-पंकज
यमन में अपने घृणित हितों की पूर्ति करने के लिए साम्राज्यवादी अमेरिका, सऊदी अरब व उसके सहयोगी देशों ने शैतानी कुकृत्य को अंजाम दिया। साम्राज्यवाद द्वारा एक और मुल्क को खून में डुबो दिया गया। हजारों बेकसूर लोगों को अपने हितों की भेंट चढ़ा दिया गया। इस समय यमन साम्राज्यवाद, आतंकवाद और सऊदी अरब व पड़ोसी देशों के खतरनाक कुचक्र में फंसा हुआ है। साम्राज्यवाद द्वारा किसी देश को तबाह और बर्बाद करने का यह एक अन्य उदाहरण है।
26 मार्च से यमन पर सऊदी अरब के नेतृत्व में लगातार हवाई हमले जारी हैं। संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, जार्डन, मोरक्को, सूडान और मिस्र या तो इस हमले में शामिल हैं या इसका समर्थन कर रहे हैं। अमेरिका, ब्रिटेन सरीखे साम्राज्यवादी मुल्क बड़ी ही बेशर्मी से सऊदी अरब के इस कृत्य का समर्थन कर रहे हैं।
WHO के अनुसार 31 मई तक इस बमबारी में 2288 लोग मारे गये हैं और 9755 घायल हुए हैं। विस्थापितों की संख्या 10 लाख से ऊपर जा पहुंची है। जाहिर है ये सारे आंकड़े सच्चाई को बयां करने वाले नहीं हैं। वास्तविक मौतों, घायलों एवं विस्थापितों की संख्या इससे कहीं अधिक होगी। इस हमले ने पहले से शरणार्थी शिविरों में रह रहे 3 लाख 34 हजार लोगों के जीवन को और भी नारकीय बना दिया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत यमन के नागरिक मौजूदा समय में भुखमरी का शिकार हैं। यमन इस वक्त खाना, पानी, बिजली व अन्य जरूरतों की कमी से जूझ रहा है। यमन के अधिकतर हवाई अड्डों और बंदरगाह को नष्ट कर दिया गया है; जिससे खाना व दवाईयां आ सकती थीं। मरने वाले और घायलों में से आधे आम जन हैं जिनमें महिलाएं और बच्चे भी शामिल हैं।
अमेरिका की सरपरस्ती में तथा सऊदी अरब के नेतृत्व में हो रहे इन हमलों में अस्पतालों और स्कूलों को भी नहीं बख़्शा गया है। वहां भी निरंतर बमबारी जारी है। इन स्थानों पर हमले का बहाना उन्होंने यह बनाया है कि इन जगहों का इस्तेमाल हूति विद्रोही कर रहे हैं या सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं। रिहायशी इलाकों, स्कूलों, अस्पतालों में हमला करना अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानूनों का घोर उल्लंघन है। पूरे प्रांत पर हमला करना तो और भी गंभीर अपराध है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र इन उल्लंघनों को देखने के लिए अंधा और सुनने के लिए बहरा बना हुआ है।
हालांकि 14 मई को मानवीय आधार पर अस्थाई युद्ध विराम की घोषणा का ढ़ोंग किया गया। इसके पीछे यह बात कही गयी कि यमन तक मानवीय मदद पहुंचाई जा सके। लेकिन इस ढोंग पर से तब पर्दा उठ गया जब युद्ध विराम की घोषणा के बाद भी हमले जारी रहे। 19 मई को सऊदी अरब ने ‘युद्ध विराम’ को खत्म करते हुए पुनः हमले जारी कर दिये। यह अमेरिकी साम्राज्यवादियों और सऊदी अरब की रक्तपिपासु मंसूबों का एक ताजा उदाहरण है। यह सर्वविदित है कि सऊदी अरब खाड़ी देशों में सर्वाधिक प्रतिक्रियावादी और जनवाद विरोधी राज्य है। इसके अलावा आतंकवाद को पालने-पोसने व हर तरह की मदद देने में भी उसका इतिहास काला है। अमेरिकी साम्राज्यवादी कभी लोकतंत्र के नाम पर तो कभी आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के नाम पर गरीब मुल्कों पर हमले करते रहे हैं। अपनी पसंद की सरकारें गठित करने व अपने आर्थिक हितों को साधने के लिए वे गरीब मुल्कों पर हमले करने के बहाने खोजने में सिद्धहस्त हैं। इन हमलों में लाखों बेगुनाहों जिसमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल हैं, को मौत की नींद सुला दिया गया।
