शनिवार, 6 मई 2017

दर्शन के कुछ सवाल: ईश्वर

-शाकिर

        अपने देश के हिन्दुओं या हिन्दू धर्म मानने वालों के लिए वेद पवित्र धर्म ग्रंथ हैं। उनका मानना है कि हिन्दू धर्म इन्हीं वेदों पर आधारित है। इतना ही नहीं, उनका मानना है कि इन वेदों में दुनिया का सारा ज्ञान भरा पड़ा है और पश्चिमी दुनिया ने इसी ज्ञान को हासिल कर इतनी तरक्की कर ली है। उनका दृढ़ विश्वास है कि आज भी अमेरिकी वैज्ञानिक नासा में इन वेदों का अध्ययन कर प्रयोग कर रहे हैं।

        मजे की बात यह है कि इन आस्थावान हिन्दुओं ने स्वयं कभी वेदों के पन्ने खोलकर नहीं देखे होंगे। उन्हें नहीं पता कि वेद गद्य में हैं या पद्य में? कि वेदों की संख्या क्या है? कि वेदों में वास्तव में क्या लिखा है?

        यदि आस्थावान हिन्दू वास्तव में वेदों को पढ़े तो उन्हें गहरा धक्का लगेगा। तब उन्हें पता चलेगा कि वेदों में ईश्वर लगभग नदारद है (उसका जिक्र केवल बाद के हिस्सों में है)। कि वेद देवताओं को सम्बोधित हैं। कि वेदों का सबसे बड़ा देवता इन्द्र है जिसे आम आस्थावान हिन्दू एक लम्पट-व्यभिचारी देवता मानता है, जो हमेशा तपस्या करने वालों की तपस्या भंग करने की फिराक में लगा रहता है। कि वेदों में विष्णु और शिव का जिक्र केवल बाद के अंशों में ही आता है। कि वेदों में विष्णु के अवतारों यानि राम और कृष्ण का कोई जिक्र नहीं है। कि वेदों में कोई पूजा-पाठ, कोई व्रत-त्यौहार, कोई मूर्तिपूजा और कोई मन्दिर नहीं है। कि वेदों में केवल देवताओं को समर्पित यज्ञ हैं जिनमें बलियां भी दी जाती थीं। कि वेदों की संरचना किसी खास देवता को संबोधित ऋचाओं के रूप में हैं और ऋचाओं में कई श्लोक हो सकते हैं। कि हर ऋचा एक निश्चित देवता को संबोधित है, जिसका रचियता कोई एक ऋषि है और जो एक निश्चित छन्द में है। हर ऋचा एक निश्चित उद्देश्य को समर्पित है यानि एक निश्चित उद्देश्य के लिए यज्ञ करते समय इस ऋचा का उच्चारण किया जाना चाहिए। कि वेद इन ऋचाओं के संकलन हैं, जिन्हें संहिता कहते हैं। कि वेदों कि सबसे पुरानी संहिता ऋग्वेद की शाकल संहिता है। कि सभी संहिताओं के नाम किसी जानवर के नाम पर हैं (जैसे कि शाकल सांप की एक किस्म है)। 

        वेदों के बारे में इन सामान्य तथ्यों को जानते ही एक सामान्य आस्थावान हिन्दू चकरा जाता है। लेकिन उसकी चकराहट तब चरम पर पहुंच जाती है, जब उसे पता चलता है कि वेदों कि व्याख्या करने वाली भारतीय दर्शन की एक प्रमुख और वह भी आस्थावान धारा वेदों को पूर्णतया निरीश्वरवादी घोषित कर देती है तथा ईश्वर के अस्तित्व के विरुद्ध एक से बढ़कर एक तर्क प्रस्तुत करती है। भारतीय दर्शन की यह जानी-पहचानी धारा है मीमांसा या पूर्व मीमांसा। जब चाणक्य ने अपने ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ में राजाओं की दार्शनिक शिक्षाओं के लिए भारतीय दर्शनों का जिक्र किया तो उसमें तीन ही थे: सांख्य, मीमांसा और लोकायत। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये तीनों ही निरीश्वरवादी दर्शन हैं यानी वे ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते बल्कि उसे नकारते हैं।

        मीमांसा दर्शन वास्तव में वेदों की दार्शनिक व्याख्या के लिए ही पैदा हुआ था। इसके आदि संस्थापक जैमिनी माने जाते हैं लेकिन जिसके बाद के दो सबसे प्रसिद्ध प्रस्तोता प्रभाकर और कुमारिल भट्ट हैं।

        वेदों कि व्याख्या के सिलसिले में तर्क-वितर्क करते हुए मीमांसा दार्शनिक इस नतीजे पर पहुंचे कि न केवल किसी ईश्वर का अस्तित्व नहीं है बल्कि स्वयं वेदों के देवता भी नाम भर हैं। वे केवल शब्द मात्र हैं जिन्हें यज्ञ के समय उच्चारित किया जाता है (श्लोक में बहुत सारे शब्दों के बीच एक और शब्द)। कोई देवता नहीं मौजूद है जो अपने को समर्पित यज्ञ से खुश होकर फल प्रदान करते हैं। बल्कि यज्ञ स्वयं (यज्ञ की आग, उसमें डाली जाने वाली हवि, उस समय उच्चारित की जाने वाली ध्वनियां, इत्यादि) इच्छित फल प्रदान करते हैं। यह कार्य-कारण संबंध के जरिये होता है। यज्ञ किया जाता है और इच्छित फल प्राप्त होता है।

        न केवल मीमांसा दार्शनिकों ने वेदों को नकारा है और वेदों की भौतिकवादी व्याख्या की बल्कि उन्होंने भारतीय दर्शन के ईश्वरवादियों  (न्याय-वैशेषिकों और वेदान्तियों) के तर्कों का जोरदार खंडन भी किया। इसी सिलसिले में कुुमारिल भट्ट ने चिढ़कर कहा था कि लार को वक्त्रासव कह देने से कोई चीज साबित नहीं हो जाती।

        आज एक आस्थावान हिन्दू के लिए उपरोक्त सब बिल्कुल भी न समझ में आने वाली बात है। पर सच्चाई यही है ऊपर से तुर्रा यह की मीमांसा दर्शन प्राचीन और मध्यकाल में एक आस्थावान दर्शन माना जाता था - वेदों में आस्था रखने वाला। असल में मीमांसा दार्शनिकों ने ही घोषित किया था कि वेद अनादि और अनन्त हैं यानि वे हमेशा से विद्यमान हैं, उनका कोई रचियता नहीं है। भारतीय दर्शन में हमेशा ही आस्तिक का मतलब वेदों में आस्था रखने वाला माना गया है। इसके बदले वेदों में आस्था न रखने वालों को नास्तिक कहा गया है। ईश्वर के सम्बन्ध में ईश्वरवादी और निरीश्वरवादी शब्द इस्तेमाल किए गये। इस तरह ऐसा हुआ कि भारतीय दर्शन में मीमांसा, वेदान्त या उत्तर मीमांसा तथा न्याय-वैशेषक सभी आस्तिक दर्शन माने जाते हैं जबकि इनमें से पहला निरीश्वरवादी है और बाद के दोनों ईश्वरवादी।

        पर यहां भी मामला थोड़ा पेचीदा है। उत्तर मीमांसा या वेदान्त वेदों के बदले स्वयं को वैदिक साहित्य के अंतिम हिस्सों यानि उपनिषदों पर आधारित करता है (पहले संहिताऐं, फिर उनके परिशिष्ट के तौर पर ब्राह्मण ग्रन्थ फिर उनके परिशिष्ट के तौर पर अरण्यक तथा अंत में अरण्यक के परिशिष्ट के तौर पर उपनिषद)। वेदांत का शाब्दिक अर्थ है वेदों का अंत। वेदान्त दर्शन में वैदिक देवताओं के बदले आत्मा, कर्म और ब्रह्म की चर्चा है। यहां गौर करने लायक है कि ब्रह्म ईश्वर के समरूप नहीं है। ब्रह्म को केवल नकार यानी न-न से ही परिभाषित किया जा सकता है। उसमें न रूप है, न गुण है, इत्यादि। आत्मा इसी ब्रह्म का हिस्सा है जो कर्म से युक्त हो जाने के कारण ब्रह्म से अलग हो गयी है। आत्मा की मुक्ति का मतलब है कर्म से मुक्त होकर वापस ब्रह्म में मिल जाना।

        ब्रह्म की यह धारणा ईश्वर की धारणा का एक तरह से नकार थी, जिसे अपनी तार्किक परिणति तक अद्वैत वेदान्त के प्रस्तोता आदि शंकराचार्य ने पहुंचाया। उन्होंने घोषित कर दिया कि इस दुनिया का कोई अस्तित्व नहीं है, कि यह दुनिया माया है। एकमात्र सत्य ब्रह्म है। चूंकि दुनिया का अस्तित्व ही नहीं है, इसलिए बनाने वाले किसी ईश्वर के होने का सवाल ही नहीं उठता। दुनिया और ईश्वर के अस्तित्व को नकारने वाले इस दर्शन की बौद्ध दर्शन की महायान शाखा से इतनी ज्यादा समानता थी कि शंकर के विरोधी उन्हें प्रच्छन्न बौद्ध (छुपा हुआ बौद्ध) कहते थे। 

        मजेदार बात यह है कि दार्शनिक तौर पर दुनिया और ईश्वर के अस्तित्व को नकारने वाले शंकराचार्य ने हिन्दुओं के लिए चार धाम की स्थापना की। उनका मानना था कि ब्रह्म के ज्ञान के माध्यम से केवल कुछ ज्ञानी लोग ही मुक्ति पा सकते हैं, आमजन तो चारों धाम की यात्रा से मुक्ति पा जायेंगे। 

        शंकर के अद्वैत वेदान्त से अलग वेदान्त की अन्य शाखाओं- द्वैत वेदान्त, विशिष्ट द्वैत वेदान्त, द्वैत-अद्वैत वेदान्त,- ने दुनिया के अस्तित्व को स्वीकार किया तथा ब्रह्म की ईश्वरवादी व्याख्या की। इन्होंने ईश्वर के अस्तित्व के बारे में तर्क भी प्रस्तुत किये। 

        जहां तक न्याय-वैशेषक नामक ईश्वरवादी दर्शन का सवाल है यह भारत में परमाणुवादी दर्शन था, जिसका मानना था कि दुनिया परमाणुओं से बनी हुई है (परमाणु का मतलब उनके लिए प्रकाश की झिर्री में दिखने वाले सबसे छोटे कण के दो बार विभाजन से प्राप्त होने वाले कण था)। देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय जैसे दार्शनिकों का मत है कि न्याय-वैशेषक दर्शन भी शुरू में एक निरीश्वरवादी दर्शन था, पर विरोधियों द्वारा उठाये गये इस सवाल का कि परमाणु आपस में मिलकर चीजों का निर्माण कैसे करते हैं संतोषजनक उत्तर न दे पाने के कारण इसे ईश्वर की अवधारणा की शरण लेनी पड़ी जो परमाणुओं को आपस में जोड़कर चीजों का निर्माण करता है। लेकिन एक बार ईश्वर की धारणा स्वीकार कर लेने के बाद न्याय-वैशेषक दार्शनिकों ने शुद्ध ज्ञान शास्त्रीय आधार पर ईश्वर की धारणा के पक्ष में तर्क दिये वहीं वैशेषक दार्शनिकों ने विश्वशास़्त्रीय आधार पर। इन्होंने ही ईश्वर के पक्ष में घड़े का प्रसिद्ध उदाहरण दिया जिसे मीमांसा दार्शनिकों ने आंतरिक असंगतता से ग्रस्त बताकर खारिज कर दिया (यदि घड़े को कुम्हार बनाता है तो ईश्वर का अस्तित्व नहीं है और यदि घड़े को कुम्हार के पीछे से वास्तव में ईश्वर ही बनाता है तो यह केवल पुनर्कथन मात्र है। इससे ईश्वर का अस्तित्व साबित नहीं होता)। न्याय-वैशेषकों का मूल तर्क यह था कि जैसे घड़े के दो हिस्सों को जोड़कर कुम्हार घड़े का निर्माण करता है वैसे ही ईश्वर ही परमाणुओं को जोेड़कर दुनिया की ही चीज का निर्माण करता है। जैसे घड़े का एक रचयिता है वैसे दुनिया का भी एक रचयिता होना चाहिए जो कि केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर ही हो सकता है।

        भारत की दार्शनिक परम्परा में वेदों में आस्था रखने वाले यानी आस्तिक दर्शन दो और हैं। ये हैं सांख्य और योग। और ये दोनों ही निरीश्वरवादी हैं यानी ईश्वर को नहीं मानते। सांख्य दर्शन प्रकृति को ही प्रमुख मानता है जबकि योग शारीरिक क्रियाओं तथा ध्यान से संबंधित है। 

        भारत में इन छः आस्तिक दर्शनों के अलावा तीन नास्तिक दर्शन भी रहे हैं यानी जो वेदों में आस्था नहीं रखते। ये हैं लोकायत, बौद्ध तथा जैन दर्शन। ये तीनों भी निरीश्वरवादी दर्शन हैं।

        लोकायत भारतीय दर्शन परम्परा में सबसे दृढ़ भौतिकवादी और निरीश्वरवादी दर्शन रहा है। इसीलिए इसे सबसे ज्यादा दमन का सामना करना पड़ा है। दमन के कारण ही लोकायतिकों या चार्वाकवादियों की सारी रचनाएं नष्ट हो गयीं। यदि इनके बारे में कुछ मिलता है तो विरोधियों की रचनाओं में ही {लोकायतिकों ने खुलेआम घोषित किया था कि तीनों वेदों के रचियता भांड़, धूर्त और निशाचर हैं (त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्ड, धूर्त, निशाचरा)}। उन्होंने घोषित किया कि आत्मा-परमात्मा जैसी कोई चीज नहीं है। उन्होंने ब्राह्मणीय कर्मकाण्डों का भी भंडाफोड़ किया। पर इसके बावजूद प्राचीन काल में उनका दर्शन इतना महत्वपूर्ण था कि राजाओं को इसका अध्ययन करने की सलाह दी जाती थी।

        बौद्ध दर्शन का विकास बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के आधार पर हुआ। स्वयं गौतम बुद्ध ईश्वर के बारे में तर्क-वितर्क करना पसन्द नहीं करते थे और ईश्वर से संबंधित सवालों को अप्रासंगिक या निरर्थक बता कर टाल जाते थे। उन्होंने वेदों में आस्था के बदले तर्कबुद्धि पर भरोसा करने की बात कही। गौतम बुद्ध के काफी बाद जब बौद्ध दर्शन का विकास हुआ तो उसने दृढ़ निरीश्वरवादी रुख अपनाया, इसके बावजूद कि वह भौतिकवादी के बदले भाववादी था। खासकर महायान बौद्ध दर्शन में यह चरम पर पहुंचा जब दुनिया के अस्तित्व को नकार कर इसे शून्य घोषित करने वाले महायान दार्शनिकों ने ईश्वर के विरुद्ध बहुत सारे तर्क प्रस्तुत किये। यह आश्र्चजनक किन्तु सत्य है कि आत्मा और पुनर्जन्म में विश्वास करने वाले महायानी पूर्णतया निरीश्वरवादी थे। यह गौतम बुद्ध की मूर्तिपूजा के साथ-साथ चल रहा था। (भारत में पहली मूर्तियां गौतम बुद्ध और महावीर जैन की बनी थीं। बाद में हिन्दुओं ने भी देखा-देखी अपने देवी-देवताओं की मूर्तियां और उनके मंदिर बनवाने शुरू कर दिये)।

        बौद्ध दर्शन की तरह जैन दर्शन भी निरीश्वरवादी दर्शन था। उसके दार्शनिकों ने भी ईश्वर के विरुद्ध तर्क-वितर्क किये। जैन दर्शन का तर्क-शास्त्र खास तौर पर विकसित था जिसका उन्होंने ईश्वर की धारण को गलत साबित करने के लिए इस्तेमाल किया। 

        इस तरह देखा जाये तो भारतीय दर्शन का प्रमुख स्वर निरीश्वरवादी था। भारत के ज्यादातर दार्शनिक निरीश्वरवादी थे। पर इसके बावजूद दुनिया भर में भारत की पहचान एक आत्मिक (स्पिरिचुअल) देश के तौर पर है। यह सच है कि मध्य काल के पहले से ही भारत की बहुलांश आबादी ईश्वर को मानती आई है। केवल बौद्ध व जैन धर्म के अनुयाई तथा आदिवासी जन ही ईश्वर से अलग किसी अन्य देवी-देवता में विश्वास करते रहे हैं। निरीश्वरवाद मूलतः दार्शनिकों के बीच ही प्रचलित था। मध्यकालीन हिन्दू धर्म में तो शिव और विष्णु के राम व कृष्ण नामक अवतारों का बोलबाला रहा। इन सबको इस या उस रूप में ईश्वर से जोड़ा गया। पुराणकथाओं ने इन विश्वासों को कायम करने में बड़ी भूमिका निभाई। महाभारत की गीता और रामायण का भी इसमें योगदान रहा। 

        जब इस्लाम धर्म भारत आया तो यह अपने साथ एकेश्वरवादी धारणा साथ लेकर आया। मूर्ति पूजा का विरोधी होने के बावजूद एक सर्वशक्तिमान ईश्वर की धारणा इसकी भी विशेषता थी। 

        ईश्वर की धारणा पर सामान्य तौर पर बात करने को पहले पश्चिमी दर्शन पर भी इस संबंध में एक नजर डाल लेना अच्छा होगा। 

        यूनानी दर्शन का जन्म देवी-देवताओं को मानने वाले समाज में हुआ था। इसीलिए इसके दो सबसे महान दार्शनिकों यानी प्लेटो और अरस्तू के दर्शन में सीधे किसी ईश्वर की अवधारणा नहीं मिलती। दोनों ने ही प्रकृति को गति प्रदान करने वाली किसी शक्ति की कल्पना की थी। पर यह शक्ति न तो प्रकृति की रचयिता थी और न ही संचालक। 

        इनके बाद यूनानी दर्शन में ईश्वर की धारणा पैदा हुई जिसका एपीक्यूरस ने जोरदार खण्डन किया। एपीक्यूरस यूनान का चार्वाक था। ईश्वर को नकारने वाला उसका यह कथन बहुत मशहूर है: 

‘ईश्वर यदि दुनिया में फैली हुई बुराईयों को दूर करना चाहता है और नहीं कर सकता तो वह सर्वशक्तिमान नहीं है। यदि वह दूर कर सकता है और नहीं करता तो दिल का कुटिल है। यदि वह सक्षम है और चाहता है तो फिर बुराईयां क्यों हैं? यदि वह न तो सक्षम है और न चाहता है तो उसे ईश्वर क्यों कहा जाये।’

