-दीपक
इस वर्ष 15 से 18 दिसम्बर तक नैरोबी, केन्या में आयोजित दसवें मंत्री स्तरीय सम्मेलन में भारत सरकार उच्च शिक्षा को गैट (जनरल एग्रीमेंट आॅन ट्रेड एंड सर्विसेज) के तहत लाने की तैयारी कर रही है। नैरोबी में इन प्रस्ताव के पास हो जाने के बाद डब्ल्यू.टी.ओ. (विश्व व्यापार संगठन) के 160 सदस्य देशों के पास ये अधिकार होगा कि वे अपने विद्यालयों की शाखा भारत में खोल सकते हैं। यदि विश्वविद्यालयों का मुख्य काम भारत में शिक्षा का प्रचार-प्रसार करना होता तो शायद ही कोई व्यक्ति इस सम्मेलन और प्रस्तावों का विरोध करता परन्तु हम बहुत अच्छी तरह से साम्राज्यवादियों व उनकी संस्थाओं की चाहत जानते हैं।
दरअसल पूंजीवाद प्रत्येक चीज की तरह शिक्षा को भी खरीदने-बेचने की वस्तु अर्थात माल में बदल देता है। यहां नए विद्यालय खोलने का उद्देश्य शिक्षित व्यक्तियों का निर्माण करना नहीं बल्कि अधिक से अधिक मुनाफा कमाना होेता है। इस मुनाफे की छटपटाहट ही साम्राज्यवादी देशों के विद्यालयों को भारत तथा अन्य मुल्कों में अपनी शाखाएं खोलने को प्रेरित कर रही हैं।
विश्व आर्थिक संकट के दौर से गुजरती साम्राज्यवादी पूंजी मुनाफे के नित नए साधन ढूंढ रही है। जो कुछ खरीदा-बेचा जा सकता है, नए कानून बनाकर उसे खरीदा-बेचा जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार 2008 तक शिक्षा का वैश्विक बाजार 111 अरब डालर का था। साम्राज्यवादी देशों में ये बाजार एक तरह से संतृप्त हैं वहां पहले से ही अधिकांश छात्र आबादी इस बाजार की ग्राहक बनी हुयी है। परन्तु तीसरी दुनिया के भारत जैसे मुल्कों में एक बड़ी आबादी ऐसी है, जिस पर साम्राज्यवादियों की नजर है। भारत में सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल 18 प्रतिशत छात्र ही उच्च शिक्षा तक पहुंच पाते हैं। इन विदेशी विद्यालयों की नजर इन 18 प्रतिशत छात्रों के साथ-साथ उन 82 प्रतिशत छात्रों पर भी है जो आर्थिक कारणों से उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। इन्हें भी बाजार से जोड़ने के लिए बैंक कर्ज का ऐसा जाल बुना जा रहा है, जिसमें फंसा छात्र जिन्दगी भर कर्जदार ही बना रहेगा। ये सब साम्राज्यवादियों के अपनाए हुए नुस्खे हैं। खुद अपने देशों में भी वे अपने छात्रों को लूटकर इसी तरह मुनाफा कमाते हैं।
1998 से ही विश्व व्यापार संगठन उच्च शिक्षा को डब्ल्यू.टी.ओ.-गैट के अंतर्गत लाने का प्रयास कर रहा है और इसी रोशनी में इन मुद्दों पर वार्ताओं का क्रम दोहा (कतर) में आयोजित चैथे मंत्री स्तरीय सम्मेलन में 2001 से ही शुरू हो गया था। भारत सरकार ने उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में अगस्त 2005 में ही विश्व व्यापार संगठन में प्रस्ताव रख दिया था। भारतीय पूंजीपतियों के विभिन्न धड़ों के बीच आपसी मतभेद होने के चलते पिछले दस सालों से इस पर आम राय नहीं बन पायी। परन्तु कांग्रेस सरकार विभिन्न तरीकों से इसके प्रावधानों को लागू करने की कोशिश करती रही। जिसके लिए वे संसद में अलग-अलग मौकों पर छः अलग-अलग बिल भी लेकर आयी। परन्तु वामपंथियों के विरोध के चलते सरकार इन बिलों को पास नहीं करवा सकी। साम्राज्यवादी दबाव व खुद अपनी जरूरतों के चलते भारत का एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग अब और इंतजार करने को तैयार नहीं है। मोदी सरकार के बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद से उसके मंसूबे इस दिशा में तेजी से बढ़े हैं। इस बात की प्रबल संभावना है कि इस बार सरकार इस पर तैयार हो जाए। सरकार के हालिया कदम भी इस ओर इशारा करते हैं, जिसमें सरकार एक ओर शिक्षा के बजट में कटौती कर रही है तो उच्च शिक्षा में निजीकरण को तेजी से बढ़ा रही है। आज भारत का पूंजीपति वर्ग बिल्कुल नहीं चाहता कि सरकार शिक्षा जैसे ‘‘बेकार के कामों’’ में खर्चा करे। बल्कि उसकी चाहत उच्च शिक्षा के बाजार को अपने कब्जे में करके उससे भारी मुनाफा कमाने की है।
शिक्षा सेवाओं में व्यापार के लिए गैट ने मुख्यतः चार प्रणालियां बनायी हैं जिसमें छात्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जायेंगे, छात्र विदेशी संस्थान में पत्राचार के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करेंगे, विदेशी शिक्षा प्रदाता भारत में विश्वविद्यालय खोलेंगे और विदेशी अध्यापक भारतीय शिक्षण संस्थानों में अपनी सेवा देंगे; शामिल हैं। ये वह तरीके हैं जिनके जरिये विदेशी संस्थान भारत के छात्रों को लूटकर अपनी जेब भरेंगे। क्योंकि इनका मुख्य मकसद शिक्षा देना नहीं बल्कि मुनाफा कमाना है। अन्य देशों में विदेशी संस्थानों के खोले जाने से सम्बन्धित सन् 2000 की एक रिपोर्ट में खुद साम्राज्यवादी संस्था विश्व बैंक को इन संस्थानों की आलोचना करनी पड़ी, जिन्होंने केवल मुनाफा कमाने के उद्देश्य से अपने घटिया दर्जे के विश्वविद्यालयों को अन्य देशों मेें खोला था। यही सब भारत में भी होगा।
जिस देश की 82 प्रतिशत छात्र आबादी उच्च शिक्षा तक नहीं पहुंच पाती, उस देश की सरकार नए कालेज खोलने के बजाए शिक्षा बजट में कटौती कर रही है। सबको शिक्षा देने की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए विदेशी विश्वविद्यालयों को न्यौता दे रही है जिनमें सीटें पहले ही पैसे वालों के लिए आरक्षित हैं।
ऐसे में सरकार के इस छात्र विरोधी कदम का विरोध जरूरी बन जाता है। सबको निशुल्क और वैज्ञानिक शिक्षा के नारे के साथ ज्ञान को मुनाफे की बेड़ियों से आजाद कराने का लक्ष्य मेहनतकश समुदाय को अपने सामने रखना ही पड़ेगा। तब तक सरकार द्वारा शिक्षा के निजीकरण के जरिए सबको शिक्षा देने के अपने कर्तव्य से पल्ला झाड़ने का व्यापक विरोध खड़ा करना चाहिए।
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