दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगें
आजाद थे, आजाद हैं, आजाद ही रहेंगें।
-महेश
ब्रिटिश साम्राज्यवाद की गुलामी में पैदा हुए, साम्राज्यवाद की प्रत्यक्ष जकड़न के विरूद्ध खड़े हुए चन्द्रशेखर आजाद ने कभी गुलामी स्वीकार नहीं की। उन्होंने अपनी तरह के उत्साही, जुझारू, संघर्षशील नौजवानों को साथ लेकर गुलामी में रह रहे अपने प्यारे वतन भारत से साम्राज्यवाद की बेड़ियों को काट डालने की कसम ली। राष्ट्र मुक्ति व इंकलाब के इस संघर्ष में अशफाक उल्ला खाँ, बिस्मिल, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद आदि नौजवान शहादत की अनन्त ऊंचाईयों तक जा पहुंचे, संघर्ष के प्रतीक बन चुके इन महान वीरों की शहादतें अपने बाद आने वाली तमाम पीढ़ियों के नौजवानों की रगो में अन्याय के प्रति आक्रोश पैदा करती रही हैं। प्यारे वतन की मुक्ति के लिए शहादतें दी हैं।
चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के झाबुआ, वर्तमान (अलीराजपुर) जिले के भांवरा, वर्तमान (चन्द्रशेखर आजाद नगर) गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी था। इनका जन्म एक कटट्र सनातन धर्मी निम्न मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनकी माताजी का नाम जगरानी देवी था। इनका बचपन भांवरा गांव ; आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में बीता। जहाँ बचपन में ही इन्होंने धनुष-बाण चलाने व निशाने बाजी सीख ली थीं। पिता आजाद को संस्कृत पढा़कर वेद ज्ञाता और विद्वान बनाना चाहते थे, पर आजाद की रूचि पढा़ई में न पाकर पिता ने उनको अलीराजपुर तहसील में एक नौकरी में लगा दिया। आजाद को नौकरी की जी हुजुरी का काम बर्दाश्त नहीं हुआ। एक दिन वह नौकरी छोड़कर घर से भागकर पहले बम्बई पहुँचे फिर बनारस जा पहुँचे। 14 वर्ष की उम्र में बनारस में रहकर संस्कृत पढ़ने लगे।
उस समय का दौर अपने आप में संघर्षाें का दौर था देश की जनता आजादी के लिए छटपटा रही थी। देश के कोने-कोने में संघर्ष चल रहे थे। ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लोग आक्रोश से भरे हुए थे। जगह-जगह नौजवानों के संघ बन रहे थे। वह अपने प्राणों तक की बाजी लगाने को तैयार बैठे थे। ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ते हुए शहीद होने का मतलब अपनी मातृभूमि का ऋण चुकाना होता था और मातृभूमि का ऋण चुकाने के लिए नौजवान हमेशा तैयार रहते थे।
ऐसे समय में जब जनता, देश किसी दूसरे मुल्क के प्रत्यक्ष गुलाम हों। देश संघर्ष की आग में जल रहा हो। ऐसे में देशभक्त, संघर्षशील नौजवान, क्रांतिकारियों का पैदा होना स्वाभाविक था।
1919 के जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड ने चन्द्रशेखर आजाद को काफी व्यथित किया। निहत्थे हजारों भारतीयों के मारे जाने के कारण वह ब्रिटिश साम्राज्यवादियों से काफी आक्रोश से भरे हुए थे। उसी समय में असहयोग आंदोलन ने काफी विस्तार पाया। बनारस शहर भी इससे अछूता ना रहा। बनारस में वि़द्यार्थी स्कूल-काॅलेज के बजाय आंदोलन में शरीक होने लगे। इसी उत्साहपूर्ण माहौल में कुछ किशोर बालकों ने ‘‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’’, ‘‘इंकलाब