शनिवार, 6 मई 2017

घोर दक्षिणपंथी का राष्ट्रपति बनना

-चंदन

        पिछले दिनों अमेरिका में नये राष्ट्रपति का चुनाव हुआ। अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव कई मायनों में अंतर्राष्ट्रीय महत्व का होता है। अमेरिका में होने वाले आर्थिक-राजनीतिक परिवर्तन वैश्विक अर्थव्यवस्था व राजनीति को सीधे प्रभावित करते हैं व दुनिया के अधिकांश देशों की नीतियों को प्रभावित  करते हैं। सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति होने के कारण न सिर्फ तीसरी दुनिया के देशों बल्कि अन्य साम्राज्यवादी देशों(फ्रांस, जर्मनी, रूस, जापान आदि) को भी यह प्रभावित करता है। अतः अमेरिकी राजनीति में होने वाला बदलाव भारत के भी आर्थिक-राजनीतिक संबंधों पर प्रभाव ड़ालता है क्योंकि भारतीय शासक भी क्रमशः अधिकाधिक अमेरिका से सटते चले गये हैं। 

        राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप होंगे। डोनाल्ड ट्रंप साम्राज्यवाद के नए सरगना नियुक्त हुए हैं। वैश्विक आर्थिक संकट के मौजूदा दौर में दुनिया का शासक वर्ग दक्षिणपंथ की ओर ढुलका है। फासीवादी विचार वाले डोनाल्ड ट्रंप का राष्ट्रपति चुना जाना पुनः इस बात की पुष्टि करता है। जनता में जहां फासीवाद के खिलाफ नाराजगी व विरोध है वहीं हाल-फिलहाल एक बड़ा हिस्सा इसके प्रभाव में भी है। जनता बढ़ रही असमानता, बेरोजगारी आदि के कारण परेशान है।

        2007 में अमेरिका से शुरु हुए ‘सब प्राइम’ संकट के बाद पूरी दुनिया आर्थिक संकट के प्रभाव में है। इस संकट ने पूरी दुनिया को एक असमाधेय आर्थिक संकट में धकेल दिया है। इसका सबसे ज्यादा बोझ मजदूर वर्ग पर पड़ा है। अमेरिका में भी पूंजीपतियों ने बड़े पैमाने पर छंटनी की, सरकारों ने पूंजीपतियों को बेल आउट पैकेज दिये। इससे सरकारी खजाने(मेहनतकश जनता के पैसे) पर पड़े बोझ को कम करने के लिए फिर जनता पर टैक्स बढ़ाये। ‘आस्टिरिटी सुधार’ के जरिये सामाजिक सेवाओं(शिक्षा, स्वास्थ्य) व रोजगार के अवसर और भी कम कर दिये। पूंजीपतियों के स्वर्ग को बचाने के लिए यह मजदूर-मेहनतकश वर्ग पर बड़ा हमला था। यह है अमेरिकी जनता सहित पूरी दुनिया के मेहनतकशों के असंतोष और आक्रोश का कारण। लेकिन शासक पूंजीपति वर्ग यह सच बताने की सोच भी नहीं सकता कि ‘हमारी संगठित लूट तुम्हारी बदहाली का कारण है’। वह जनता को भ्रमित करता है जैसा कि अमेरिकी चुनावों में भी हुआ। वह जनता को खुद अपने(जनता के) खिलाफ खड़ा करता है जैसा कि फासीवादी विचारों वाला डोनाल्ड ट्रंप कर रहा है।

        अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव एक लंबी और बेहद खर्चीली प्रक्रिया है। सबसे पहले पार्टी के भीतर सभी सदस्य अपनी पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का चुनाव करते हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने अपने प्रचार की शुरुआत से ही अंध राष्ट्रवादी बातें कीं। उसने अमेरिका के ‘खोए हुए गौरव’ को वापस हासिल करने की बातें कीं। इराक-अफगानिस्तान में और अधिक मारक हमला कर युद्ध को ‘खत्म’ करने की बात की। अपनी इन अंधराष्ट्रवादी बातों से ट्रंप सभी प्रांतों में हुए पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार पद के लिए निर्वाचित हो गये। देश के सभी प्रांतों में पार्टी के भीतर हुए इन चुनावों के बाद राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार अपने साथ उप राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को भी चुनता है। इसके बाद प्रांतवार आम चुनाव के लिए प्रचार होता है। इन प्रचारों में ट्रंप ने अपने फासीवादी जहर को और भी अधिक खुलकर उड़ेला। उसने महिलाओं के सामाजिक उत्पादन में भागीदारी करने को, प्रवासियों को बेरोजगारी, महंगाई का कारण बताया। उसने नीग्रो लोगों को अपराध का कारण घोषित किया। आतंकवाद के नाम पर मुस्लिमों पर निशाना साधा। चुनावों में इन हथकंडों ने उसे खासा प्रचार दिया। चुनाव में प्रतिद्वन्द्वी हिलेरी क्लिंटन पूंजीपतियों की पहली पसंद थीं। बैंकिंग पूंजीपतियों की लाबी, तेल कंपनियों की लाबी प्रमुखता से डेमोक्रेटिक पार्टी(हिलेरी की पार्टी) के साथ रही है। वहीं रिपब्लिकन पार्टी (डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी) को हथियार लाबी का समर्थन रहता है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता प्रतिष्ठानों में  पहले से बैठे लोगों को निकम्मा-भ्रष्टाचारी कह कर जनता को सम्मोहित ही कर दिया। 19 दिसंबर को इलेक्टोरल कालेज में प्रांतों के सेनेटरों के वोट का नतीजा आया। इसके बाद ट्रंप राष्ट्रपति निश्चित हो गये। 9 नवंबर से 19 दिसंबर के बीच अमेरिकी पूंजीपति आश्वस्त हो गये थे कि ट्रंप उनका कुशल चाकर ही रहेगा। इस तरह ट्रंप खुद सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा बने। 

        भारतीय फासीवादियों ने ट्रंप की जीत पर खूब जश्न मनाया। उसी दिन नोटबंदी होने से बस मिठाई न बांट सके। आखिर उनके मन मुताबिक अमेरिकी सरगना के पद पर एक फासीवादी जो सवार हो रहा था। यह परिघटना वाकई दुनिया के मेहनतकशों के लिए गंभीर चुनौती है। दुनिया के शासकों का दक्षिणपंथ की ओर ढुलकना और ऐसे लोगों का सत्ता तक पहुंचना। पूंजीवाद अपने संकट को लोकतंत्र के मुखौटे से न ढक सका तो वह अपना तानाशाही चेहरा उघाड़ने लगा। ज्यादा निरंकुश शासन। सरकार के खिलाफ हर बात अपराध-देशद्रोह-आतंकवाद हो जायेगी; आखिर हम भारतीयों से बेहतर इस बात को कौन महसूस करेगा। आज यहां सरकार के खिलाफ हर बात असहनीय अपराध हो गयी है, देश पर ‘खतरा’ हो गयी है। ऐसा निरंकुश शासन जनता के अधिकारों-संघर्षों को बूटों तले रौंदता है। 

        अमेरिकी जनता निरंकुशता के इस खतरे को समझती रही है। ऐसा नहीं है कि वे हिलेरी क्लिंटन को पसंद करते थे लेकिन ट्रंप से कम खतरनाक समझते थे। खुद चुनावों में मत प्रतिशत देखा जाय तो 48 प्रतिशत लोगों ने हिलेरी को मत दिया जबकि 47 प्रतिशत लोगों ने ट्रंप को वोट दिया। शेष अन्य को मिले। लेकिन पूंजीवादी जनवाद का ढकोसला ही है कि अल्पमत से जीता व्यक्ति सत्ता पर है। अमेरिका में जिस उम्मीदवार को अधिक वोट मिलते हैं प्रांत की सारी सीटों से वही विजयी रहता है। ट्रंप की आम चुनावों में जीत के बाद से ही ट्रंप विरोधी प्रदर्शन शुरु हो गये। जनता ने ट्रंप हमारा राष्ट्रपति नहीं’, इलेक्टर्स(इलेक्टोरल कालेज में वोट देने वाले) ‘हमसे गलती हुई, तुम मत करना’ नारों से प्रदर्शन हुआ। जनता यह न समझ सकी कि अमेरिकी शासक ट्रंप को अपना प्रतिनिधि चुन चुके हैं। उनसे ऐसी मांगें बेमानी हैं। कम से कम यह कि जनता की मांगें सत्ता से नहीं, मजदूरों के क्रांतिकारी संघर्ष से हल होंगी; यह बात समझनी होगी। अमेरिकी साम्राज्यवाद को, इसकी लूट को, इसके नरसंहार को एक क्रांतिकारी आंदोलन ही चुनौती दे सकता है। 

        पूंजीवादी शासन सत्ता में पहुंचने वाला व्यक्ति पूंजीपति वर्ग का चाकर भर होता है। अमेरिकी साम्राज्यवाद का सरगना बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप भी साम्राज्यवादी पूंजीपति वर्ग का चाकर भर है। इस बात को वह खुद बहुत बेहतरी से समझता है। चुनाव जीतने के बाद उसने भाषण में कहा ‘मैं सबका राष्ट्रपति बनके दिखाऊगां।’ इसमें ‘सबका’ से मतलब साम्राज्यवादी पूंजीपतियों से है। उदाहरण के लिए पुनः भारत के 2014 के चुनावों में मोदी ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा लगाकर सत्ता पर आए। 2014 से अब तक मुस्लिमों, दलितों पर हमले, छात्र विरोधी व मजदूरों का खून चूसने वाले श्रम सुधार, किसानों को उनके हाल पर(आत्महत्या), यहां तक कि अपने मंत्रियों को उनके निजी सचिव तक चुनने का अधिकार नहीं, सारी शक्ति प्रधानमंत्री कार्यालय में आदि। इनमें सब कौन हैं? विकास किसका है? टाटा-अंबानी-अडानी आदि पूंजीपतियों से मिलने वाली शाबासी बताती है कि विकास उनका और उनके भाई-बन्धुओं का। इतने लंबे उदाहरण के लिए माफी, पर इतना जरूरी लगा। पूंजीवादी व्यवस्था में सरकार के अलावा, प्रशासन, न्यायालय, सेना भी प्रमुख अंग होते हैं। पूंजीपति वर्ग इन संस्थाओं को अपने हितों के अनुरूप इस्तेमाल करता है। इसके अलावा उनका प्रशिक्षण भी पूंजीवाद की सेवा के लिए किया जाता है। ट्रंप भी पूंजीपति वर्ग के ऐसे ही सेवक हैं। इससे अलग वह कुछ कर भी नहीं सकते। ऐसी ही स्वीकृति पूर्व राष्ट्रपति ओबामा ने डोनाल्ड ट्रंप पर टिप्पणी करते हुए की  कि ‘‘मैं राष्ट्रपति बनने से पहले बहुत कुछ करने की सोचता था लेकिन बाद में मुझे अचंभित करने वाली बातोें का पता चला। डोनाल्ड ट्रंप भी कुछ नहीं कर सकेंगे।’’

        मजदूर-मेहनतकश वर्ग के लिए भी इससे कुछ निष्कर्ष निकलते हैं। उन्हें साम्राज्यवादी अमेरिका से तो संघर्ष करना ही है। वहीं डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से यह चुनौती और अधिक बढ़ जाती है। क्योंकि वह एक फासीवादी साम्राज्यवादी की भूमिका में होंगे। इसकी संभावना मौजूदा विश्व आर्थिक संकट के दौर में काफी है। मजदूर वर्ग अपनी क्रांतिकारी एकता और संघर्ष से ही इसे रोक सकता है और मुक्ति पा सकता है।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें