व रियासतें छल-बल द्वारा हड़पी जाने लगीं।
1761 में पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों की हार ने भारत में किसी मजबूत केन्द्रीय शक्ति का खात्मा कर दिया। इस बीच ब्रिटेन में भी औद्योगिक क्रांति हो चुकी थी। वह व्यापारिक पूंजीवाद से औद्योगिक पूंजीवाद के युग में प्रवेश कर चुका था और एक औद्योगिक महाशक्ति बन रहा था। पहले हिन्दुस्तानी मंडियों का सस्ता माल हड़पना अंग्रेजों का प्रारंभिक उद्देश्य रहा था परंतु अब हिन्दुस्तानी धंधों-दस्तकारी को तबाह कर अपने उद्योगों का माल हिन्दुस्तानी बाजारों पर थोपना उनका मुख्य उद्देश्य बन गया था। इसके साथ ही भारी मात्रा में उद्योगों के लिए आदिम या प्रारंभिक पूंजी संचय भी किसानों-जमींदारों पर भारी कर लगाकर वे पूरा कर रहे थे। उद्योगों के लिए कच्चा माल, प्राकृतिक संसाधनों की लूट तो उनका मकसद था ही।
अंग्रेज धीरे-धीरे भारत में अपने पैर जमाते गये। कलकत्ता, मद्रास और बंबई में कंपनी का शासन कायम होने के बाद मराठा रियासतों, मैसूर (टीपू सुल्तान शासित) हैदराबाद, अवध, फरूखाबाद, तंजौर, भरतपुर व सिंध में उनका प्रभुत्व स्थापित हो गया। 1839 में रणजीत सिंह के निधन के बाद पंजाब को भी उन्होंने अपने शिकंजे में जकड़ लिया।
अपने इन जीते गये इलाकों की लूट से अंग्रेजों ने एक विशाल फौज खड़ी कर ली जो उनके लिए भारत ही नहीं अफगानिस्तान, फारस, क्रीमिया, नेपाल व वर्मा में भी लड़ाई लड़ रही थी। इन सेनाओं में प्रमुख थी बंगाल आर्मी, जिसमें एक लाख तीस हजार सैनिक थे। भारत में कुल दो लाख 60 हजार की सशस्त्र सेना में केवल 34 हजार अंग्रेज व 10 हजार अंग्रेज अफसर थे।
औपनिवेशिक गुलामी को भारतीय जनता ने चुपचाप स्वीकार नहीं किया। इसके खिलाफ जब-तब संघर्ष फूटते रहते थे। जुलाई 1806 की एक रात वेलोर की छावनी के हिन्दुस्तानी सिपाहियों ने बगावत कर कई अंग्रेज अफसरों को मार डाला। बगावत अंततः कुचल दी गयी। पंजाब में दिसंबर 1845 में अंग्रेजों ने मुदकी व फिरोजशहर की लड़ाईयों में अपने ही नेताओं द्वारा छले जाने के बावजूद जनरल शाम सिंह अटारीवाला के नेतृत्व में आखिरी दम तक अंग्रेजों का प्रतिरोध किया। 1855 में झारखंड के भोगनाडीह में दस हजार संथाल किसानों ने विद्रोह किया। उनके गांव अंग्रेजों द्वारा फूंक डाले गये व सैकड़ों को फांसी पर लटका दिया गया।
1832 से बहाबी आंदोलन ने जोर पकड़ा। अपने रूप में धार्मिक होने के बावजूद यह अंतर्वस्तु में अंग्रेज साम्राज्यवादियों के खिलाफ एक किसान विद्रोह था। धीरे-धीरे वक्त बढ़ा तो प्रतिरोध भी बढ़ता गया।
इस तरह आया 1857 का ‘प्रथम स्वतंत्रता संग्राम’। गुपचुप तरीके से विद्रोह की तैयारियां चल रही थीं। सिपाही के लिए लाल कमल और जनता के लिए रोटी विद्रोह का प्रतीक बन गए। गांव-गांव और शहर-शहर रोटी और कमल का फूल बंट रहे थे। तात्या टोपे, नाना साहब, कुंवर सिंह, बख्त खान आदि विद्रोह का संगठन कर रहे थे। विद्रोह की नियत तिथि 31 मई तय हुई। लेकिन घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया कि विद्रोह की आग पहले ही भड़क उठी।
इस महाविद्रोह की आग पहले पहल पश्चिम बंगाल के दम दम में जनवरी 1857 में फूटी थी फिर मार्च में बैरकपुर में मंगल पाण्डे ने बगावत कर साहसिक कदम उठाया। मई के मध्य में इसकी लपटें लखनऊ जा पहुंचीं और फिर 9 व 10 मई को मेरठ में बड़े पैमाने का विद्रोह भड़क उठा। इसके बाद पूरी बंगाल आर्मी में विद्रोह भड़क उठा। इसी के साथ कई सत्ताच्युत व असंतुष्ट राजा-नवाब व ताल्लुकेदारों ने भी खुली बगावत कर दी। मेरठ, दिल्ली, रूहेलखण्ड, आगरा, बनारस, इलाहाबाद, झांसी और कानपुर विद्रोह का केन्द्र बनकर खड़े हो गये। तात्या टोपे, नाना साहब, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, बेगम हजरत महल, बख्त खान, कुंवर सिंह, अजीमुल्ला आदि इस विद्रोह के महानायकों के रूप में उभरे।