यमन 2011 में अरब जन उभार के समय से ही राजनीतिक अस्थिरता को झेल रहा है। 2012 में लंबे समय से शासन कर रहे यमन के राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह को सत्ता से बेदखल करने के बाद स्थिति और बुरी हो गयी। अब्दुल रब्बुह मंसूर हैदी को अंतरिम सरकार का मुखिया बनाया गया। हैदी की अंतरिम सरकार का कार्यकाल 21 जनवरी 2014 को एक प्रशासनिक प्रक्रिया के जरिये बढ़ाया गया। इसके पीछे यह आकांक्षा काम कर रही थी कि हैदी सुधारों को लागू कर सके। मगर वे इसमें असफल रहे। पिछले 3 वर्षों के दौरान ही ‘अरब प्रायद्वीप में अलकायदा’ नामक चरमपंथी संगठन काफी सक्रिय हुआ है। इस चरमपंथी संगठन की सक्रियता अमेरिका द्वारा किये गये ड्रोन हमलों की प्रतिक्रियास्वरूप थी। इसी समय हूति एक राजनीतिक शक्ति के बतौर उभर कर आये। हूति शिया इस्लाम के जैदी संप्रदाय से संबंध रखते हैं। हूति पिछले बीस सालों से केन्द्रीय सरकार और सऊदी अरब के खिलाफ संघर्षरत हैं। पिछले वर्ष के सितंबर के बाद जब हूति विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया तो उन्होंने इससे और आगे बढ़ते हुए बड़े शहरों की तरफ रुख किया। इस प्रकार हूति विद्रोही और उनके सहयोगियों का नियंत्रण यमन पर बढ़ता चला गया है। राष्ट्रपति हैदी यमन से भाग खड़े हुए और सऊदी अरब की शरण में चले गये।
2011 का जनउभार सिर्फ अब्दुल्ला सालेह की तानाशाही के खिलाफ फूटा था यह कहना ठीक न होगा। इस जनउभार के पीछे भ्रष्टाचार, बेरोजगारी जैसी समस्याएं भीषण रूप में यमन के समाज को बराबर उद्वेलित कर रही थीं। अब्दुल्ला सालेह संविधान में बदलाव कर स्वयं को आजीवन राष्ट्रपति और अपने बेटे को अपना उत्तराधिकारी बनाना चाहते थे। लेकिन यमन की जनता ने उनके इस अरमान पर पानी फेर दिया। क्योंकि इस जनउभार को कोई क्रांतिकारी समूह नेतृत्व नहीं दे रहा था। ठीक इसी कारण यह जनउभार अपना लक्ष्य हासिल करने से वंचित हो गया। शासक वर्ग, आस-पड़ोस की घोर दक्षिणपंथी शेखशाहियों ने इस जनाक्रोश को सांप्रदायिक रंग देना शुरु किया। यमन में लगभग 60 प्रतिशत सुन्नी और 40 प्रतिशत शिया मुस्लिम आबादी रहती है। अरब देशों की शेखशाहियों ने पहले अलकायदा और बाद में इस्लामिक स्टेट का इस्तेमाल कर यमन में हूति विद्रोहियों को शिकस्त देने व अपनी मनपसंद की सरकार गठित करने की कोशिश की। इसमें असफल होने के बाद सऊदी अरब ने सीधे हवाई हमले करने का फैसला लिया।
सऊदी अरब का कहना है कि वह यमन पर तब तक हमला जारी रखेगा जब तक कि हूति विद्रोहियों को सैन्य तौर पर पराजित न कर दे और हैदी को पुनः राष्ट्रपति के पद पर स्थापित न कर दे।
अमेरिका और ब्रिटेन सहित अन्य साम्राज्यवादी मुल्क बड़ी ही बेशर्मी के साथ इस युद्ध में या तो मदद कर रहे हैं या इस युद्ध का समर्थन कर रहे हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में अनेक देशों की संप्रभुता को कुचलते हुए, पिछड़े व गरीब मुल्कों पर युद्ध थोपने का उनका इतिहास काफी पुराना है। इन अमानवीय युद्धों में लाखों बेकसूर लोगों की हत्याएं साम्राज्यवादियों द्वारा की गयी। प्रत्यक्ष व अप्रत्क्ष तौर पर मौतों की संख्या और भी ज्यादा है। अपने घृिणत हितों को साधने के लिए साम्राज्यवादियों द्वारा आर्थिक प्रतिबंध लगाकर बच्चों को भोजन, पानी, दवाईयों आदि के अभाव में मौत की नींद सुला दिया। ऐसा नहीं है कि यमन पर सऊदी अरब और उसके सहयोगियों द्वारा ये हवाई हमले बिना साम्राज्यवाद की शह के हो रहे हैं। बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक रहेगा कि बगैर साम्राज्यवादी शक्तियों के इसमें किसी न किसी रूप में शामिल हुए यह युद्ध संभव ही नहीं हैं।
