-संपादकीय
हाल के वर्षों में भारत के छात्र-युवाओं की राजनीतिक सक्रियता में वृद्धि हुयी है। देश के कई विश्वविद्यालय और संस्थान छात्रों के संघर्षों के केन्द्र बने। अक्सर ही यह संघर्ष दक्षिण और वाम के रूप में सामने आया है। इस टकराहट के साथ ही दोनों की हर चीज आमने-सामने थी। दक्षिण जहां ‘राष्ट्रवाद’ के नारे लगा रहा था वही वाम ‘आजादी’ के नारे लगा रहा था। दक्षिण जहां आक्रामक था वहां वाम रक्षात्मक था। हर विवाद की शुरुआत दक्षिण ने की और हर विवाद के बाद वाम के सामने नयी चुनौतियां आकर खड़ी हो गयीं। दिलचस्प बात यह है कि छात्र-युवाओं की व्यापक आबादी न दक्षिण के साथ थी और न वाम के। इसलिए हर संघर्ष, हर विवाद, हर मुद्दे का अंत वैसे हुआ जैसे न दक्षिण चाहता था और न वाम।
दक्षिण को सत्ता का वरदहस्त प्राप्त था। मीडिया हर कदम पर उसका साथ दे रहा था। उसकी हर चीज जायज थी। उसकी गुण्डागर्दी को छात्रों-युवाओं का स्वाभाविक आक्रोश माना गया। ‘राष्ट्रवाद’, ‘देशभक्ति’, धर्म, संस्कृति आदि की व्याख्याएं सड़क छाप ढंग से की जाती और मीडिया उसे महिमामंडित करता। दक्षिण के गुण्डों ने हर जगह उत्पात मचाया। हर उस स्थल पर आक्रमण किया जहां से उसकी आलोचना, निंदा हो रही थी। हर उस विद्वान, हर उस पुस्तक, हर उस आयोजन को निशाने पर लिया जो उनकी पूरी ‘सहिष्णुता’ से आलोचना कर रहा था।
वाम को सत्ता का सहयोग नहीं था। सत्ता ने उसे अनाथ छोड़ दिया। उसकी हर बात संदेह के दायरे में थी। मीडिया उसे घेर रहा था और वह अपने को घेरने दे रहा था। उसकी बातें, तर्क, सिद्धान्त, नारे को शोर और चिल्लाहट से दबाया गया और वह उतना ही प्रतिकार, प्रतिरोध कर सकता था जितना उसने किया। वह जैसा वाम था वैसा उसका काम था। दशकों से उसकी परवरिश सत्ता के वृक्ष की छाया में हुयी। छाया में पाला-पोसा यह वाम आसान शिकार और आसान शत्रु था। फिर भी वह वाम था इसलिए दक्षिण के निशाने पर था।
जैसे प्रकृति और समाज में एक ही कोटि की चीजों में भी भिन्नता होती है। और यहां तक कि भिन्नता इनके बीच इतनी अधिक होती है कि उनको अलग-अलग ही कहना होता है। जैसे गिलहरी भी स्तनपायी है और व्हेल भी। बिल्कुल इसी तरह वाम भी किस्म-किस्म का होता है। एक वाम ऐसा होता है जिसे सरकारी कहा जा सकता है तो दूसरा क्रांतिकारी। देश के विश्वविद्यालयों में जिस वाम का प्रभाव रहा है वह पहले वाला है। यह वाम क्रांतिकारी लफ्फाजी में आगे था। क्रांति को आगे बढ़ाने के स्थान पर उसका अवरोधक था। सत्ता ने इसे पाला-पोसा ही इसलिए था। यह वाम क्रांतिकारी बातों से अपना निजी जीवन संवारता था। कैरियर में कामयाबी के लिए वाम का इस्तेमाल करता। सत्ता के गलियारों में पहुंचकर विनम्रता पूर्वक शासक वर्ग की सेवा करता था। इतना अच्छा-भला होने के बावजूद यह दक्षिण की आंखों में चुभता था। चढ़ जाता था। इसलिए यह सरकारी वाम दक्षिणपंथी सरकार के कायम होने के बाद निशाने पर आ गया। मद्द, गुहार के लिए यह वाम वहां जाता जहां से इसे ताकत, ऊर्जा मिलती; उन जगहों को उसने बहुत पहले ही त्याग दिया था। मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए यह अजनबी और पराया था। इसलिए इसने जब पुकार लगायी तो वहां से इसे निराशा हाथ लगी। जैसे कर्म किये थे वैसे ही फल मिले।
