-सम्पादकीय
पिछले तीन दशकों से जारी शिक्षा के निजीकरण की प्रक्रिया एक ऊंचे मुकाम पर पहुंच चुकी है। इस मुकाम में शिक्षा का हाल देखें तो शिक्षण संस्थान दुकान, छात्र अभिभावक ग्राहक और शिक्षा एक माल बन चुकी है। जिस तरह एक माल को खरीदने के लिए मोल-भाव होता है। उत्पाद बेचने के लिए लुभावने विज्ञापन होते हैं, वैसे ही शिक्षा के साथ हो रहा है। निजी स्कूल-कालेज के मालिक फीस की किस्त, ‘जाॅब गारंटी’ आदि-आदि ‘स्कीमों’ के भडकीले विज्ञापन के साथ अपने माल का विज्ञापन कर रहे हैं।
इन तीस वर्षों में सरकार द्वारा लगातार सरकारी शिक्षा के ढांचे को जर-जर किया गया और निजी शिक्षण संस्थानों को खूब प्रोत्साहन दिया गया। प्राइमरी सरकारी शिक्षा को खस्ताहाल बना देने के बाद अब इसे गैर सरकारी संगठनों, फाउंडेशनों के हवाले करने की तैयारी की जा रही है। ‘अजीम जी फाउंडेशन’ ऐसा ही फाउंडेशन बनकर उभरा है। शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देने का परिणाम ही है कि महानगरों से लेकर छोटे-मोटे कस्बों तक में निजी शिक्षण संस्थान भारी मात्रा में खुल चुके हैं। आज का सच यह है कि सरकारी स्कूलों की संख्या और यहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या दोनों ही मामलों में निजी शिक्षण संस्थान आगे हैं।
देश में सरकारी शिक्षा के साथ-साथ निजी शिक्षा वैसे तो हमेशा ही रही है। भारत में माध्यमिक शिक्षा तो लाला-सेठों, के भरोसे ही अधिक रही। प्राथमिक और उच्च शिक्षा में निजी शिक्षण संस्थान मौजूद रहे। सिर्फ तकनीकी शिक्षा ही पूरी तरह सरकारी रही। निजी शिक्षण संस्थान लाला, सेठों, धार्मिक समूहों द्वारा खोले जाते रहे। धार्मिक समूहों के स्कूलों को आज भी ठीक-ठाक संख्या में हम देख सकते हैं।
धन्ना सेठों द्वारा खोले गये माध्यमिक व उच्च शिक्षण संस्थानों में छात्रों और शिक्षकों का भारी उत्पीड़न किया जाता था। जिससे त्रस्त छात्र-शिक्षक लगातार संघर्षरत रहते थे। धीरे-धीरे संघर्ष ‘राजकीयकरण करो’ की मांग की ओर मुड़ गये। संघर्षों के दवाब में आकर सरकार द्वारा स्कूल-कालेज का सरकारीकरण किया गया। सरकारीकरण से अध्यापकों को सम्मान मिला उनका भविष्य सुरक्षित हुआ और छात्रों को कम फीसों में शिक्षा हासिल करने का मौका मिला।
यह सब कुछ दशक तक चला। भारतीय पूंजीपति वर्ग और अधिक मुनाफे की गरज से तथाकथित बंद अर्थव्यवस्था के माॅडल को त्यागकर खुली अर्थव्यवस्था की बंदरबांट अर्थव्यवस्था के माडल को अपनाने के लिए बढ़ा। निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण की नीतियों को जोर-शोर से लागू किया जाने लगा। जिन नीतियों का ही परिणाम है कि सरकार सामाजिक सुरक्षा की मदों में कटौती करे और हर क्षेत्र को पूंजीपति की लूट के लिए खुला छोड़ दे। परिणाम स्पष्टता से दिखने भी लगे। सरकार द्वारा शिक्षा व अन्य सामाजिक मदों पर खर्च लगातार कम होता चला गया और पूंजीपतियों को शिक्षा से भी मुनाफा कमाने की छूट दे दी गयी। अब सरकार कहने लगी ‘शिक्षा मुनाफे के लिए नहीं, सोच से हमें छुटकारा पाना होगा’।
शिक्षा के निजीकरण ने शिक्षा के नाम पर कारोबारी गठजोड़ को कायम किया है। पहले के छोटे-मोटे सेठों द्वारा खोले गये निजी स्कूलों के मुकाबले अब शिक्षा के धंधे में देशी-विदेशी पूंजी अपना खेल, खेल रही है। फाइव स्टार सुविधाओं से युक्त प्राइमरी स्कूल से लेकर तकनीकी शिक्षा सब जगह पूंजीपति हाथ आजमा रहा है, मुनाफा कमा रहा है। छोटी पूंजीवाले पूंजीपति इस बाजार में अपनी दुकानें खोलकर छात्र-अभिभावकों को लूट रहे हैं।
पूंजीपतियों की इस मुनाफे की गंगा में बैंक अपने हाथ धोने से कैसे पीछे रह सकते हैं। बैंक छात्रों को कर्ज उपलब्ध कराकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। छात्रों को कर्ज के मकड़जाल में फंसा रहे हैं।
शिक्षा के निजीकरण की यह मुहिम देशी-विदेशी पूंजीपतियों के हित में है। आज गरीब छात्र तो इन महंगे निजी स्कूल-कालेजोें में दाखिला भी नहीं ले पा रहा है। हां उसकी चाहत हमेशा बनी रहती है। जो निजी स्कूल-कालेज आज मेहनतकशों के हिस्से में आते हैं उनमें कई वर्ष पढ़ने के बाद पता चलता है कि यह संस्थान गैर मान्यता प्राप्त है। तब छात्र खुद को ठगा महसूस करता है और अपने परिवार की गाढी कमाई इन संस्थानों में लुटा चुका होता है।
निजीकरण को लागू करने बाद सरकार, सरकार द्वारा दी जाने वाली शिक्षा को बोझ कहने लगी। इस काम को सरकार जनता में खैरात बांटने जैसा समझने लगी। हमारा स्पष्ट कहना है कि शिक्षा पर सरकार का खर्च कोई खैरात नहीं, मेहनतकश परिवार सरकार को प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष कर देते हैं। जिसकी एवज में हमें शिक्षा-स्वास्थ्य इत्यादि मिलना ही चाहिए। यह खैरात नहीं बल्कि हमारा अधिकार है। राज्य की जिम्मेदारी है, जिससे राज्य पीछे हटा है।
शिक्षा के निजीकरण के बाद खुली यह छोटी-बड़ी शिक्षा की दुकानें लूट और फर्जीवाडे के केन्द्र हैं। छात्र समुदाय को इनके खिलाफ एक होकर ‘शिक्षा सरकार की जिम्मेदारी है’ का नारा बुलंद करना होगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें