शनिवार, 15 अगस्त 2015

भारतीय राज्य के जिम्मेदारी से पलायन और शिक्षा के माल बनने की कथा

-रोहन
शिक्षा के माल बनाये जाने के घातक परिणाम निकल रहे हैं और ज्यादा निकलने हैं। ऐसे अभिभावकों, छात्रों और शिक्षकों में रोष दिनोंदिन पनप रहा है जो शिक्षा के माल बनने से ठगे व छले जा रहे हैं। आये दिन ऐसी घटनाएं घट रही हैं जिसमें इन शोषित-उत्पीड़ितों का आक्रोश फूट पड़ता है। इस पूरी परिघटना को ठीक व सही से न समझ पाने के कारण यह आक्रोश दिशाहीन होकर ठण्डा पड़ जाता है। यह आक्रोश तभी दिशा पा सकता है जब वह शिक्षा के जिम्मेदारी से राज्य के पलायन के षड़यंत्र को समझे और साथ ही एक ऐसी व्यवस्था के लिए लड़े जहां शिक्षा माल न हो। जहां देश के सभी नागरिकों को निःशुल्क, वैज्ञानिक, तार्किक, जीवनोपयोगी शिक्षा उसकी मातृभाषा में मिले। और ऐसा करना राज्य की जिम्मेदारी हो। ऐसी शिक्षा वर्तमान घृणित व्यवस्था में नहीं मिल सकती।


बहुत समय नहीं बीता है जब शिक्षा को ज्ञान और मुक्ति से जोड़ा जाता था। अक्सर ही शिक्षा को ऐसे पेश किया जाता था कि इससे व्यक्ति के चरित्र का निर्माण होता है और वह गुलामी से मुक्ति पाये भारत के राष्ट्र निर्माण में  योगदान देगा। 
        शिक्षा का संदर्भ पिछले दो-तीन दशकों में इस कदर बदला कि ये बातें पूरे समाज से हवा हो गईं। ज्ञान, मुक्ति, समाज, राष्ट्र की चिंता करने वाली बातें न तो शिक्षा में रहीं और न ही ऐसे शिक्षक रहे जो अपने विद्यार्थियों के लिए वह सब कुछ करते थे जो वह कर सकते थे। 
        असल में जब देश गुलाम था और वह अपनी मुक्ति के लिए छटपटा रहा था तब ऐसे मूल्य, आदर्श जन्म ले रहे थे जो भगत सिंह जैसे विद्यार्थियों और मास्टर सूर्यसेन जैसे अध्यापक को पैदा कर रहे थे। हालांकि शिक्षा का ढर्रा कुछ और था।
        अंग्रेज हमारे शासक थे और लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा व्यवस्था की नींव डाली थी जिससे गुलामों की कौम पैदा होती रहे और वह अंग्रेजों की सेवा को ही अपना आदर्श माने। हजारों ऐसे लोग तैयार हुए जिन्होंने जो अंग्रेजों ने चाहा उसी को अपना आदर्श माना। उन्हीं की नकल करते हुए जीवन जिया। 
        परन्तु अंग्रेजों की इच्छा के खिलाफ भी बहुत कुछ हुआ और ऐसे देशभक्त पैदा हुए जिन्होंने शिक्षा को देश की गुलामी से मुक्ति के एक हथियार के रूप में प्रयोग किया। ढेरों ऐसे व्यक्तियों के नाम और जीवन से हम परिचित हैं और ढेरों का नाम इतिहास की किसी पुस्तक में दर्ज नहीं है। 
        आजाद भारत ऐसा भारत नहीं था जिसकी कल्पना भारत के शहीदों ने की थी। ज्यादातर लोगों के जीवन की आवश्यकता ऐसे भारत की थी जिसमें हर व्यक्ति को वह सब चीजें उपलब्ध हों जिसकी दरकार एक इंसान को होती है। आजादी, बराबरी, भाईचारे से निर्मित एक ऐसा भारत लोगों की कल्पना में था जिसे भारत के संविधान की प्रस्तावना में तो लिखा गया, जोड़ा गया परन्तु हकीकत से उसका कोई लेना-देना नहीं था। यानी समाजवादी भारत। 
        बीसवीं सदी में जब से रूस में लेनिन और बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में समाजवाद की स्थापना हुयी थी तब से हर गुलाम देश समाजवाद से प्रेरणा पाता था। सोवियत संघ की समाजवादी व्यवस्था को एक आदर्श के रूप में देखा जाता था और तीसरी दुनिया की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले नेता अक्सर ही इस बात की घोषणा करते थे कि वे आजाद होने के बाद अपने देश में समाजवाद की स्थापना करेंगे। 
        दूसरे विश्व युद्ध में जब सोवियत संघ ने हिटलर की फासीवादी व्यवस्था को धूल चटा दी और जब चीन ने माओ के नेतृत्व में समाजवाद की राह पकड़ी और जब दुनिया के एक बड़े हिस्से में समाजवाद की जय हो रही थी तब तीसरी दुनिया का कोई ऐसा देश नहीं था जहां समाजवाद का नारा न गूंज रहा हो, जहां समाजवाद की नकल करते हुए सैकड़ों कदम न उठाये जा रहे हों। 
        भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू अपने युग के अन्य नेताओं की तरह समाजवाद की माला जपते थे और भारत के लिए उसे आदर्श बताते थे। राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेन्द्र देव जैसे भी समाजवाद की बात करते थे। हद तो यह हुई थी कि भारतीय जनता पार्टी ने भी 1980 में अपनी स्थापना के समय समाजवाद की चर्चा की थी। गांधीवादी समाजवाद को अपना आदर्श बताया था। समाजवादी राज्य और यहां तक कि लोक कल्याणकारी राज्य(नार्वे, स्वीडन, फिनलैण्ड आदि) में इस बात को एक सिद्धांत के रूप में माना जाता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आदि चीजें ऐसी हैं जिनकी जिम्मेदारी राज्य(स्टेट) को उठानी चाहिए। निःशुल्क शिक्षा, निःशुल्क स्वास्थ्य और इसी तरह रोजगार का बंदोबस्त करना राज्य की जिम्मेदारी है। 
        भारत के सरकारी स्कूल, कालेज, अस्पताल इसी तर्ज पर थे। सामान्य तर्क यह भी था कि जब राज्य नागरिकों से विभिन्न किस्म के टैक्स वसूलता है तो उसे ऐसे कार्य करने ही चाहिये जो नागरिकों की बुनियादी जरूरतों के लिए बेहद आवश्यक हैं। 
        आजाद भारत में नयी आर्थिक नीतियों को स्वीकार किये जाने से पहले यही माना जाता था कि देश के हर नागरिक की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी चीजों का बंदोबस्त करना भारतीय राज्य की जिम्मेदारी है और अक्सर ही इस तरह की मांगों को लेकर लोकप्रिय आंदोलन फूटते रहते थे। 
        सत्तर-अस्सी के दशक में देश के विभिन्न शहरों, कस्बों और गांवों में स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय आदि की स्थापना के लिए जुझारू आंदोलन हुए। ऐसे ही संघर्षों के फलस्वरूप कुमायूं, गढ़वाल, रूहेलखंड विश्वविद्यालय अस्तित्व में आये। 
        ऐसे ही उस दौरान ऐसे भी लोकप्रिय छात्र व जन आंदोलन हुये जिसमें मांग होती थी कि निजी स्कूल, कालेजों का राजकीयकरण किया जाय। शिक्षकों को सरकारी मापदंड के हिसाब से वेतन व नियुक्ति दी जाय। ऐसे ही आंदोलन के फलस्वरूप हल्द्वानी का मोतीराम बाबूलाल महाविद्यालय राजकीय कालेज बना। यही बात रामनगर, कोटद्वार, देहरादून, बरेली, इलाहाबाद, बनारस, दिल्ली से लेकर देश के ढेरों शहरों, कस्बों के महाविद्यालयों के अतीत में झांकने से सामने आयेगी। 
        ये बात हमें याद दिलाती है कि हमारे देश में ऐसा कभी नहीं रहा जब शिक्षा निजी हाथों में न रही हो। आजादी के पूर्व व बाद में ढेरों ऐसे कालेज, विद्यालय थे जो निजी हाथों में थे। इनके संस्थापक उच्च आदर्शोें से प्रेरित रविन्द्र नाथ टैगोर(शांति निकेतन) जैसे व्यक्तियों से लेकर उदारमना बनिये-व्यापारी तक होते थे। धार्मिक स्कूल-कालेजों की संख्या हमेशा से ठीक-ठाक रही। अंग्रेजों की ‘बांटो और राज करो’ की नीति के तहत धार्मिक पुनरुत्थानवादियों को भी आधुनिक शिक्षा को धर्म की चाश्नी में लपेटकर देने के लिए प्रोत्साहित किया गया। बनारस का हिंदू विश्वविद्यालय और अलीगढ़ की मुस्लिम यूनिवर्सिटी ऐसे ही शिक्षण संस्थान थे। 
        आजाद भारत में धार्मिक शिक्षण संस्थानों की संख्या कम होने के स्थान पर बढ़ती गयी। हर धर्म के पूंजीपतियों, धार्मिक नेताओं ने ऐसे विद्यालय, कालेज खोले जो धार्मिक शिक्षा के साथ आधुनिक शिक्षा देते थे। खालसा स्कूल, दयानंद एंग्लो वैदिक(डीएवी) काॅलेज, इस्लामिक मदरसा, सरस्वती शिशु मंदिर, क्रिश्चयन कालेज आदि-आदि की भरमार है।
        कहां तो धर्मनिरपेक्षता का तकाजा है कि राज्य का धर्म से अलगाव हो। शिक्षा में धर्म की कोई पैठ न हो। समाज, राजनीति, शासन-प्रशासन में धर्म की कोई भूमिका न हो। धर्म व्यक्तिगत मामला है। कोई माने या न माने यह उस व्यक्ति की स्वतंत्रता है। परंतु हमारे देश में संविधान की प्रस्तावना में भले ही धर्मनिरपेक्षता लिखा हो परंतु हकीकत में धार्मिक कूपमंडूकता, मध्ययुगीन मूल्यों को भारतीय राज्य प्रशय देता, बढ़ावा देता है। 
        नई आर्थिक नीतियों(निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण) की शुरुआत के पहले समय तक राज्य की भूमिका शासकों से लेकर जनता तक यह स्थापित थी कि वह शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि का बंदोबस्त करेगा। इस सोच में परिवर्तन नई आर्थिक नीतियों के आगाज के साथ भारत के शासकों द्वारा लाया गया। तब के भारत के प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने घोषणा कि सरकार कोई धर्मशाला नहीं है। 
        इस बात का अर्थ था कि यह भारतीय राज्य की जिम्मेदारी नहीं है कि वह भारतीय नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ, रोजगार आदि का बंदोबस्त करे। सरकार इन मदों में एक निश्चित ढंग से कटौती करने लगी। शिक्षा को निजी हाथों में सौंपे जाने की क्रमशः नीतियां बनने लगीं और पिछले ढाई दशकों में भारत का शैक्षिक परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया। 
        निजी स्कूलों, कालेजों, विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों में अभूतपूर्व वृद्धि देखने को मिली। देश का हर छोटा-बड़ा पूंजीपति शिक्षा के ‘धंधे’ में उतर गया। फाइव स्टार होटलों की तर्ज से लेकर हाइवे पर खुले ढावों की तरह स्कूल-कालेज खुलने लगे। बरसात में कुकुरमुत्ते की तरह उगे इन स्कूल-कालेजों की हालत यह है कि किसी स्कूल कालेज में भले ही आस-पास के शहरों और जिलों के विद्यार्थी भी न पढ़ते हों परंतु उसके नाम में ‘ग्लोबल’, ‘इण्टरनेशनल’ अवश्य शामिल रहता है। ये निजीकरण के साथ वैश्वीकरण के अनुपम उदाहरण हैं। 
