(यह लेख मारिस हिन्दुस की पुस्तक ‘‘ह्यूमिनिटी अपरूटेड’’ के एक अध्याय का अनुवाद है। मारिस हिन्दुस रूस में पले-बढ़े एक अमरीकी लेखक थे। क्रांति के बाद रूसी समाज में हुए बदलावों को देखने ये रूस गये और उससे काफी प्रभावित हुए। अपनी पुस्तकों में उन्होंने क्रांति के बाद हुए बदलावों का सुरूचिपूर्ण वर्णन किया है। ‘‘ह्यूमिनिटी अपरूटेड’’ पुस्तक 1930 के आसपास के रूस का वर्णन करती है - सम्पादक)
पिछले अंक से जारी-
नाटक के प्रति अपने अन्तर्जात प्यार के साथ रूसी लोगों ने इस आस्था को दिन प्रतिदिन के जीवन के साथ जोड़ दिया है। इसे प्रतिदिन के अनुभव के साथ गूंथ दिया है। इन्होंने इसे न सिर्फ एक दर्शन, एक अमूर्तन, एक विचार के तौर पर लिया है बल्कि एक मार्गदर्शक, एक प्रेरणा, अनुमति और निषेध की एक संस्था के रूप में लिया है। यह उनके लिए महासागर की एक लहर मात्र नहीं है, बल्कि स्वयं महासागर है। ऐसा महासागर जो नित नई लहरों, नए तूफानों को जन्म देता है जो पराजित करता, डुबोता और रूपांतरित करता है।......उदाहरण स्वरूप, पूरी दुनिया में कहां युवा अन्तर्राष्ट्रीयतावाद की भावना से उस प्रकार सिंचित होता है जैसा कि रूस में? यूक्रेनी बालक यूक्रेनी भाषा बोलता है और जानता है कि वह यूक्रेनी है। जार्जियाई बालिका जानती है कि वह जार्जियाई है। बुरयात युवा जानता है कि वह बुरयात है। लेकिन उन सभी को इस तरह पाला जाता है कि वे महसूस करें कि सबसे पहले वे अन्तर्राष्ट्रीयतावादी हैं; उन्हें किसी भी व्यक्ति के साथ उसके नस्ल, रंग या राष्ट्रीयता की वजह से भेद नहीं करना है। उन्हें अफ्रीकी, मंगोली, हिन्दुओं, तुर्कों के साथ उसी तरह हाथ मिलाना है जैसा कि वे जर्मन, अंग्रेज, अमेरिकी या किसी भी श्वेत के साथ मिलाते हैं। जापान में भूकम्प? जोहान्सबर्ग में हड़ताल? जावा में जनउभार? उन्हें संघर्षशील और पीड़ित अवाम को राहत प्रदान करने के लिए अपने कोपेक का योगदान करना है। क्रान्तिकारी नौजवानों की किसी परेड को रूस में देखिए और आप तत्काल उसके उद्दाम अन्तर्राष्ट्रीयतावाद की भावना को महसूस करेंगे। कोई राष्ट्रीय अहंकार नहीं। कोई राष्ट्रीय बैनर नहीं। कोई राष्ट्रीय गीत नहीं। कहीं भी नस्लभेद या रंगभेद का कोई निशान नहीं। रूस और अन्य स्थानों, खासकर एशिया, की सभी जनजातियां और जन-गण, अपने स्थानीय परिधान और स्थानीय चाल में, लड़के और लड़कियां कंधे से कंधा मिलाकर कदमताल करते हुए, सभी एक ही लाल बैनर के नीचे, एक समान ही लाल पताका में लिपटे हुए, समान लाल धुन से ताल मिलाते हुए, एक ही इंटरनेशनल को गाते हुए!