1857 के अन्य केन्द्रों में सहारनपुर, मुरादाबाद, बरेली, अलीगढ़, मथुरा, आगरा, शाहजहांपुर, फरूर्खाबाद, फतेहपुर, आजमगढ़, जौनपुर, बनारस, जबलपुर, इंदौर, नीमच, पेशावर, लाहौर, अमृतसर, जालंधर, लुधियाना, नसीरपुर, एरिनपुर, अहमदाबाद, आरा, नागपुर, मुर्शिदाबाद, बहरामपुरा और कलकत्ता थे। हरियाणा में इसका असर कुछ ज्यादा और पंजाब में थोड़ा कम रहा। छिटपुट असर के इलाके महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान व गुजरात में भी थे।
किसी व्यवस्थित व एकीकृत केन्द्रीय कमान व योजनाबद्धता के अभाव में एक-एक कर विद्रोहियों के इलाके उनके हाथ से जाते रहे। सबसे लंबा और भीषण संघर्ष अवध का रहा जहां अप्रैल 1859 तक संघर्ष चलता रहा। अंग्रेजों के साथ सुविधा यह थी कि वे पुख्ता रणनीति बना रहे थे जबकि बागी स्थानीय स्तर की रणनीति बना रहे थे इसलिए भारी संख्या में होने के बावजूद वे अलग-अलग इलाकों में हरा दिये गये।
विद्रोही दो दिशाओं पूर्व व उत्तर-पश्चिम में दुश्मन से हार गये हालांकि जंग आसान नहीं रही। दिल्ली का मोर्चा सवा चार महीने से ज्यादा समय तक टिका रहा। आखिरी दौर में बख्त खान के हाथ में कमान थी। ग्वालियर की टुकड़ी ने अंग्रेजों को हरा दिया और कानपुर पर कब्जा कर लिया। झांसी की रानी का मोर्चा एक ऐतिहासिक नजीर बन गया। जगदीशपुर के कुंवर सिंह ने बड़े इलाके में जोरदार संघर्ष की मुहिम चलायी। तात्या टोपे अंग्रेजों से दो साल तक लड़ते रहे। शाहजहांपुर और पटना में भी विद्रोहियों ने कब्जा किया। बागियों ने कहीं भी बिना लड़े मोर्चा नहीं छोड़ा।
इस संग्राम की अंतिम बड़ी लड़ाई 21 जनवरी 1859 को सीकर राजस्थान के पास लड़ी गयी। कुछ गद्दार राजाओं की वजह से तात्या टोपे, राव साहब और फिरोजशाह के नेतृत्व वाली सेनाओं को हार का मुंह देखना पड़ा। कुछ गद्दारों ने धोखे से तात्या टोपे को 7 अप्रैल 1859 को सोते हुए पकड़वा दिया। तात्या टोपे को सार्वजनिक फांसी दी गयी। चारों तरफ टीलों पर हजारों लोगों ने तात्या टोपे को भावपूर्ण नमन किया। तात्या टोपे ने खुद फांसी का फंदा अपने गले में डाला। क्रांति का यह महानायक जिसकी नेतृत्वकारी एवं रणनीतिक क्षमताओं का लोहा अंग्रेजों ने भी माना था, आने वाली पीढ़ियों के लिए संग्रामी भावना व आत्मउत्सर्ग का प्रतीक बन गया।
इसी तरह पटना विद्रोह के नायक पीर अली ने फांसी के फंदे को चूमने से पहले पटना के कमिश्नर टेलर को जो बयान दिया वह देशभक्ति का अविस्मरणीय दस्तावेज है। पीर अली ने कहा, ‘‘जान एक प्यारी चीज है मगर कुछ चीजें जान से भी प्यारी हैं। मादरे वतन ऐसी ही चीज है जिसके लिए जान भी कुर्बान की जा सकती है।’’
छिटपुट रूप में विद्रोह अगले एक साल तक जारी रहा और अंततः अंग्रेज इसे दबा पाने में कामयाब रहे। कई देशी राजाओं व जमींदारों ने अंग्रेजों का साथ दिया। देश के बहुत बड़े इलाके जहां राजे-रजवाड़े व जमींदार अंग्रेजों के साथ थे विद्रोह का मामूली असर भी नहीं हुआ। जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर, उदयपुर, अलवर, टोंक, भरतपुर, जम्मू, हिमांचल, गढ़वाल, हैदराबाद, मैसूर, लावणकोर, बड़ौदा, जूनागढ़, रामपुर, ग्वालियर, भोपाल, कोचीन, कपूरथला, पटियाला, ढेंकानाल, सरायकेल्ला, कूचविहार, राजकोट, भावनगर, सांगली, मिराज, कोल्हापुर और सैकड़ों छोटे-बड़े राजे-नवाबों के इलाकों में विद्रोह का असर नहीं हुआ।
