-दीपक
बीते 8 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा के बाद से ही पूरा देश भयानक आर्थिक अराजकता के दौर से गुजर रहा है। नोटबंदी की घोषणा किए जाने के बाद से ही पूरा देश ‘अच्छे दिनों’ के इंतजार में एक अनुशासित सिपाही की तरह लाइन में लगा रहा। परंतु ‘अच्छे दिनों’ का मियादी काल (50 दिन का) हर एक दिन खुद एक-एक कर सरकार के दावों की पोल खोलता रहा। इन 50 दिनों में देश ने लाइन में 2000 रू0 के लिए लगे लोगों को रोते, चिल्लाते और मरते हुए देखा तो वहीं दूसरी ओर भाजपा नेता जर्नादन रेड्डी की बेटी की 500 करोड़ की शादी को भी देखा। इन 50 दिनों में हमने कई काले धन रखने वालों को हंसते हुए देखा तो अपनी मेहनत से एक-एक पाई कमाने वाली मेहनतकश जनता को तबाह-बर्बाद होते हुए भी देखा। बीते दिनों में जरूरी सामानों में कटौती कर एक-एक पैसा बचाने की हर घर की अपनी कहानी है। हां, अधिकांशतः ही इस कहानी में दर्द भरा है।
8 नवंबर की आधी रात को दिए अपने भाषण में संघी प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी को भारत की हर एक समस्या का समाधान घोषित किया था। नोटबंदी द्वारा काला धन, भ्रष्टाचार, नकली करेंसी, आतंकवाद, नक्सलवाद को खत्म करने के दावे करने वाले मोदी दिन बीतने के साथ-साथ खुद भी अपने राग बदलने लगे। अब कोई भी कालेधन की बात नहीं कर रहा है बल्कि एक नया शिगूफा छोड़ते हुए कैशलैस के फायदे गिनाए जा रहे हैं। हद तो तब हो गयी जब सरकार खुद एक गली के दुकानदार की तरह अपना ‘न बिकने वाला माल’ बेचने के लिए लक्की ड्रा की घोषणा करने लगी।
मौजूदा लेख के शुरुआत में सरकारी दावों का विश्लेषण करते हुए नोटबंदी पर अपनी राय रखी गयी है। इससे जनता के विभिन्न हिस्सों पर पड़े प्रभावों का लेखा-जोखा दूसरे हिस्से में रखा गया है। अंत में सरकार के इस तानाशाही पूर्ण कदम से फैली अराजकता का जिक्र किया गया है।
काला धन- संघी प्रधानमंत्री व उनकी मण्डली द्वारा नोटबंदी लागू करने का सबसे बड़ा कारण काले धन को खत्म करना बताया गया। प्रचारित किया गया कि इस कदम से 500-1000 के नोटों के रूप में जमा किया गया सारा काला धन बाहर आ जायेगा। हांलाकि इस काले धन में विदेशों में जमा अरबों रूपयों का काला धन शामिल नहीं था, जिसे 100 दिनों में देश में लाने का दावा करके मोदी लोकसभा का चुनाव जीते थे। चुनावी पार्टियों को चंदे के रूप में पूंजीपतियों से मिलने वाला काला धन (चंदा) भी इसमें शामिल नहीं था। इसलिए भी नोटबंदी की घोषणा के बाद से ही काले धन के बडे़ खिलाड़ी तमाम पूंजीपति, नेता, अभिनेता इसकी तारीफ करते रहे।
तमाम आंकलनों के आधार पर आए तथ्यों में ये माना गया कि भारतीय अर्थव्यवस्था में 20-30 प्रतिशत काला धन बाजार में शामिल है और कुल काले धन का मात्र 5-6 प्रतिशत ही नोट के रूप में मौजूद है। स्पष्ट है कि अपनी पूर्णता में लागू होने के बावजूद नोटबंदी कालेधन का मात्र 6 प्रतिशत हिस्सा ही खत्म कर पाती। पर जैसाकि पूंजीवाद में बने हुए हर एक कानून के साथ होता है, पैसे वाले लोग पैसे की ताकत के दम पर कानूनों को तोड़ने के सौ रास्ते निकाल लेते हैं तो निर्दोष गरीब आदमी ही इन कानूनों की मार झेलता रहता है। नोटबंदी के बाद से ही पुराने नोटों को नये नोटों में बदलने का एक नया काला बाजार पैदा हो गया। कई काला धन रखने वालों ने इसके जरिए अपने धन को सफेद कर लिया। तो कईयों ने अपने रसूख का इस्तेमाल करके सीधे बैंकों से ही अपने नोट बदलवा लिये। हां, इसका छोटा हिस्सा बैंक मैनेजरों की जेब में भी गया। आम जनता अपनी मेहनत की कमाई को निकालने के लिए भी घंटों लाइन में लगी रही। नोट बदलने के इस काले बाजार ने मेहनतकश जनता पर ही सबसे ज्यादा असर डाला। पैसे की जरूरत को पूरा करने के लिए कई लोगों को अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा दलालों को देना पड़ा। स्पष्ट है कि इस नये काले बाजार ने जहां काला धन रखने वालों के वारे-न्यारे किए तो इसकी सबसे ज्यादा मार भी गरीब जनता को झेलनी पड़ी। इस प्रकार नोटबंदी से बैठे बिठाए आम जनता की कमाई का एक हिस्सा नए काला बाजारी करने वालों की जेब में चला गया।
इन नये खिलाड़ियों के काण्डों के उद्घाटन के साथ ही मोदी सरकार फिर से नऐ झूठ गढ़ने लगी। नोटबंदी की विफलता का ठीकरा जन-धन योजना खाताधारकों के बहाने आम जनता के सर पर ही फोड़ा जाने लगा। बैंककर्मियों को भ्रष्ट घोषित कर खुद को भ्रष्टाचार के खिलाफ चलने वाली लड़ाई का यौद्धा घोषित किया जाने लगा। अंततः इस पूरी योजना का भानूमति का पिटारा साबित होते-होते मोदी सरकार खुद ही फिफ्टी-फिफ्टी योजना लेकर चली आयी। जिसके तहत अपने काले धन की घोषणा करने वाले को लगभग 50 प्रतिशत टैक्स देकर अपना शेष पैसा वापस मिल सकता था। इसी योजना के तहत हुए एक खुलासे ने मोदी सरकार की कलई खोल के रख दी।
हुआ यूं कि नवंबर के आखिरी दिनों में गुजरात के एक व्यापारी महेश शाह द्वारा अपने पास 13860 करोड़ रूपये की नगदी होने की घोषणा सभी टीवी चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज बनी रही। प्रचारित किया गया कि मोदी की नोटबंदी व फिफ्टी-फिफ्टी योजना के तहत करोड़ों का काला धन उजागर हो पाया है। लगभग 2 हफ्तों तक शाह के उद्घाटन के बहाने अपनी योजना के प्रचार के बाद महेश शाह को सबूतों के अभावों में रिहा कर दिया गया और उनके द्वारा घोषित की गयी नगदी का अब तक पता नहीं चला है।
परंतु मामला इतना ही नहीं है बल्कि इसकी पूरी कहानी ही दूसरी थी। दरअसल महेश शाह द्वारा नोटबंदी से पूर्व ‘आय की घोषणा’ योजना के तहत 30 सितंबर को टैक्स अधिकारियों के सामने अपने पास 13860 करोड़ रूपये की नकदी की घोषणा की गयी। उद्घाटन के अनुसार शाह को कुल रूपयों का 45 प्रतिशत, लगभग 6237 करोड़ रूपये सरकारी विभाग में जमा करने थे। 30 नवंबर को इन रूपयों की पहली किस्त 1560 करोड़ रूपयों को जमा करने की तारीख से पहले ही महेश शाह गायब हो गये और रहस्यपूर्ण तरीके से 3 दिसंबर को एक टीवी चैनल पर अवतरित हुए। चैनल पर इन्होंने बताया कि उनके पास मौजूद नकदी अपनी नहीं है बल्कि कई नेताओं की है। इससे पहले कि वे नेताओं के नाम उद्घाटित करते उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा नाटकीय तरीके से चली जांच के बाद रिहा कर दिया गया।
गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री व अब भाजपा छोड़ चुके सुरेश मेहता के अनुसार मोदी के मुख्यमंत्री काल में महेश शाह को मुख्यमंत्री कार्यालय तक खुले तौर पर आवाजाही थी तो कई अन्य लोगों के अनुसार अमित शाह के महेश शाह से करीबी रिश्ते हैं। स्पष्ट है कि महेश शाह द्वारा उद्घाटित किये जाने वाले नेताओं के क्या नाम थे। इसलिए भी इतने बड़े खुलासे के बावजूद उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
उपरोक्त परिघटनाओं ने दिखाया कि नोटबंदी ने काले धन के बड़े जखीरेदारों पर कोई असर नहीं डाला बल्कि इसने काले धन के कुछ छोटे खिलाड़ियों को बर्बाद किया तो नए खिलाड़ियों को पैदा भी किया। इस पूरी प्रक्रिया में आम जनता को अच्छे दिनों के जुमलों के अलावा कुछ नहीं मिला, उल्टा उनकी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा उनसे छीन लिया गया।
कैशलैस अर्थव्यवस्था- नोटबंदी लागू होने का एक पखवाड़ा बीतते-बीतते संघी प्रधानमंत्री अपने राग बदलने लगे। नोटबंदी के बेसुरे गीत में कैशलैस रूपी एक नया सुर शामिल हो गया। कैशलैस के फायदे गिनाये जाने लगे और कहा जाना लगा कि ये भ्रष्टाचार मिटाने का अचूक तरीका है। मोदी घूम-घूम कर अपनी सभाओं में डिजीटल वालेट के फायदे गिनाने लगे और निर्लज्जता के साथ भिखारियों को भी स्वाइप मशीन इस्तेमाल करने की नसीहत देने लगे। वो तो भला हो जेटली जी का जो 50 दिन बीतते-बीतते आगे निकल आए और बोले कि हम कैशलैस नहीं बल्कि लैसकैश इकानामी बनाना चाहते हैं। वरना तो संघी मोदी कितना नीचे गिरते इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।
कैशलैस के सरकारी दावों के उलट 50 प्रतिशत से अधिक आबादी अभी बैंकों की पहुंच से दूर हैं। भारत में अनौपचारिक क्षेत्र की 60 प्रतिशत अर्थव्यवस्था नकदी लेन-देन पर आधारित है। ग्रामीण क्षेत्रों की बहुलांश आबादी तथा शहरी क्षेत्रों की गरीब-मेहनतकश जनता इंटरनेट की पहुंच से दूर है। ऐसे में इस आबादी का आर्थिक, शैक्षणिक विकास किए बिना इन्हें डिजीटल तरीकों को अपनाने को मजबूर करना इनका उत्पीड़न है।
जहां तक भ्रष्टाचार के खात्मे की बात है, इस पर भी मोदी सरकार जनता को गुमराह कर रही है। खुद रिजर्व बैंक के अनुसार वर्ष 2011 में 34110 करोड़ सरकारी रू0 साइबर क्राइम की भेंट चढ़ गया है। जिसका पता अब तक सरकार नहीं लगा पाई है। पूंजीपति वर्ग का संगठन एसोचैम के अनुसार अगले साल कैशलैस पेमेंट से जुड़े धोखाधड़ी के मामलों मेें 65 प्रतिशत तक बढ़ोत्तरी हो सकती है। एसोचैम के इन दावों को पेटीएम जैसी कंपनियां आये दिन सही साबित करने पर तुली हुई हैं। अभी तक इन जैसी कंपनियों के सैकड़ों मामले कुछ ही दिनों में उजागर हो चुके हैं। आगे कई अन्य मामले भविष्य की गोद में हैैं।
दरअसल डिजीटल पेमेंट अथवा कैशलैस, भ्रष्टाचार को कम नहीं करता बल्कि ये भ्रष्टाचार-धोखाधड़ी को और अधिक आसान बना देता है। अमेरिका जैसे देशों में भी जहां एक हद तक कैशलैस अर्थव्यवस्था है, कर चोरी, धोखाधड़ी के लाखों मामले उजागर होते हैं। कंप्यूटर में एक क्लिक पर ही करोड़ों-अरबों रूपये एक देश से दूसरे देश में पहुंचाये जा सकते हैं। मात्र एक क्लिक के जरिये साइबर अपराधी करोड़ों रूपये की मेहनत की कमाई को लूट सकते हैं। इसी साल अक्टूबर में बैंकों के 32 लाख डेविड कार्डों का डाटा हैकरों ने उड़ा दिया था। इस घटना ने दिखा दिया था कि बैंकों के सुरक्षा इतंजाम कितने अपूर्ण हैं। भविष्य में ऐसी घटनाएं नहीं घटेंगी इसकी गारंटी बैंक भी नहीं दे सकते।
डिजीटल पेमेंट, कैशलैस तथा नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर भारत के अनौपचारिक क्षेत्र के व्यापारियों पर पड़ेगा। इस क्षेत्र में अधिकांश व्यापार नकदी के आधार पर होता है। व्यापारियों का ये हिस्सा कर चोरी तथा अन्य तरीकों से छोटी मात्रा में काला धन इकट्ठा करता रहा है। परंतु डिजीटल पेमेंट के जरिये इस पर मार पड़नी तय है। इस प्रकार इस छोटे व्यापारी की बर्बादी से खाली हुए बाजार को भरने का काम बड़ी कंपनियां करेंगी। जैसे अंबानी का रिलायंस फ्रेस वर्षों से खुदरा मार्केट में अपनी जगह बनाने की फिराक में है। परंतु भारत में बड़ी संख्या में मौजूद छोटे-बड़े खुदरा व्यापारी निरंतर ही उसके प्रसार में बाधक रहे हैं। नोटबंदी, डिजीटल पेमेंट के जरिये ये हिस्सा ही सबसे ज्यादा बर्बाद हुआ है। जिसका फायदा रिलाइंस फ्रेस जैसी कंपनियों को मिलना तय है।
डिजीटल पेमेंट लागू करने के पीछे एक तर्क सरकार की आय को बढ़ाना भी बताया जा रहा है। नोटबंदी लागू करने के पीछे भी एक बड़ी वजह इसी को बताया जा रहा है। सरकार के अनुसार डिजीटल पेमेंट के जरिये सभी व्यक्तियों की आय-व्यय सरकार की नजर में आ जायेगी। जिससे अब तक कर ना चुकाने वाले लोग भी टैक्स के दायरे में आ जायेंगे और सरकार की आय बढ़ जायेगी। इस बात में एक हद तक सच्चाई है परंतु सवाल ये है कि सरकार की आय बढ़ने से फायदा किसको होगा? क्या इसका फायदा देश की मेहनतकश 70 प्रतिशत जनता को मिलेगा या फिर नोटबंदी की तरह इसका फायदा भी धनकुबेर ही उठायेंगे? सरकार की नीतियां दूसरी बात की तस्दीक करती हैं। पिछले 4 सालों में सरकारों ने अपने बजट से 20 लाख करोड़ रूपये भिन्न-भिन्न माध्यमों के जरिये पूंजीपतियों को चढ़ावे में दिये हैं। यही नहीं नोटबंदी काल में भी जब पूरा देश भयानक आर्थिक संकटों से गुजर रहा था, मोदी सरकार ने पूंजीपतियों के 7000 करोड़ रू0 माफ(एनपीए) कर दिये। ये दिखाता है कि सरकार की आय बढ़ने से भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर फायदा पूंजीपतियों को ही होगा। यानी जनता के पैसे पर पूंजीपति मलाई खायेंगे और जनता भूखे सोयेगी।
नोटबंदी के प्रभावः
मजदूर वर्ग- नोटबंदी की सबसे अधिक मार देश की करोड़ों-करोड़ मजदूरों ने ही झेली है। इनमें भी असंगठित क्षेत्र के मजदूरों ने अधिक। दिल्ली सरकार द्वारा कराये गये एक सर्वे के अनुसार राजधानी के लगभग 60 प्रतिशत मजदूर नोटबंदी के कारण बेरोजगार हो गये। फरीदाबाद, कानपुर, गुडगांव, कोयम्बटूर, बंगाल ऐसा कोई औद्योगिक क्षेत्र नहीं बचा जहां नकदी की कमी के चलते छोटे उद्योग बंद न हुए हों। वो चाहे कानपुर का मशहूर लैदर का काम हो अथवा बंगाल की जूट मिलें, सभी जगह काम बंदी के चलते मजदूरों को छंटनी की मार झेलनी पड़ी। केवल छोटे उद्योगों ने ही नहीं बल्कि मारूति, होंडा मोटर, महिंद्रा, फोर्ड जैसी आटो कंपनियों ने भी माल कम बिकने के चलते भारी संख्या में बंदी व छंटनी की। एक अनुमान के अनुसार देश में लगभग 13 लाख मजदूरों को नोटबंदी के चलते अपनी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा।