छात्र-युवाओं के स्वर बनकर कुछ अलग ढंग से कुछ और ही उभरे। जो अपनी आत्मा में वास्तविक वाम थे पर उनका रूप वैसा नहीं था जैसा सरकारी वाम का था। इनको वाम नाम इन पर हमला करने वालों ने दिया। इनको हर उस गाली से नवाजा गया जिसे दक्षिण इन्हें दे सकता था। इनका नाम कभी रोहित वेमुला और कभी गुरमेहर कौर था। इन्होंने कुछ मौकों पर सीधे अपनी आत्मा से बोला। इन्होंने वह भाषा बोलने की कोशिश की जो स्थापित वाम कभी का भूल चुका था। इन्होंने वे मुद्दे उठाये जिन्हें उठाने की हिम्मत यह वाम कभी का छोड़ चुका था। समय विशेष में ही सही ये ऐसी आवाज बनकर उभरे जिसका सामना दक्षिण अपना सारा जोर लगाकर भी नहीं कर सका। झूठ, कुत्सा प्रचार, निन्दा, तोहमत आदि हर तरीके से इन्हें लांक्षित करने की कोशिश की, पर वे सफल नहीं हो सके। दक्षिण चीखा, चिल्लाया बहुत पर सब कुछ के बावजूद भविष्य ने अपने आने के संकेत दे दिये। लेकिन यह नहीं भूलना होगा कि ये भविष्य के सिर्फ संकेत हैं। भविष्य अपने-आप वर्तमान को पराजित नहीं कर सकेगा। भविष्य के लिए हजारों-हजार को आगे आना होगा। रोहित, गुरमेहर से आगे और आगे जाना होगा। क्रांतिकारी वाम की राह को अपनाना होगा। शहीद भगत सिंह के दिखाये रास्ते पर चलना होगा। हमें वही बुद्धिमानी, वही जज्बा, वही हौसला दिखाना होगा जो भगत सिंह ने दिखलाया था।
हम भारत के छात्र-युवाओं का सामना ऐसे दक्षिण से नहीं हो रहा है जो कमजोर हो, बिखरा हुआ हो। यह दक्षिण, भारत के इतिहास में अब सबसे ज्यादा मजबूत और संगठित है। उसका लक्ष्य एक हिन्दू फासीवादी राज्य बनाना है। पूंजी, सत्ता और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की संगठित ताकत इस दक्षिण की ताकत है। इस ताकत का मुकाबला खोखले शब्दों और पिटे हुए जुमलों या बिखरे ढंग से नहीं किया जा सकता। वाम को अपने निजी उत्थान, कैरियर के लिए महज एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने वाले इस दक्षिण का क्षण भर भी मुकाबला नहीं कर सकते हैं। इससे ज्यादा की हिम्मत, माद्दा इनमें नहीं है। और उससे बड़ी बात इनके पास ऐसे संगठन भी नहीं हैं।
हम छात्र-युवाओं को पूरी बेबाकी से इंकलाबी बातों को अपने साथियों के साथ व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी तक ले जाना होगा। ऐसे इंकलाबी संगठन बनाने होंगे जो न केवल दक्षिण की चुनौतियों का सामना कर सकें बल्कि उससे आगे उस क्रांति को अंजाम दे सकें जिसकी बात शहीद भगत सिंह फांसी चढ़ने से पूर्व तक करते रहे। समाजवादी क्रांति। जिसका लक्ष्य पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा और एक नये व श्रेष्ठ समाज समाजवाद का निर्माण करना है।
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