अमेरिका ने सार्वजनिक तौर पर यह कहा है कि यमन के खिलाफ इस युद्ध में उसकी भूमिका खुफिया जानकारी इकट्ठा करने और कुछ ढांचागत समर्थन सऊदी अरब को देने तक सीमित रहेगी। वह अमेरिका ही है जो सऊदी अरब को वे सारी खुफिया जानकारी दे रहा है जिसके आधार पर सऊदी अरब और गठबंधन यमन पर हमले कर रहे हैं। अमेरिकी खुफिया विमान यमन के आकाश में उड़कर हमले के ठिकानों को चिह्नित कर रहे हैं। जब स्कूलों, अस्पतालों पर हमले हो रहे हैं तो इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि इसमें अमेरिका का हाथ नहीं है। सऊदी अरब, अमेरिका, ब्रिटेन व नाटो द्वारा दिये गये हथियारों से ही वह हमले कर रहा है। उत्तरी यमन के कई गांवों में क्लस्टर बम गिराये गये। ये बम सदा प्रांत के अल सफरा क्षेत्र में गिराये गये जहां सैकड़ों लोग रहते हैं। अभी हाल ही में अमेरिका ने सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को ब्ठन्.105 नामक सेन्सर फूज्ड हथियार दिये हैं। यह ऐसा हथियार है जो स्वतः ही किसी इमारत या वाहन पर निशाना साध सकता है। इसको अमेरिका की टेक्सट्रोन सिस्टम कार्पोरेशन ने बनाया है।
क्लस्टर हथियार अंतर्राष्ट्रीय संधि द्वारा प्रतिबंधित हैं। दुनिया के 100 से ज्यादा देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। किंतु सऊदी अरब और अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। 2003 में इराक में भी अमेरिका ने भारी पैमाने पर क्लस्टर बमों का प्रयोग कर भीषण नरसंहार को अंजाम दिया था। 1960 व 1970 के दशक में अमेरिकी वायुसेना व नौसेना ने हजारों टन क्लस्टर बमों की वर्षा वियतनाम, कम्बोडिया और लाओस में की। अमेरिका व उसका लठैत इजराइल दुनिया में सर्वाधिक क्लस्टर निर्माता है। हर युद्ध में अमेरिका अपने हथियारों को बेचकर भारी मुनाफा कमाता है। हथियार कारोबार भी युद्ध को पैदा करने का एक कारण है।
पिछले 5 वर्षो में सऊदी अरब की शेखशाही के साथ 90 बिलियन का हथियार सौदा किया गया है। सऊदी अरब को अमेरिका द्वारा 84 नये जैट फायटर, 160 नये हथियारों से लैस हैलिकाप्टर, टैंकरोधी मिसाइल, भारी तोपें, हथियार बंद वाहन दिये गये हैं।
यमन के अपने विशेष भू-राजनीतिक महत्व के कारण सऊदी अरब और अमेरिका उसे अपने प्रभुत्व में लेना चाहते हैं। अरब के तेल भंडारों तक अपनी पहुंच को सुगम बनाने के लिए भी यमन एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बनता है। यमन का समुद्री मार्ग भी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में विशेष महत्व रखता है। सऊदी अरब और अमेरिका इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को किसी भी कीमत पर अपने कब्जेे में लेना चाहते हैं। अगर यमन में कब्जा होता है तो यह ‘‘शैतान राष्ट्र’’ ईरान पर अपने नियंत्रण को कसने हेतु रणनीतिक तौर पर बेहद लाभकारी होगा।
इसके अलावा इस युद्ध का एक और कारण यह है कि अमेरिका यमन का एक बार फिर बंटवारा कराने की साजिश पाले हुए है। दक्षिणी यमन जहां कि अधिकांश आबादी सुन्नी है, को सऊदी अरब में मिलाने की साजिश जारी है। बंटवारा होने की स्थिति में अमेरिका व सऊदी अरब को सीधे लाभ पहुंचेगा। उन्हें अरब सागर तक मार्ग अपने व्यापार के लिए मिल जायेगा। इससे व्यापार हेतु फारस की खाड़ी पर इनकी निर्भरता खत्म हो जायेगी तथा साथ ही ईरान के हरमुज मार्ग को रोकने का डर भी खत्म हो जायेगा। अमेरिका यमन पर इसलिए भी नियंत्रण रखना चाहता है कि वहां से ईरान और हरमुज मार्ग पर भी नजर रख सके।
इस प्रकार यमन में अपने घृणित हितों की पूर्ति करने के लिए साम्राज्यवादी अमेरिका, सऊदी अरब व उसके सहयोगी देशों ने शैतानी कुकृत्य को अंजाम दिया। साम्राज्यवाद द्वारा एक और मुल्क को खून में डुबो दिया गया। हजारों बेकसूर लोगों को अपने हितों की भेंट चढ़ा दिया गया। इस समय यमन साम्राज्यवाद, आतंकवाद और सऊदी अरब व पड़ोसी देशों के खतरनाक कुचक्र में फंसा हुआ है। साम्राज्यवाद द्वारा किसी देश को तबाह और बर्बाद करने का यह एक अन्य उदाहरण है।
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