जो सामंत अंग्रेजों के खिलाफ थे- मसलन 1857 से पहले टीपू सुल्तान, वेलुथंपी, रानी चेनम्मा, पोल्यगर विद्रोह में हिस्सा लेने वाले विद्रोही और अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफर उनके नामों निशां मिटा दिये गये। लेकिन अंग्रेजों का साथ देने वालों को ईनाम दिए गये और उनके वंशज आज भी मौजूद हैं तथा महाराज-महारानी-राजमाता आदि कहलाते हैं। भारतीय शासक वर्ग का हिस्सा बनकर ये आज भी राज कर रहे हैं।
1857 में भाग लेने वाले विद्रोही सैनिकों, किसानों व राजे-सामंतों का कठोर दंड दिये गये। हजारों की संख्या में वे फांसी चढ़ाये गये, तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिये गए और हजारों को काले पानी की सजा मिली।
1857 के विद्रोह के बाद भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन खत्म कर इसे सीधे ब्रिटिश ताज के अधीन लाया गया।
1857 का विद्रोह भले ही कुचल दिया गया हो लेकिन इसने जिस संग्रामी चेतना को विकसित किया वह खत्म नहीं की जा सकी। भारत में राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्रीय चेतना का विकास इस आंदोलन ने किया।
कुछ अंग्रेज परस्त व शासक वर्गीय इतिहासकार 1857 के विद्रोह को महज सैनिक बगावत या म्यूटनी कहकर इसका अवमूल्यन करते हैं लेकिन वास्तव में 1857 में विद्रोही सैनिक, सामंत-ताल्लुकेदार, किसान व कामगार एक साथ लड़े थे।
बागी सैनिक जिन इलाकों से आते थे वहां भारी असंतोष था। बेहिसाब लगान के चलते किसानों व जमींदारों की हालत बुरी थी। जमींदारों व किसानों की मिल्कीयत कभी भी जब्त की जा सकती थी। अवध को 1856 में अंग्रेजों ने अपने में मिला लिया था और वहां की सेना को भी विखंडित कर बंगाल आर्मी में शामिल कर लिया था। अवध के ताल्लुकेदारों व किसानों पर भी वही महलवारी व्यवस्था लागू की गयी जो बाकि जगह कहर बरपा रही थी। विद्रोही बंगाल आर्मी के जवान किसान पृष्ठभूमि के ही थे।
निस्संदेह मंगल पाण्डे, लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहब, कुंवर सिंह व बेगम हजरत जैसे इस विद्रोह के महानायक-नायिकाएं हैं और इस महान संग्राम के चमकते शिखर हैं लेकिन 1857 के विद्रोह में कामगार वर्ग की अच्छी-खासी भूमिका थी, जिसे प्रायः नजरअंदाज किया जाता है। विद्रोह के शहरी केन्द्रों में उजड़े हुए बुनकरों, कारीगरों व बेरोजगारों की खासी भूमिका रही।
अहमद उल्ला शाह उर्फ डंकाशाह व अजीमुल्ला जैसे लोगों का योगदान भुला दिया जाता है। डंकाशाह फकीर थे। उन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ जबर्दस्त जनगोलबंदी की। अहमद उल्ला के मुरीद फैजाबाद, अलीगढ़, बरेली, मुरादाबाद, आगरा, आदि मेें भारी तादाद में थे। ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उनकी आग उगलती तकरीरों को सुनने के लिए दसियों हजार लोग जुटते थे। अपने मुरीदों का सैन्य संगठन कर उन्होंने फैजाबाद, लखनऊ, बरेली आदि जगह जबर्दस्त लड़ाई लड़ी व शाहजहांपुर को आजाद करा लिया। अंततः युवालां के राजा ने धोखे से वार्ता के बहाने बुलाकर उनकी हत्या की।
