शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

बैन की राजनीति

आईआईटी मद्रास मामला 
-योगिता
        यूं तो शासक वर्ग हमेशा से तार्किक और वैज्ञानिक विचारों से घबराता रहा है। लेकिन मोदी-नीत भाजपा सरकार ने सत्ताशीन होने के बाद से ही जनवादी ताकतों पर चैतरफा हमला बोलना शुरु कर दिया है। ताजा मामला आईआईटी मद्रास का है जिसके अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्किल(एपीएससी) नाम के एक स्टूडेंट ग्रुप को मानव संसाधन विकास मंत्रालय(एम.एच.आई.डी) के हस्तक्षेप के बाद संस्थान ने डिरिक्नोइडड(नामंजूर) कर दिया। संस्थान के डीन आफ स्टूडेंट(डीओएस) ने 22 मई को अपने आदेश में, एपीएससी पर संस्थान द्वारा मिले अधिकारों का दुरुपयोग करने का आरोप लगाते हुए उसे बैन कर दिया।
उसके बाद से ही पूरे देश की मीडिया व जनवादी तबकों में ये मामला गर्माया है और पूरे देश में जनवादी ताकतों के विरोध के चलते संस्थान को एपीएससी से बैन हटाना पड़ा है। दरअसल डीओएस ने ये कदम मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 15 मई को संस्थान को भेजे गये एक पत्र के जवाब में उठाया था। जिसमें आईआईटीएम से प्राप्त एक पत्र का हवाला देते हुए एपीएससी के खिलाफ जांच कर, कार्यवाही करने के आदेश मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आईआईटीएम को दिये थे। हुआ यूं कि आईआईटीएम से एक अनाम पत्र मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजा गया था जिसमें एपीएससी पर दलित छात्रों को बांटने, उन्हें देश के प्रधानमंत्री मोदी व हिन्दुओं के खिलाफ भड़काने का आरोप लगाया गया था।
        उसके बाद से ही ये पूरा मामला अस्तित्व में आया। होना तो यह चाहिए था कि एमएचआरडी को सबसे पहले इस अनाम पत्र की जांच करानी चाहिए थी और उसके बाद आगे की कार्यवाही करनी चाहिए थी पर हुआ ठीक इसका उल्टा। एमएचआरडी ने अपने स्वभाव के मुताबिक आनन-फानन में एपीएससी के खिलाफ जांच के आदेश दे दिये। इससे पहले भी एक फासिस्ट द्वारा आईआईटी में मांस खिलाए जाने की शिकायत करने पर एमएचआरडी ने आईआईटी में शाकाहारी छात्रों का भोजन अलग पकाने के आदेश दिये थे। इन दोनों ही मामलों में एमएचआरडी ने त्वरित कार्यवही करते हुए भाजपा सरकार के फासिस्ट एजेण्डे को लागू करने की कोशिश की। यही एमएचआरडी शिक्षा के सवाल पर मिलने आए छात्रों व शिक्षकों से मिलने तक से मना कर देता है। देश भर से भेजी जा रही शिकायतों पर चुप्पी साधे रहता है। परंतु उपरोक्त मामले में इसके द्वारा दिखायी गयी तेजी इसकी मंशा को जाहिर करती है। दरअसल देश में आईआईटी जैसे संस्थान बुद्धिजीवी छात्रों का केन्द्र बनते हैं जो एक सही दिशा मिलने पर समाज व छात्र-समुदाय को अपने साथ खड़ा कर सकते हैं और यही चीज मोदी सरकार के लिए खतरनाक है। इसीलिए वह किसी भी तरह की जनवादी और वैज्ञानिक सोच से घबराते हैं। इसीलिए वह भारतीय इतिहास परिषद, विज्ञान कांग्रेस व शिक्षा संस्थानों का सांप्रदायिकरण करना चाहते हैं। जिससे उनके तथाकथित हिन्दू राष्ट्र पर कोई सवाल न उठा सके। ताजा मामला इसका जीता जागता सबूत है। 
        एपीएससी, आईआईटी मद्रास में दलित व पिछड़े छात्रों को एक ग्रुप है, जो छात्रों के बीच अम्बेडकर-पेरियार से लेकर भगत सिंह के विचारों का प्रचार-प्रसार करता रहा है। 14 अप्रैल 2014 में अपने गठन के बाद से ही ये कृषि, भाषा, श्रम कानूनों में बदलाव से जुड़े सवालों पर अध्ययन चक्र चलाता रहा है। इसी क्रम में वे मोदी सरकार की पूंजीपरस्त नीतियों की आलोचना भी छात्रों के बीच करता रहा है। जिसके चलते वह लंबे समय से आईआईटी प्रशासन की आंखों में खटक रहा था। पहले भी आईआईटी प्रशासन ने एपीएससी पर अंबेडकर व पेरियार जैसे राजनीतिक लोगों के नाम का इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर इसकी कार्यवाहियों को रोकने की कोशिश की थी। जबकि इसी संस्थान में ‘विवेकानंद’ के नाम से एक दक्षिणपंथी स्टडी ग्रुप लंबे समय से काम करता है। परंतु संस्थान को इसके नाम से कोई दिक्कत नहीं है। 
        एपीएससी पर की गयी उपरोक्त कार्यवाही मोदी-नीत भाजपा सरकार के सामान्य व्यवहार का हिस्सा है। देश के अंदर कई दलितवादी संगठन इसे दलितों के ऊपर हमले के बतौर देखते हैं। और यहीं से इन संगठनों की सीमाएं उजागर हो जाती हैं। जबकि पूरे देश के भीतर शैक्षिक संस्थानों में भाजपा सरकार द्वारा यही कोशिश की जा रही है। जरूरत बनती है कि भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति का पर्दाफाश कर उसकी हर तानाशाही पूर्ण कार्यवाही का मुंहतोड़ जवाब दिया जाय।                 

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