मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

निजी शिक्षण संस्थानों का फैलता जाल

        साल दर साल, सरकार दर सरकार शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देने से आज निजी शिक्षण संस्थानों का जाल पूरे देश में फैल चुका है। उच्च शिक्षा में निजीकरण बहुत ऊंचे मुकाम पर पहुंच चुका है। तमाम छात्र तो इन निजी संस्थानों की फीसें ना चुका पाने के कारण अपनी पढ़ाई ही जारी नहीं रख पाते। नेशनल सैम्पल सर्वे की रिपोर्ट बताती है कि 2007-08 पर प्रति छात्र निजी व्यय 2461 था जो कि 2014 में बढकर 6788 हो गया। यानी छात्रों के शिक्षा में निजी व्यय 175.8 फीसदी की वृद्धि हो गयी। नेशनल सैम्पल सर्वे 2014 के अनुसार 18 से 24  आयु वर्ग के लगभग 4.49 करोड़ छात्रों की आर्थिक स्थिति उच्च शिक्षा लेने की नहीं है। यह छात्र उच्च शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते।

        निजी शिक्षण संस्थानों ने छात्रों-अभिभावकों की जेबों में डाका डाला हुआ है। शिक्षा से जुड़ी ये दुकानें शिक्षा को व्यापार और छात्रों को ग्राहक के अतिरिक्त कुछ नहीं समझती। इनकी निगाहें सिर्फ मुनाफे पर टिकी होती है। मुनाफा भी कम नहीं भारी मुनाफा। एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था के अनुसार भारत में शिक्षा का बाजार लगभग 46 हजार करोड़ रूपये का है। जो कि 18 फीसदी की दर से बढ़ भी रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में इस भारी मुनाफे को देखकर ही देशी-विदेशी पूंजीपति वर्ग यहां निवेश कर रहा है। हमारे देश की केन्द्र व राज्य सरकारें उन्हें इस लूट-मार की खुली छूट दिये हुए हैं।

        2014-15 में उच्च शिक्षा में 3.42 करोड दाखिले हुए जिसमें से 2.2 करोड़ यानी 65 फीसदी निजी संस्थानों में हुए। सरकारी संस्थानों की तुलना में निजी संस्थानों की खुलने की रफ्तार बहुत तेज है। इसी वजह से शिक्षा की चाहत लिए नौजवान अधिक फीसें देकर भी निजी संस्थानों में पढ़ने को मजबूर हैं। (देखें तालिका)


        उच्च शिक्षण संस्थानों में आज की स्थिति यह है कि निजी संस्थान 76 फीसदी तक पहुंच चुके हैं। सरकारी की तुलना में 63 फीसदी छात्र निजी डिप्लोमा, सार्टिफिकेट कोर्स में एडमिशन लेते हैं जिसके पीछे सरकारी कालेजों का अभाव तो वजह है ही साथ ही यहां से नौकरी जल्दी मिल जाती है, की भी समझ काम करती है।

        शिक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी होती है किन्तु हमारी सरकारें इस जिम्मेदारी से पीछे हटती जा रही हैं। हमारी सरकारें छात्रों-अभिभावकों को शिक्षा के व्यापारियों के सामने लुटने के लिए फेंक दे रही है। इस लूट से हमें इंकार करने की आवश्यकता है और शिक्षा के व्यापारियों और उसको प्रशय देने वाली इस व्यवस्था के खिलाफ तीखा संघर्ष करने की आवश्यकता है।

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