जिन्दाबाद’’ आदि नारे लगाते हुए जूलूस निकाला। पुलिस को किशोर बालकों का यह जुलूस बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने जुलूस को तितर-बितर कर 2-3 बालकों को गिरफ्तार कर लिया। इन्हीं में से एक 15 वर्षीय चन्द्रशेखर आजाद भी थे। मजिस्ट्रेट के सामने जब आजाद को पेश किया गया। मजिस्ट्रेट के सामने अपना नाम ‘‘आजाद’’ पिता का नाम ‘‘स्वतंत्र’’ और घर ‘‘जेलखाना’’ बताने वाले इसी साहसी बालक को 15 बेतों की सजा सुनायी गयी। इस घटना के बाद से चन्द्रशेखर नाम के आगे आजाद भी जुड़ गया।
असहयोग आंदोलन के दौरान गोरखपुर के चैरी-चैरा में सत्याग्रह करती जनता को अंग्रेजों की पुलिस ने गोलियों से भून दिया। 26 लोग शहीद हो गये। जनता के सब्र का बांध टूट गया और लोग बगावत पर उतर पड़े। उन्होंने चैरी-चैरा के पुलिस थाने में आग लगा दी। 21 सिपाहियों व थानेदार की मौत हो गयी। इस साहसपूर्ण कार्यवाही से जहाँ देशभर के मेहनतकश नौजवानों में उत्साह और लड़ने-मरने का जोश पैदा हुआ, वहीं दूसरी ओर गांधी जी ने इस घटना को लेकर हिंसा का विरोध करते हुए आंदोलन को स्थगित करके संघर्षशील लोगों का जोश ठंडा कर दिया। इसके साथ ही गांधी व कांग्रेस से आजाद जैसे नौजवानों का मोह भंग हुआ और वह देश को आजाद करने के लिए क्रांतिकारी तरीकों की ओर अग्रसर हुए।
आजाद का पहले से पढा़ई में मन नहीं लग रहा था। वह मन्मथनाथ गुप्त व प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये। ‘‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’’ (एच.आर.ए.) के सदस्य बन गये। जिसका उद्देश्य भारत को अंग्रेजों से आजाद कराकर सम्मिलित राज्यों का ऐसा प्रजातंत्र संघ बनाना था, जिसमें बालिग मताधिकार वाले शोषण रहित समाज की स्थापना हो।
एच.आर.ए. को प्रचार-प्रसार एवं हथियारों को खरीदने के लिए पैसों की आवश्यकता थी। दल की बुरी हालत देखकर रेल में डाका डालकर सरकारी खजाना लूटने की योजना बनी। 9 अगस्त 1925 को रात में शाहजहाँपुर-लखनऊ के बीच काकोरी स्टेशन पर राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजादी के इन मतवालों ने ट्रेन को लूट लिया। काकोरी की इस घटना ने अंग्रेजो को चुनौती पेश की। दल के काफी सारे नौजवान गिरफ्तार कर लिये गये। परन्तु चन्द्रशेखर आजाद को पुलिस ढूंढ़ पाने में नाकाम रही।
काकोरी काण्ड के क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी व 4 लोगों को- राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ, रोशन सिंह और राजेन्द्र नाथ लाहिड़ी को फांसी पर चढ़ा दिया। भारी संख्या में गिरफ्तारी ने दल को काफी कमजोर किया। कामों में कमी भी आ गयी। लेकिन आजाद खाली बैठे नहीं रहे। उन्होंने दल को फिर से खड़़ा करने के लिए हाथ पैर मारने शुरू कर दिये।
दल की जिम्मेदारी अब सीधे तौर पर आजाद के हाथों में आ गयी थी व काकोरी काण्ड के बाद दल के निर्विवाद नेता के तौर पर उभर कर आ गये थे। लोगों को पहचानने व उनको जोड़ने में उनको महारत हासिल थी। पुलिस व खूफियां लोगों से कैसे बचा जाये इसको भी वह अच्छे से जानते थे।
इसी दौरान लाहौर में भगवती चरण बोहरा, भगत सिंह, यशपाल के नेतृत्व में कार्यरत ‘‘नौजवान भारत सभा’’ को एच.आर.ए. का पर्चा प्राप्त हुआ। प्रताप नामक अखबार के राष्ट्रीय संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी के जरिये आजादी के दोनों दिवानों चन्द्रशेखर आजाद व भगत सिंह की कानपुर में मुलाकात हुई।
9 दिसम्बर 1928 को देश के प्रमुख क्रांतिकारियों की दिल्नी के फिरोजशाह कोटला किले के एक खण्डहर में बैठक हुई। इसी बैठक में दल का नाम हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (हिन्दुस्तान समाजवादी प्र्रजातांत्रिक संघ) रखा गया जिसका उद्देश्य समाजवाद की स्थापना था। इसी में सात सदस्यों की एक केन्द्रीय समिति का गठन हुआ। इसमें भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद, फणीन्द्रनाथ घोष, विजय कुमार, शिववर्मा, सुखदेव और कुन्दन लाल थे। संघ के कामों को योजनाबद्ध कर कामों की जिम्मेदारी बांटी गयी। चन्द्रशेखर आजाद संघ के अध्यक्ष व सैन्य विभाग के नेता चुने गये।
एच.एस.आर.ए. लगातार गतिविधियों में सक्रिय रहा, 1928 में साइमन कमीशन भारत आया। जिसका व्यापक विरोध हुआ। इसी में लाला लाजपत राय की अंग्रेजों की लाठियों से मौत हो गई। दोषी पुलिस अफसर सांडर्स को मौत के घाट उतार कर एच.एस.आर.ए. ने लाला जी की मौत का बदला ले लिया। आजाद यहाँ भी पुलिस से बचते-बचते भाग रहे थे।
1929 में अंग्रेज सरकार ने जब दमन के 2 नये कानून सार्वजनिक सुरक्षा कानून और औद्योगिक विवाद कानून बनाने का प्रयास किया तो एच.एस.आर.ए. ने इन कानूनों को जनता की स्वतंत्रता की भावना के हनन होने की बात चिन्हित की। तय किया कि इस दमनकारी नीति का असेम्बली में बम फेंककर विरोध किया जाए। गिरफ्तार होकर यह लोग अदालत से अपने कार्यक्रम व उद्देश्य की घोषणा करेंगे। आजाद गिरफ्तारी के पक्ष में नहीं थे। परन्तु अन्य लोगों की राय के चलते उनको सहमत होना पडा़।
असेम्बली बम काण्ड के बाद गिरफ्तारियों का दौर चल पड़ा। कई सारे लोग गिरफ्तार कर लिये गये। परन्तु आजाद फिर भी गिरफ्तार नहीं हो सके। गिरफ्तार साथियों को जेल से छुड़ाने की आजाद की दिमाग में योजना बनने लगी। यह योजना क्रियान्वित नहीं की जा सकी और भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू को फांसी की सजा सुना दी गयी। आजाद ने इन लोगों की फांसी की सजा को रद्द करने के लिए गांधी जी के पास प्रस्ताव भेजा। जो कि उस समय लार्ड इरविन से वार्ता करने जा रहे थे। गांधी जी ने क्रांतिकारियों के बारे में वहां बात करना भी उचित नहीं समझा।
एच.एस.आर.ए. का ढांचा गिरफ्तारियों के चलते कमजोर पड़ गया। आजाद ने कुछ संदेहों के चलते 4 सितम्बर 1930 को केन्द्रीय समिति को भंग कर दिया। ताकि दल का नये सिरे से गठन हो सके। दल जब विघटन के दौर में गुजर रहा था, तभी कुछ साथियों ने आजाद के सामने रूस जाने का प्रस्ताव रखा, तो आजाद ने उत्तर दिया ‘‘मैं रूस-फूस नहीं जाता, मेरा देश इस समय आजादी का युद्ध लड़ रहा है। ऐसे समय में देश से बाहर नहीं जाऊंगा, यह रण में पीठ दिखाने के समान होगा। मेरी देश में ही आवश्यकता है और मैं जीवन में अंतिम सांस तक शत्रु से लड़ता रहूंगा।’’