        चार्वाक की तरह एपीक्यूरस का भी कहना था कि यही जीवन ही सब कुछ है जिसे सबसे अच्छी तरह जीना चाहिए। इस जीवन के खत्म होने पर कुछ नहीं बचेगा। कहीं कोई स्वर्ग-नर्क नहीं है। चार्वाक की तरह एपीक्यूरस को भी भोगवादी कहकर उसकी भत्र्सना की गई जबकि वह और उसके अनुयाई सादगीपूर्ण और नैतिक जीवन जीते थे। 

        जब यूरोप में इसाई धर्म ने व्यापकता हासिल कर ली तो बाइबिल (न्यू टेस्टामेन्ट) की शिक्षाओं को दार्शनिक आधार प्रदान करने की कोशिश की गई। इस दिशा में पहला बड़ा प्रयास पांचवीं शताब्दी में सन्त अगस्तीन ने किया। अन्य बातों के अलावा अगस्तीन ने ईश्वर की दार्शनिक धारणा प्रस्तुत की। इसके लिए उसने नव-प्लेटोवाद का सहारा लिया। प्लेटो ने कहा था कि हर चीज का परिपूर्ण ‘फार्म’ मौजूद होता है तथा दुनिया की वास्तविक चीजें इसी परिपूर्ण ‘फार्म’ की अपूर्ण अनुकृतियां होती हैं। अब इस तर्क को आगे बढ़ाकर कहा जा सकता है कि इन सभी परिपूर्ण ‘फार्मो’ का भी एक परिपूर्ण ‘फार्म’ मौजूद होता है, अन्य ‘फार्म’ जिसकी अनुकृतियां होती हैं। यह सर्वोच्च परिपूर्ण ‘फार्म’ केवल ईश्वर ही हो सकता है क्योंकि ईश्वर ही सबसे परिपूर्ण है। यदि वह अस्तित्वमान नहीं है तो परिपूर्ण नहीं हो सकता। इसलिए ईश्वर को अस्तित्वमान होना चाहिए।

        संत अगस्तीन के काफी बाद संत अन्नसेलम ने भी उससे मिलता-जुलता तर्क दिया हालांकि उसमें प्लेटोवाद नहीं था। अन्नसेलम ने कहा कि एक सबसे बड़ी चीज की कल्पना की जा सकती है पर यदि यह केवल कल्पना में है वास्तविक तौर पर विद्यमान नहीं है, तो वह सबसे बड़ी नहीं हो सकती। कल्पना के साथ वास्तविक अस्तित्व उससे ज्यादा बड़ा होगा इसलिए इस कल्पित सबसे बड़ी चीज को अस्तित्वमान होना ही चाहिए और यही ईश्वर है। इसलिए ईश्वर का अस्तित्व है।

        ईश्वर के अस्तित्व को साबित करने के लिए इस तर्क पद्धति का बहुत लोगों ने मजाक बनाया। इसके जरिये शैतान से लेकर भांति-भांति की बकवास चीजों का अस्तित्व साबित किया गया।

        बाद में आने वाले संत टाॅमस अक्विनास, संत अन्नसेलम के तर्क से सहमत नहीं थे। उन्होंने स्वयं को अरस्तू के दर्शन पर आधारित कर ईश्वर के अस्तित्व को साबित करने का प्रयास किया। उसका प्रमुुख तर्क यह था कि कार्यकारण श्रृंखला का कहीं अंत होना ही चाहिए। यानी कोई पहला कारण होना ही चाहिए और वह ईश्वर ही हो सकता है। इसाई धर्म के सभी दार्शनिकों की तरह अक्विनास का भी मानना था कि वैसे तो ईश्वर के अस्तित्व का सवाल बाइबिल में आस्था से तय हैं पर यदि इसे दार्शनिक आधार प्रदान किया जाए तो यह और पुख़्ता हो जाता है। तर्क-वितर्क कि क्षमता ईश्वर ने इसीलिए दी भी है।