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यद्यपि जिस अंतर्राष्ट्रीयतावाद का रूसी युवा पालन करता है उसका निहितार्थ सामाजिक सहनशीलता नहीं है। इसके बिल्कुल उलट इसका निहितार्थ एक खुला सामाजिक विरोध है। बुद्धिजीवियों और जनता के भावनात्मक जीवन में वर्ग संघर्ष की भावना के सबसे आगे रहने की वजह से इसके अलावा कुछ हो भी नहीं सकता। अपने शुरुआती दिनों से ही नौजवानों को यह समझाया जाता है कि मानवता सर्वहारा वर्ग और बुर्जुआ वर्ग में बंटी हुई है जो कि एक-दूसरे के साथ एक सतत युद्ध में संलिप्त हैं। जो इतिहास ये स्कूलों में पढ़ते हैं वे राष्ट्रीयताओं का इतिहास नहीं है, बल्कि वर्गों का एक-दूसरे से संघर्षों का इतिहास है। बाईबिल और धर्म के प्रति इसकी पहुंच वर्ग संघर्ष के दस्तावेज और उत्पाद की तरह है। वह लेखक सबसे महत्वपूर्ण है जिसने अपनी कला के माध्यम से वर्ग संघर्ष को सबसे सुग्राह्य तरीके से उकेरा है और दबी कुचली जनता के प्रति अपनी सबसे परम संवेदनाएं प्रदर्शित की हैं। टालस्टाॅय, तुर्गनेव, दोस्तोयवस्की, एनातोल फ्रांक, डिकेन्स, सभी को इस परीक्षा से गुजरना होता है और सभी को संघर्षशील जनता के प्रति दिखायी गयी सहानुभूति की मात्रा या तीक्ष्णता के अनुसार प्रशंसा या निन्दा हासिल होती है। संक्षेप में, पूरी सभ्यता वर्ग संघर्ष का मुद्दा है। प्रायः जब मैं रूसी नौजवानों को बताता हूं कि मैं एक लेखक हूं, तत्काल उनका प्रश्न होता है कि मेरी राजनीतिक दिशा क्या है? वास्तव में उनका मतलब यह होता है कि मैं वर्ग संघर्ष के पक्ष में हूं या विरोध में। वे किसी ऐसे लेखक की परिकल्पना नहीं कर सकते जो कि अराजनीतिक हो और राजनीतिक दृष्टिकोणों के प्रति तटस्थ हो। उनके लिए वर्ग संघर्ष जादू की छड़ी और अंतिम योजना के समय येशु द्वारा प्रयुक्त पवित्र प्याला है।
जीवन के सबसे मानवीय पहलुओं के संबंध में क्रान्तिकारी युवा विलक्षण दृश्य प्रस्तुत करता है। दुनिया में कहीं का भी नौजवान माता-पिता के प्राधिकार या बड़ों के मार्गदर्शन से इस तरह स्वतंत्र नहीं है। कहीं भी वह ऐसा जुझारू और सैन्यीकृत नहीं है, कहीं भी लिंगों की समानता और स्वतंत्रता का, धर्म को खारिज करने, सामाजिक सेवा को जीवन का उद्देश्य एवं ध्येय होने की धारणा, निजी संपत्ति संग्रहण के विरोधी होने, सामूहिक कार्य, श्रम को महत्ता देने का इतना आदी नहीं है। श्रम सिर्फ जीवन निर्वाह का स्रोत नहीं है, यह जीवन निर्वाह का हिस्सा है। यह मात्र किसी साध्य का साधन नहीं, बल्कि अपने आप में एक साध्य है। क्या आस-पास कोई चक्की या मत्स्य पालन केन्द्र है? नौजवानों को इस उद्यम के तरीकों और उद्देश्यों से और समुदाय के सामाजिक आत्मनिर्भरता में इसके योगदान से अपने को परिचित कराना होगा। क्या वहां कपास, अनाज, बागवानी या पशुपालन में विशेषता प्राप्त कोई खेती का क्षेत्र है? नौजवानों को अपने स्कूलों के माध्यम से उनके आर्थिक और सामाजिक मूल्य को पहचानना और उनको बढ़ाने के तरीकों को सीखना होगा। क्या वहां किसी कपड़े की फैक्ट्री, कलपुर्जों के भंडार, कोयला खदान, बिजली के प्रोजेक्ट का निर्माण कार्य चल रहा है? नौजवानों को यह जानना होगा कि यह सब क्या है और इसके सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक निहितार्थ क्या हैं? सभी शिक्षा किसी श्रम से, किसी निर्माण के प्रयास से संबंधित है।
आचरण के संबंध में सिद्धांत को लागू करने में रूसी युवा को अपनी मुख्य परेशानियों का सामना करना पड़ता है और यहीं से वह अपना मुख्य प्रशिक्षण प्राप्त करता है। यही वह हिस्सा है जो क्रांति का सबसे विलक्षण पहलू है।
समूह के एक सदस्य ने आत्महत्या कर ली। वह एक भरोसेमंद साथी था, लेकिन उसने आत्महत्या की है। वह मरने के अधिकार को मानना था जबकि एक क्रांतिकारी को सिर्फ जीने के अधिकार को मानना चाहिए। कैसे उसे सम्मान, भाषणों, परेड, लाल झण्डों के साथ दफनाया जाए? क्या क्रांतिकारी युवा किसी व्यक्ति की अच्छाईयों को उसके क्रांतिकारी सहन-शक्ति से स्वतंत्र मान्यता दे सकता है? क्या करें?
एक लड़की ने बगैर अपने निकटस्थ समूह से सलाह किए गर्भपात कराया। गर्भपात, निस्संदेह कानूनी है। लेकिन एक क्रांतिकारी को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी के बारे में सोचना चाहिए। गर्भपात स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना है और स्त्री को अपने मकसद के लिए सर्वोत्तम काम करने में कम सक्षम बनाना है। इसके अतिरिक्त क्रांति मांग करती है कि स्त्रियां बच्चों को जन्म दें। अतः फिर से, क्या करें?