आजाद खुद के रूस जाने पर सहमत नहीं हुए परन्तु सुरेन्द्र नाथ पाण्डेय, यशपाल व वैशम्पायन को रूस भेजने का इंतजाम कर रहे थे। 27 फरवरी को 1931 को सुरेन्द्रनाथ पाण्डेय व यशपाल कुछ सौदा खरीदने के लिए इलाहाबाद चैक में जाने का कार्यक्रम तय करते हैं तो आजाद भी उन्हें अल्फ्रेड पार्क में किसी से मिलना है, यह कहते हुए उनके साथ हो लेते हैं। अल्फ्रेड पार्क में उन्हें सुखदेवराज मिलते हैं, आजाद और सुखदेवराज पार्क में चले जाते हैं। कोई मुखबिर आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना पुलिस को दे देता है। 60 पुलिस कर्मियों के दल ने एस.पी. नटबाबर के नेतृत्व में आजाद को चारों ओर से घेर लिया। इस मुठभेड़ में आजाद ने एस0पी0 नटबाबर को ही अपना निशाना बनाया। आजाद की जांघ की हड्डी व फेफड़े, एक बाह को गोली छलनी कर चुकी थी। इसके बाद भी वह लगातार लड़ते रहे। कितनी गोली पिस्तोल में बची हुयी थीं, यहआजाद को याद था। बचने का कोई रास्ता ना पाकर आजाद ने अन्तिम गोली अपनी कनपटी पर दाग दी और शहीद हो गये। पुलिस के हाथों अपने न पड़ने का प्रण भी निभाया। आजाद के पास जाने का साहस फिर भी पुलिस वाले नहीं कर पा रहे थे। आजाद की मृत्यु का अंदाजा लगाने के लिए पुलिस वाले उनके पैर में गोली भी मारते हैं। तब जाकर उनको आजाद की मौत पर विश्वास होता है। यहीं आजाद की जीवनलीला समाप्त हो जाती है।
आजाद की शहादत की खबर पाकर जनता अल्फ्रेड पार्क की ओर दौड़ती है। इस अमर शहीद के खून से सनी मिट्टी को अपने माथे से भी लगाती है और साथ में रख लेती है। ब्रिटिश सरकार को यह भी सहन नहीं होता है। वह पार्क में इस पेड़ को ढहा देती हैै। आजाद की शहादत की जगह की निशानी को मिटा देती है।
आजाद स्त्रियों की बहुत इज्जत करते थे और ना ही स्त्रियों के बारे में उन्हें मजाक पसन्द था। अपने जीवन साथिनी केे बारे में एक बार उन्होंने यशपाल से कहा था कि ‘‘मैं तो एक ऐसी स्त्री से शादी करना चाहता हूँ कि कांग्रेस वाले अंग्रेजों से समझौते कर भी लें तो हम सरहद पार चले जायें। वह राईफल भरते जाए, मैं दनादन चलाता जाऊं। इसी तरह हम समाप्त हो जायें।
जनता के पैसे को वह धरोहर समझते थे। वह प्रायः तीसरे दर्जे में सफर करते थे। सुरक्षा की दृष्टि से जब लोगों ने उनको दूसरे दर्जे में सफर करने को कहा तब आजाद ने उत्तर दिया जनता आज विश्वास करती है, कल जब मैं दूसरे दर्जे में सफर करूंगा तो जनता का विश्वास उठ जायेगा। वे अपने ऊपर दल का पैसा खर्च नहीं करते थे परन्तु अपने साथियों का सुख-सुविधा का पूरा ख्याल रहता था। सारे मूल्यांकन के बाद ही दल की जिम्मेदारी किसी साथी को सौंपते थे। इन्हीं गुणों के चलते ही वह एच.एस.आर.ए. के योग्य संगठनकर्ता व कमाण्डर इन-चीफ थे।
तत्कालीन अंग्रेज सरकार क्रांतिकारियों का भयंकर दमन करती थी। गुप्त काम करने में आजाद बेजोड़ थे। अलग-अलग भेष धरना, ब्रिटिश हुकूमत के खुफियाओं से बचना आजाद अच्छे से जानते थे। यह उनकी जीवन शैली में शामिल था। कई मौकों पर आजाद की तत्परता से दल के कई लोग आजाद के कारण ब्रिटिश जासूसों से बचते थे।
आजाद ने पूरा जीवन दल के कामों व देश की आजादी के लिए समर्पित कर दिया था। एक दिन भगत सिंह ने कहा था कि आप अपने घर का पता बता दीजिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम आपके परिवार की मद्द कर सकें। इस पर आजाद ने बिगड़ते हुए जवाब दिया। इतिहास में मुझे अपना नाम नहीं लिखवाना है और ना परिवार वालों को किसी की सहायता चाहिए। अब कभी यह प्रसंग मेरे सामने नहीं आना चाहिए। मैं इस तरह नाम, यश, और सहायता का भूखा नहीं हूँ।
