बुधवार, 21 दिसंबर 2016

महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति

-कैलाश

        25 अक्टूबर 1917 के दिन रूस में एक युगान्तरकारी घटना घटी। जिसने एक नये युग का सूत्रपात कर दिया। यह घटना थी मजदूर क्रांति की, समाजवादी क्रांति की। इस घटना के बाद बीसवीं सदी इसी घटना के इर्द-गिर्द घूमती रही। कोई भी बात बिना मजदूर क्रांति की चर्चा किये बगैर ना सिर्फ अधूरी थी बल्कि वह पूर्णतः गलत हो जाती थी। साहित्य-ज्ञान विज्ञान से लेकर गुलाम देशों की हालत, संघर्ष, कोई भी बात या विश्लेषण मजदूर क्रांति के बगैर समझा ही नहीं जा सकता था। इस क्रांति को, समाजवादी राज्य को भले ही पहले-पहल पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासकों ने मान्यता न दी हो किंतु दुनिया के मेहनतकशों के लिए यह पहले ही दिन से मान्य था। बड़ी तेजी से वे समाजवाद के प्रति आकर्षित होते चले जा रहे थे। समाजवाद की ‘किताबी’ बातों को वे अपने यहां भी वस्तुगत सच्चाई बना देना चाहते थे। जिससे दुनिया का उत्पीड़क शासक बुरी तरह भयभीत था।
        महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति होने के बाद पहली बार मजदूर वर्ग शासक बना और उसने समाजवादी निर्माण किया। सदियों से दबाये, उत्पीड़ित, शोषित जन अब सत्ता पर काबिज हो गये। जिन्होंने रूस को बनाया, जो उसके असली निर्माता थे, अब रूस की सत्ता पर काबिज हो गये थे। अब उनके सामने बेहद चुनौतीपूर्ण रास्ता, काम था। उन्हें मजदूर राज की ना सिर्फ हिफाजत करनी थी बल्कि एक नये समाज समाजवादी समाज की भी आधारशिला रखनी थी
        सत्ता से पूंजीपति वर्ग को धकेलते ही उसकी राज्यमशीनरी को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया गया। राजकीय प्रतिष्ठानों, रेल, तालघर, बैंक, खदानों, जमींदारों-गिरजाघरों की जमीनों को तुरंत ही राजकीय नियंत्रण में ले लिया गया। वर्षों से युद्ध में जर्जर हो चुके रूस को मुक्त करने के लिए युद्ध से अलग होने की घोषणा पहले ही दिन कर दी गयी। जनता को रोटी, शांति देने के लिए मजदूर राज एकजुट प्रयास करने लगा। सैकड़ों वर्षों से उत्पीड़ित किसानों के बीच जमीनों का बंटवारा किया गया। 
        फ्रांसीसी क्रांति को 125 वर्ष से अधिक का समय हो जाने के बाद भी पूंजीवादी जनवाद बेहद सीमित था। गरीब, मेहनतकशों, महिलाओं को वोट डालने तक का अधिकार पूंजीवादी व्यवस्था नहीं दे सकी। किंतु रूसी क्रांति ने पहले ही दिन सार्विक मताधिकार की घोषणा कर दी। अपने देश के मजदूरों-मेहनतकशों को इस राज ने वो सारे अधिकार दिये जिनके बारे में पूंजीवादी व्यवस्था कभी सोच भी नहीं सकती थी। रूस की देखा-देखी, बढ़ते दबाव के कारण ही मजबूरीवश धीरे-धीरे पूंजीवादी देशों ने सार्विक मताधिकार का अधिकार दिया। 
        महान अक्टूबर क्रांति का ही प्रभाव था जिसने दुनिया के लुटेरे शासकों को कल्याणकारी राज्य के लिए मजबूर किया। क्रांति के बाद रूसी जनता का जीवन दुनिया के मेहनतकशों को बेहद आकर्षित करता था। और वे अपने यहां भी ऐसे जीवन, ऐसे राज के लिए संघर्ष करने लगे। पूंजीवादी शासकों ने अपना कुरूप चेहरा छिपाने के लिए कल्याणकारी राज्य का मुखोटा ओढ़ लिया। और जैसे ही पहले रूस और बाद में चीन में पुनस्र्थापना हुई इन राज्यों ने धीरे-धीरे अपना नकाब उतार दिया। कल्याणकारी राज्य को एक किनारे रख छुट्टे पूंजीवाद की ओर तेजी से बढ़ने लगे। 
        महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति एक वैश्विक महत्व की क्रांति थी। इसने दुनिया के हर कोने में अपना प्रभाव पैदा किया। क्रांति के वैज्ञानिक सिद्धान्त जो अब तक सिर्फ किताबों में दर्ज थे, लोग उन्हें सुन्दर कल्पना किंतु असंभव मानते थे। रूसी क्रांति ने इसे वास्तविकता में उतार दिया। समाजवाद का व्यापक और सफल प्रयोग दुनिया को कर दिखाया। इस क्रांति ने माक्र्सवाद को एक जीवित सच्चाई बना दिया। रूसी क्रांति से प्रेरणा पाकर और जिस ढंग से पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का संकट बढ़ता जा रहा था; ने पूरे यूरोप में क्रांति का संकट पैदा कर दिया। 
        1915 में जर्मनी में मजदूर-सैनिक बगावतें खड़ी करने लगे। सामाजिक जनवादी पार्टी की गद्दारी और भीषण दमन-हत्याचक्रों के बाद ही यहां क्रांति को रोका जा सका। हंगरी, इटली में भी जर्मनी के समान  ही तेजी से क्रांति के संघर्ष खड़े हुए किंतु यहां भी क्रांतियां न हो सकीं। 1918-20 के बीच फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन में क्रांतिकारी पार्टियां गठित हुयीं। यहां भी मजदूर आंदोलन, हड़तालों में भारी वृद्धि हुयी। माक्र्स की बात कि ‘‘ क्रांति का भूत यूरोपी शासकों को सता रहा है।’’ को वास्तविक तौर पर रूसी क्रांति के बाद देखा व महसूस किया गया। 
        महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति ने दुनिया में समाजवादी आंदोलन को तो प्रेरणा व वेग दिया साथ ही उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के संघर्ष को भी आगे बढ़ाने में भरपूर सहयोग दिया। साम्राज्यवाद द्वारा गुलाम बनाये गये देश अपनी मुक्ति के लिए छटपटा रहे थे। उनका एक मजबूत सहयोगी समाजवादी रूस अब मौजूद था। जिसने इन संघर्षों को तीखा-धारदार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका सभी जगह राष्ट्र मुक्ति के आंदोलन बेहद तेज हो गये और एक के बाद दूसरा-तीसरा देश आजाद होता चला गया। रूसी क्रांति ने सिद्ध किया कि अब पूंजीपति के नेतृत्व में जनवाद के लिए संघर्ष करने के दिन बीत चुके हैं। अब जनवाद के संघर्षों  को भी सर्वहारा के नेतृत्व में ही लड़ा और जीता जा सकता है। इस बात की सत्यता पर अंतिम मोहर चीनी क्रांति ने लगा दी।
        चीनी क्रांति में भी रूसी क्रांति का बड़ा प्रभाव पड़ा। 4 मई 1919 के छात्रों के आंदोलन में भी रूस में फूटे ऊर्जापुंज की ऊर्जा साफ देखी जा सकती है। इस आंदोलन के बाद से ही कहा जाता है कि चीन एक क्रांतिकारी युग में प्रवेश कर गया। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में क्रांतिकारी पार्टी बनने में रूस की एक बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। जिन पार्टियों ने देश में मजदूर वर्ग को राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्वकारी बनाया। राष्ट्र मुक्ति के संघर्षों में समाजवादी क्रांति का महत्व इसी तथ्य से पता चल जाता है कि जैसे ही चीन में पुनस्र्थापना होने के बाद समाजवादी क्रांति की श्रंखला टूटी वैसे ही राष्ट्रमुक्ति संघर्ष का विजय होना लगभग नामुमकिन बन गया। उसके बाद किसी भी देश में यह क्रांतिकारी संघर्ष सफल नहीं हो सका और अब तो स्थिति काफी गंभीर है। 
        समाजवादी क्रांतियों ने साम्राज्यवाद को सीधे सामने से चुनौती दी। उसे सामने से हराकर कमजोर किया तो राष्ट्रमुक्ति की लड़ाईयों ने उसे पीछे से धक्का मारकर कमजोर किया। इन दोनों ही संघर्षों में मजदूर वर्ग एक मजबूत ताकत था। यह ऐसा वक्त था जब कि लग रहा था कि साम्राज्यवाद के दिन अब गिने-चुने बचे हैं। कई देशों में समाजवादी क्रांति हो गयी। एक मजबूत समाजवादी खेमा दुनिया में मौजूद था, जो साम्राज्यवाद को लगातार चुनौती दे रहा था। 
        रूस में समाजवाद की राह कोई आसान राह नहीं थी। यह बलिदानों, कठिनाईयों से भरी राह थी। 
        गृहयुद्ध और साम्राज्यवादी देशों द्वारा थोपे गये युद्ध में रूसी मजदूरों ने अदम्य शौर्य का परिचय दिया। भीतरी-बाहरी दुश्मनों को परास्त कर ही वह रूस में समाजवादी निर्माण के लिए आगे बढ़ा। उसके बाद द्वितीय विश्वयुद्ध और तानाशाह हिटलर एक नयी चुनौती बनकर रूस व दुनिया के सामने खड़ा हुआ। दुनिया दो राहे पर खड़ी थी। या तो दुनिया बर्बरता-फासीवाद की ओर जाये या मानवता की ओर। क्रांतिकारी रूसी जनता ने अकूत बलिदान देकर दुनिया को फासीवादी दानव से बचाया। दुनिया को बर्बरता की राह पर जाने से बचाया। द्वितीय विश्वयुद्ध में 2 करोड़ रूसी नागरिक शहीद हुए। 
        मजदूर राज ने ना सिर्फ अपने देश में शोषण-उत्पीड़न खत्म किया बल्कि दुनिया में भी यह शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ लड़ने वाले देशों की जनता का भरपूर सहयोग करता था। साम्राज्यवादी गुलामी से राष्ट्रों के मुक्तिसंग्राम का एक बड़ा स्रोत सोवियत संघ रहा। 
        सोवियत संघ की इन्हीं तमाम उपलब्धियों के कारण पूरी दुनिया का मेहनतकश समाजवाद के प्रति आकर्षित हुआ और अपने देश के पूंजीवादी शासकों के खिलाफ संघर्ष करने लगा। दुनिया के साम्राज्यवादी-पूंजीवादी शासक इसे एक खौफनाक समय के तौर पर देखते थे। मजदूर राज को बदनाम करने, खत्म करने के लिए नित नये षड़यंत्र रचते थे। शासकों के विपरीत देश-दुनिया का मजदूर-मेहनतकश मजदूर राज से प्यार करता था। मजदूरों-मेहनतकशों के साथ-साथ दुनिया की तमाम प्रगतिशील जनवादी ताकतें भी रूस को एक आदर्श समाज के रूप में जानती व मानती थीं। मजदूर-मेहनतकश का समाजवाद के प्रति यह प्यार-सम्मान नाहक नहीं था। समाजवाद ने ही पहली बार उसे वह सब कुछ दिया जिसका वह हकदार था। समाजवाद ने मजदूर वर्ग को पहली बार एक शासक बनाया।उसे भूख, गरीबी, बदहाली, अपमान शोषण व उत्पीड़न से मुक्ति दिलाई।
        अक्टूबर क्रांति की सौवीं वर्षगांठ को याद करते हुए जब हम अपने समाज को देखते हैं तो ऐसी ही क्रांति की जरुरत बड़ी शिद्दत से महसूस करते हैं। आज हमारे देश व दुनिया को मजदूर राज समाजवाद की बेहद आवश्यकता है। अक्टूबर क्रांति की सौंवी वर्षगांठ पर यही संकल्प लेने की आवश्यकता है।

अतीत में क्रांतियों का आमतौर पर समापन सरकार के शीर्ष पर शोषकों के एक गुट को शोषकों के दूसरे गुट द्वारा हटाने से हो जाता था। शोषक बदल जाते थे, शोषण जारी रहता था। ऐसी स्थिति गुलामों से मुक्ति आंदोलन के दौरान थी। ऐसी स्थिति भूदासों के विद्रोहों के काल के दौरान थी। ऐसी स्थिति इंग्लैण्ड, फ्रांस और जर्मन की सुविदित ‘‘महान’’ क्रांतियों के दौरान थी। मैं पेरिस कम्यून की बात नहीं कर रहा हूं। वह सर्वहारा वर्ग द्वारा पूंजीवाद के विरूद्ध इतिहास को मोड़ने का पहला गौरवशाली, बहादुराना लेकिन असफल प्रयास था।
        अक्टूबर क्रांति इन क्रांतियों से सिद्धान्ततः भिन्न है। इसका लक्ष्य शोषण के एक रूप को शोषण के दूसरे रूप में, शोषकों के एक गुट को शोषकों के दूसरे गुट से बदलने का नहीं है बल्कि इसका लक्ष्य मनुष्य द्वारा मनुष्य के तमाम शोषण के खात्मे, शोषकों के सभी गुटों के खात्मे, सर्वहारा वर्ग के अधिनायकत्व को स्थापित करने, अब तक अस्वित्वमान सभी उत्पीड़ित वर्गों के सबसे क्रांतिकारी वर्ग की सत्ता को स्थापित करने, एक नये, वर्गहीन समाजवादी समाज को संगठित करने का है।
             -स्तालिन
  अक्टूबर क्रांति का अंतर्राष्ट्रीय चरित्र(अक्टूबर क्रांति की दसवीं वर्षगांठ के अवसर पर)

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