एक नौजवान किसी लड़की के प्रेम में है, वह नास्तिक है। लड़की नहीं है। वह लड़की को बेहद चाहता है। उसे भरोसा है शादी के बाद एक समय उपरांत वह उसे उसकी आस्था से बाहर निकाल लाएगा। इस दौरान वह अड़ी हुई है। वह उससे तभी विवाह करेगी जब लड़का चर्च में विवाह के लिए राजी होगा। क्या लड़के के पास झुक जाने का अधिकार है? और मान लें उसके पास है भी तो भी बगैर समूह से पूछे चर्च के समारोह में शामिल होकर क्या उसने अपनी वास्तविकता के साथ समझौता नहीं किया? समूह को क्या करना चाहिए? उसे निष्कासित करे और क्रांति के एक सक्रिय साथी को खो दे या उसे माफ कर दे और ‘‘अंधकार की ताकत’’ के साथ समझौता कर ले। क्या करें?
एक नौजवान ने शादी की है और समूह की बैठकों में अकेला आता रहा है, कभी -कभार ही अपनी पत्नी के साथ। क्या पत्नी के प्रति और उद्देश्य के प्रति उसका रवैया सही है? लिंगो की समानता के सिद्धांत का क्या होगा? अगर पत्नी घर में बंद हो जाती है और घर के कामों में जीवन बिता देती है? ऐसे मामलों में समूह को क्या करना चाहिए और क्या कर सकता है?
एक नास्तिक नौजवान ने एक यहूदी लड़की के बारे में अपमानजनक टिप्पणी की। ऐसा उसने सिर्फ इसलिए किया क्योंकि उसने उसकी प्रेयसी बनने से इंकार कर दिया। ऐेसे नौजवान का पुनर्निमाण कैसे किया जाए, कैसे उसे उसके प्राचीन नस्लीय नफरत के दाग से आजाद कराया जाए?
एक नौजवान एक नेपमैन के बेटे के साथ ज्यादा घुलमिल रहा है। यह अपने आप में कोई अपराध नहीं है। नेपमैन का लड़का किसी दिन एक समर्पित क्रांतिकारी बन सकता है और एक वर्ग सचेत क्रांतिकारी युवा से अपेक्षा की जाती है कि उससे संबंध कायम करे और नए विचारों से उसे परिचित कराए। लेकिन, यह क्रांतिकारी नेपमैन के घर पर बहुत ज्यादा जाता रहता है और उसने नेपमैन के द्वारा दिए गए उपहारों को स्वीकार किया। वह नेपमैन के द्वारा दिए गए सोने की चेन का अपने साथियों के सामने प्रदर्शन करता रहता है और कुछ के भीतर जलन पैदा करता है तो अन्यों के निंदा का पात्र बनता है। क्या यह कभी भी उचित है कि नेपमैन से उपहार लिया जाए और अगर लिया जाए तो किस तरह का उपहार और कहां सीमा रेखा खींची जाए?
नौजवानों के नित्य जीवन में आने वाली समस्यायें अंतहीन हैं और हमेशा इनके समाधान उसे स्वयं ढूंढने पड़ते हैं। वह कहीं अन्य से इनका समाधान नहीं हासिल कर सकता। यह बड़ों की सलाह पर ध्यान नहीं देगा, तब भी जबकि वे क्रांतिकारी पांतों से आते हों, पुरानी मान्यताओं और धारणाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं हुए हों। ...........अपने द्वंद्वों का संतोषजनक समाधान प्राप्त करने के लिए इसे स्वयं से सलाह लेनी होगी। इसे प्रयोग करना होगा, परेशानी उठानी होगी, छांटना होगा, चुनना होगा और अड़ना होगा।
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तब भी इसके अपने तरीके से और इसके अपने नजरिए से वह उतना प्रसन्न है जितना कि कोई युवा ही हो सकता है। गृहयुद्ध, अकाल, पार्टी की टकराहटों, अंतर्राष्ट्रीय संकटों ने इसे अपमान और वंचना सहने लायक मजबूत कर दिया है। इसने भौतिक आनंदोपभोग के प्रति निरपेक्षता को अपना गुण बना लिया है। यह शिकायत नहीं करता जब इसे तीन, चार यहां तक कि छह लोगों के साथ एक कमरा साझा करना पड़ता है। यह कुनमुनाता नहीं हैं जब इसे अपने जूते को बार-बार मरम्मत कराकर पहनना पड़ता है। यह हर रोज काली रोटी और पत्तागोभी का सूप पीकर संतुष्ट रह सकता है। यह घर, माता-पिता, बड़ों, चर्च, अतीत के प्रति नहीं बल्कि सिर्फ क्रांति और भविष्य के प्रति अपनी स्वामीभक्ति रखकर जीता है। इसके पास स्काॅट फिट्जजेराल्ड के ‘‘उदास जवान लोग’’ या अर्नस्ट हेमिंग्वे और एलडस हक्सले के जैसा संदेहवाद नहीं है। इससे आस्था और जीने और संघर्ष करने की उत्कंटा फूट रही है। एक रूसी उपन्यास का एक पात्र कहता है, ‘‘आप देख रहे हैं कि सूरज चमकने की कितनी कोशिश कर रहा है? यह सब हमारे लिए हो रहा है।’’ हां, रूसी क्रांतिकारी युवा को लगता है कि सूरज और सारी प्रकृति नयी दुनिया के लिए इसके युद्ध में इसके साथ संश्रय में है।
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