आजाद सांगठनिक कार्याें में कठोर अनुशासन के बड़े हिमायती थे। जीवन भर इस अनुशासन से खुद को बांधे रखा बल्कि साथियों से भी इसके लिए संघर्ष किया।। अंग्रेज हुकुमत के लिए यह अत्यन्त आवश्यक भी था।
उनके राजनीतिक विचार लगातार विकसित होते जा रहे थे। इसकी परिपक्वता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह रूसी समाजवादी माॅडल की स्थापना भारत में करने के लिए तत्पर थे। समाजवादी विचारों के प्रभाव के कारण ही वह अपने ब्राह्मणी खान-पान, रहन-सहन, धार्मिक विचारों में बदलाव को मजबूर हुए। अपने बाल्य जीवन में पढा़ई से नाता तोड़ चुके आजाद बाद में रोजाना अखबार पढ़ते, साहित्य का अध्ययन करने, माक्र्सवाद की गहराईयों की ओर जाने लगे।
आजाद को गाना गाने या सुनने का शौक नहीं था लेकिन फिर भी वह कभी-कभी कुछ शेर कहा करते थे।
‘‘टूटी हुई बोतल है टूटा हुआ पैमाना
सरकार तुझे दिखा देंगे ठाठ फकीराना’’
‘‘ दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे।
आजाद ही रहे हैं आजाद ही मरेंगे।’’
आजाद द्वारा लिखित कविता (मां) का अंश
‘‘मां हम विदा हो जाते हैं, हम विजय केतु फहराने आज
तेरी बलिवेदी पर चढ़कर मां निज शीश कटाने आज।’’
आजाद ने कुछ वचन किये या कुछ प्रण किये थे।
‘‘जिस राष्ट्र ने चरित्र खोया उसने सबकुछ खोया’’
‘‘मैं जीवन की अंतिम सांस तक देश के लिए शत्रु से लड़ता रहूंगा’’
‘‘जब तक यह बमतुल बुखारा (आजाद पिस्तौल को इसी नाम से पुकारते थे) मेरे पास है किसी ने मां का दूध पिया है जो मुझे जीवित पकड़ ले जाए। आजाद की कलाई में हथकड़ी लगाना बिल्कुल असम्भव है। एक बार सरकार लगा चुकी, अब तो शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो जाऐंगे, लेकिन जीवित रहते पुलिस बन्दी नहीं बना सकती।’’
अपने आदर्श चरित्र की जो मिशाल आजाद ने पेश की वह आज भी नौजवानों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। आजाद की जनभावना के साथ पक्षधरता बेजोड़ थी। वह उच्च कोटी के संगठनकर्ता थे। उनका एक साहसिक व्यक्तित्व था। भगत सिंह के साथ आने से वे समाजवाद की ओर आकर्षित हुए और एक समतामूलक समाज की स्थापना आजाद का उद्देश्य बन गया।
आजाद जिस भारत के निर्माण के लिए शहीद हो गये वह भारत आज भी अधूरा है। आजाद के सपनों का भारत हासिल करना आज छात्रों-नौजवानों का कार्यभार बनता है। जिन साम्राज्यवादियों को भगाने के लिए आजाद शहीद हुए। वही आजाद भारत के शासक अंग्रेजों व अन्य साम्राज्यवादियों के साथ सांठ-गांठ बढ़ा रहे हैं। शहीदों की भावनाओं को कुचल रहे हैं। आजाद के व्यक्तित्व की अच्छाइयों को ग्रहण कर उनके बताये रास्ते पर चलने की जरूरत है।
आजाद का जज्बा आज भी हमें प्रेरणा देता है। आजाद उन चन्द लोगों में से हैं जिन्होंने अपनी जवानी की मिसाल अपने खून से रची। निश्चय ही शोषण-अन्याय के खिलाफ जंग में सैकड़ों आजाद तुमने पैदा किये हैं और करते रहोगे।
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