बुधवार, 23 दिसंबर 2015

एफटीआईआई-139 दिन तक चला जुझारू आंदोलन

        -चंदन

        फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट आफ इंडिया (एफटीआईआई) के छात्रों का 139 दिन चला जुझारू संघर्ष अक्टूबर अंत में स्थगित हो गया। छात्र 12 जून,2015 से एफटीआईआई के अध्यक्ष पद पर गजेन्द्र चैहान व 4 अन्य लोगों की नियुक्ति का विरोध कर रहे थे। केन्द्र की मोदी सरकार के संघी एजेण्डे के तहत शिक्षा को भगवा रंग में रंगने के खिलाफ छात्रों का संघर्ष महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आंदोलन पर एक संक्षिप्त नजर डालना उचित रहेगा।

        केन्द्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा 9 जून को गजेन्द्र चैहान को नियुक्ति दी गई। एफटीआईआई, पुणे के छात्र 12 जून से कक्षाएं छोड़ नियुक्ति का विरोध करने लगे। उन्होंने साफ सवाल उठाया कि उक्त पद पर फिल्म जगत से जुड़े योग्य व्यक्ति को चुना जाये न कि अयोग्य को। गजेन्द्र चैहान को भाजपा के प्रचारक होने के ईनाम के रूप में ही यह पद सौंपा गया। इन बातों के साथ आंदोलन पुणे व दिल्ली में लड़ा गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय आदि के बाहर प्रदर्शन, धरने, अनशन, आदि गतिविधियां भी हुईं। पुलिस की लाठी, मार, रात मंे छात्रावास से चोरों की तरह पुलिस ने छात्रों को गिरफ्तार भी किया। सरकार व प्रशासन के हर दमन की कार्यवाही का छात्रों ने मजबूती से मुकाबला किया। 9 बार मंत्रालय से बेनतीजा मुलाकात के बाद अंततः छात्रों ने निराश हो सरकार से किसी भी प्रकार की बातचीत से इंकार कर दिया। नये सत्र में छात्रों का प्रवेश हो सके तथा सत्र शून्य न हो इस कारण छात्रों ने कक्षाओं में जाने और अन्य रूपों में आंदोलन जारी रखनको फैसला किया। 
        एफटीआईआई के छात्र व्यापक मेहनतकश और न्यायप्रिय जनता तक अपने संघर्ष की आवाज पहुंचाने मेें सफल हुए। अब छात्र तमाम जनपक्षधर साहित्यकारों, फिल्मकारों व जनवादी, क्रांतिकारी लोगों से उम्मीद करते हैं कि वे इस संघर्ष को अपनी आवाज दें। 
        एफटीआईआई के छात्रों का संघर्ष यदि सफलता न हासिल कर सका तो इसका मुख्य कारण सरकार का घोर दक्षिणपंथी फासीवादी रुख है। जहां संघर्ष की किसी भी आवाज को सुनने को कोई नहीं, बल्कि तानाशाही पूर्ण ढंग से दमन की ही गुंजाइश है। 
        एफटीआईआई के छात्रों का जुझारू और जोशपूर्ण यह संघर्ष व्यापक छात्रों का संघर्ष न बन सका। यदि शिक्षा के भगवाकरण की मार झेल रहे अन्य संस्थानों के छात्रों को भी इसमें शामिल किया जाता तो आंदोलन और ऊंचाईयां प्राप्त करता। छात्रों की इस छूट गयी संख्या के साथ सरकार पर दबाव भी बढ़ जाता। सरकार के प्रति अधिक आशांवित होना भी ठीक नहीं था। एकाधिकारी पूंजी व संघी गठजोड़ की सरकार को भी चुनौती दी जाने की जरूरत थी। उसे नकारे बिना उसके फैसले को ही नकारना संघर्ष के प्रभाव को हल्का कर देता है। 
        आंदोलन के हश्र से ज्यादा उसका प्रभाव मायने रखता है। एफटीआईआई के छात्रों का आंदोलन अंधेरे में दिये की लौ की तरह उभरा। इसने अंधेरे दौर को चुनौती दी। निश्चित तौर पर इस आंदोलन से सबक लेकर भविष्य के संघर्ष इस पूंजीवादी व्यवस्था के हर कारनामे सहित व्यवस्था बदलने तक की दिशा लेंगे। तभी भोर का वह लाल तारा सारी दुनिया में प्रकाश एवं जीवन का संदेश देगा।

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