        रेने देकार्त के साथ पश्चिम में आधुनिक पश्चिमी दर्शन का जन्म हुआ। देकार्त भी आस्थावान इसाई थे। उन्होंने अपने दर्शन में ईश्वर के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किये। उनका एक तर्क संत अगस्तीन के तर्क की तरह का ही था। ईश्वर के बारे में विचार एक परिपूर्ण चीज का विचार है। चूंकि वास्तव में विद्यमान चीज अस्तित्वहीन चीज से ज्यादा परिपूर्ण होगी इसलिए ईश्वर का अस्तित्व होना ही चाहिए। देकार्त का एक दूसरा तर्क ज्यादा तकनीकी किस्म का था। देकार्त की तरह लेबनीज ने भी ईश्वर के पक्ष में तर्क प्रस्तुत किये पर स्पिनोजा ने ईश्वर को नकार कर संपूर्ण प्रकृति को ही ईश्वर घोषित कर दिया। इसके दंड स्वरूप यहूदी धर्म ने उन्हें अपने धर्म से निष्कासित कर दिया। पुरोहित बर्कले ने जहां ईश्वर के अस्तित्व को साबित करने के लिए ही अपने अनुभववादी दर्शन की रचना की वहीं उनके बाद आने वाले संदेहवादी अनुभववादी ह्यूम ने ईश्वर से किनारा कर लिया। कान्ट तो और आगे गये और उन्होंने अपने दर्शन में विस्तार से बताया कि तर्कों के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को नहीं साबित किया जा सकता। इसके बावजूद कान्ट ईश्वर में विश्वास करते थे और उन्होंने कहा कि उन्होंने तर्क बुद्धि की सीमा इसलिए साबित की कि ईश्वर में आस्था को बल प्रदान किया जा सके।

        पश्चिमी दर्शन में निरीश्वरवादियों की एक बहुत मजबूत परम्परा रही है। इसमें सर्वोच्च हैं फ्रांसीसी दार्शनिक - मैत्री, होस्बाज, हेल्वेनियस, देनी दिदेरो, इत्यादि। बाद में इस परम्परा को माक्र्सवाद ने आगे बढ़ाया। 

        दार्शनिकों ने हजारों सालों से ईश्वर के पक्ष-विपक्ष में तर्क किये हैं। जहां ईश्वर के पक्ष में तर्कों ने भांति-भांति के धर्मों को वैचारिक आधार प्रदान किया वहीं इसके विरोधियों ने तर्कों के माध्यम से ईश्वर में आस्था को समाप्त करने का प्रयास किया। अनुभव ने दिखाया कि निरीश्वरवादियों के तर्कों से जन-मानस में व्याप्त ईश्वर में आस्था को नहीं समाप्त किया जा सकता था। इसका कारण स्वयं ईश्वर की अवधारण की उत्पत्ति में ही था।

        सुदूर अतीत आदिम साम्यवाद का मानव सहज भौतिकवादी था। वह अपने आस-पास की प्रकृति को उसी रूप में लेता था। पर तब भी यह प्रकृति उसके लिए रहस्यमय थी और अक्सर ही काफी क्रूर भी। आदिम मानव का जीवन न केवल अभाव से ग्रस्त था बल्कि भांति-भांति के संकटों से भी। हिंसक जानवरों से लेकर बिमारियां तक उसे घेरे रहते थे। प्रकृति का सामान्य मौसमी चक्र भी उसके लिए परेशानी का कारण था। 

        अपने आस-पास की प्रकृति से जूझते हुए आदिम मानव ने धीमे-धीमे प्रकृति का मानवीकरण शुरु किया। उससे अपने जीवन को सम्बन्धित किया। यहीं से प्रकृति की शक्तियों रूपी देवी-देवताओं की धारणा की उत्पत्ति हुयी। इसी तरह मृत्यु और सपनों जैसी चीजों से जूझते हुए शरीर में निवास करने वाली आत्मा की धारणा भी पैदा हुई।

        एक लम्बे समय तक मानव इन्हीं देवी-देवताओं और आत्माओं में विश्वास करता रहा। यहां तक कि शुरुआती वर्गीय समाज में भी यही था। पर जब समय के साथ बड़े राज्य पैदा हुये तब राजा के समान्तर उसकी परिपूर्ण अनुकृृति के तौर पर एक सर्वशक्तिमान, सर्वविद्यमान और सर्वज्ञानी ईश्वर की धारणा पैदा हुई। अक्सर ही धर्म ग्रन्थों में ईश्वर का जो वर्णन मिलता है। वह किसी बड़े राजा का ही चित्र होता है। इसका सबसे प्रतिनिधिक उदाहरण इसाईयों के न्यू टेस्टामेण्ट का ‘प्रकाशन’ नामक अध्याय है। इसमें विस्तार से ईश्वर और उसके दरबार का चित्रण किया गया है। 

        ईश्वर की धारणा पैदा हो जाने के बाद उसके समर्थन में भांति-भांति के तर्कों का सामने आना भी स्वभाविक था। खासकर ईश्वर को नकारने वाले विरोधियों की बातों का जवाब देने के लिए। पर इन सबके मूल में कुछ बातें समान थीं। 

        इतनी विशाल बहुरंगी और जटिल दुनिया को बनाने और चलाने वाला कोई होना चाहिए। यह अपने आप अस्तित्व में नहीं आ सकती। और न हमेशा से विद्यमान हो सकती है। क्योंकि हर चीज की कभी न कभी तो शुरुआत होती है। दुनिया की विशालता और जटिलता के कारण ही इसका कर्ता कोई सर्वशक्तिमान, सर्वविद्यमान, सर्वज्ञानी ईश्वर ही हो सकता है। 

        ईश्वर की यह अवधारणा दुनिया की सबसे सरल व्याख्या पेश करती है। सभी कुछ को ईश्वर के हवाले कर दिमाग पर जोर डालना बन्द किया जा सकता है। यह इस हद तक था कि स्वयं ईश्वर को किसने बनाया? और यदि ईश्वर स्वतः विद्यमान हो सकता है तो अपने नियमों से संचालित यह प्रकृति क्यों स्वतः विद्यमान नहीं हो सकती? 

        पर ईश्वर की धारणा का सम्बन्ध केवल दुनिया की व्याख्या से ही नहीं था। ईश्वर की धारणा वर्गीय समाजों की उत्पत्ति के साथ आयी थी। और वर्गीय समाजों ने अधिकांश लोगों के जीवन को अत्याचार, अन्याय, दमन, शोषण से भर दिया था। आदिम साम्यवाद का  भाईचारा समाप्त हो गया था। ऐसे में दुःखी-पीड़ित मानव के लिए एक सहारे की जरूरत थी। ईश्वर की धारणा ने इस सहारे का काम किया और खूब किया।

        एक ईश्वरवादी या ईश्वर में विश्वास करने वाले के लिए ईश्वर उसकी हर समस्या का समाधान है। यदि समस्या स्वयं ईश्वर ने पैदा की है (और उसकी इच्छा के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता) तो भी इसमें कुछ भला ही छिपा होगा। हो सकता है, ईश्वर उसकी परीक्षा ले रहा हो। इस दुनिया में चाहे जितना कष्ट होगा, मृत्यु के बाद ईश्वर उसे सुख ही सुख प्रदान करेगा। अच्छे लोगों को स्वर्ग मिलेगा और बुरे लोगों को नरक। कयामत के दिन हर किसी को ईश्वर के सामने पेश होना पड़ेगा। वहां बुरे लोग दंडित किये जायेंगे और अच्छे लोग पुरुस्कृत। 

        ईश्वर का यह सम्बल इतना प्रबल था कि हजारों सालों तक लोग दृढ़तापूर्वक उसमें विश्वास करते रहे और निरीश्वरवादियों की सारी बातें निष्प्रभावी होती रही। ईश्वर की इसी स्थिति के कारण सारे धर्मों में ईश्वर एक अनिवार्य तत्व था। धर्म ईश्वर की धारणा पर ही टिका होता था। यहां तक कि निरीश्वरवादी बौद्ध और जैन धर्म के आम अनुयाईयों ने गौतम बुद्ध और महावीर जैन को ही ईश्वर का दर्जा दे दिया और उनकी पूजा करने लगे। 

        केवल आधुनिक काल में आकर ही धर्म और ईश्वर के बारे में व्यापक तौर पर सवाल खड़े होने शुरु हुए। पूंजीवाद की शुरुआत में ईश्वर को मानते हुए धार्मिक सुधार आन्दोलन शुरु हुए पर धीमे-धीमे ईश्वर को नकारने की ओर मामला उन्मुख हुआ। इसमें वैज्ञानिकों के साथ-साथ महान फ्रांसीसी क्रांति की वैचारिक जमीन तैयार करने वाले दार्शनिकों और स्वयं फ्रांसीसी क्रांति ने बड़ी भूमिका निभाई। 

        उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब मजदूर वर्ग का क्रांतिकारी आन्दोलन शुरु हुआ तो धर्म और ईश्वर के खिलाफ आन्दोलन ने एक सुगठित रूप धारण कर लिया। नयी बनने वाली मजदूर पार्टियों ने सचेत तौर पर विज्ञान और वैज्ञानिक सोच पर जोर दिया तथा ईश्वर और धर्म के विरुद्ध प्रचार किया। इसका नतीजा हुआ कि मजदूर वर्ग में धर्म और ईश्वर का प्रभाव घटने लगा।

        इसमें एक बड़ी छलांग तब लगी जब रूस में क्रांति हुुई। रूस (या बाद में सोवियत संघ) की करीब पन्द्रह करोड़ आबादी एक झटके से धर्म से दूर हो गई। वहां नयी पीढ़ी पूरी तरह से निरीश्वरवादी बन गई। यही स्थिति बाद में उन देशों में भी पैदा हुई जहां समाजवाद कायम हुआ।