        बड़े पूंजीपतियों ने तो देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तरह स्कूल-कालेज की श्रृंखला स्थापित कर दी। ‘बिग बाजार’, ‘ईजी डे’ आदि की तर्ज पर ‘दिल्ली पब्लिक स्कूल’ (डीपीएस), ‘बिडला स्कूल’, ‘जी लर्निंग’, ‘मदर्स प्राइड’ आदि आदि को देश की राजधानी से लेकर सुदूर जिलों-शहरों में देखा जा सकता है। अरबों-करोड़ों का कारोबार इन स्कूलों-कालेजों की श्रृंखला में होता है। 
        इसी तरह देश के नामी-निरामी संस्थानों विशेषकर मेडिकल और इंजीनियरिंग में दाखिले को लेकर करोड़ों रुपये का कारोबार करने वाले कोचिंग संस्थानों की भरमार है। राजस्थान का कोटा तो कोचिंग का गढ़ ही कहा जाता है। 
        बात इतनी रहती तो गनीमत होती। अब स्थिति यह है कि पूरे देश में पूंजीपति-राजनेता-अफसरों का ऐसा गठजोड़ कायम हो चुका है जो शिक्षा के इस आधुनिक निजीकृत कारोबार से करोड़ों रुपया कमा रहा है। काले धन को इस धंधे के जरिये सफेद किया जा रहा है। सारे नियम-कायदे-कानून ताक पर रखकर मेडिकल, इंजीनियरिंग कालेज और विश्वविद्यालय खोले जा रहे हैं। उनके प्रवेश में धांधलियां हो रही हैं। लाखों रुपये के वारे-न्यारे किये जा रहे हैं। 
        पूंजीपति-राजनेता-अफसरों का घृणित गठजोड़ इस धंधे में किस कदर लिप्त है इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर मध्य प्रदेश का ‘व्यापम घोटाला’ सामने आया है। घोटाले का खुलासा होने के बाद सबसे बड़े अपराधियों के चेहरे पर पड़ी नकाब कहीं उतर न जाये इसके लिए आये दिन इस घोटाले से सम्बन्धित व्यक्तियों की हत्याएं की जा रही हैं। बड़े ही शातिर ढंग से कई हत्याओं को आत्महत्यायें घोषित कर दिया गया है। 
ठीक जिस समय सरकार शिक्षा के क्षेत्र में निजीकरण की नीतियों को बढ़ावा दे रही है उसी समय भारत की जनता को छलने के नाम पर देश की संसद शिक्षा का अधिकार(राइट टू एजूकेशन) का कानून पारित करती है। इस कानून के तहत एक चैथाई सीटें गरीबी की रेखा के नीचे वालों के लिए मुकर्रर की जाती हैं। हकीकत में होता उलटा है। नामी-गिरामी स्कूलों में इन सीटों में दाखिले को लेकर एक नया गोरखधंधा पैदा हो चुका है। हाल ही में दिल्ली के कई स्कूलों में इस ‘शिक्षा के अधिकार’ का धंधा करने वालों का रैकेट सामने आया जो इसके जरिये अमीरों को कमजोर तबके का साबित कर इन स्कूलों में प्रवेश करा रहा था। स्कूल वाले इसकी एवज में मोटी रकम वसूल रहे थे। दलाल अपनी दलाली से ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे थे। 
        अतीत के समाजवादी आदर्शों व वर्तमान की कड़वी सच्चाईयों के बीच शिक्षा के निजीकरण का अर्थ तलाशा जाय तो वह क्या निकलेगा। 
        शिक्षा के निजीकरण का अर्थ है- राज्य का शिक्षा अधिकार की वास्तव में कोई गारंटी न करना। अपनी जिम्मेदारी से पलायन करना और इसके बंदोबस्त से अपने हाथ खींचना। शिक्षा को सभी वस्तुओं और सेवाओं की तरह एक माल(कमोडिटी) बना देना और जिस की जैसी हैसियत हो उसके हिसाब से वह अच्छा या खराब माल खरीदे। 
        शिक्षा का एक माल बनने के साथ अब आदर्शों का कोई अर्थ नहीं रह गया है जो कभी शिक्षा के साथ जोड़े जाते थे। उनमें एक तरफ वे आदर्श जो एक नव स्वाधीन देश के राष्ट्र निर्माण से संबन्धित थे तो दूसरी तरफ पुराने की निरंतरता में वे आदर्श थे जो धर्म या सामंती मूल्य-मान्यताओं से लैस थे। मुक्ति अपने समुदाय के मूल्यों के अनुरूप जीवन जीने की शिक्षा, सेवा आदि बातों का अब शिक्षा में कोई खास महत्व नहीं है। इनका महत्व तभी है जब इस शिक्षा से फासीवादी, कट्टरपंथी मकसद हासिल करने हों। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा संचालित ‘निजी’ स्कूलों-कालेजों में दी जाने वाली शिक्षा का उद्देश्य भारत में हिंदू फासीवादी राज्य की स्थापना है। जाहिर है यह हिंदू फासीवादी राज्य गरीबों के हितों को नहीं एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के हितों को साधता है और खासकर ऐसे समय में साधता है जब पूंजीवाद घोर संकटग्रस्त हो और उसके सामने सामाजिक जन क्रांति का खतरा मंडरा रहा हो। 
        शिक्षा का माल बनते जाने से वह नापाक गठजोड़ कायम हो गया है जिसमें छोटे-बड़े पूंजीपति, राजनेता और अफसर शामिल हैं। काले धन को सफेद बना देने का यह कारोबार धर्म की तरह ही है। जो बातें बड़ी-बड़ी करता है पर हकीकत में काले कारनामों से भरा रहता है। भारत के पूंजीपति, राजनेता, अफसरों को अपने काले धन को सफेद धन बनाने में शिक्षा के निजीकरण ने एक बड़ी भूमिका निभायी है। 
        आज पूरे समाज में स्थिति यह है कि चाहे किसी को एहसास हो या न हो शिक्षा को एक माल के रूप में पूरे तौर से मान्यता मिल चुकी है। जब किसी स्कूल-कालेज में ऊंची फीस देने के बाद भी ठीक व अच्छा ‘माल’ नहीं मिलता है तो अभिभावकों, विद्यार्थियों का गुस्सा फूट पड़ता है। फरवरी से लेकर जुलाई माह के बीच हर वर्ष हर शहर-कस्बे में ऐसे आंदोलन फूटते रहते हैं। गुस्ताखी माफ हो जब इन आंदोलन को अच्छे माल की ख्वाहिश के आंदोलन कहा जा रहा है तो इसका आशय मात्र इतना है कि जब तक शिक्षा के माल बनाये जाने का मूल विरोध नहीं किया जायेगा तब तक इस तरह के संघर्षों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। जब तक ऐसे आंदोलन उपभोक्ता फोरम की शिकायतों-संघर्षों की तरह ही चलेंगे। 
        शिक्षा के निजीकरण का एक परिणाम यह भी निकला कि शिक्षक के पेशे की सारी गरिमा खत्म हो गयी। वैसे तो यह पूंजीवाद का आम नियम है कि कभी एक समय गरिमामय माने जाने वाले सारे पेशों को ही पैसे के ‘बर्फीले पानी’ में डुबो दिया पर भारतीय समाज में यह प्रक्रिया थोड़ी देर और धीमी गति से घटी। 
        कुछ दशक पूर्व तक शिक्षकों के प्रति पूरे भारतीय समाज में बहुत सम्मान का भाव था। आज शिक्षक इस ‘माल’ से अमीर बनने का प्रयास करते हैं और कई बन भी जाते हैं। और जो बेचारे ऐसा कुछ नहीं कर पाते या कर सकते वे कुंठित होकर दिहाड़ी पर जाने वाले बन गये हैं। भले ही इनका नाम ‘मेहमान अध्यापक’ (गेस्ट टीचर) हो। शिक्षण के पेशे में अब वही पारंगत माना जाता है जो कतई पेशेवर अंदाज में इस धंधे को करता हो और जब वह चलता हो तो उसके जेब में पड़े सोने के सिक्कों की खनक दूर तक जाती हो। 