इनमेें से अधिकांश मजदूरों के परिवारों ने भुखमरी से बचने के लिए गांवों का रुख किया है। ऐसे में मजदूरों का ये पलायन गांवों की बेरोजगारी को और अधिक बढ़ायेगा। नोटबंदी के चलते मरने वाले 150 के लगभग लोगों में भी अधिकांशतः मजदूर वर्ग से ही थे। इनमें उन लोगों का कोई आंकलन नहीं है जो केवल एक समय खाकर जैसे-तैसे मौत को टाल रहे हैं।
काले धन के जमाखोरों ने अपने धन की कालिख मजदूरों पर भी लगाने की कोशिश की। 400-500 रू0 की दिहाड़ी में मजदूरों का एक हिस्सा नोटों को बदलवाने के लिए दिनभर लाइनों में खड़ा रहा तो कभी मालिक से तनख्वाह में मिले पुराने नोटों को बदलवाने के लिए उसे अपनी दिन भर की दिहाड़ी छोड़नी पड़ी।
किसान- नोटबंदी को लागू करने का समय वही था जब खरीफ की फसल पक कर कटने को तैयार थी और रवि की फसल की बुआई होनी थी। फसल बेचने के बाद मिले पैसों से नई फसल के लिए बीज, खाद, मशीनें आदि का इंतजाम किया जाता था। ये समय किसानों के लिए खुशियां मनाने और शादियों का भी होता था। परंतु नोटबंदी के चलते पैदा हुई नकदी की कमी ने करोड़ों किसानों की उम्मीदों को धाराशाही कर दिया। बाजार में पैसों की कमी के चलते फसलों के खरीददार ही नहीं मिले। तो कई जगह किसान लागत से भी कम में अपनी फसलों और सब्जियों को बेचने पर मजबूर हुए। सका ही परिणाम था कि कई जगहों पर किसानों ने विरोध स्वरूप अपनी सब्जियों को बर्बाद कर दिया। नकदी की कमी के चलते रवि की फसल भी प्रभावित रही। जिस समय मिट्टी में जुताई होनी थी, किसान अपने पैसे निकालने के लिए लाइन में लगा हुआ था। यही वजह है कि इस बार पूरे देश में फसल की बुआई देर से हुयी है। जिसका प्रभाव उत्पादन और किसानों की स्थिति पर पड़ना तय है।
किसानों की इस बर्बादी पर भी संघी मोदी का दिल न पसीजा। इस स्थिति में किसानों की मदद करने के बजाय सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धमनी रहे ‘कोपरेटिव बैंकों’ द्वारा नोटों की अदला-बदली करने व पैसे देने की प्रक्रिया में रोक लगा दी। सरकार के इस फैसले ने पहले से ही परेशान किसान आबादी के कष्टों को बढ़ाने का ही काम किया।
पिछले 10 सालों में हमारे देश में 3 लाख से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या कर ली और ये संख्या तेजी से बढ़ रही है। हर दिन लगभग 50 लोग खेती छोड़ रहे हैं। ऐसे में नोटबंदी ने उनकी स्थिति को और पीछे धकेल दिया है।
छात्र- नोटबंदी के चलते छात्रों की आबादी भी भारी दिक्कतों-परेशानियों को झेलती रही। नवंबर माह पूरे देश के भीतर छात्रों की सेमेस्टर परीक्षाओं का समय है। नोटबंदी के चलते उन्हें पढ़ाई से ज्यादा एटीएम की लाइन पर ध्यान देना पड़ रहा था। लाखों छात्र पैसे की कमी के चलते फार्म भरने, फीस भरने जैसी चीजों से वंचित रह गये। दिल्ली जैसे शहरों में मकान मालिक नकद में किराए की मांग करने लगे। यहां कमरों का किराया 6-12 हजार तक है। स्पष्ट है कि 2000 की निकासी सीमा की वजह से उन्हें 3-6 दिन केवल किराया चुकाने के लिए एटीएम की लाइनों में लगना पड़ा। जिस समय का इस्तेमाल परीक्षाओं की तैयारी में किया जा सकता था, महज एक तुगलकी फरमान की वजह से लाइनों में बर्बाद हुआ।