        इस बीच पूंजीवादी दुनिया में भी बदलाव हो रहा था। विज्ञान लगातार आगे बढ़ रहा था और अपनी तकनीकी इजाद से अपना प्राधिकार स्थापित कर रहा था। अब यह नहीं कहा जाता था कि ‘बाइबिल यह कहती है’ बल्कि यह कहा जाता था कि ‘विज्ञान यह कहता है’। समाजवाद और मजदूर आन्दोलन के दबाव में पूंजीवादी देशों के शासकों को ‘कल्याणकारी राज्य’ की ओर कदम बढ़ाना पढ़ रहा था। इससे जनता के जीवन में कुछ सुरक्षा महसूस हो रही थी और इस कारण ईश्वर की जरूरत कम हो रही थी।

        उपरोक्त सब का ही नतीजा है कि आज यू.के., इटली और फ्रांस जैसे विकसित पूंजीवादी देशों में अधिकांश आबादी या तो सीधे-सीधे निरीश्वरवादी है या फिर अज्ञेयवादी (पता नहीं कि ईश्वर है या नहीं)। मुश्किल से पांच-दस प्रतिशत लोग चर्च जाते होंगे। यह तब जब पिछले सालों में प्रतिक्रियावादी शासकों ने हर प्रतिक्रियावादी विचार को प्रोत्साहित किया है।

        पर पिछड़े पूंजीवादी देशों में स्थिति भिन्न है। यहां धर्म और ईश्वर की जकड़न अभी भी बहुत ज्यादा है। ‘कल्याणकारी राज्य’ का आभाव, शोषण-दमन की इंतहा लोगों को इससे मुक्त नहीं होने देती बल्कि और ज्यादा उधर धकेलती है। स्थापित धर्मों से असंतुष्ट होने के बाद लोग बाबाओं-साधुओं, दरगाहों के चक्कर में पड़ते हैं।

        दर्शन के हजारों सालों के इतिहास में ईश्वर की धारणा के विरुद्ध हर तरीके के तर्क मौजूद हैं। विज्ञान के विकास ने इसमें और इजाफा किया है। प्रकृति की और खासकर जैविक जगत की सफल व्याख्या के कारण अब मानव के आस-पास मौजूद दुनिया की व्याख्या करने के लिए ईश्वर की धारणा की जरूरत नहीं रह गई है। लेकिन एक तो व्यापक जनता तक इस व्याख्या की पहुंच नहीं है, दूसरे दुःखों-कष्टों से सराबोर जनता के लिए अभी भी ईश्वर नाम के सम्बल की जरूरत बनी हुई है। चूंकि यह जरूरत बनी हुई है इसीलिए समाज के सारे प्रतिक्रियावादी इसका फायदा उठा रहे हैं। इसमें पंडित-मुल्ला, बाबा-साधु, मठाधीश, पूंजीपति वर्ग और उसकी सत्ता चलाने वाले सभी शामिल हैं। जिससे उनका व्यवसाय और राज चलता रहे। ईश्वर के सहारे बैठा व्यक्ति क्रांति करने के लिए आगे नहीं बढ़ेगा।

        ऐसे में जनता में व्याप्त ईश्वर में आस्था को समाप्त करने के लिए केवल दार्शनिक और वैज्ञानिक तर्क-वितर्क ही पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि उसे समाज परिवर्तन की प्रक्रिया में खींचा जाये। केवल अन्याय-अत्याचार और शोषण-दमन से मुक्ति के लिए क्रांतिकारी संघर्ष में गोलबंद होकर ही जनता एक नया सम्बल हासिल कर सकती है और ईश्वर नामक सम्बल को त्याग सकती है। आम नवयुवकों और नवयुवतियों के लिए भी यही सच है और उनके मामले में यह अपेक्षाकृत आसान भी है। एक बार ईश्वर नामक सम्बल से मुक्त होकर नये समाज का निर्माण करने का प्रचार करने वाले लोग यदि सफल हो गये यानी नये समाज का निर्माण शुरु हो गया (क्रांति के बाद) तो क्रांति और नव-निर्माण की इस प्रक्रिया में खिंचकर बाकी व्यापक आबादी भी ईश्वर नामक सम्बल का सहारा लेना बन्द कर देगी। शोषकों और शोषण के खात्मे के साथ उसका सह-उत्पाद धर्म और ईश्वर भी खत्म हो जायेगा। इंसान स्वयं अपना स्वामी बन जायेगा। तब हर किसी के लिए यह तथ्य सामान्य सी बात हो जायेगा कि सुदूर अतीत में ईश्वर ने इंसान का निर्माण नहीं किया था बल्कि निकट अतीत में (इंसान के समग्र इतिहास को देखते हुए) इंसान ने ईश्वर का निर्माण किया था।

(नोट: सरल रूप में ईश्वर के बारे में तर्क-वितर्क के लिए शहीद भगत सिंह का लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ जरूर पढ़ें। आज आम जन में निरीश्वरवादियों यानी ईश्वर को न मानने वालों के लिए नास्तिक शब्द ही प्रचलित है।)

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