अजीमुल्ला जो कि नाना साहब के सलाहकार थे, ने फरवरी 1857 में दिल्ली से ‘पयामे आजादी’ नामक पत्र निकालकर विद्रोह की मशाल जलायी। उन्होंने प्रसिद्ध गीत-‘‘हम हैं इसके मालिक, हिन्दुस्तान हमारा, पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा’’ की रचना की जो आने वाली कई पीढ़ियों में देशभक्ति का जज्बा पैदा करता रहा और जो वाकई भारत की संग्रामी जनता की आत्मा की आवाज था।
1857 के विद्रोह में दलित-शोषित वर्ग की भूमिका को अक्सर भुला दिया जाता है। दलित मातादीन हेला, उसकी पत्नी लाजो, कोरी समुदाय की झलकारी बाई, उसके पति पूरन, अजीजन, अवंती बाई लोधी, ऊदा देवी, बिजली पासी, सिदो कान्हो जैसे कामगार वर्ग के नायकों की वीरगाथा केवल जनश्रुतियों में ही सुरक्षित रह सकी। अंग्रेजों द्वारा 1858 में फांसी दिये जाने से ऐन पहले ली गयी तस्वीर में गंगू मेहतर के चेहरे पर आत्मसम्मानी विद्रोह का जो तेज था वह हर देशवासी के लिए गौरव की बात है।
1857 का विद्रोह भारत में हिन्दू- मुस्लिम एकता की भी एक मिसाल है। बंगाल आर्मी, जिसके 65 प्रतिशत सैनिक ब्राह्मण व राजपूत थे, का बहादुरशाह जफर को अपनासम्राट व बख्त खान को अपना प्रतिनिधि मानने में कोई गुरेज नहीं था। इस विद्रोह के मुस्लिम नेताओं द्वारा हिन्दू-मुस्लिम एकता का जर्बदस्त प्रचार किया गया। विद्रोही नवाबों ने अपने शासन के अंतर्गत गौ हत्या पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस विद्रोह के दौरान भारत की गंगा-जमुनी तहजीब ने अपने को मूर्त रूप में प्रकट किया। हिन्दू-मुस्लमान एक ही मकसद- अंग्रेजों की गुलामी के खिलाफ आजादी- के लिए मिलकर लड़े। दोनों का खून एक साथ धरती पर गिरा व जज्ब हुआ।
हालांकि यह विद्रोह पुरानी जमीन से लड़ा गया था लेकिन इसमें आधुनिक चेतना के बीज भी छुपे थे। विद्रोही सिपाहियों ने जनरल या कर्नल जैसी कोई पदवी धारण नहीं की। सामूहिक तौर पर दरबार लगाकर फैसले लिये जाते थे। बख्त खान के नेतृत्व में जो प्रशासनिक इकाई कायम की गयी थी उसमें सभी फैसले वोट के द्वारा लिये जाते थे। यहां तक की बादशाह का भी वोट होता था।
प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब के अनुसार यह विद्रोह 19 वीं सदी में दुनिया का सबसे बड़ा विद्रोह था। यहां तक कि लैटिन अमेरिका में महान बोलीवार के नेतृत्व में सशस्त्र क्रांतिकारियों की संख्या कभी कुछ हजार से ज्यादा नहीं पहुंच पायी लेकिन यहां तो केवल बंगाल आर्मी के 1 लाख 24 हजार सिपाही विद्रोह में शामिल थे। विद्रोही जनता की संख्या लाखों में थी।
1857 विद्रोह के 160 साल बाद इस विद्रोह की स्मृतियां जनमानस में धुंधली पड़ती जा रही हैं। साम्राज्यवादी गुलामी एक बार फिर नये रूप मेें सामने आ रही है। सत्ता में वे लोग काबिज हैं जो भारत की मिली-जुली संस्कृति गंगा-जमुनी तहजीब को नष्ट कर धार्मिक उन्माद की आंधी बहा रहे हैं और एक हिन्दू फासीवादी राज्य कायम करने पर आमादा हैं। जिन लोगों का आजादी के आंदोलन में गद्दारी का कलंकित इतिहास रहा है वे आज फर्जी देशभक्ति और गौरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों व मजदूर मेहनतकशों पर नृशंस हमले कर रहे हैं। ऐसे में जनता के बीच 1857 की संग्रामी विरासत को ले जाना बहुत महत्वपूर्ण कार्यभार बनता है ताकि 1857 के शहीदों के सपनों को खत्म होने से बचाया जा सके, भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को बचाया जा सके और आज के दौर में देशी-विदेशी पूंजी की गुलामी के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाया जा सके।
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