पेटीएम जैसी कंपनियों और पूंजीपतियों की चांदी- हमने ऊपर देखा कि नोटबंदी ने समाज के मेहनतकश तबके को पीछे की ओर धकेला है। नोटबंदी से बड़े पूंजीपतियों को होने वाले फायदे का जिक्र भी हम ऊपर कर चुके हैं। परंतु नोटबंदी से पेटीएम जैसी कंपनियों को प्रत्यक्ष तौर पर फायदा हुआ है। 8 नवंबर की घोषणा की अगली सुबह ही प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर के साथ विभिन्न अखबारों में पेटीएम का विज्ञापन कंपनी द्वारा मोदी को धन्यवाद करने का तरीका था। नोटबंदी के बाद से पेटीएम से रोजाना 70 लाख सौदे होने लगे, जिनका मूल्य करीब 120 करोड़ रू0 तक पहुंच गया है। पेटीएम हर ट्रांजिक्शन पर मोटा कमीशन वसूल कर अपना मुनाफा बढ़ा रही है। मजेदार बात यह है कि पेटीएम में चीनी कंपनी अलीबाबा की बड़ी हिस्सेदारी है। दिवाली पर चाइनीज सामानों का विरोध करने वाली संघी ब्रिगेड पेटीएम की इस असलियत पर चुप है।
रास्ता क्या है?- नोटबंदी के बाद से भाजपा गठबंधन व जेडीयू को छोड़कर लगभग सभी चुनावबाज पार्टियों ने नोटबंदी का कुछ किंतु-परंतु के साथ विरोध किया है। जहां कांग्रेस इसके लागू करने के तरीकों पर विरोध करती रही वहीं आप व तृणमूल कांग्रेस ने इसे वापस लेने की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन भी आयोजित किये। जहां तक कांग्रेस के विरोध की बात है, 2013 में कांग्रेस खुद इस कदम को उठाने वाली थी। तब विपक्ष में रहने वाली भाजपा ने इसका विरोध किया था। अब कांग्रेस एक ‘ईमानदार विपक्ष’ का फर्ज निभाते हुए इसका विरोध कर रही है।
सपा-बसपा-आप व तृणमूल कांग्रेस अपने-अपने प्रदेशों में क्षेत्रीय पूंजीपतियों व व्यापारियों के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। नोटबंदी, सीधे-सीधे इस तबके पर हमला करती है। ऐसे में इनका विरोध दुश्मनाना अंतर्विरोध नहीं बल्कि दोस्ताना अंतर्विरोध है क्योंकि खुद अपने-अपने राज्यों में ये पार्टियां भी मेहनतकशों को बर्बाद करने वाली नीतियों को धड़ल्ले से लागू कर रही हैं।
इस मामले में तथाकथित वामपंथियों का चेहरा और अधिक बेनकाब हुआ है। इसका रश्मी विरोध संसद की चैहद्दी तक ही कैद है। नोटबंदी के पूंजीपरस्त चरित्र को उघाड़ने के बजाय ये वामपंथी उसके लागू करने में आई कमियों के विरोध तक ही सीमित हैं।
ये बात सच है कि नोटबंदी के फायदे के नाम पर संघ मंडली और उनकी चाकर मीडिया द्वारा फैलाये गए भ्रम व देशभक्ति की धुंध ने आम जनता को सच्चाई से एक हद तक दूर रखा है। मध्यम वर्ग तो पूरी तरह से मोदी भक्ति में लोटमलोट है ही। मेहनतकश जनता का भी एक बड़ा हिस्सा शुरुआती दौर में इस कदम के साथ खड़ा था परंतु समय बीतने के साथ नोटबंदी संघी सरकार के गले की हड्डी साबित हो रही है। नोटबंदी के चलते करोड़ों के चूल्हे जलने बंद हुए हैं तो करोड़ों का रोजगार छूटा है। जमीनी हकीकत जनता की आंखों पर पड़ी पट्टी को तोड़ने का काम कर रही है। ऐसे में सभी क्रांतिकारी, प्रगतिशील ताकतों का फर्ज बन जाता है कि नोटबंदी के जनविरोधी चरित्र को जनता के सामने खुलकर रखें। उनके गुस्से को संगठित प्रतिरोध तक ले जाने की कोशिश करते हुए व्यवस्था विरोधी आंदोलनों को संगठित करें।

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