शनिवार, 6 मई 2017

विधान सभा चुनावः देश का युवा और उसकी समस्याएं

-संपादकीय

        पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। सभी पूंजीवादी राजनीतिक दल अपने लाव-लश्कर के साथ और अपने आजमाये हुए जोड़-तोड़, झूठे चुनावी वायदों और जुमलों के साथ एक बार फिर जनता के बीच हैं। एक बार फिर से गाजे-बाजे के साथ पूंजीवादी लोकतंत्र की और ‘‘जनता के शासन’’ के कसीदे गढे़ जा रहे हैं।
        यह समय पूंजीवादी पार्टियों के लिए ‘बदलाव और ‘विकास’ की बातें करने का समय है लेकिन हर कोई मेहनतकश अपने निजी अनुभव से जानता है कि चुनावों के बाद अगर कुछ नहीं बदलता तो वह उसकी स्थिति है। बल्कि वह चुनाव दर चुनाव, साल दर साल और भी बदतर होती जा रही है। चुनाव सिर्फ और सिर्फ पूंजीपति वर्ग की दौलत और विकास का जरिया भर है। हां, यह चुनाव मेहनतकश जन को मुगालते में रखने और अपनी मर्जी से शासक बदलने के भ्रम में डालने का भी सबसे बढ़िया जरिया है। 

        पार्टियां या उनके नेता चाहे जनता से कुछ भी कहें चुनाव जीतने के बाद वह पूंजीपति वर्ग की सेवा में बिना किसी झिझक और शर्म के पाये जाते हैं। मोदी जी द्वारा किया गया अच्छे दिनों का वायदा हो या हर खाते में 15 लाख जमा कराने का वायदा, चुनाव जीतने के बाद एक चुनावी जुमला घोषित कर दिया जाता है। यह साफ है कि जुमलों को उछालने में मोदी जी अव्वल हैं पर अन्य पार्टियां भी उनसे बहुत पीछे नहीं हैं।

        पूंजीवादी लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष का भेद निरंतर खत्म होता जा रहा है। विपक्ष में बैठकर सरकार की नीतियों को जनविरोधी कहकर विरोध करने वाले अपनी बारी में सरकार में आने पर उन्हीं नीतियों को पूर्व सरकार से भी ज्याद शिद्दत से आगे बढा़ती हुयी  नजर आती हैं। इसीलिए एक-दूसरे से घोर विरोधी कहे जाने वाले दलों के नेता आसानी से, अपने करियर के मद्देनजर चुनावों से पहले दल-बदल करते हैं। यह बात आज इतनी आम हो चुकी हैं कि इसको सामान्य मानकर आज इस पर कोई बात भी नहीं करता। 

        लोकतंत्र के इस उत्सव का हाल यह है कि जैसे-जैसे चुनाव आयोग इसमें होने वाले पैसे, जातिवादी-सांप्रदायिक राजनीति पर रोक लगाने की बातें करता है उसी स्तर में यह और बढ़ता जाता है। चुनाव आयोग की सुधारों की हर एक बात ऐसे नीतिवचन बनकर रह जाने को मजबूर हैं जिन पर कोई राजनीतिक दल नहीं चलना चाहता या चल ही नहीं सकता। 

        कोई कह सकता है कि चुनाव में जीत या  हार व्यक्ति या पार्टी  पर, उसकी नीतियों पर निर्भर करती है। लेकिन यह पर्दे के पीछे खड़े असली खिलाड़ियों-एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग को न देखने की मासूमियत  है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी जी के प्रचार में जो 30-40 हजार करोड़ रू0 खर्च हुआ वह किसका था? और जिसका था, उन्होंने क्यों कर खर्च किया? और ऐसे ही इन चुनावों में भी बेहिसाब पैसा खर्च किया जा रहा है। जाहिर है कि अड़ानी, अंबानी जैसे एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के वरदान से बनने वाली सरकारें, उनके आशीर्वाद से चकाचैध और मदहोश कर देना वाला ऐसा प्रचार जो रात को दिन और काले को सफेद साबित कर देता है, इन चुनावों में निर्णायक होता है। ठीक यही कारण है कि चुनावी जीत के बाद मात्र पूंजीपति वर्ग ही पटल पर होता है। 

        इस चुनावी समर में भारत को सबसे युवाओं या युवा वोटरों का देश कहा जा रहा है। लेकिन किसी भी राजनीतिक दल के पास युवाओं के देने के लिए कुछ नहीं है। बेरोजगारी और मंहगी होती शिक्षा से छात्र-नौजवान त्रस्त हैं। बेरोजगारी का आलम यह है कि इसके इस वर्ष और बढ़ने के अनुमान हैं। नौजवानों के सम्मुख उपस्थित समस्याओं का समाधान न तो इस पूंजीवादी व्यवस्था में है और न ही पूंजीवाद में होने वाले किसी चुनाव से वो हल हो सकती हैं। लेकिन हर कोई दल युवाओं को छलने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन व जुमलों का इस्तेमाल करता है। कोई लैपटाप बांट रहा है तो कोई उनको रोजगार देने की बात कर रहा है। लेकिन सत्ता में पहुंचने के बाद वह क्या कर रहे हैं? भारी पैमाने पर रोजगार के अवसर कम करना, श्रम कानूनों को मजदूरों/कर्मचारियों के खिलाफ ढांलना आदि-आदि रूपों से वे युवाओं पर हमलावर हैं। युवाओं-बेरोजगारों के प्रति शासकों का क्या रुख है यह देश की राजधानी से लेकर प्रदेशों की राजधानियों में पिटते व जेल जाते शिक्षा मित्रों, शिक्षा आचार्यों, प्रशिक्षित बेरोजगारों  आदि के रूप में आसानी से देखा जा सकता है। 

        पूंजीवाद और उसकी व्यवस्था के पतन के इस दौर में उससे न तो उच्च लोकतांत्रिक मूल्यों की कोई उम्मीद की जा सकती है और न ही मेहनतकश अवाम व छात्रों-नौजवानों को कुछ देने की उम्मीद। नवउदारवाद के इस दौर में जब विश्व पूंजीवादी व्यवस्था आर्थिक संकट की चपेट में है तो यह और ज्यादा जनवाद विरोधी, मेहनतकश विरोधी होती जा रही है। भारत सहित दुनिया में इसकी गूंज साफ देखी व सुनी जा सकती है। 

        ऐसे समय में मांग की जाये कि हमें मात्र चुनाव नहीं चाहिए। हमें अपने जीवन में आमूलचूल परिवर्तन चाहिए। जैसा कि शहीद भगत सिंह ने कहा था कि मजदूरों किसानों छात्रों के जीवन में बेहतर बदलाव सिर्फ और सिर्फ समाजवादी क्रांति से ही आ सकता है। ऐसा इंकलाब रूस में आज से ठीक 100 वर्ष पहले हुआ था।                   

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