        शिक्षा के माल वाले इस युग में सबसे बुरा हाल उसका है जो इसके केन्द्र में होना चाहिए था। यानि विद्यार्थियों का। सब उससे खिलवाड़ कर रहे हैं। भारतीय राज्य, पूंजीपति, राजनेता, शिक्षा अधिकारी, प्रबंधक, शिक्षक और यहां तक कि उन बेचारों के मां-बाप तक। 
        व्यवस्था के मारे अभिभावकों के लिए अपनी संतानों की शिक्षा पर खर्च किये जाना वाला धन पूंजी निवेश है। आज पूंजी निवेश करने का अर्थ है कल उस पूंजी का दुगना-तिगुना होना। आजकल भाषा में जिसे निवेश पर रिटन्र्स भी कहा जा सकता है और जो विद्यार्थी ऐसा न कर पाये तो उसके अभिभावकों का शोक, कुंठा में डूबना लाजिमी है या फिर उस छात्र का जो अपने मां-बाप को यथोचित मूल सहित सूद न लौटा पाया हो। 
        शिक्षा के माल बनने के धंधे में एक बड़े लाभकारी की चर्चा और करना जरूरी है। ये लाभकारी हैं जो शिक्षा के नाम पर ऋण उपलब्ध कराते हैं। बैकों का यह नया धंधा है जो शिक्षा के निजीकरण के फलस्वरूप पनपा है। लाखों छात्र और उनके अभिभावक हमारे देश सहित पूरी दुनिया में ऋण जाल में फंसे हुए हैं। अभिभावकों-छात्रों को इस ऋण जाल में बड़े ही धूर्तता से ये शिक्षण संस्थान और बैंक धकेलते हैं। 
        शिक्षा के माल बनाये जाने के घातक परिणाम निकल रहे हैं और ज्यादा निकलने हैं। ऐसे अभिभावकों, छात्रों और शिक्षकों में रोष दिनोंदिन पनप रहा है जो शिक्षा के माल बनने से ठगे व छले जा रहे हैं। आये दिन ऐसी घटनाएं घट रही हैं जिसमें इन शोषित-उत्पीड़ितों का आक्रोश फूट पड़ता है। इस पूरी परिघटना को ठीक व सही से न समझ पाने के कारण यह आक्रोश दिशाहीन होकर ठण्डा पड़ जाता है। यह आक्रोश तभी दिशा पा सकता है जब वह शिक्षा के जिम्मेदारी से राज्य के पलायन के षड़यंत्र को समझे और साथ ही एक ऐसी व्यवस्था के लिए लड़े जहां शिक्षा माल न हो। जहां देश के सभी नागरिकों को निःशुल्क, वैज्ञानिक, तार्किक, जीवनोपयोगी शिक्षा उसकी मातृभाषा में मिले। और ऐसा करना राज्य की जिम्मेदारी हो। ऐसी शिक्षा वर्तमान घृणित व्यवस्था मंे नहीं मिल सकती। पूंजीवाद में तो बर्बरता का ही बोलबाला होना है। समाजवाद ही ऐसी व्यवस्था हो सकती है जिसका झूठा वायदा तो हमारे देश के शासकों व संविधान ने किया था परंतु जिसे हकीकत में उतारने का न तो उसका इरादा था और न ही कोई योजना। समाजवाद पूंजीपति वर्ग की पार्टी और नेता कभी नहीं लाना चाहेंगे और न वे ला सकते हैं। समाजवादी व्यवस्था कायम करने का काम तो देश के शोषित-उत्पीड़ित मजदूरों और किसानों का है। उनकी संतानों का है। भगत सिंह के सच्चे वारिसों का है। इस दूरगामी लक्ष्य को हासिल करने के लिए जरूरी है कि भारतीय राज्य के शिक्षा देने के जिम्मेदारी से पलायन का खुलासा किया जाय। शिक्षा के माल बनाये जाने का विरोध किया जाय। पूंजीपतियों-राजनेताओं-अधिकारियों के नापाक गठजोड़ का भाण्डा फोड़ा जाय। मनमानी फीसों, ऋण जाल, आवश्यक शैक्षिक सुविधाओं के अभाव आदि का विरोध किया जाय।
                 

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